आज़ादी विशेषांक / Freedom Special

अंक 13 / Issue 13

एक गाँव-विहीन भविष्य की ओर / Towards a Village-Less Future

इस अंक की शीर्ष कथा तीन साक्षात्कारों, एक कहानी, एक जीवनी अंश और एक चित्रकार के काम से मिलकर बनी है. दक्षिण एशिया के अग्रणी समाज चिंतक आशीष नंदी से संवाद गाँव के बारे में सर्जनात्मक कल्पना के निरंतर हो रहे हास, नगरीय औद्यौगिक यूटोपिया और विकास की सीमाओं और आदिवासी जीवन पद्धति और हिंसा आधारित विचारधारा के इंटरफेस पर केंद्रित है. प्रसिद्ध कबीर अध्येता और राजनैतिक टिप्पणीकार पुरूषोत्तम अग्रवाल से बातचीत तथाकथित ‘ऑनर किलिंग’ पर एकाग्र है. अग्रवाल इन हत्याओं को स्वाभाविक रूप से ग्रामीण-मध्यकालीन फिनॉमिना मानने से इंकार करते हुए इसे जाति आधारित अस्मिता राजनीति से और आधुनिक राज्य की विभिन्न समुदायों की परंपराओं से जैविक विछिन्नता से जोड़ते हैं. पिछले कुछ समय से गाँव को ही अपना ठिकाना बना चुके विचारक सच्चिदानंद सिंहा से हिन्दी कवि मनोज कुमार झा की बातचीत गाँव में समय, अनुभव और ज्ञान की भिन्न अवधारणाओं और उनकी पारस्परिकता को समझने का प्रयास करती है.

शीर्ष कथा की उपलब्धि है इसके दो कथात्मक मज़मून. बीसवीं शताब्दी में जिन थोड़े-से भारतीय लेखकों ने आधुनिकता को अपनी देशज शर्तों और परंपरा से उत्तीर्ण किया, उसे लेखन और जीवन में परिवर्तन की प्रणाली बनाया उनमें नागार्जुन अग्रणी हैं. यह नागार्जुन का जन्म शताब्दी वर्ष है और इस अवसर पर उनके पुत्र शोभाकांत द्वारा लिखी जा रही उनकी जीवनी का एक अंश बाबा की स्मृति में नमनपूर्वक प्रकाशित है. शोभाकांत के सघन सान्द्र और उतप्त गद्य के कारण यह जीवनी स्वयं को तत्क्षण एक उपन्यास में बदलती रहती है.

मैट रीक और आफ़ताब अहमद के अंग्रेज़ी अनुवाद में कथाकार मेराज अहमद की हिन्दी कहानी विभाजन की पृष्ठभूमि में उजाड़ हो रहे गाँवों के एक पात्र की असाधारण प्रेमकथा है जो अपनी रिहाईश ही नहीं अपनी पहचान और धर्म से भी लगातार विस्थापित होता रहता है. शीर्ष कथा की अंतिम प्रविष्टि भज्जू श्याम की कला है जो इस पूरे अंक के पीछे कार्यरत दृष्टि के बहुत नजदीक है.

The lead feature in this issue comprises three interviews, one short story, an excerpt from a biography and the work of a painter. The conversation with leading South Asian social thinker Ashis Nandy centers on the the continual decline of creative imagination of village, the limits of urban industrial utopias and their idea of development, and the interface between tribal life and militant ideology. The conversation with eminent Bhakti scholar and political commentator Purushottam Agrawal is about so-called ‘honor killings’. Agrawal refuses to think of these killings as an essentially rural-medieval phenomenon, linking them instead with identity politics, the cult of identity the modern nation state’s lack of an organic relation with the various traditions of the communities that inhabit it. Sacchidanand Sinha, who has made his home in the village for a while now, talks to Hindi poet Manoj Kumar Jha about the mutuality of the different conceptions about time, knowledge and experience in the village.

Among the few Indian writers of the twentieth century who managed to qualify, in their writing, the colonial modernity on their own terms and tradition, and turned it into a system for bringing about change in writing and in life, was Nagarjun. This year is the birth centenary of Nagarjun, on the occasion of which we present an excerpt from the dense, passionate and novelistic biography, being written by his son Shobhakant.

Meraj Ahmed’s story, in Matt Reeck and Aftab’s translation, set against the backdrop of the Partition, tells the unusual love story of a character who is constantly displaced not just from his village, but from his religion and identity. The lead feature is completed by the art of Bhajju Shyam which comes very close to the vision behind this entire issue.

*

Click to Read

An Ambiguous Journey to the City: A Dialogue with Ashis Nandy

A Counter-Enlightenment of Sorts: Purushottam Agrawal

जो फड़ा सो झड़ा, जो जला सो बुझा: सच्चिदानंद सिन्हा से मनोज कुमार झा की बातचीत

नेह छोह: शोभाकान्त

The Believer: Meraj Ahmed

Art Gallery: Bhajju Shyam

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  1. a very good article.

