आज़ादी विशेषांक / Freedom Special

अंक 13 / Issue 13

नीम का पौधा: चन्दन पाण्डेय

Art: Samia Singh

रोली को तल्लीन होकर भोजन करना पसन्द है. जो कुछ उसे नापसन्द है उनमे से एक है – दोपहर के भोजन के समय ऑफिस कैंटीन मे जमा हुए सेल्समैन, एन.जी.ओ. के प्रचारक, घर बेचने वाले, खाता खुलवाने वाले एजेंट और इस नौवीं प्रजाति के अन्य जंतु. वो दाल चावल पर भिड़ी होती है जब कोई आकर एकसार मीठी अंग्रेजी मे कहता है – मैडम, अगर आपके पास दो मिनट का समय हो…मैं इस कम्पनी से आया हूँ. रोली के खाने का सारा मजा किरकिरा हो जाता है. कभी उन्हे सुन लेती है, कभी थाली छोड़ उठ जाती है, कभी डॉटकर भगा देती है और फिर अफसोस करती है कि वो भी किसी की नौकरी ही बजा रहे हैं, दो मिनट सुन लेने मे क्या हर्ज़ था? पर रोली के खाने का ऐसा है कि खाने के जितने कौर वो तोड़ती है उतना ही वो खुद के स्वस्थ से स्वस्थतर होते चले जाने पर चिंतित भी होती रहती है.

आज कैंटीन मे पैर रखते ही हरे रंग की एक जैसी टी-शर्ट डाले कुछ लोग दिखे. उनमे से एक मुखियानुमा गंजा कैंटीन हॉल को सम्बोधित था. ये लोग ग्रीन वर्ल्ड नाम का बैनर और बोर्ड लगाये घूम रहे थे. जब रोली ने चावल दाल का ऑर्डर लगाया तब वो मुखिया, हरियाली पहचानने के बारे मे बता रहा था: जिन साथियों ने इस जीवन मे पेड़ नहीं देखे उनसे अनुरोध है, कृपया अपने हाथ खड़े करे. इसमे शर्माने जैसा कुछ भी नहीं. अभी आपकी उम्र भी क्या ठहरी? (कुछ हाथ उठते हुए देख) वेरी गुड. आज मैं आपको पेड़ पौधे पहचानने की खूब सारे तरीकें बताऊंगा.

रोली ‘हुँह’ वाले अपने ही अनोखे अन्दाज में मुस्काई. अभी पिछली दो अगस्त को जब वो घर से आ रही थी तो रेलगाड़ी के बाहर उसने अनगिन पेड़ देखे थे. आदमी से भी बड़े पेड़. कैक्टस का एक खूबसूरत गमला तो उसके हॉस्टल के बाहर ही है. और रोली की स्मृतियाँ? बाप रे! उनकी तो पूछो ही मत. वो तो हरियाली की याद से भरी पड़ी हैं.

रोली की गोरखपुरिया आँखों के इलाज के समय की बात है, नौकरी का पहला पहला साल था, जब डॉक्टर ने सुबह और शाम का कुछ वक्त हरियाली मे बिताने की सलाह दी. दिल्ली मे पेड़ की तलाश की पहली ही सुबह उसकी बस छूट गई थी. रात के नौ बजे ऑफिस से लौट कर हरा देखो या लाल, सब धान बाइस पसेरी. आंखो की बिमारी के साथ किसी की सलाह मानने और अमल करने की भी बिमारी उसे है.

