आज़ादी विशेषांक / Freedom Special

अंक 13 / Issue 13

कस्बे में बिथोवन: जयशंकर

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लगभग तीस बरस होने को आ रहे हैं और मैं उस पहाड़ी लड़की को बीच-बीच में याद करता हूँ जिससे मैं उन्नीस सौ तिहत्तर की गर्मियों में मिलता रहा था. ये बांग्लादेश बनने के आसपास के दिन थे. हमारे शहर में ब्लैक आउट की रातों के आसपास के दिन थे. हमारी सीमाओं पर होती लडाइयों के बारे में पहली बार उस गढ़वाली लड़की ने ही बताया था. वह एक सैनिक की लड़की थी. सैनिकों के लिए कतार में खड़े हुए पाँच-छह मकानों में से एक में वह अपने पिता और छोटे भाई के साथ रह रही थी. उसका छोटा भाई मेरा सहपाठी था. प्रमोद बर्थवाल अपनी बहन को दीदी कहता था और इसीलिए मैं भी गुनगुन को दीदी ही कहने लगा था. उनकी माँ गुजर गई थीं और घर का सारा काम गुनगुन दीदी ही किया करती थीं.

मैं सोलह-सत्रह बरस की उस साँवली लड़की से जब मिला, तब वह जैनेन्द्र कुमार का उपन्यास ‘त्यागपत्र’ पढ़ रही थी. यह सब मैं याद करता हूँ. तब मैं चौदह-पन्द्रह साल का रहा हूँगा और न मैंने ‘त्यागपत्र’ के बारे में कुछ जाना था न जैनेन्द्र कुमार के बारे में. उन दिनों तक नंदन, चम्पक, पराग, चंदामामा, धर्मयुग, बालभारती के अलावा जो एक मात्र किताब मैं पढ़ पाया था, वह ‘आश्चर्यलोक में एलिस’ थी. हम उनके घर के पास की पब्लिक लाइब्रेरी में गर्मियों की किसी-किसी शाम जाते रहे थे और मैं और उसका भाई पत्रिकाओं की तरफ़ बढ़ते रहे थे और गुनगुन दीदी किताबों की तरफ. दीदी उन दिनों में रवीन्द्रनाथ ठाकुर, शरतचंद्र, प्रेमचंद्र, देवकीनंदन खत्री की किताबें पढ़ती रही थीं. उन दिनों के बाद के दिनों में देहरादून की अपनी ससुराल में उन्होंने तालस्ताय, दोस्तोयेवस्की, मोपासाँ, अज्ञेय और अमृतलाल नागर के भी उपन्यास पढ़े थे, ऐसा बाद में मुझे उनकी चिठ्ठियों से पता चलता रहा था.

किताब के लिए एक सच्चा अनुराग, पुस्तक के लिए एक तरह का परिपक्व ‘पैशन’, साहित्य से सांत्वना, और सोच पाने की ललक, भाषा के लिए ममत्व और स्नेह, ये कुछ ऐसी बातें हैं, जो मुझे उस पहाड़ी लड़की के सानिध्य में और बाद में एक अरसे तक आती रही उसकी चिठ्ठियों से मिलती रही थी. वह एक मेहनती लड़की थी. घर का सारा काम करती थी, साइकिल से बाज़ार जाती थी, कुँए से पानी खींचती थी, घर के कपडों को इस्त्री करती थी और अपनी फुर्सत की घडियों में किताबें पढ़ती रहती थी, फ्रेंच लेखक एक्युपेरी की किताब ‘द लिटिल प्रिंस’ का हिन्दी अनुवाद मैंने उस लड़की से ही सुना था. वह कभी कभार हमें गढ़वाल के इलाके की उन लोककथाओं को भी सुनाती थी, जिन्हें उसने अपनी माँ से कभी सुना होगा.

यह उस लड़की के मेरे जीने में उतरने से ही सम्भव हुआ है कि मैं किताबों से अपना रिश्ता बनाने लगा. मैं माँ की अनुपस्थिति में भी उनके परिवार को तसल्लियों के बीच पाता रहा था. मुझे लगता रहा था कि अपने प्रियजनों के चले जाने के बाद जैसा खालीपन जीवन में उतरता चला जाता है, उसे किताबों से भी थोड़ा बहुत भरा जा सकता है. वहां किताबें हमारे आत्मीयजनों में बदल जाती हैं. वे हमारी मित्र हो जाती हैं और अपने कन्धों पर हमारा सर रख लेती हैं कि हम कुछ देर तसल्ली के साथ रो सकें. सांत्वना पा सकें. अपने जीने को सह सकें, अपने जीवन को समझ सकें.

