आज़ादी विशेषांक / Freedom Special

अंक 13 / Issue 13

Archive for October 2008

बाबेल से पहले / Before Babel

सम्पादकीय / Editorial

Editorial for October 2008
अक्टूबर २००८ का सम्पादकीय



बाबेल से पहले / Before Babel

सम्पादकीय / Editorial

Editorial for October 2008
अक्टूबर २००८ का सम्पादकीय



बाबेल से पहले / Before Babel

सम्पादकीय / Editorial

Editorial for October 2008
अक्टूबर २००८ का सम्पादकीय



बाबेल से पहले / Before Babel

सम्पादकीय / Editorial

Editorial for October 2008
अक्टूबर २००८ का सम्पादकीय



In Search of Ramanand – The Guru of Kabir and Others: Purushottam Agrawal

शीर्ष कथा / Lead Feature

प्रसिद्द कबीर अध्येता पुरुषोत्तम अग्रवाल का यह शोध आलेख उस रामानंद की खोज करता है जिसे परम्पराएं और मध्यकालीन स्रोत संत-कवि कबीर और अन्यों के गुरु की तरह स्वीकार करती आयी हैं किन्तु आधुनिक पांडित्य न सिर्फ़ ‘एक ब्राह्मण’ रामानंद के ‘एक जुलाहे’ कबीर का गुरु होने से, बल्कि दोनों के समकालीन होने से भी इनकार करता है. यह पाठ, सप्रमाण, इन दोनों आधुनिक मिथकों का खंडन करते हुए उस ‘संस्कृत रामानंद’ को भी एक्सपोज करता है जिसे बीसवीं शताब्दी में ‘आविष्कृत’ किया गया और जिसे बाद के शोधकर्ताओं ने सर्वसम्मति से ‘ऐतिहासिक रामानंद’ की तरह प्रतिष्ठित कर दिया.

पुरुषोत्तम अग्रवाल का पाठ ‘संस्कृत रामानंद’ के बरक्स ‘हिन्दी रामानंद’ को, ‘आधुनिक’ के बरक्स ‘मध्यकालीन’ को पढ़ते हुए अस्मितामूलक विमर्शों का, और उनमें सक्रिय ‘प्रामाणिक प्रतिनिधित्व’ की धारणा का भी, क्रिटीक निर्मित करता है, जो समूची परंपराओं को ‘संस्थाबद्ध साज़िश’ में और एक मनुष्य को अपनी जातीय, सामुदायिक पहचान के आत्मचेतनाहीन नमूने (Sample) में घटा देती है.जैसा यह पाठ कटु व्यंग्य से पूछता है, क्या कबीर के ‘प्रामाणिक प्रतिनिधित्व’ के लिये हमें किसी ‘ओबीसी आलोचक’ की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी?

Renowned Kabir scholar, Purushottam Agarwal’s research paper sets off in search of Ramanand whom tradition(s) and medieval sources have referred to as the guru of the Sant-poet Kabir and others. Modern scholarship, however, holds that Ramanand and Kabir were not contemporaries and that the Brahman Ramanand could not have been the guru of the low-caste Kabir. This text, in disproving both these modern myths also exposes the ‘Sanskrit Ramanand’ as a 20th century construct whom later scholars have, almost unanimously, estabished as the ‘Historic Ramanand’.

By reading the ‘Hindi Ramanand’ against the ‘Sanskrit Ramanand’, the ‘medieval’ against the ‘modern’, Purushottam Agarwal’s text develops a critique of the identity discourses (and the undercurrent notion of ‘authentic representation’) which reduce entire traditions into ‘institutionalized conspiracies’ and reduce a human being to merely a function of his caste or communal identity. As the text asks sarcastically, will we have to wait for a “critic belonging to the OBCs” to receive an “authentic representation” of Kabir?



In Search of Ramanand – The Guru of Kabir and Others: Purushottam Agrawal

शीर्ष कथा / Lead Feature

प्रसिद्द कबीर अध्येता पुरुषोत्तम अग्रवाल का यह शोध आलेख उस रामानंद की खोज करता है जिसे परम्पराएं और मध्यकालीन स्रोत संत-कवि कबीर और अन्यों के गुरु की तरह स्वीकार करती आयी हैं किन्तु आधुनिक पांडित्य न सिर्फ़ ‘एक ब्राह्मण’ रामानंद के ‘एक जुलाहे’ कबीर का गुरु होने से, बल्कि दोनों के समकालीन होने से भी इनकार करता है. यह पाठ, सप्रमाण, इन दोनों आधुनिक मिथकों का खंडन करते हुए उस ‘संस्कृत रामानंद’ को भी एक्सपोज करता है जिसे बीसवीं शताब्दी में ‘आविष्कृत’ किया गया और जिसे बाद के शोधकर्ताओं ने सर्वसम्मति से ‘ऐतिहासिक रामानंद’ की तरह प्रतिष्ठित कर दिया.