अगली सुबह वो सीधी कमर किये बिस्तर पर बैठी, आंखे बन्द किया, और खुद को अपनी स्मृतियों मे ले गयी. हद से हद उसने तीन-साढे तीन मिनट ऐसा किया और गॉव का सारा बागीचा देख डाला. वो झूला भी, जो उसके बैठते ही टूट गया था, जबकि वो महज से महज सात साल की थी. हरे खेत. पिताजी की हरी कमीज. कौन मानेगा, इतनी नई लड़की की याद्दाश्त मे पीपल और महुआ के पेड़ भी थे. जब उसने आंखे खोली तो दर्द कुछ हल्का लगा. हफ्ते दिनों के इस रियाज ने उसे काफी फायदा पहुंचा दिया था. अपनी तन्द्रा से वो तब जागी जब ग्रीन वर्ल्ड के सदस्य ने उसके टेबल पर नीम का एक बेहद नाजुक पौधा रखा. उसने कहा, “ मैम, आज हरियाली दिवस है. हरेक आदमी एक पौधा लगाये, ये हमारा लक्ष्य है. आप भी. प्लीज”. वो पलट गया, अपने यही डॉयलॉग किसी और के सामने दुहराने. रोली को हंसी आई और आश्चर्य हुआ. उसने पौधे को देखा – दस या बारह बहुत कोमल, हरी और तनिक पीली पत्तियाँ, तना एक डंठल जिसका कोई दातुन भी बनाना चाहे तो न बना पाये, उजली पॉलीथिन में बंद मिट्टी. पौधे को लेकर अपने डेस्क पर आ गई.

काम करते हुए ही उस पौधे को देख ले रही थी और लगातार सोच विचार रही थी. क्या करुंगी मैं इसका ? दफ्तर में काम अधिक और समय सीमित होता है, फिर भी कुछ अच्छे और एक बुरे दोस्त को फोन लगाकर बताया – जानते/जानती हो, मुझे ऑफिस से नीम का एक पौधा मिला है. सबने अपने अपने स्वार्थ के हिसाब से जवाब दिये. उसे जरूर लगा देना. पौधा लगाना इंसानियत है. क्या यार! तू भी किन किन लफड़ो मे पड़ जाती है? फेंक उसे डस्टबिन में.

उसके सबसे बुरे दोस्त को आजकल लगने लगा था कि उनके बीच शानदार घनिष्टता की लौ बुझ चुकी है और रोली बेहद सलीके से उससे दूर हो रही है. ऐसे मे बुरा दोस्त रोली को किसी भी कीमत पर खुश रखना चाहता है-सम्बन्धो मे पहले वाली मिठास के लिये नही, वो तो अब रोली कभी होने नही देगी, बल्कि इसलिये कि एक दिन अचानक जब उनके बीच आगे से कुछ न हो तब भी बुरे लड़के को रोली की खुशी याद रहे. उस दोस्त ने कहा – जरूर लगाओ. और अगर ना लगा सको तो मुझे बताओ मैं उस पौधे को अपने साथ रख लेता हूँ और जहाँ भी उसे लगाऊँ उसे रोली उद्यान का नाम दिया दूँगा. रोली को ऐसी बातों से कोफ्त है. कहा – बकवास बन्द करो और मुझसे बात मत करो. समझे.

ऑफिस से निकलते हुए उसने पौधे को दोनो हाथ से उठाये बस तक आई. दिन मे उसे जरूर इस आशय के ख्याल आये कि लोग क्या कहेंगे? दूसरे लोगों के पास भी पौधे है. पर रोली को वे लोग परेशान नहीं लग रहे है. रोली सोचती है कि कितना अच्छा हो कि मै भी उन्हे परेशान न लगूँ.

दफ्तर की बस में उसके लिये खिड़की की जगह तय है. आज उसने अपने बगल मे नीम के नन्हे पौधे को इस सलीके से रखा जैसे वो नीम राजा पूरी दिल्ली देखते हुए घर पहुँचेगे. रोली सोचती है, इन्हे कोई नाम दे. खुद में ही इंकार करती है. फिर नाम देना दो दिन के लिये मुल्तवी करती है. जब बस दिल्ली – नोएडा की सीमा पर पहुंची, जहाँ उसके मोबाईल का नेटवर्क चला गया, तब उसकी सबसे बडी मुश्किल दरपेश हुई. जमीन. जमीन कहाँ है? एक या दो पल का वक्फा था जब वो इस खुदमुख्तार सवाल पर बेतरह परेशान हो गयी. उसे कोई एक ऐसी जगह नही याद आई जहाँ नीम का वो पौधा रोपा जाये.

