जहां रोउं तो गिरे आंसू: मनोज कुमार झा
कविता / Poetryप्रतिमान वो एक पुरानी दुकान बब्बन हलवाई की वहां मिठाइयों से मिक्खयां भगा रहे एक वृद्ध स्वाद बचाने का कोई व्रत हो कदाचित. कहते हैं सन बियालीस की लड़ाई में इनकी टांग टूट गई थी गोतिया था लिखने-पढ़ने में होशियार सो उठा रहा स्वतन्त्रता-पेंशन. इनके जीभ में किसी जिन्न का वास है तुरन्त बता देंगे [...]







