आज़ादी विशेषांक / Freedom Special

अंक 13 / Issue 13

सांस्कृतिक उग्रभक्ति और साहित्यः सत्य पी. मोहंती

Art: Sunita

प्रो. सत्य पी. मोहंती से रश्मि दुबे भटनागर और राजेन्द्र कौर की बातचीत

मूल अंग्रेजी से अनुवाद: राजशेखर पाण्डेय 

यह साक्षात्कार अक्टूबर-नवंबर २०११में लिया गया था. दोनों साक्षात्कारकर्ता अमेरिकी विश्विद्यालयों में साहित्य के अध्यापन से जुडी हुई हैं : रश्मि भटनागर पित्त्सबर्ग विश्विद्यालय के मानविकी केन्द्र में विजिटिंग फेलो हैं तथा राजेंदर कौर साऊथ एशियन लिटरेरी एसोसियेशन की साम्प्रतिक अध्यक्ष और विलियम पिटरसन विश्विद्यालय के अंग्रेजी विभाग में सहायक अध्यापक हैं. यह साक्षात्कार संयुक्त राज्य अमेरिका की पत्रिका  साउथ एशियन रिव्यू में प्रकशित हुआ था.  मूल अंग्रेजी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें.

 

प्रश्न: हम अपने साक्षात्कार की शुरुआत आपके द्वारा संपादित नई पुस्तक उपनिवेशवाद, आधुनिकता और साहित्य: भारत से उठती हुई दृष्टि के बारे में कुछ प्रश्नों के साथ करना चाहते है जो तुलनात्मक भारतीय साहित्य के अध्ययन के लिए एक आदर्श प्रस्तुत करता है. ऐसा मालूम पड़ता है कि इस संग्रह को प्रस्तुत करने में आपको कई वर्ष लगे हैं और इस के लिए प्रेरणा आपको कॉर्नेल विश्वविद्यालय में २००० को हुए एक संगोष्ठी में यू. आर. अनन्तमूर्ति के एक अभिभाषण से मिली है.

प्रो. मोहंती:  हाँ, भारत में विभिन्न भाषा-विज्ञानी परम्पराओं के विद्वानों और अमेरिकी आलोचक, जो यूरोपीय और लातीनी अमेरिकी साहित्य के विशेषज्ञ हैं, के साथ मिल कर काम करना सच में रोमांचक रहा. लेकिन, निश्चित तौर पर प्रेरणा के स्त्रोत यू. आर. अनन्तमूर्ति और उनकी मानवीय, विश्व-बंधुत्व की दृष्टि रहे है. मेरे लेखों का संग्रह उन्ही को समर्पित है.  कॉर्नेल विश्वविद्यालय में दिया गया उनका अभिभाषण वैसे तो बहुत सारे विषयों से सम्बंधित है, परन्तु उन सबका आधार फकीर मोहन सेनापति के ‘छह माड़ आठ गुंठ’ [१८९७-१८९९] और रविन्द्रनाथ टैगोर के गोरा [१९०७-१९०९] का तुलनात्मक अध्ययन था, और इन दोनों ने अनंतमूर्ति को बहुत प्रभाबित किया.

प्रश्न:  अब हम आपके द्वारा भारतीय साहित्य पर किये गए कार्यों के निहितार्थ के विस्तार की तरफ लौटना चाहेंगे मगर उससे पहले क्या हम जान सकते है की भारतीय सहित्य के पाठों के अनुवाद एवं उसकी व्याख्या और आपके सैद्धांतिक संदर्भ के बीच किस तरह का संबंध है. आपको दार्शनिक यथार्थवाद पर काम करते हुए करीब करीब दो दशक हो गए हैं , और हाल-फ़िलहाल आपने साहित्यिक यथार्थवाद के बारे में भी लिखना शुरू किया है. क्या आप बता सकते है की सैद्धांतिक यथार्थवाद और साहित्यिक यथार्थवाद में आप क्या संबंध देखते है ? आपके सम्पूर्ण आलोचनात्मक लेखों में यह भाव विद्यमान है कि साहित्यिक आलोचना और वृहत्तर बौद्धिक प्रवृति, जिसमें मानवतावादी शोध और सामाजिक सर्वेक्षण शामिल है, के बीच अस्तित्वमान ‘संबंध’ में कई गंभीर दोष मौजूद है. फिर आपका जोर भी इस बात पर है कि विद्यार्थियों और विद्वानों को इस संबंध को आप्त-वाक्य की तरह स्वीकारना नहीं चाहिए बल्कि उन्हें इन संबंधो की पुन: पड़ताल करनी चाहिए. इस वृहत परियोजना के संदर्भ में, आपके लेखों में ‘यथार्थवाद’ कैसी भूमिका निभाता है ?

प्रो.मोहंती: मै समझता हूँ कि दार्शनिक एवं सैद्धांतिक यथार्थवाद और साहित्यिक यथार्थवाद के बीच के संबंध को बेहत्तर ढंग समझने के लिए हमे अपना ध्यान इस बात पर केंद्रित करना चाहिए की ‘ज्ञान’ के बारे इनमें से दोनों व्यक्त या अव्यक्त रूप से क्या कहते है ? और ख़ास करके हम सामाजिक जगत में चीजों को कैसे जान पाते है ? क्या सामाजिक तथ्यों को  समझते समय हम सब कभी भी पूर्णत: वस्तुनिष्ठ रह सकते हैं? क्या किसी भी सामाजिक विषय-वस्तु को समझते समय हम समाज में प्रभावशाली विचारधाराओं द्वारा उत्पन्न किये गए विरूपित बोध से बच पाते हैं ? जबकि इस तरह के विरूपित बोध हमारे सामने और भी यथार्थ वर्णन के साथ प्रकट होते हैं, और इस तरह के वर्णन हमें विश्वसनीय भी लग सकते हैं.

अब इन प्रश्नों के उत्तर बताने के क्रम में यह बताना जरुरी है कि मेरे जैसे साहित्यआलोचक की दिलचस्पी पहले दार्शनिक यथार्थवाद और उपरोक्त प्रश्नों के प्रति क्यों हुई?  १९८० के मध्य अपने आसपास के लोगों की तरह, मै भी उत्तर-संरचनावादी सिद्धांतों तथा मार्क्सवाद एवं नारीवाद जैसे भौतिकवादी और समाज आलोचनात्मक विचारों की विभिन्न परंपराओं में मेल बिठाने की कोशिश कर रहा था. परन्तु, बाद में मुझे यह महसूस हुआ कि उत्तर-संरचनावाद, जितना हम उसे साहित्यि के अध्ययन के सन्दर्भ से जानते हैं, कई दिलचस्प सवाल तो उठाती है पर वह उनमें से कुछ प्रश्नों का समाधान संतोषजनक तरीके से नहीं दे सकती.