बुरे दोस्त को फोन किया. इसे लगाउंगी कहाँ?

मैने तो कहा था कि अगर तुम्हे कोई परेशानी हो तो बोल दो, मै आकर ले जाता हूँ.

मैं मजाक नही कर रही, गौरव.

तुम्ही बताओ फिर?

गमला कैसा रहेगा? सारे सहकर्मी भी गमले मे ही लगाने की बात कर रहे पर ये तो पौधे को धोखा देना होगा, फिर तुम्हे इसे लेना ही नहीं चाहिये था, साल भीतर उस गमले की मिट्टी और जगह नीम के लिये नाकाफी होगी और वो सूख जायेगा, तुम्हारे हॉस्टल के बाहर जो जगह है, वो?

वो! तुम कैसी बात कर रहे हो, जंगली सब उसे वहाँ रहने देंगे, वैसे भी वहाँ केवल रेत ही रेत है.

अरे हाँ, वो जहाँ तुम कूड़ा डालती हो…?

रोली बिफर गयी. कैसी बात करते हो? कूड़े के पास लगाऊँ ताकि उसे दो ही दिन मे अपने कचड़े से लोग ढँक दे? तुम फोन रखो जी, तुमसे तो बात ही करना बेकार है.वो कहता रहा: अरे मैं तो जगह ढूँढने मे तुम्हारी मदद ही कर रहा था.

पूरे रास्ते वो शिद्दत से चाहती रही: जब मैं हॉस्टल पहुँचू तब तक थाले भर की जमीन मिल जाये. जब बस दिल्ली की भीड मे फंसी थी तब उसने तय किया कि ये पौधा वो लगायेगी और वो भी बेहतरीन ढंग से लगायेगी. अपने बस स्टॉप से कमरे तक पहुंचते हुए वो रास्ते के आस पास की तमाम जमीन देखती-निरखती गई. गमलों का कोई बाजार लगा हो, जिनमे तुलसी और गुलाब उगाये जा सकते है, ऐसा दीख रहा था.

कमरे पर वापसी के बाद एक नियत समय फोन पर गुजरता है. आज जिस किसी से बात हुई, कैसे ना कैसे रोली से इस नीम के पौधे का जिक्र हो ही जा रहा था. देर रात जब वो खा पी के सोने जा रही थी तो जैसे उसे एक सपना आया, वो अपने हाथों को धीरे धीरे उपर खींच रही है और वो पौधा भी उसी रफ्तार से बढ रहा है. ये सपना देख ही रही थी और ये भी नहीं अन्दाजा लगा पाई थी, पौधा कितना बढ चुका है कि उसे नींद आ गई.

निहायत भोर मे जाग खुली. दफ्तर के लिए देर हो जायेगी, यह खतरा मोल लेकर वो नजदीक के पार्क तक गई. सुबह की भीड़ थी. पार्क मे तमाम विदेशी नाम वाले, औसत से भी छोटे आकार वाले पेड़ थे, जो हद से हद अपने गन्धहीन फूलोँ के लिये जाने जाते हैं. बेहद करीने से सब कुछ धजा था. जैसे सही के पेड़ पौधे ना होकर किसी चित्रकार के चित्र हो – इतना सुन्दर चित्र जो बिल्कुल सच्चा लगे- प्राकृतिक दिखता हुआ.

पार्क मे जगह खूब थी.

माली से मिली. उसने अपना परिचय ‘माली’ नहीं बताया. बताया – पार्क इंचार्ज. रोली ने बिना किसी भाव भूमिका के पूर्वी कोने वाली जगह की ओर इशारा किया – उस जगह पर मैं इस नीम के पौधे को लगा रही हूँ. खुर्पी है? रोली को इसका जरा भी भान नही था, जो हुआ.

पार्क इंचार्ज- इस पार्क मे पौधे इस तरह नहीं लगते. उनका नियम है.

नियम मतलब?