अपने जीवन में खाली जगहों, खाली होती जगहों को कविताओं, कहानियो, उपन्यासों और निबंधों से भरा जा सकता है. इसका पहला अनुभव मुझे गुनगुन दीदी के किताबों से रिश्ते को देखकर ही मिला था. वह सिर्फ़ किताब पढ़ना ही नहीं चाहती थीं, पढ़वाना भी चाहती थीं. उनके विवाह के सात-आठ बरसों के बाद्तक वे माँ नहीं बन सकी थीं और उन बरसों में उन्होंने अपने ही घर में बच्चों के लिए एक लाइब्रेरी खोल ली थी. वहीँ वह बच्चों को हिन्दी पड़ती. अपनी किताबें देती और उन सबके लिए शाम का नाश्ता तैयार करती थीं.

उन्ही दिनों मैं गुनगुन दीदी से आख़िरी बार देहरादून में मिला था. तब तक मैं चार-पाँच कहानियाँ लिख चुका था और यही सोचता था कि गुनगुन दीदी, जिनकी निगाहें कभी शरतचंद्र की ‘श्रीकांत’, ‘चरित्रहीन’ और ‘शेष प्रश्न’ जैसी मेरी प्रिय किताबों पर ठहरती रहती होंगी, वही निगाहें मेरी कहानियो पर भी ठहरी होंगी. पर न तब तक, और न अभी तक मैं एक भी ऐसी कहानी लिख पाया हूँ, जो गुनगुन दीदी जैसी प्रौढ़ और परिपक्व पाठक को पसंद आ सकती. गुनगुन दीदी कहती है, गुनगुन दीदी ही कह सकती हैं, कि ‘मुझे अपनी कहानियो में अपने आप से बाहर जाना चाहिए, अपने आप के घेरे को तोड़ फेंकना चाहिए.’ किसी दिन मैं शायद मैं वैसी कोई कहानी लिखने मैं सफल हो पाउँगा जो गुनगुन दीदी को ठीकठाक लगेगी. मैं इसी तरह गुनगुन दीदी के ऋण को चुका सकूँगा. उनके प्रति कृतज्ञता को व्यक्त कर सकूंगा. यह लिखते हुए मुझे याद आ रहा है दीदी ने ही मुझे बारहवीं पास होने पर निर्मल वर्मा का उपन्यास ‘लाल तीन की छत’ डाक से भिजवाया था और उस असाधारण कृति के आलोक में ही मेरा बाद का पढ़ना हुआ था, बाद का थोड़ा-थोड़ा जीना और थोड़ा सा कुछ लिख पाने का प्रयत्न करना. दीदी की मुझ पर कृपा की, मेरे लिए उनके भीतर बसी करुणा और ममत्व की बातों को क्या मैं कभी शब्दों में बाँध सकूँगा? पर उनके बारे में चुप रहना कहीं भी और किसी से भी उनका ज़िक्र नहीं करना, किसी साहित्यप्रेमी को नज़रअंदाज करना नहीं होगा? दीदी जैसे न जाने कितने लोग हैं, जो अपने अनुराग, समर्पण और संघर्ष से साहित्य को बचने में शामिल होते रहते हैं और इस तरह मनुष्य को बचाने की एक विनम्र पहल करते रहे हैं.

हम अक्सर भूल जाते हैं कि किसी भी भाषा के साहित्य के खड़े होने की प्रक्रिया में कितने ऐसे साधारण जनों की शांत, चुपचाप और गहरी भूमिकाएं होती हैं, जो अच्छी और सच्ची किताबों को पढ़ते हैं, पढ़वाते हैं और बचाते हैं.