इन प्रश्नों का गंभीरतम पक्ष  मूल-सिद्धांतवाद (foundationalism) की उतर-संरचनावादी आलोचना से उभरता है, जिसे देरिदा ने अपने विखंडनवाद के निरूपण के सन्दर्भ में एडमंड हुसर्रल की  ‘उपस्थिति’ की अवधारणा के माध्यम से समझाया है. यह अवधारणा  इस बात को मान कर चलती है कि हमारे अनुभव और निरीक्षण का एक आधारभूत स्तर हो सकता है जहाँ हम इस बात को लेकर पूर्णत: निश्चिन्त हो जाते है कि हम कुछ जानते है. आरंभिक विश्लेषणात्मक दर्शनशास्त्र की तरह मूल-सिद्धांतवाद की उतर-संरचनावादी आलोचना भी इस बात को पहचान लेने से संभव हुई कि  ऐसा कोई आधारभूत स्तर होता ही नहीं है, कि किसी व्यक्ति के निजी अनुभवों से लेकर प्रयोगशाला में वैज्ञानिक निरीक्षण के नतीजों तक कुछ भी हमें बिना प्रबल मध्यस्थता उपलब्ध नहीं होता. सबकुछ, जैसा कि विज्ञान के दार्शनिक मानते हैं, सिद्धांत-निर्भर होता है.

इस बात की स्वीकृति के साथ एक महत्वपूर्ण प्रश्न पैदा होता है क्योंकि सभी तरह का ज्ञान गहरे तक मध्यस्थों द्वारा निर्धारित होता है तो वस्तुनिष्ठ ज्ञान प्राप्त करना असंभव नहीं है ? क्या सभी ज्ञान एक ख़ास दृष्टिकोण के सापेक्ष नहीं है ? तो क्या एक प्रकार का ज्ञानमीमांसीय सापेक्षवाद ही सबसे तार्किक विचार-पद्धति है, जैसे कि इस तरह के तर्क कहते हैं [जैसे कि इस विषय पर ल्योतार का लेखन]?. 

यह वो प्रश्न है जिस पर मैं ८० के दशक में लिख रहा था (जैसे कि ‘द येल जर्नल ऑफ क्रिटीसिज्म’ में १९८९  में प्रकाशित हुआ और फिर कई संग्रहों में संकलित मेरा लेख ‘हम और वे’) – सापेक्षवाद पर और इस पर कि क्या वही एक व्यवहार्य, वांछनीय ज्ञानमीमांसीय स्टांस है?. इस निबंध को लिखने के लिए मुझे दार्शनिक यथार्थवाद के ताजातरीन संस्करणों की  पड़ताल करना पड़ी जो मानते हैं कि वस्तुनिष्ठ ज्ञान संभव है लेकिन उसके लिए हमें २०वीं सदी की मूल-सिद्धांतवादी निश्चितता को त्यागने और वस्तुनिष्ठता को पुनर्विन्यस्त करने की जरुरत है, उसे और अर्थमूलक और चिन्तनपरक बनाने की ज़रूरत. इस दृष्टि से वास्तविक वस्तुनिष्ठता महज निष्पक्षता नहीं है. हमें वस्तुनिष्ठता की प्राप्ति कई अलग-अलग वस्तुगत दृष्टिकोणों एवं  हमारे सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों आदि के ज्ञानमीमांसीय निहितार्थों, विचारधाराओं और सामाजिक स्थिति  पर विचार करके प्राप्त होती है.  इन चीज़ों की पड़ताल करते समय मुझे विज्ञान के दार्शनिक और इतिहासविद थॉमस कुहन के काम के आस पास हो रही  विश्लेषणात्मक दर्शनशास्त्र के कई बहसों से बहुत कुछ सीखने को मिला.

प्रश्न: तो क्या दार्शनिक यथार्थवाद और साहित्यिक यथार्थवाद, वस्तुनिष्ठता के किसी रूप से सम्बंधित है ?

प्रो. मोहंती: बिलकुल, दार्शनिक यथार्थवाद और साहित्यिक यथार्थवाद में स्पष्ट रूप से समानता है. क्योंकि ये दोनो, सामाजिक और सांस्कृतिक यथार्थ के लिए प्राय: एक वस्तुनिष्ठ दृष्टि की मांग करते है और एक यथार्थवादी लेखक हमेशा इस बारे में बात करता है कि किस तरह से वो प्रभुत्वशाली विधाओं और रुढियों के प्रस्तुतिकरण को संशोधित कर रहा है. इस दृष्टि का उदाहरण आप जॉर्ज एलिएट में देख सकते हैं, उन्होंने अपने समय के लेखकों से आह्वान किया कि रचना को कल्पना (fancy) का पर्याय ना मानकर कल्पना के परे रचिए. (उनका मानना था कि कल्पना का प्रस्तुतिकरण बहुत ही सरलकाम होता है). ठीक इसी तरह का भाव सेनापति के लाल बिहारी द्वारा भारतीय गाँव के जड़ और प्राच्यवादी [‘सरल’] प्रस्तुतीकरण की आलोचना में प्राप्त होते है. प्रारंभिक यथार्थवादी यह कहते है कि  वो दृश्य, घटना आदि के प्रति अतिरिक्त वस्तुगत ईमानदारी प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहे है और ऐसा करने के प्रयास में उस समय के वर्तमान प्रस्तुतिकरण का परिहार कर रहे है या उसके परे जा रहे हैं क्योंकि वो किसी विचारधारा या अन्य कारणों से दूषित है. उनका अभीष्ट प्रभुत्वशाली दृष्टिकोणों द्वारा जितना सच बीनने की इज़ाज़त मिलती है उसके   बजाय वृहत्तर सत्य और वृहत्तर वस्तुनिष्ठता की प्राप्ति और प्रतिष्ठा था – लेकिन ऐसा  था कि वो प्रकृति के प्रति किसी चरम वर्णनात्मक निष्ठा के साथ नहीं. सर्वश्रेष्ठ यथार्थवादी लेखक यथार्थ के विश्लेषण को प्रस्तुत करने पर ध्यान देता है और संसार का उसके द्वारा किया जाने वाला पुर्नचित्रण उसके इस विश्लेषण को पुष्ट करने के लिए होता है. यद्यपि दार्शनिक और ज्ञानमीमांसीय यथार्थवाद तथा कुछ अंशो में साहित्यिक यथार्थवाद की परियोजना/लक्ष्य के बीच समानता का स्पष्ट निर्धारण अभी भी मुश्किल है तो ऐसा भी नहीं है कि सैद्धांतिक उत्तर-आधुनिकतावाद  (जिसमें वह भी शामिल है जिसे हम उत्तर सरंचनावाद कहते हैं) और साहित्यिक उत्तर-आधुनिकतावाद के बीच भी कोई जरुरी संबंध हो. साहित्यिक उत्तर-आधुनिकतावाद का संबंध एक ख़ास कथा में पाठगत वैशिष्ट्य और रूढियों से है जिनकी पहचान   साहित्येतिहासकारों के अनुसार साहित्यिक आधुनिकतावाद के ह्रास के बाद प्रकट होने वाली प्रवृतियों के रूप में की गयी है. साहित्यिक उत्तर-आधुनिकतावाद शब्द साहित्य-इतिहास से लिया गया है जबकि सैद्धांतिक उत्तर-आधुनिकतावाद एक ज्ञानमीमांसीय और सामान्य दार्शनिक मुद्रा या दृष्टि है.