नियम मतलब नियम, कायदा, कानून. हर साल पार्क के लिये पौधों की खरीद बड़ी संख्या मे होती है. एक कमिटी है जिसे पता है, इस शहर के लोगों के स्वास्थ्य के लिये कैसे पौधे लगाये जाने हैं और कौन सी नर्सरी से उन्हे खरीदा जाना है.

रोली का रंग बदलने लगा- पर ये तो नीम का पौधा है. पार्क इंचार्ज: बिल्कुल. ये नीम ही है. आप इसे अगली जुलाई मे लेकर आईयेगा, अगर जुलाई मे बरसात हो रही होगी, तो. मैं कमिटी से आग्रह करूँगा.

गुस्से के मारे रोली के दाँत बजने लगे थे, कहा: तुम्हे जरा भी समझ मे आ रहा है, तुम क्या कह रहे हो, बुड्ढे, बदमाश. फनफनाते हुए उसने पौधे को पत्तियों से पकड़ कर उठाया और पार्क से बाहर निकल आई. बाहर आकर दो चार लम्बी साँसें भरी, समय देखा और पाया कि देर हो सकती है. अगले दो चार पल अपने इस सवाल पर खर्च किये; इस बुड्ढे के बुढापे पर गुस्सा करते रहना ठीक रहेगा या इसकी लाचारी पर अफसोस जाहिर करके छोड़ दे?

दफ्तर के लिये तैयार हुई. जाते जाते उसने पौधे के थाले में दो बार धार फोड़कर पानी दिया. आधा पौना ग्लास पानी. उसे ऐसा लग रहा था कि कल से आज मे पौधा कुछ पीला पड गया है. बॉलकनी मे ऐसी जगह पौधे को रखा जहाँ सूर्य अपनी तेज धूप के साथ सबसे ज्यादा समय तक ठहरते हों. वहीं एक जग पानी भी रख छोड़ा. हॉस्टल की ढेरों लड़कियों को बुलाया और कहा: इसे दिन मे दो बार पानी देना. बिल्कुल हल्की धार से. देखना, पौधे का थाला टूटने ना पाये. फिर तो मैं शाम तक आ ही जाऊंगी. लड़कियों में से किसी ने सवाल ठोंका: यही तुम्हारा नया ब्वायफ्रेंड है क्या? इसके जबाव मे रोली ने हँसते हुए कहा: शाम तक अगर एक भी पत्ती टूटी, तब बताती हूँ.

हॉस्टल की लड़कियों पर भरोसा करने वाले वाकये से रोली को पता चला कि वह खुद भी आखिर चाहती क्या है? वह चाहती थी: जमीन भरोसे लायक हो. खुद तथा कुछ भरोसेमन्द लोगो की निगरानी  में तब तक हो जब तक ये इतना न बढ जाये कि दो चार कुल्हाड़ियों के वार से कट ना सके. मवेशी चर ना जाये. बच्चे इसे सर से ना तोड़ डालें. गैरजिम्मेदार बडे, बूढे सिर्फ किसी आन्नद के लिये इसे ना तोड़े. इसका दातुन ना बनाया जा सके.

इतना सबकुछ वो बड़े शौक से करना चाह रही थी. वरना सिर्फ पौधा तो पार्क के बाहर, बलुई जमीन और कूड़े के ढेर पर भी लगाया जा सकता है. लोगों ने गमले की सलाह भी दी; जिसमे नीम का पौधा रोपने के दूसरे या तीसरे साल काटना पड़ता है. एक बात यह भी कि पहले अगर इतनी जिम्मेदारियाँ याद दिलाई गयी होती तो शायद वो पौधा लेने से इंकार कर देती.

पार्क इंचार्ज के इंकार के बाद भी उसे अच्छी जगह जमीन की उम्मीद थी. शाम को लौट कर उस सब्जी वाले के पास गयी, जो सोने चाँदी के भाव सब्जियाँ बेचना पसन्द करता है और सप्ताह के हर रोज किसी फिल्मी सितारे की  आवाज मे पुकार लगाता है. सोमवार को दिलीप कुमार, मंगलवार को अमिताभ … आज गुरुवार था और वो नाना पाटेकर के चीखने चिल्लाने की महान नकल किये जा रहा था.