पुरुषोत्तम अग्रवाल का पाठ ‘संस्कृत रामानंद’ के बरक्स ‘हिन्दी रामानंद’ को, ‘आधुनिक’ के बरक्स ‘मध्यकालीन’ को पढ़ते हुए अस्मितामूलक विमर्शों का, और उनमें सक्रिय ‘प्रामाणिक प्रतिनिधित्व’ की धारणा का भी, क्रिटीक निर्मित करता है, जो समूची परंपराओं को ‘संस्थाबद्ध साज़िश’ में और एक मनुष्य को अपनी जातीय, सामुदायिक पहचान के आत्मचेतनाहीन नमूने (Sample) में घटा देती है.जैसा यह पाठ कटु व्यंग्य से पूछता है, क्या कबीर के ‘प्रामाणिक प्रतिनिधित्व’ के लिये हमें किसी ‘ओबीसी आलोचक’ की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी?

Renowned Kabir scholar, Purushottam Agarwal’s research paper sets off in search of Ramanand whom tradition(s) and medieval sources have referred to as the guru of the Sant-poet Kabir and others. Modern scholarship, however, holds that Ramanand and Kabir were not contemporaries and that the Brahman Ramanand could not have been the guru of the low-caste Kabir. This text, in disproving both these modern myths also exposes the ‘Sanskrit Ramanand’ as a 20th century construct whom later scholars have, almost unanimously, estabished as the ‘Historic Ramanand’.

By reading the ‘Hindi Ramanand’ against the ‘Sanskrit Ramanand’, the ‘medieval’ against the ‘modern’, Purushottam Agarwal’s text develops a critique of the identity discourses (and the undercurrent notion of ‘authentic representation’) which reduce entire traditions into ‘institutionalized conspiracies’ and reduce a human being to merely a function of his caste or communal identity. As the text asks sarcastically, will we have to wait for a “critic belonging to the OBCs” to receive an “authentic representation” of Kabir?



In Search of Ramanand – The Guru of Kabir and Others: Purushottam Agrawal

शीर्ष कथा / Lead Feature

प्रसिद्द कबीर अध्येता पुरुषोत्तम अग्रवाल का यह शोध आलेख उस रामानंद की खोज करता है जिसे परम्पराएं और मध्यकालीन स्रोत संत-कवि कबीर और अन्यों के गुरु की तरह स्वीकार करती आयी हैं किन्तु आधुनिक पांडित्य न सिर्फ़ ‘एक ब्राह्मण’ रामानंद के ‘एक जुलाहे’ कबीर का गुरु होने से, बल्कि दोनों के समकालीन होने से भी इनकार करता है. यह पाठ, सप्रमाण, इन दोनों आधुनिक मिथकों का खंडन करते हुए उस ‘संस्कृत रामानंद’ को भी एक्सपोज करता है जिसे बीसवीं शताब्दी में ‘आविष्कृत’ किया गया और जिसे बाद के शोधकर्ताओं ने सर्वसम्मति से ‘ऐतिहासिक रामानंद’ की तरह प्रतिष्ठित कर दिया.

पुरुषोत्तम अग्रवाल का पाठ ‘संस्कृत रामानंद’ के बरक्स ‘हिन्दी रामानंद’ को, ‘आधुनिक’ के बरक्स ‘मध्यकालीन’ को पढ़ते हुए अस्मितामूलक विमर्शों का, और उनमें सक्रिय ‘प्रामाणिक प्रतिनिधित्व’ की धारणा का भी, क्रिटीक निर्मित करता है, जो समूची परंपराओं को ‘संस्थाबद्ध साज़िश’ में और एक मनुष्य को अपनी जातीय, सामुदायिक पहचान के आत्मचेतनाहीन नमूने (Sample) में घटा देती है.जैसा यह पाठ कटु व्यंग्य से पूछता है, क्या कबीर के ‘प्रामाणिक प्रतिनिधित्व’ के लिये हमें किसी ‘ओबीसी आलोचक’ की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी?

Renowned Kabir scholar, Purushottam Agarwal’s research paper sets off in search of Ramanand whom tradition(s) and medieval sources have referred to as the guru of the Sant-poet Kabir and others. Modern scholarship, however, holds that Ramanand and Kabir were not contemporaries and that the Brahman Ramanand could not have been the guru of the low-caste Kabir. This text, in disproving both these modern myths also exposes the ‘Sanskrit Ramanand’ as a 20th century construct whom later scholars have, almost unanimously, estabished as the ‘Historic Ramanand’.