आप एक उत्तर-आधुनिक उपन्यासकार या कवि हो सकते है और इस तरीके से सम्पादक आपको वर्गीकृत कर उचित संकलन में जगह दे देगा. मगर सिर्फ  इस बात से यह पता नहीं चल सकेगा कि दार्शनिक अर्थों में उत्तर-आधुनिकतावादी हैं या नहीं. कोई भी रचनाकार दार्शनिक यथार्थवादी परियोजना- [ एक परियोजना जो सामाजिक विकृतियों को बेनकाब करने का यत्न करती  है और यथार्थ के एक अधिक वस्तुनिष्ठ  संस्करण से हमारा साक्षात् कराती है ]- का अनुसरण करते हुए भी उत्तर-आधुनिक साहित्यिक रूढियों का प्रयोग कर सकता है.  आप रश्दी या पिंचों (Thomas Pynchon) की कथन शैली को अपनाकर कहानी लिखते हुए भी जॉर्ज एलिएट के लक्ष्य का अनुसरण कर सकते हैं. आप दिल से दार्शनिक यथार्थवादी रहते हुए भी साहित्यिक यथार्थवाद की  परम्पराओं/रुढियों के साथ खिलवाड़  भी कर  सकते हैं या उसके उलट भी जा सकते है. कुछ ऐसा ही तर्क करते हुए कुमकुम संगारी ने १९८० के दशक के मध्य में रश्दी और गार्सिया मार्केस पर एक बेहतरीन विश्लेषण लिखा जिसने पाठकों  की इस धारणा को कि बाद के दौर की रचनाओं में जादुई यथार्थवाद का प्रयोग अयथार्थवादी है, को झकझोर कर उसपर पुनर्विचार के लिए प्रोत्साहित किया. और यदि आप इकोनोमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में २००९ को गार्सिया मार्केस पर छपे जेनिफर हर्फोर्ड वर्गा के लेख को पढ़ें तो तो आप यही उद्भावना पायेंगे. दोनों आलोचनाएं प्रभावी ढंग से यही तर्क उपस्थित करती हैं कि जादुई यथार्थवादी लेखक के पास प्राय: एक यथार्थवादी ज्ञानमीमांसा होती है जिसका स्पष्ट मतलब होता है कि वे वस्तुनिष्ठ सामाजिक यथार्थ के करीब जाने का प्रयास कर रहे है.

यह उन कई कारणों में से एक है कि क्यों फकीर मोहन सेनापति का छह माड़ आठ गुंठ १८९० के उत्तरार्ध में औपनिवेशिक भारत में ऐसे एक दिलचस्प पाठ के रूप में लिखा गया. यह संदर्भों से भरी पैरोडी की शैली में लिखा गया है और उस शैली की याद दिलाता है जिसे साहित्य के आलोचक उत्तर-आधुनिकतावाद का नाम देते है. मगर उस शैली के नीचे तथा उन ध्वंसकारी कथानक युक्तियों के द्वारा सेनापति ने औपनिवेशिक काल के समाज और संस्कृति का बहुत ही गहरा वर्णनात्मक और विश्लेष्णात्मक विवरण प्रस्तुत किया है. इस तरह सेनापति पश्चिम में उत्तर-आधुनिकतावादी उपन्यास के आगमन से ६०-७० साल पहले के लेखक हैं जो दार्शनिक यथार्थवादी हैं  और  जिनके लेखन शैली में उत्तर-आधुनिकतावादी अभिलक्षण दिखाई पड़ते है.

 प्रश्न: आप  ‘छह माड़ आठ गुंठ’ की भूमिका में इस बात की चर्चा करते हैं कि कैसे सेनापति पाठकों को उपन्यास में प्रस्तुत यथार्थ का सक्रिय पाठक होने के लिए उकसाते है बजाय इस कि वो पहले से बने बनाये और तय यथार्थ के निष्क्रिय उपभोक्ता बने. सेनापति के उपन्यास ‘छह माड़ आठ गुंठ’ [और साथ ही साथ १६वीं शताब्दी में बलराम दास द्वारा एक नारीवादी रचना लक्ष्मी-पुराण जिसका  आपने विस्तृत विश्लेषण किया है के बारे में भी तर्क करना चाहेंगे] में आधुनिकता ‘अकथात्मक कथन शैली’ में है, और ख़ास करके सहयोगी कार्यकर्त्ता की भूमिका निभाते हुए ये ‘पाठ’ पाठकों पर वर्तमान सामाजिक ढांचे और राजनीतिक शक्ति की आलोचना के दायित्व को थोपते है. हमलोग आपके इस लेख को पढकर चकित हैं, इसमें आपने इस भूमिका को कथनात्मक/ज्ञानमीमांसीय आप्त प्रमाण का श्रेय दिया है, जहाँ तथ्यों का आख्यान में बदलना और सत्य से किसी विचारधारा के रुख का पता चलना एक ज्ञानमीमांसीय उत्कर्ष को प्राप्त करना होता है. पाठकों को अस्त-व्यस्त करने की सेनापति रणनीति प्रकारांतर से पाठकों को पाठों की  व्याख्या के लिए अधिकार भी देती है और साथ ही साथ या यह पाठकों के सत्य ग्रहण के पारंपरिक बोध को तोडती भी है. क्या आप सहमत हैं कि इन पाठों की यथार्थवादी कथन भंगिमा में एक तरह का बौद्धिक कौशल है और अपने पाठकों से यह एक ख़ास तरह की अपेक्षा करती है जिससे पाठक सामाजिक व्यवहारों और संस्थान के एक व्यष्टि इकाई के रूप में खुद ही  कई सारे नैतिक प्रश्नों से घिर जाता है. तो क्या यह एक तरह का नीतिशास्त्रीय आज्ञार्थ है ?

प्रो. मोहंती: बलराम दास का नारीवादी और जाति-विरोधी लक्ष्मी-पुराण उड़ीसा (जिसे २०१० के एक विधेयक के बाद आधिकारिक रूप से अब ‘ओडिशा’ कहा जाता है) की एक जीवित परंपरा है. यह आज भी उड़ीसा के हरेक गाँव और शहर में मार्गशीर्ष के महीने में हिंदू घरों की स्त्रियों द्वारा अनुष्ठानिक तौर पर पढ़ा जाता है. बलराम दास उड़ीसा के एक सुधारक संत-कवि थे जिनकी सबसे प्राथमिक उपलब्धि तत्कालीन सामाजिक परम्पराओं का नया प्रत्याख्यान रचने में है जिसका पाठ लगभग ४५० साल  से वहाँ की महिलाए करते आ रही हैं. वे अपनी सहेलियों  के साथ इसकी चर्चा करती हैं और इस पुराण के नारीवादी और जाति-विरोधी निहितार्थों को विश्लेषित करती हैं. इस परंपरा ने वहाँ एक सुधारवादी सामाजिक और राजनीतिक माहौल का निर्माण किया जिसका प्रयोग किसी भी प्रगतिशील उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जा सकता है.