रोली यहीं से फल और सब्जियाँ ले जाती है. सब्जी वाला इसे बेहद सस्ती सब्जी देता है. रोली को देखते ही कहता है: आइये मैडम जी. करेला, दुनिया के लिये अस्सी रूपये किलो आपके लिये मात्र बीस रूपये पाव. इतना कहने का अन्दाज भी वही – नाना पाटेकर का. अपनी मुश्किल रोली ऐसे भी बता सकती थी पर वो नीम के पौधे को किसी मुश्किल मे और किसी लापरवाही मे नहीं डालना चाह्ती थी, सो बेमन से आधा दर्जन केले खरीदे. फिर कहा: कल्लू राम जी, मेरे पास नीम का एक पौधा है और ये आपके पीछे जो कूड़े का ढेर है इस पर उसे लगा दूँ तो कैसा रहेगा? आपको उसे देखते रहना होगा.

वो, नाना पाटेकर का नक्काल, शुरू हो गया: किस पंडित ने कहा है? उसे सामने लाओ. अभी तुम्हारी उम्र क्या है, शादी की ऐसी जल्दी पडी है, मैं बताता हूँ, पेड़ लगाने से ना आपका प्रोमोशन होगा और ना ही शादी, रहा सवाल कूड़े का, तो आँखें खोलो मैडम, वो प्लास्टिक का ढेर है, नीम तो जाने दो वहाँ बेहया भी ना उगे, कूड़ा बीनने वालों से उस नीम के बच्चे को मैं बचा लूँगा, आप अगर उसे यहाँ के जानवरों से बचा लें….. उसके फिल्मी अन्दाज पर मजमा जैसा जमा हो गया था. रोली ने सौ रूपये के नोट बढाये: अपने पैसे काट लो.

लौटते हुए वो खुद को कुछ ऐसे काम याद दिलाना चाहती थी जिसे आज के आज  पूरा करना बेहद जरूरी हो. ऐसा कुछ भी याद नही आया. कमरे पर आकर फोन बन्द कर लेट गई. वो चाह रही थी कि उसे बुखार हो जाये. वैसे सरदर्द भी कामचलाऊ बीमारी है. पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.

अचानक उठी और बालकनी का बल्ब जलाया. नीम का पौधा डोल गया, जैसे रोली को देखकर बहुत खुश हुआ हो. जैसे उसे लगा हो, रोली अभी उसे उठा लेगी. रोली ने बेहद धीमी आवाज मे कहा: क्या करूँ मैं तुम्हारा? कहॉ रोपूँ मैं तुम्हें? समझदार होने के बाद कम मौकों पर ही उदास हुई होगी. आज थी.

बालकनी से उस नीम के पौधे ने और फिर रोली ने देखा, एक असली सा दिखता बच्चा उतने ही असली माँ-बाप के साथ खूब सुन्दर तस्वीर मे चौराहे पर टँगा है. रोली ने इतने कम समय मे ही मन के किसी गहरे कोने मे तय कर लिया था कि छुट्टी लेगी और पौधे को लेकर गाँव जायेगी. घर फोन मिलाया. मम्मी से बात करने की इच्छा थी सो नही हो पाई. पापा और भईया से जरूर हुई.

भईया ने बताया, इस बरस पाँच सौ पॉपलर के पेड़ और इतने ही यूकेलिप्टस के पेड़ मैंने अपने सारे खेतों की मेड़ पर लगाये हैं. रोली को बात, ना जाने कैसे, बनती हुई लगी, पूछा: नीम क्यों नही लगाये?

नीम, आम तमाम मे बहुत समय लगता है, पचासों साल. पॉपलर पांच साल मे तैयार हो जाता है.

पर उससे तो जलस्तर कम होता है ना.