By reading the ‘Hindi Ramanand’ against the ‘Sanskrit Ramanand’, the ‘medieval’ against the ‘modern’, Purushottam Agarwal’s text develops a critique of the identity discourses (and the undercurrent notion of ‘authentic representation’) which reduce entire traditions into ‘institutionalized conspiracies’ and reduce a human being to merely a function of his caste or communal identity. As the text asks sarcastically, will we have to wait for a “critic belonging to the OBCs” to receive an “authentic representation” of Kabir?



No Other Tongue: 4 Hindi Poets in Vinay Dharwadker’s Translation

फीचर्स / Features

प्रसिद्द अकादमीशियन, कवि और अनुवादक विनय धारवाड़कर के ये अनुवाद पिछले ४० बरस में हिन्दी कविता को सबसे ज़्यादा प्रभावित करने वाले कवियों में से चार का काम अंग्रेजी में एक समुच्चय में रखते हैं. मुख्यतः सत्तर और अस्सी के दशक की यह कवितायें हिन्दी के दो, एक दूसरे से बहुत भिन्न, एंग्री यंग कवियों धूमिल और श्रीकांत वर्मा से होते हुए केदारनाथ सिंह के बोलचाल के आत्मीय लहजे और कुंवर नारायण के ज्ञान मार्ग की ओर आती हैं. हिन्दी काव्य वाक्य जैसा अभी अक्सर दिखता है, उस पर इन चार कवियों का गहरा असर है.

These translations by renowned academician, poet and translator, Vinay Dharwadkar, bring together works by 4 of the most influential Hindi poets of the past 40 years. Mostly from the 70s and 80s, this selection begins with some angry young poetry by two (very different) poets Dhoomil and Shreekant Verma, moves on to Kedarnath Singh’s intimate, conversational tone, finally reaching the Gyan Marg of Kunwar Narain. Hindi syntax, as one now finds it in poetry, owes much to these four poets.



No Other Tongue: 4 Hindi Poets in Vinay Dharwadker’s Translation

फीचर्स / Features

प्रसिद्द अकादमीशियन, कवि और अनुवादक विनय धारवाड़कर के ये अनुवाद पिछले ४० बरस में हिन्दी कविता को सबसे ज़्यादा प्रभावित करने वाले कवियों में से चार का काम अंग्रेजी में एक समुच्चय में रखते हैं. मुख्यतः सत्तर और अस्सी के दशक की यह कवितायें हिन्दी के दो, एक दूसरे से बहुत भिन्न, एंग्री यंग कवियों धूमिल और श्रीकांत वर्मा से होते हुए केदारनाथ सिंह के बोलचाल के आत्मीय लहजे और कुंवर नारायण के ज्ञान मार्ग की ओर आती हैं. हिन्दी काव्य वाक्य जैसा अभी अक्सर दिखता है, उस पर इन चार कवियों का गहरा असर है.

These translations by renowned academician, poet and translator, Vinay Dharwadkar, bring together works by 4 of the most influential Hindi poets of the past 40 years. Mostly from the 70s and 80s, this selection begins with some angry young poetry by two (very different) poets Dhoomil and Shreekant Verma, moves on to Kedarnath Singh’s intimate, conversational tone, finally reaching the Gyan Marg of Kunwar Narain. Hindi syntax, as one now finds it in poetry, owes much to these four poets.



No Other Tongue: 4 Hindi Poets in Vinay Dharwadker’s Translation

फीचर्स / Features

प्रसिद्द अकादमीशियन, कवि और अनुवादक विनय धारवाड़कर के ये अनुवाद पिछले ४० बरस में हिन्दी कविता को सबसे ज़्यादा प्रभावित करने वाले कवियों में से चार का काम अंग्रेजी में एक समुच्चय में रखते हैं. मुख्यतः सत्तर और अस्सी के दशक की यह कवितायें हिन्दी के दो, एक दूसरे से बहुत भिन्न, एंग्री यंग कवियों धूमिल और श्रीकांत वर्मा से होते हुए केदारनाथ सिंह के बोलचाल के आत्मीय लहजे और कुंवर नारायण के ज्ञान मार्ग की ओर आती हैं. हिन्दी काव्य वाक्य जैसा अभी अक्सर दिखता है, उस पर इन चार कवियों का गहरा असर है.

These translations by renowned academician, poet and translator, Vinay Dharwadkar, bring together works by 4 of the most influential Hindi poets of the past 40 years. Mostly from the 70s and 80s, this selection begins with some angry young poetry by two (very different) poets Dhoomil and Shreekant Verma, moves on to Kedarnath Singh’s intimate, conversational tone, finally reaching the Gyan Marg of Kunwar Narain. Hindi syntax, as one now finds it in poetry, owes much to these four poets.