सेनापति का उपन्यास भले ही एक्टिविज़्म की किसी परंपरा  से निकल कर न आया हो [यद्यपि दिल्ली विश्विद्यालय के नारीवादी विद्वान  विद्युत मोहंती का तर्क है कि ये अप्रत्यक्ष्य रूप से ‘लक्ष्मी-पुराण’  से प्रभावित है] मगर इस उपन्यास में कथा-वाचक कहानी कहने का सिर्फ एक तटस्थ जरिया ही नहीं है  इस उपन्यास में कहानी से भी अधिक महत्वपूर्ण इसके कथा-वाचक का चालाक मगर तीखा सामाजिक आलोचनात्मक रुख है, जिसकी पाठक उपन्यास को पढ़ते या दुबारा पढ़ते हुए प्रशंसा करना सीखते हैं. मै खुद को ऐसे उड़िया आलोचना कि धारा में सम्मिलित करते हुए , जिसमे कि रवि शंकर मिश्रा भी शामिल है और जिन्होंने विवेच्चय उपन्यास का बाख्तियन और देरिदियन पाठ-व्याख्या प्रस्तुत किया ,इस बात को दर्शाना चाहता हूँ कि इस उपन्यास के पाठ की शक्ति का केन्द्र भाषा और कथानक-शैली के पुनराविष्कार में है. इस तरह यह उपन्यास महज एक लालची जमींदार की कहानी भर नहीं ठहरती. [जैसा कि यू. आर. अनंतमूर्ति इस उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद ही पढ़ने भर से बहुत पहले ही समझ चुके थे] सेनापति का यह उपन्यास बहुत सारे स्तरों पर एक यथार्थवादी उपलब्धि है. जैसा कि शिशिर कुमार और कई अन्य विद्वान इस बात को रेखांकित करते हैं यह उपन्यास ग्रामीण प्ररिप्रेक्ष्य से उस समय के औपनिवेशिक भारतीय समाज का विस्तृत और यथार्थ चित्र उपस्थित करता है. मगर, जैसा कि मैंने उपन्यास की भूमिका में लिखा है, इन चित्रों की वास्तविकता प्रथमतया वर्णनात्मक ना होकर आलोचनात्मक और विश्लेषणात्मक है.

प्रश्न: यथार्थवादी साहित्य का विमर्श के बारे में एक रणनीतिक मानसिकता काम कर्ती है जो समय के रेखीय-बोध कि अवधारणा से संचालित होती है ,जिसमे यह माना जाता है कि सभी साहित्य का निर्माण अपने पूर्ववर्ती साहित्य के दाय से होता है इस रूप में वाह अपने पूर्ववर्ती साहित्य का ऋनी होता है. लेकिन आपके बारे में यह लगता है कि उपन्यास के आलोचनात्मक भूमिका में इस बात को स्वीकार कर कर कि , छ माना आठ घंटा का यथार्थवाद मुल्कराज आनन्द के प्रकृतिवाद की तुलना में सलमान रश्दी के रचनाओं से प्रतिबिंबित उत्तर-आधुनिकता के ज्यादा करीब है, आपने अपने आपको साहित्य-इतिहास में काल के अरेखीय धारणा के पक्ष में कर लिया है.क्या आप मानते है कि साहत्यिक-यथार्थवाद की युग बध्द  अवधारणा उस युग के पहले कि है जब यथार्थवाद का करीबी संबंध हीगेल और मार्क्स के इतिहास के विभिन्न चरणों से था ? इसके विपरीत , विश्व-सहित्य में यथार्थवाद के ऊपर हो रही आलोचनात्मक रचनाएं विश्व-सहित्य-समय की एक  अवधारणा के साथ-साथ चलता है जो की पूर्वानुमान के मुहाबरे  के साथ रेखीय-काल बोध के ध्वंस के लिए प्रत्य्ख्यान रचता है. साहित्यिक यथार्थवाद की राजनीतिक शक्ति बहुत मात्रा में यथार्थवाद, अल्पकलिकता और मानव इतिहास के बीच के संबंधों पर निर्भर करती है और यही से हमारा प्रश्न शुरू होता है.

प्रो. मोहंती: हाँ, विल्कुल, हमें साहित्य और संस्कृति की प्रगति और विकास के भोले-भाले प्रारूपों के इत्तर जाने की जरुरत है. अत: हमें भारतीय उपन्यास के इतिहास को अनगढ़ यथार्थवाद से स्वचेता-उत्तरआधुनिकतावाद एवं जादुई यथार्थवाद के क्रमिक विकास और महान से महानतम तक के परिष्कार के रूप में देखने की जरुरत नहीं है. इसके बजाय हमें विभिन्न तरह के यथार्थवाद के द्वारा किये गए विश्लेष्णात्मक और ज्ञानमीमान्सीय कार्यों के स्तर के बारें में जिसने अपने  समय और उसकी सच्चाईयों को  साथ जोड़ा, के प्रति एक ख़ास तरीके से इनके पाठों को लेकर और  अधिक जागरूक होना होगा.

दूसरा और अधिक जटिल प्रारूप [ विकास और प्रगति का] उस तरीके से भी उत्पन्न हो सकता है जिस तरीके से सहित्य प्राय:  आलोचनात्मक सामाजिक-विज्ञान के शोध-खोजों से पुर्व-अपेक्षाएं रखता है  भारत में यथार्थवादी उपन्यास के बारें में यह बात बिलकुल सत्य है  वसुधा डालमिया ने प्रेमचंद के उपन्यास गोदान के अंग्रेजी अनुवाद की भूमिका में इस दृष्टि का निरूपण किया है. इस सन्दर्भ में डालमिया और अन्य आलोचक सही भी हैं: साहित्य प्राय: इतिहासवेत्ताओं और सामाजिक चिंतको की अंतर्दृष्टि और निष्कर्षों  से पूर्व-अपेक्षाएँ रखता है और हम जैसे साहित्य आलोचक एक बहु-अनुशासनिक परियोजना के निर्माण में मदद कर सकते है जिसे हम ‘तह से एक साहित्य दृष्टि’ कह सकते है [जैसा की ई. पी. थॉम्पसन के द्वारा १९६६ के टाइम्स लिटरेरी सप्लिमेंट एस्से में छपे एक लेख से प्रतिध्वनित होता है, और थॉम्पसन के प्रमुख घोषणापत्र का शीर्षक भी ‘तह से इतिहास’ है ] हरीश त्रिवेदी के साथ मिलकर मैंने २००६ के इकोनोमिक एंड पॉलिटिकल वीकली के विशेष भाग का संपादन किया जिसमे ‘तह से साहित्य दृष्टि’ मुहावरे का शीर्षक के रूप में प्रयोग उस इतिहास लेखन सम्बन्धी परियोजना की ओर संकेत करता है और साथ ही साथ इसी शीर्षक से तुलनात्मक भारतीय साहित्य विषय पर मनोरंजन मोहंती के साथ मिलकर मैंने २००८ में दिल्ली विश्वविद्यालय और कर्नेल विश्वविद्यालय में दो संगोष्ठियों का आयोजन भी किया.

प्रश्न:  आपने पाठकों को सेनापति के इस उपन्यास के बारे में ऐसा सोचने के लिए प्रोत्साहित किया है कि सेनापति का यथार्थ ‘वर्णनात्मक’ न होकर ‘विश्लेष्णात्मक’ है. विश्लेष्णात्मक यथार्थवाद की जो धारणा आप प्रस्तावित करते हैं उसके दो प्रभाव दृष्टिगोचर होते हैं.पहला यह कि यथार्थवाद के बारे में बने बनाये ढंग से बात करने को लेकर जो असंतोष है उसे विश्लेष्णात्मक यथार्थवाद अपने में जगह देता है. इसके प्रमाण स्पष्ट ही सायेर (Sawyer), मोहपात्रा और नारायण राव की रचनाओं में  देंखे जा सकते हैं: एक आलोचक के लिए उपलब्ध बौद्धिक पोजीशन के दायरे में. दूसरा यह कि, विश्लेषणात्मक यथार्थवाद ने उपन्यास अध्ययन के  सन्दर्भ में विश्लेषण के तरीको और प्रविधियों को सुधारते हुए पूर्णत: बदल दिया है, और अब हम भारतीय या अफ़्रीकी भाषाओं में लिखे गए यथार्थवादी उपन्यासों को यथार्थवाद के उपलब्ध यूरोपीय वर्गीकरण के खांचे में फिट करने का प्रयास भी नहीं करते.