तो? अभी तक खाना नहीं खाया. ऑफिस से कितने बजे छूटती हो. प्रकृति से पहले अपनी फिकर करो.

पापा से आधी अधूरी बात हुई. उन्होने कहा, छोड़ना तो नहीं चाहिये पर अभी काम पर ध्यान देना जरूरी है इसलिये वहीं कहीँ सड़्क़ पर पौधे को छोड़ दो और भगवान से माफी माँग लेना, किसी मन्दिर मे दस पाँच  रूपये का कुछ प्रसाद चढ़ा देना.

पापा और भईया से इस कदर नाराज थी कि उन्हे माफ़ भी नहीं करना चाहती थी. बहुत देर तक पौधे के पास फर्श पर बैठी रही. उसके उन पत्तों को सहलाती रही जिन्हे पकड़ कर सुबह तब उठा लिया था जब माली ने नाजायज बातें कही थी. नीम के इस कोमल पौधे से यह लाग लगाव उसे भी समझ में नहीं आ रहा था. वो उन निठ्ठले समाजशास्त्रियों की तरह सोचना चाह रही थी, जो कुछ ऐसे कारण ढूँढने का काम करते हैं जिनका सच से कोई लेना देना नही होता. जो मित्रता को एक जरूरत बताते हैं और उत्साह से रिश्ते निभाते चले को भी मानव मन की चालबाजी समझते हैं.

वो खुद कुछ ऐसा सी तर्क जमा करना चाहती थी, मसलन पौधे से जुड़ाव, अकेलेपन से उपजा है. इसी सोच विचार मे अपने मन को बेहद कठोर कर उसने पौधे से कहा: आप महाराज, रविवार तक इंतिज़ार करो, मेरे हाथ से पानी पीते रहो, इस घर की धूप सेंकते रहो, रविवार को मैं आपका कुछ करती हूँ.

रविवार दूर न था.

**

रविवार आया. आम रविवारों से अलग, आज रोली उसी तत्परता से तैयार हुई और नाश्ता लिया जैसे वो दफ्तर जाने के दिनों में करती है. पौधे की पत्तियों तथा डंठल को गीले सूती कपड़े से पोछ कर तैयार कराया. आज ऑफिस की बस कहाँ थी जो पौधे महाशय को ख़िड़्की वाली जगह मिलती. रोली ने नीम राजा को अपनी गोद मे बैठा रखा था. वो नामुराद, पता नहीं जुदाई के ‘ज’ से भी परिचित था या नहीं, उचक उचक के दिल्ली के नजारे लिये जा रहा था. जैसे किसी पाँच – छह वर्ष के बच्चे को उसके माँ-बाप हॉस्टल छोड़ने जा रहे हों और वो बच्चा आगामी बिछोह से अंजान, पूरे रास्ते मस्ती करते जाये.

नीम के पौधे के प्रति बिना किसी वितृष्णा या खीज के यह निर्णंय लिया कि यहाँ से बस बदलते हुए सीधे यमुना जायेगी. आज का रविवार बीता तो फिर इस पौधे का भगवान ही मालिक है. नही, भगवान नहीं, पता नहीं कौन मालिक है?

चिलबिल धूप से रोली और पौधा, दोनों ही परेशान थे. दूसरे बस स्टॉप पर भीड़ थी कि कह रही थी – आज नहीं तो कभी नहीं. बसें आती, लोग चढ जाते और रोली अगले बस का इंतज़ार करने लगती. उसे ऐसी भीड में चलने का अच्छा खासा रियाज था पर आज पौधे के कारण जरा तर्क थी. सवारियाँ आती और बस मे चढने के पहले पहले तक रोली को देखती. लोगों का देखना उसे इसलिये बुरा लग रहा था क्योंकि सारी सावधानी के बावजूद पौधा अपनी मिट्टी से हिला हुआ और पीला लग रहा था.