  2. Sahitya premiyon ka swarg he, very-very thanks to all your team.

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एक गाँव-विहीन भविष्य की ओर / Towards a Village-Less Future

इस अंक की शीर्ष कथा तीन साक्षात्कारों, एक कहानी, एक जीवनी अंश और एक चित्रकार के काम से मिलकर बनी है. दक्षिण एशिया के अग्रणी समाज चिंतक आशीष नंदी से संवाद गाँव के बारे में सर्जनात्मक कल्पना के निरंतर हो रहे हास, नगरीय औद्यौगिक यूटोपिया और विकास की सीमाओं और आदिवासी जीवन पद्धति और हिंसा आधारित विचारधारा के इंटरफेस पर केंद्रित है. प्रसिद्ध कबीर अध्येता और राजनैतिक टिप्पणीकार पुरूषोत्तम अग्रवाल से बातचीत तथाकथित ‘ऑनर किलिंग’ पर एकाग्र है. अग्रवाल इन हत्याओं को स्वाभाविक रूप से ग्रामीण-मध्यकालीन फिनॉमिना मानने से इंकार करते हुए इसे जाति आधारित अस्मिता राजनीति से और आधुनिक राज्य की विभिन्न समुदायों की परंपराओं से जैविक विछिन्नता से जोड़ते हैं. पिछले कुछ समय से गाँव को ही अपना ठिकाना बना चुके विचारक सच्चिदानंद सिंहा से हिन्दी कवि मनोज कुमार झा की बातचीत गाँव में समय, अनुभव और ज्ञान की भिन्न अवधारणाओं और उनकी पारस्परिकता को समझने का प्रयास करती है.

शीर्ष कथा की उपलब्धि है इसके दो कथात्मक मज़मून. बीसवीं शताब्दी में जिन थोड़े-से भारतीय लेखकों ने आधुनिकता को अपनी देशज शर्तों और परंपरा से उत्तीर्ण किया, उसे लेखन और जीवन में परिवर्तन की प्रणाली बनाया उनमें नागार्जुन अग्रणी हैं. यह नागार्जुन का जन्म शताब्दी वर्ष है और इस अवसर पर उनके पुत्र शोभाकांत द्वारा लिखी जा रही उनकी जीवनी का एक अंश बाबा की स्मृति में नमनपूर्वक प्रकाशित है. शोभाकांत के सघन सान्द्र और उतप्त गद्य के कारण यह जीवनी स्वयं को तत्क्षण एक उपन्यास में बदलती रहती है.

मैट रीक और आफ़ताब अहमद के अंग्रेज़ी अनुवाद में कथाकार मेराज अहमद की हिन्दी कहानी विभाजन की पृष्ठभूमि में उजाड़ हो रहे गाँवों के एक पात्र की असाधारण प्रेमकथा है जो अपनी रिहाईश ही नहीं अपनी पहचान और धर्म से भी लगातार विस्थापित होता रहता है. शीर्ष कथा की अंतिम प्रविष्टि भज्जू श्याम की कला है जो इस पूरे अंक के पीछे कार्यरत दृष्टि के बहुत नजदीक है.

The lead feature in this issue comprises three interviews, one short story, an excerpt from a biography and the work of a painter. The conversation with leading South Asian social thinker Ashis Nandy centers on the the continual decline of creative imagination of village, the limits of urban industrial utopias and their idea of development, and the interface between tribal life and militant ideology. The conversation with eminent Bhakti scholar and political commentator Purushottam Agrawal is about so-called ‘honor killings’. Agrawal refuses to think of these killings as an essentially rural-medieval phenomenon, linking them instead with identity politics, the cult of identity the modern nation state’s lack of an organic relation with the various traditions of the communities that inhabit it. Sacchidanand Sinha, who has made his home in the village for a while now, talks to Hindi poet Manoj Kumar Jha about the mutuality of the different conceptions about time, knowledge and experience in the village.

Among the few Indian writers of the twentieth century who managed to qualify, in their writing, the colonial modernity on their own terms and tradition, and turned it into a system for bringing about change in writing and in life, was Nagarjun. This year is the birth centenary of Nagarjun, on the occasion of which we present an excerpt from the dense, passionate and novelistic biography, being written by his son Shobhakant.

Meraj Ahmed’s story, in Matt Reeck and Aftab’s translation, set against the backdrop of the Partition, tells the unusual love story of a character who is constantly displaced not just from his village, but from his religion and identity. The lead feature is completed by the art of Bhajju Shyam which comes very close to the vision behind this entire issue.

*

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An Ambiguous Journey to the City: A Dialogue with Ashis Nandy

A Counter-Enlightenment of Sorts: Purushottam Agrawal

जो फड़ा सो झड़ा, जो जला सो बुझा: सच्चिदानंद सिन्हा से मनोज कुमार झा की बातचीत

नेह छोह: शोभाकान्त

The Believer: Meraj Ahmed

Art Gallery: Bhajju Shyam

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  1. a very good article.

  2. Sahitya premiyon ka swarg he, very-very thanks to all your team.

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