2

मैंने सुना था कि जिस कस्बे में मुझे अपनी नौकरी शुरू करना है, उसके आस-पास घने जंगल हैं, उसके करीब सतपुडा के पहाड़ आते हैं, कि वहां कभी सेनिटोरियम था. वहां अंग्रेजों के वक्त की इमारतें और उनका स्थापत्य था, वहां गिरजे थे और कुछ घरों से पियानो के स्वर बाहर आते रहते थे. जिस इलाके में जन्मा, पला-बढ़ा था, वह ईसाईयों और पारसियों का था और वहां के कुछ घरों में पियानो था. मैं बचपन में अपनी बस्ती की किसी गली, किसी सँकरी सड़क से गुजरता और शाम के वक्त में कहीं से पियानो का स्वर सुनाई दे जाता. कभी किसी घर से नहीं तो गिरजे से पियानो के स्वर बाहर आ जाते. हमारे इलाके में ही एक पियानो टीचर रहती थीं और उनके यहाँ लड़के-लड़कियाँ पियानो सीखने के लिए आया करते थे. इस तरह अपने घर के आसपास पियानो के स्वरों का होना, मेरे लिए किसी नदी का होना था, किसी पहाड़ का होना था.

कस्बे में आया तब सब कुछ था, लेकिन पियानो नहीं था. बरसों पुराने गिरजे में भी नहीं. पियानो तो नहीं था पर पादरी था, जो पियानो के बारे में पियानो से सुनी रचनाओं के बारे में, पियानोवादकों के बारे में बहुत कुछ जानता था, बहुत कुछ समझता था. उस पादरी के घर में ही पहली बार मैंने उनके एच.एम्.वी. के रिकार्ड प्लेयर पर बिथोवन की एक सिम्फनी यह जानते हुए सुनी थी कि यह बिथोवन की पांचवी सिम्फनी है. बाद की शामों में उस अधेड़ और कस्बाती पादरी का घर एक ऐसी जगह हो गई, जहाँ मैं बख, बिथोवन, मोत्सार्ट और चायकोवस्की के रिकार्डों को नियमित रूप से सुनने लगा था. पादरी से पहचान हुई और मेरे लिए पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के एक ऐसे आत्मीय संसार का खुलना शुरू हुआ , जो इधर मेरी तसल्लियों, मेरे सुख का स्रोत बनता रहा है.

कमजोर निगाहों का, कम कद का वह पादरी मुझे नहीं मिलता तब मैं पश्चिमी संगीतज्ञों को थोड़ा-सा भी नहीं जान पाता, लेकिन उनसे पहचान न होती तो कस्बाती लोगों से जुड़ना, उन्हें जानना-समझना, कस्बे में ‘सैर’ का लिए निकलना, पेडों और परिंदों को पहचानना जैसे सुख मेरे हिस्से नहीं आ सकते थे. उन्होंने मुझे अपने अकेलेपन को अपने एकांत में बदलने का पाठ सिखाना चाह था. वे जब तक उस कस्बे में रहे, तब तक वे मुझे सिखाते रहे, समझते रहे. बाख और बिथोवन से ही नहीं, उस कस्बे का आस-पास का ग्रामों, ग्रामीणों, आदिवासियों, जंगलों और झरनों से जुड़ने के लिए प्रेरित करते रहे. मैं उनके साथ खुदाई के लिए चुने गए स्थलों तक जाता रहा था. मिट्टी से बाहर आई मूर्तियों और अवशेषों को देखता रहता था. वे मुझे सभ्यता, इतिहास और धर्म से जुड़ी किताबें देते रहे, उनके बारे में मुझे समझाते रहे.

आज उस पादरी के बारे में सोचता हूँ तो यह भी लगता है कि हमारे जीवन में कुछ लोग आते हैं, जिनसे हमारा वैसे कोई रिश्ता नहीं होता, लेकिन ऐसे लोग हमारे जीने के लिए कितना कुछ छोड़ जाते हैं, हमारे जीवन को कितना सहनीय बना देते हैं. उनका छोडा गया केवल हमारा मित्र नहीं होता, वह अपने आप में ही जीवन होता है. पूरा जीवन, समूचा जीवन. जैसा दीदी का रहा था. गुनगुन दीदी का रहा था. जैसा उस कस्बाती पादरी का रहा था. यह कितना सच है कि एक जीवन से बहुत सारे सच निकलते हैं और यह सिर्फ़ दैहिक स्तर पर ही नहीं आध्यात्मिक स्तर पर साबित हुआ सच है. मैं शरतचंद्र को पढ़ता हूँ और गुनगुन दीदी का जीवन याद आता है, मैं बिथोवन का संगीत सुनता हूँ तब दरवाज़े खोलने के लिए आते पादरी की पदचापों को सुनता हूँ, उन पदचापों को जो मुझे बाख और बिथोवन के घरों में ले जाती है.

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  1. आत्मीय गद्य की एक सुरीली धुन।

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