बयान के बाहर जैसी मुश्किल से रोली को बस मिली और उससे भी अधिक मुश्किल से मिली – एक पैर टिकाने की जगह. दूसरा पैर बस की हवा में टिका हुआ था. जब वो थक जाती तो किसी सहयात्री के पैर पर आहिस्ते से अपना पैर दो तीन क्षण के लिये रख लेती और सहयात्री के मिनमिनाने से पहले ही पैर उठा लेती थी. पसीने और धूल – धुएँ से परेशान रोली एक हाथ से कोई सहारा थामे थी और दूसरे से पौधे को खुद से लगाये हुए थी. पौधे को भी ऐसी भीड़ की आदत नहीं थी, वो डरा सहमा मुर्झाया रोली के सीने से चिपका हुआ था. वैसे जैसे एक बार हॉस्टल की तकलीफ झेल लौटा बच्चा दुबारा जा रहा हो. रोली को गुस्से वाली हंसी आ रही थी. मन हो रहा था किसी को भरपूर डॉट लगाये.

यमुना के करीबी बस स्टॉप पर वो हादसा गुजरा, जो न मालूम सही हुआ या गलत. रोली की सावधानी मे कोई कमी नही थी बस अनुमान गलत पड़ गया. जिस उंचाई से पौधे को उसने पूरे रास्ते थामे रखा था, वैसे ही वो नीचे उतर रही थी. जब किसी ने कुछ नहीं देखा तो यही कहेंगे कि कन्धे से टँगा बैग उतरती भीड के रेले मे फँस गया. उसे खींचने के लिये वो पलटी ही थी कि पौधा गिर गया. रोली को लगा होगा चीखने से पौधा मिल जायेगा और उसने ऐसा ही किया. उसके शोर का ही प्रताप था कि कंडक्टर भी वहॉ आ गया. पर इतने समय मे पौधा फर्श पर गिर कर फूट चुका था. उतरने चढने वालों के पैरों से कुचला हुआ पौधा किसी तरह वो उठा पाई. कोमल पत्तियाँ क्या इतनी कमजोर थी जो पैरो के वजन तले सुड़क ली गयी?

रोली की चीख से या पौधे की यह हालत देख बस की भीड भी उदास और खामोश हो गयी थी. एक यात्री ने नीम के कुचले पौधे की टूटी गर्दन को सीधा करने की एक दो कोशिशें की. कंडक्टर ने भी ड्राईवर से चलने को तभी कहा जब रोली बस से उतर गयी. उतरते हुए भी रोली ने टूटे पौधे को पकड़ रखा था. नदी का ढाल उतरते हुए उसने पौधे को नहीं देखा. पौधे से अनजान बालू और कींचड़ से भरे पानी के बीच कोई जगह चुनने में मशगूल होना चाहती थी.

8 comments
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  1. Sundar katha………badhai Chandan ji !

  2. बेहद संवेदनशील कहानी है .पर्यावरण की दुर्दशा जैसे विश्वव्यापी मुद्दे पर शायद हिंदी में ये पहली सार्थक कहानी है . साधुवाद !

  3. बहुत ही अच्छी संवेदना जगाने वाली कहानी .आब ऐसे लोग मिलेंगे जो पेड़ नहीं देखे होंगे

  4. बहुत ही प्यारी कहानी… चंदन को बधाई कि वे ऐसी भी कहानियाँ लिख पा रहे हैं…

  5. a heart touching story,so now reading this we should care for making our planet green.

  6. very sensational, felt as if i m reading premchand

  7. रेखाचित्र में धोखे की भूमिका से आपको वागर्थ में पहचाना था पहली बार . फिर एक और कहानी नाम याद नहीं आरहा सड़क पर किसी पत्रकार के अपहरण (लिफ्ट के बहाने ) और फिर न जाने क्या क्या ? रोंगटे खड़े हो गए थे !! आज भी अच्छा रहा आपको पढना . बधाई !!

  8. aap jaise uva lekhak se ummiden badhi hain. verna ek samay to yatharth ke naam par gandagi parosi jaati thi. Yatharth aur Bhavuktaa ka sunder mel hua Neem Ka Ped me. Bahut 2 badhai.

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