प्रो. मोहंती: विश्लेष्णात्मक यथार्थवाद और वर्णनात्मक यथार्थवाद का यह अंतर जॉर्ज लुकाच के द्वारा किये गए उपन्यास के दो भेदों को प्रतिध्वनित करने के लिए किया गया है. जॉर्जे लुकाच के अनुसार पहली कोटि में ‘प्रकृतवादी’ उपन्यास आते है जिसमे वर्णनों की प्रचुरता और विस्तार तो रहता है पर उनमें व्याख्यात्मक गहराई का नितांत आभाव होता है. मगर दूसरी कोटि के उपन्यासों [जैसे कि बॉल्जाक के उपन्यास] में गंभीर अर्थों में ‘यथार्थवादी’ उपन्यास आते हैं, चूँकि ये आधारभूत सामाजिक एवं एतिहासिक रिवाजों और ताकतों, जो अनौपचारिक रूप किसी विवेच्य संस्कृति के उपरी वर्णनात्मक ब्यौरों से ज्यादा महत्वपूर्ण हो उठती हैं, की व्याख्या प्रस्तुत करती हैं. लुकाच का यह वर्गीकरण बहुत ही मूल्यवान है, यद्यपि उसकी इस सैद्धांतिक अंतर्दृष्टि का साहित्यिक रचनाओं के लिए अनुप्रयोग हमेशा सफल नहीं हुआ. यूरोप के कुछ आरंभिक आधुनिकतावादी लेखकों के संदर्भ में लुकाच की रूचि ही उनकी सीमा थी और उनके प्रति लुकाच की प्रतिक्रिया असंगत और भ्रामक थी. मगर हमारे प्रयोजन के लिए इनके दो प्रकारों के बीच के अंतर, एक अधिक वर्णनात्मक यथार्थवादी उपन्यास और दूसरा अधिक व्याख्यात्मक यथार्थवादी उपन्यास, पर अपना ध्यान केंद्रित करना उपयोगी होगा. चूँकि यह अंतर को समझने के क्रम में हम, औपचारिक नवाचार के स्तर पर भी उपन्यास द्वारा किये जाने वाले ज्ञानमीमांसीय कार्यों को  मूल्यांकन और मूल्य-निरूपण का मौका पाते है. मैंने एक तर्क प्रस्तावित किया था , और बहुत सारे आलोचकों ने इसे पुष्ट भी किया है कि सेनापति के उपन्यास का कथा-वाचक एक बहुत बड़ी साहित्यिक खोज है. यह उपन्यास में ठीक उसी तरह से चित्रित है जिस तरह से मौखिक और सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराओं के कथा-वाचक होते हैं , और यह सेनापति की कथन-शैली है जो कथा-वाचक को यथार्थ के एक गंभीरतम रूप को रचने कि शक्ति प्रदान करती है. उपन्यास में यथार्थ के जिस गंभीरतम रूप के साक्षात् होते हैं वो बाह्य यथार्थ की महज अनुकृति और सामाजिक दृश्य-प्रपंचो एवं घटनाक्रमों के बदलते बाहरी रूपों के ईमानदार वर्णण से संभब नहीं था. ‘छह माड़ आठ गुंठ’ का कथा-वाचक हमें एक सक्रिय पाठक होने के लिए मजबूर करता है और खुद को कथानक के अर्थ निकालने में संलग्न करता है मगर सामाजिक पूर्वाग्रहों और विचारधाराओं का परिहार करते हुए क्योंकि ये दुनिया के बारे में हमारी समझ को विकृत और दूषित करती हैं. साहित्य-आलोचना के अर्थ में इस उपन्यास को ‘उत्तर-आधुनिकतावादी’ कह सकते हैं मगर इस उपन्यास की उपलब्धि दार्शनिक अर्थों में गंभीर रूप से यथार्थवादी है.

पॉल सवयेर ने पहले पहल इस विचार को एलिएट और सेनापति के बारे में लिखते हुए विकसित किया और बाद में हिमांशु मोहपात्रा भी प्रेमचंद के गोदान और सेनापति के ‘छह माड़ आठ गुंठ’ के बीच तुलना करते हुए इस विचार को रेखांकित करते हैं. इसके अलावा आप २००६ के  ‘इकोनोमिक एंड पॉलिटीकल वीकली’ में श्रीलाल शुक्ल और सेनापति पर अलका अंजारिया के लेख के साथ साथ जेनिफर हाफोर्ड वर्गाज द्वारा सेनापति और गार्सिया मार्केस पर किये गए तुलनात्मक अध्ययन को भी देखें. कुछ इसी तरह की बात आपको बरुआ और सेनापति के ऊपर नारायण राव द्वारा किये गए तुलनात्मक अध्ययन और तिलोत्तमा मिश्रा की आलोचनात्मक रचनाओं में मिलेगी           [बरुआ सेनापति से २० साल पहले असमिया में लिख रहे थे] मेरा विचार यह है कि जिन लेखों के बारे में मैंने अभी-अभी जिक्र किया है उनमे से प्रत्येक एक बहुवर्षीय शोध परियोजना के लिए प्रेरक हो सकते हैं.और इसकी उपलब्धि एक शोध पत्र या किताब के रूप में हो सकती है जो वर्णनात्मक बनाम विश्लेष्णात्मक यथार्थवाद के प्रश्न को और अधिक ऐतिहासिक विस्तार और गहराई से खोज सकेगी और हमलोग इस तरह के अध्ययन से, ख़ास करके भारतीय सन्दर्भ में, साहित्यिक यथार्थवाद के बारे में अधिक जान पाएंगे. और ठीक इसी तरह की बात सांगरी  द्वारा १९८० में सलमान रश्दी और गार्सिया मार्केस के ऊपर लिखे गए लेख,जिसका मैंने पहले उल्लेख किया था या २०१० के ‘इकोनोमिक एंड पॉलिटिकल वीकली’ में छपे मुक्ति लाखी संघाराम द्वारा उड़िया आदिवासी कवि भीमा भोई और स्वामी विवेकानंद के विस्तृत तुलनात्मक अध्ययन, के  बारे में कही जा सकती है.      

