आज़ादी विशेषांक / Freedom Special

अंक 13 / Issue 13

All entries by this author

जनपद में बारिश अभी अभी थमी है : सुधांशु फिरदौस

कविता / Poetry

Art: Samia Singh अन्दर या बाहर विरह की इस अंधेरी रात में अब तो जुगनुओं ने भी रास्ता दिखाने से इनकार कर दिया है मंजिल बहुत दूर है और आवारा सड़कें मुझे कब की रौंद चुकी हैं कड़कती हड्डियों का दर्द, ज़र्द त्वचा की सारी चमक और जमाने भर की हैरत अपने आँखों में समेट घर की दहलीज़ पर पशोपेश में बैठा हूँ कि तुम्हारा इंतज़ार किस ओर मुँह कर के करूँ अन्दर या […]



कहानी ढलान की उम्र लिख रही है : सिद्धार्थ

कविता / Poetry

1. विदर्भ से तेलन्गाना तक एक एक बार समुद्र लिखा था दस मिनट तक फिर रेत भर थकान बस्तर, लोकतंत्र वगैरा इस बार असंख्य कपड़ों की दूकानों के बीच राह बनाती महानगर की नंगी सड़क कपास के बियाबान में बूँद भर बारिश की लिखत कौड़ियों से ज़िन्दगी बुनती अपने मटमैलेपन में अदृश्य पांच साल की […]



जीवन और मृत्‍यु के बीच जो संवाद-सा कुछ है: शिरीष कुमार मौर्य

कथेतर / Non-Fiction

मृत्‍युबोध एक जटिल विषय है. मृत्‍यु के बारे में सोचते हुए या उसे अपने आसपास घटित होते देखते हुए कोई ज़रूरी नहीं है कि आप उससे भयभीत भी हों …  इसलिए सबसे पहले तो यही कहना चाहूँगा कि मृत्‍युबोध अलग वस्‍तु है और मृत्‍युभय अलग…. इन्‍हें मिला देना बहुत कुछ गड़बड़ कर देना है ..ख़ासकर […]



टॉफी का विज्ञापन देता विमान : मोनिका कुमार

कविता / Poetry

१ खेल समारोह में दर्शकों के पाले में बैठ देखती हूँ खिलाड़ी गरमा रहें हैं खुद को दूर से वे लग रहें हैं दौड़ते हुए सफेद जुराबों के जोड़े उड़ते हुए गुब्बारे अब खो गए हैं पाले में बैठे बच्चों ने भी समझ लिया है सब गुब्बारे खेलने के नहीं कुछ गुब्बारे विधान के लिए […]



नदी के द्वीप: प्रतीक और विचार – प्रणय कृष्ण

कथेतर / Non-Fiction

हम नदी के द्वीप हैं. हम नहीं कहते कि हमको छोड़कर स्रोतस्विनी बह जाए. वह हमें आकार देती है. हमारे कोण, गलियाँ, अंतरीप, उभार, सैकत-कूल सब गोलाइयाँ उसकी गढ़ी हैं. माँ है वह! है, इसी से हम बने हैं. किंतु हम हैं द्वीप. हम धारा नहीं हैं. स्थिर समर्पण है हमारा. हम सदा से द्वीप […]



अजनबीपन की गंभीरता में : प्रशांत श्रीवास्तव

कविता / Poetry

आवाज़   उनकी आवाज़ नहीं जा पाती उनकी परछाईयों से आगे   और हम गिनने लगते खामोशियाँ जबकि कुछ कहा गया कुछ ऐसा जैसे ठिठके हुए हिरण ने कहा हिरण से और वो जो पानी की परछाईं-सी कौंध गई मौत नहीं थी स्मृति का एक कोना टूट कर गिरा था   वो आ रहे हैं […]



लोकप्रियता और राग दरबारी: अमितेश कुमार

कथेतर / Non-Fiction

राग दरबारी पर कुछ लिखने का प्रस्ताव मिलने से हुए अनुभव को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता. प्रस्ताव पर स्वीकृति की मुहर लगाने के बाद समस्या यह थी कि लिखने का विषय क्या हो? बहुत सारे विषय एक एक कर दिमाग में धक्कम पेल करने लगे. ‘घास खोदने’ की पद्धति का अनुसरण करते […]



That I be a gannet: Pratyaksha

कथा / Fiction

He listens to her voice with a rapt attention. Sometimes when her voice crackles he strains to hear, pushing the receiver hard against his ears. He has begun to suffer from tingling ears. It is lonely, very lonely. But it is a sort of being and most times he does not think about it. It […]



जेतवन में भिक्षुणी : विशाल श्रीवास्तव

कविता / Poetry

अयोध्या में प्रेम   सरयू तट की घास पर बैठे हुए हैं हम इस शालीन दोपहर में जब और धूप का एक शिशु टुकड़ा नरमार्इ से खेल रहा है तुम्हारी पीठ के साथ ठीक उसी वक्त मैं यह सोचना शुरू करता हूँ  कि यह हवा जिसमें हम सांस ले रहे हैं क्या हमें इतनी इज़ाजत […]



तुलसी की कवितार्इ और आधुनिक हिन्दी का मानस: केदारनाथ सिंह

कथेतर / Non-Fiction

श्री देवताले जी, रामप्रकाश जी, श्री राजेश जोशी, आग्नेय जी, रमेशचन्द्र शाह और मेरे कर्इ सारे प्रिय बन्धु, जो मेरे सामने बैठे हैं, और मानस में गहरी पैठ रखने वाले ध्रुव शुक्ल, मेरे सामने बैठे हुए हैं. मैं इस विषय के साथ थोड़ी छेड़छाड़ करूँगा, आपकी अनुमति से. मैं तुलसीदास की दो प्रसिद्ध पंक्तियों का […]