प्रश्न: अब विश्लेष्णात्मक यथार्थवाद के बारे आपके द्वारा प्रतिपादित बिंदु के दूसरे निहितार्थ की तरफ लौटते हुए हम जानना चाहेंगे कि क्या १९वीं  सदी में भारत में यथार्थवाद एक साहित्यिक शैली के रूप में विकसित हुआ और यदि हम सबाल्टर्न परिप्रेक्ष्य से देंखे तो उसका प्रयोग उपनिवेश-विरोधी चेतना के साथ मिलकर काम करने के लिए किया जाता था. आपके द्वारा प्रस्तुत विमर्श में आपका ध्यान वस्तुनिष्ठ यथार्थवाद, सामाजिक संघर्ष, बुर्जुआ वर्ग का उदय और बुर्जुआ कि विश्व-दृष्टि जैसे प्रमुख यूरोपीय आलोचनात्मक सरोकारों से हटकर यथार्थवाद की परियोजना पर केंद्रित होता है जिसके आधारभूत घटक हैं कथा-वाचक की आवाज, लहजा, सबकुछ देख सकने वाली दृष्टि , व्यंगपूर्ण टिप्पणी की शैली, कथानक की रूढ़ता और मौन तथा उद्घाटन यादि. क्या यथार्थवाद एक स्तर पर ओड़िया और आसामी पला जैसी परम्पराओं की कौतुकपूर्ण अभिव्यक्ति और संस्कृतनिष्ठ एवं आधुनिक शिक्षण की  बाबू-विरोधी आलोचना के बीच एक करीबी मुठभेड़ है? यथार्थवाद की इस तरह की आलोचना हमें किस निष्कर्ष की  तरफ ले जाती है और हम यथार्थवाद के बारे में क्या समझ पाते है.

प्रो. मोहंती: मै सभी यथार्थवादी उपन्यासों के बारे में इस बात को इतनी जल्दी सामान्यीकृत नहीं करूँगा चूँकि अभी बहुत सारा ऐतिहासिक और पाठगत अन्वेषण करना बाकी है और जिसे पूरा करने कि भी जरुरत है. मगर इस तरह के विश्लेषण की  एक कड़ी हमें सबाल्टर्न अभिकरणों के बारे में बहुत कुछ बता पायेगी और हमें उस तरह के अतिशयोक्तिपूर्ण संदेहवाद से परे ले जायेगी जिसकि उत्पत्ति साहित्यिक-सिद्धांत परिवृत  में सबाल्टर्न चिन्तनो और विचारों पर चर्चा करते वक्त होती है. अत: कुछ ही संदर्भो में इस तरह की व्याख्या को उल्लेखित करना बुद्धिमानी होगा, क्योंकि यह अंशत: गूढ़ हो सकता है. इस विश्लेषण से संबंधित प्रभुत्वशाली विमर्शो ने सबाल्टर्न परिप्रेक्ष्य को कम करके लगभग अदृश्य ही बना दिया है और इसिलए सबाल्टर्न परिप्रेक्ष्य के बारे में अतिसामान्यकृत एवं अ-संदर्भित संदेहवाद अनुचित है. सबाल्टर्न अभिकरणों का प्रश्न प्रथमतया और शुद्ध रूप से सैद्धांतिक नहीं है. ऐसे बहुत सारे अनुभवजन्य ज्ञान जिसका हम सब में अभाव है और हमें इस ज्ञान तक पहुचने के लिए कई चिन्तनपरक और सन्दर्भ के प्रति संवेदनशील सैद्धांतिक युक्तियों की जरुरत है. इस जगह पर पहुँच कर इतिहास-वेत्ताओं और सामाजिक वैज्ञानिकों का काम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है , और उनके द्वारा एक प्रकार का किया जाने वाला साहित्यिक विश्लेषण भी प्रासंगिक हो जाता है. और इस तरह के शास्त्रीय अन्वेषण में हमें अतिशयोक्तिपूर्ण संदेहवाद के कोई चिन्ह नहीं मिलते जिसके सबसे बढ़िया उदहारण है थॉम्पसन द्वारा १९७१ में लिखी ‘भीड़ का नैतिक अर्थशात्र’ और जेम्स स्कॉट का ‘कमजोर का हथियार’.अगर हम एरिक हॉब्सबाम कि रचना ‘ग्रासरूट हिस्ट्री’ पर एक नजर डालेंगे तो पता चलेगा कि इसी बात को अभिव्यक्त करने में वो कितने सावधान और स्पष्ट हैं इसके साथ ही उन्होंने संदेहवाद को अनुसन्धान के सही संदर्भों, विचारधारात्मक पूर्वाग्रहों एवं सैद्धांतिक प्रविधि के आधार के रूप में नियोजित किया. [यह लेख १९८५ में पहली बार प्रकाशित हुआ था जिसका शीर्षक था ‘तह से इतिहास कुछ झलकियाँ’] इसलिए उत्तर-संरचनावादी वृतों में एक तरह का जो अतिशयोक्तिपूर्ण संदेहवाद देखने को मिलता है वो संदेहवाद का एकमात्र प्रकार नहीं है. इस संदेहवाद की अतिशयोक्तिपूर्ण मुद्रा के अलावा कई अन्य प्रकार भी हैं. इस जगह पर पहुच कर आलोचक एक उपयोगी हस्तक्षेप कर सकता है. इससे पहले कि साहित्य आलोचक इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सबाल्टर्न कुछ अभिव्यक्त नहीं कार सकता या जो कुछ भी अभिव्यक्त कर सकता है उसे हम समझ नहीं सकते , उनसे [आलोचक से ] ये पूछना अच्छा होगा कि हमारे समृद्ध क्षेत्रीय और भाषाओं के साहित्य में विकसित हुआ साहित्य-रूप [ मौखिक परदर्शन-परक परम्पराओं के अनुसार चित्रित ] किस तरह कि आलोचना को दर्शाते है. असमिया लेखक हेमचन्द्र बरुआ और फकीर मोहन सेनापति को साथ साथ पढ़ना हमारे इस विश्लेषण पर आपका ध्यान केंद्रित करने में मदद करेगा जैसा कि सीएमएल में प्रकाशित  तिलोत्तमा मिश्रा का आलोचनात्मक लेख इशारा करता है. [या आप मौखिकता और उपन्यास के विश्लेषण का विस्तार इस महाद्वीप के पार भी, सेनापति के उपन्यास और अमोस तुतुओला कि उपन्यास ‘द पाम-वाइन-ड्रिंकार्ड’, जो कि योरुबा लोककथाओं पर आधारित है, की कथन शैली के तुलनात्मक अध्यन के जरिये कर सकते है.]

अब आपकी बात की तरफ लौटते हुए मुझे इस बात का निर्देश कर देना चाहिए कि, कथन की पद्धति, शिल्प पर मेरे द्वारा दिए जाने वाले जोर का मतलब इस बात का अस्वीकार बिलकुल भी नहीं है कि वस्तुनिष्ठ सामाजिक यथार्थ यथार्थवादी उपन्यास के लिए महत्वपूर्ण है. जो कुछ भी मैं कह रहा हूँ वह ये है कि उपन्यास में वस्तुनिष्ठ यथार्थ का प्रस्तुतिकरण उसे प्रकृति का दर्पण बनाकर या जो कुछ भी सूक्ष्म ब्यौरे हम देखते हैं उनके वर्णन से नहीं किया जा सकता. जिन उपन्यासों की हम चर्चा कर रहे हैं वही हमें यह दिखा देंगे कि प्रस्तुतीकरण में “कैसे” पर अक्सर ज्ञानमीमांसीय महत्व टिका होता है. भारतीय एवं अफ़्रीकी उपन्यास का अध्ययन और उन परम्परागत लोक रूपों का भी जिसके आधार पर वे रचे गए है का विश्लेषण करते समय उपरोक्त बातों को ध्यान में रखने की जरुरत है.

प्रश्न: अब हमलोग अनुवाद के बारे में चर्चा करें, ख़ास करके ‘छह माड़ आठ गुंठ’ के आपके द्वारा किये गये सहयोगी अनुवाद की. क्या कभी ऐसा समय आया जब चार अन्य अनुवादकों में से आप सेनापति के इस असमतल, उबड़-खाबड़ भरे सांकेतिक सतह वाले उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद करते हुए किसी कठिनाई में फंसे हों? क्या आपने इस उपन्यास के मौखिक, प्रदर्शनपरक और भंगिमापरक आयामों, ख़ास करके कथा-वाचक द्वारा अपनाए गए विभिन्न अर्थ-भंगिमायों के विस्तार को जिसमे  मूक-विलंबन, या  संदेहवाद जो  खुले तौर या वक्रता के साथ प्रकट होता है, कोई भी निर्णय देने के संकोची अस्वीकार आदि सम्मिलित हैं, के अनुवाद के लिए कोई रणनीति बनाई ?  उपन्यास की आपकी  भूमिका में इस बारे में कुछ संकेत किये गए हैं. उदहारण के लिए , आपने भूमिका में इस बात का जिक्र किया है की कैसे गाँव के तालाब से गुजरना और तालाब के पास औरतों की गप्प-शप्प अपने आप में माननीय लाल बिहारी डे के प्राच्यवादी नृ-शास्त्रीय स्पष्टीकरण का परोडी अनुवाद है. तब हमें इस बात के लिए आश्चर्य करना होगा की अनुवाद की यह प्रक्रिया आपको और आपके सहयोगी अनुवादकों को १९वीं सदी भारतीय यथार्थवादी उपन्यास के यथार्थवाद की धारणा तक पुख्ता तौर पर सीधे सीधे नहीं ले जाती है प्रत्युत  पाठ में अंतर्निहित कई ‘भाषाओं’ के अनुवाद के माध्यम से परत दर परत ले जाती है.

प्रो. मोहंती: हाँ , इसका अनुवाद करते समय हम प्राय: मुश्किल में पड़ जाते थे और अनुवाद की प्रक्रिया वास्तव में बहुत मुश्किल थी. इस बात को ध्यान में रखते हुए की सेनापति की भाषा में कई स्तर हैं एक साधारण किसान की परिचित भाषा से लेकर ऊँची जातियों की ओड़िया भाषा का अति-संस्कृतनिष्ठ संस्करण, और इसमे फारसी-संक्रमित भाषा से लेकर सत्ता और शक्ति के भाषा के रूप प्रतिध्वनित होती हुई अंग्रेजी और संस्कृत की सीधी मौजूदगी है और लय के अप्रत्याशित बदलाव सीधे, दोटूक चलते हुए अचानक विडंबनात्मक और पैरोडीमय हो उठना.  हमें अनुमान था कि अंग्रेजी अनुवाद में अनिवार्य रूप से बहुत सारी चीजों को सपाट करना ही होगा.        [इसके पूर्व हिन्दी और तेलगु में किया गये अनुवाद बेहतरीन हैं. बांग्ला अनुवाद के कुछ पाठक यह बता रहे थे की अनुवाद के क्रम में कथन भंगिमा की क्षति हुई है क्यूंकि बांग्ला साहित्य में जिस अति-संस्कृतनिष्ठ, ‘साधू’ भाषा का प्रभुत्व है.]

चूँकि हम चाहते थे की उपन्यास की पहुँच विस्तृत पाठक वर्ग तक हो और  अकादमिक विशेषज्ञों के आलावा इसे हरेक रूचि के लोग पढ़ें, हमलोगों ने उपन्यास के अंत में शब्दार्थ के अतिरिक्त  केवल जरुरी पाद-टिप्पणियों देने का फैसला किया. यूनीवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया प्रेस की हमारी संपादक लिंडा नोर्टन ने मुझसे कहा कि उपन्यास की भूमिका कुछ एसी होनी चाहिय जो संसार भर के गैर-अकादमिक पाठक वर्ग को संबोधित करे जो कि इस उपन्यास को पहली बार पढ़ रहे होंगे, और मुझे इस बात की खुशी है की जब मै भूमिका लिख रहा था तब यह बात मेरे दिमाग में चल रही थी. मै इस उपन्यास के बारे में एक और बात, एकदम साफ़ साफ़ कहना चाहूँगा कि “इस उपन्यास को दो बार पढ़ें. क्योंकि पहली बार पढ़ते समय आपका सारा ध्यान कहानी पर ही केंद्रित रहेगा और इस उपन्यास की बहुत सारी दिलचस्प चीजें आपसे छूट जायेंगी”.

जब हम और पॉल पिएरे जब इस परियोजना में पहली बार जुटे, तब अनुवाद का आरंभिक स्वरूप जो हमने देखा वह बहुत ही कच्चा था मगर इसके साथ एक विशेषता यह थी कि इसने सेनापति के इस उपन्यास के बहुस्तरीय बाख्तियन स्वर एवं भंगिमा को पकड़ लिया था क्यूँकि यह उस व्याख्या को प्रतिबिंबित कर रहा था जिसका आधार रविशंकर मिश्रा का ओड़िया और अंग्रेजी में प्रकाशित एक लेख था. [अनुवाद के इस प्रारूप को रविशंकर मिश्र ने ही जतिन्द्र नायक के साथ मिलकर तैयार किया था] इस परियोजना में हमारा उद्देश्य प्रारूप को सावधानीपूर्वक संशोधित करना था ताकि यह सेनापति की उड़िया की सारी विशेषताओं  को ठीक ठीक अनुवाद कर सके मुहावरे और शैली को सुपाठ्य बनाये रखते हुए. इसके साथ ही हमलोगों ने एक फैसला किया कि उपन्यास के कुछ शब्दों को अंग्रेजी अनुवाद में ज्यों का त्यों ले लिया जाय क्योंकि उनमे से कई के अंग्रेजी में कोई पर्याय उपलब्ध नहीं हैं (जैसे उदाहरण के लिए ‘नबता’)  पर ये शब्द जिस अर्थ कि तरफ इशारा करते है वो सन्दर्भ से स्पष्ट हो जाता है. इसके अलावा उपन्यास में ऐसे कई शब्द हैं जो सेनापति के समय तो प्रचलित थे मगर वर्तमान ओड़िया में उनका प्रयोग नहीं होता मसलन कोस जिसका प्रयोग सेनापति के समय में दो किलोमीटर के अर्थ में होता था अब वर्तमान उड़िया में इसका प्रयोग नहीं होता है, और इस तरह के शव्दों को उपन्यास में बिना अनुवाद ही छोड़ दिया जिससे सेनापति और हमारे समय के बीच कि दूरी और अधिक स्पष्ट हो. और अंत में हम उन शब्दों के संधान में सफल हो पाए जो कि गैर-भारतीय पाठकों के लिए शब्द के सूक्ष्म अर्थच्छटाओं को प्रतिध्वनित कर सके. जैसे कि हमने चरित्र शब्द का अनुवाद उसे सन्दर्भ से जोड़कर और अधिक स्पष्ट रूप से किया रामचंद्र मंगराज का चरित्र. फिर इसे बड़े अक्षरों [कैपिटल लेटर ] में लिखा क्योंकि पश्चिमी जगत में संतो के नाम के शीर्षक के रूप में लिखते समय ऐसा ही करते है ऐसा करने से सेनापति के उपन्यास का विडंबनात्मक व्यंग्य का लहजा भी अंग्रेजी अनुवाद में आ गया जो कि संभव नहीं था यदि इसका अनुवाद रामचंद्र मंगराज की जीवनी किया जाता. कुछ चीजों का अनुवाद और व्याख्या विस्तृत पाद-टिप्पणियों के सहारे किया जाना था , जिसे मैंने रविशंकर मिश्रा के साथ मिलकर युनीवर्सिटी कैलिफोर्निया प्रेस के हमारे कॉपी एडिटर के महत्वपूर्ण सुझाव कि सहायता से परियोजना के सबसे अंतिम अबस्था में किया.उपन्यास के आरंभिक दौर में जो भारतीय दर्शन के न्याय संप्रदाय का सन्दर्भ मिला था उसका संकेत आगे चलकर और अधिक विस्तृत हो गया था , और हमलोग को अनुवाद में उन सांकेतिक स्तरों पर ध्यान देने कि जरुरत थी वो भी प्रत्येक संदर्भो के साथ न्याय दर्शन की कोई टिप्पणी दिए बिना, और वास्तव में ऐसा करना बहुत ही विद्वतापूर्ण था.

इस तरह के तर्क के बारे में भी सोचा जा सकता है कि उपन्यास की भूमिका में मैंने जो व्याख्या प्रस्तुत की थी वह एक तरह का अनुवाद ही है. रविशंकर मिश्रा ने १९९-९२ में प्रकाशित अपने लेख इस तरह की व्याख्या की जैसा की पॉल पिएरे  भी अपने एक लेख में अनुवाद सिद्धांत के परिप्रेक्ष्य से इस उपन्यास के बारे में कर चुके थे. कथावाचक की केन्द्रीयता के अतिरिक्त मैं उन सांकेतिक अंतर-पाठीय स्तरों को ,जिसे मैंने  लाक्षणिक उप-पाठ नाम दिया है, जो उपन्यास के मौलिक सबाल्टर्न मूल्यों को मुख्य कथानक की तुलना में कई गुना अधिक प्रकट करते हैं, दर्शाना चाहता था.  अत: एक तरीके से अनुवाद को एक क्रमबद्ध अवस्था वाले कार्य के रूप में समझा जाना चाहिए जिसके नैरंतर्य में पहले वाक्य रचना और मुहावरे का चुनाव फिर पाद-टिप्पणियां और व्याख्यात्मक लेख शामिल हैं और इसी के माध्यम से पाठकों के भारतीय उपन्यास ख़ास करके ग्रामीण जीवन से सम्बंधित एक उपन्यास की मान्यताओं को चुनौती दी जाती है या उसे संशोधित किया जाता है. अनुवाद बहुत कुछ व्याख्यात्मक लेखों की तरह हमारे अपने समय का आलोचना कर्म है. बतौर एक पाठक हम अपनी मान्यताओं को प्रश्नांकित करते हैं,  अपने दृष्टिकोण अपने पूर्वाग्रह और प्रतिरोध को संशोधित करते हैं, इसीलिए अनुवाद को निरंतर अपडेट करते रहने की जरुरत है जिससे उसमे और प्रासंगिक ब्यौरे जोड़ा जा सके. ‘छह माड़ आठ गुंठ’ जैसे उपन्यास का जटिल पाठ हमें एक अच्छा पाठक होना सिखलाता है. समय के साथ क्रमश: यह अपने पाठक-वर्ग का भी निर्माण करता है. और जिस प्रक्रिया, जिसके द्वारा हम बेहतर पाठक और प्रबुद्ध पाठक बनना सिखाते है, वह संकुचित अर्थ में साहित्यिक होना नहीं है, चूँकि इसमें एक वृहततर सांस्कृतिक विमर्श अंतर्निहित है जिसमे हमारे जिद्दी आदते दृढ विश्वास और विचारधारात्मक निवेश शामिल है.  छह माड़ आठ गुंठ के संबंध में हम पाते है यह हमारी एक मान्यता             [विचारधारात्मक-निवेश ] की जड़ें खोदता है उसे चुनौती देता है, और वह मान्यता है, हमारा बाबू-संस्कृति-सुलभ विश्वास जिसमें अवश्यम्भावी रूप से ग्रामीण परिप्रेक्ष्य की तुलना में शहरी परिप्रेक्ष्य की सर्वोच्चता का भाव जुड़ा होता है और साथ ही साथ वाचिक परम्परा की तुलना में लिखित परंपरा को श्रेष्ठ समझना भी. 

उपन्यास में मौखिक परंपरा का आयाम अनुवाद के सबसे अंतिम संस्करण में प्रकट होता है, लेकिन उड़िया लोक प्रदर्शनपरक कलारूपों के साथ पाल-गायन के संवंध का ख़याल मेरे मन में बाद में पैदा हुआ. मैंने उपन्यास की भूमिका में ससंकोच स्पष्ट किया है कि यह उपन्यास पाल-गायक [ मुख्य गायक/ कथा-वाचक ] की चचेरी बहन है क्यूंकि दोनों संवेग-पूर्ण संवादों का प्रयोग करती है. इस तथ्य की पुष्टि तब हुई जब मैं हेमचन्द्र बरुआ ‘फेयर विदाउट, फाउल विदइन’ का तिलोत्तमा मिश्रा द्वारा किया गया अनुवाद पढ़ा , और इस बात को समझ पाया कि असम और ओडिशा की थिया-पाल परंपरा में कितना करीबी संबंध है. एक बातचीत में तिलोतमा मिश्रा ने मुझे यह बताया कि १५वीं शताब्दी में शंकर देव के समय से ही ओडिशा और असम के बीच व्यापक सांस्कृतिक संपर्क और अदन-प्रदान का सिलसिला शुरू हो गया था और लोक-परम्पराओं के असमी  विद्वान इस बात को मानते है की इन शताब्दियों में असमी और ओड़िया पाल-गायन एक दूसरे को प्रभावित किया होगा. और इसी बात की मैं सूक्ष्मता से छानवीन करना चाहता था.मेरी जानकारी में ऐसा कोई नहीं है जो इस विषय पर शोध कर रहा हो. बरुआ और सेनापति के उपन्यासों में पाल [ भारत के दो भिन्न प्रदेशों के सामान कलारूपों] की पाठगत प्रतिध्वनियों को सावधानी-पूर्वक छानवीन करना भी बेहतर होगा. पूर्वी भारत में पाल और साहित्य के संबंध को सामान्य तरीके से समझने के लिए, असम बंगाल और ओडिशा में विभिन्न प्रकार से विकसित होने वाले पाल के ठोस इतिहास की जरुरत है. तीन भाषाई प्रदेशों में पाल का तुलनात्मक अध्द्ययन इसमें मददगार साबित होगा. मुझे खोज के लिए इस बात ने बहुत ही आकर्षित किया कि असम के पाल की जड़ें कबीलाई पूजा परम्पराओं में हैं. जैसा कि मैं समझता हूँ बहुत सम्भव है प्रस्तुति [पाल-गायन] का यह संवादात्मक रूप, बहु-विधात्मक शैक्षणिक कीर्तन परंपरा से जरुर प्रभावित हुआ होगा जिसको १४ सदी में नामदेव ने महाराष्ट्र में लोकप्रिय बनाया था.

इतने विश्लेषण के बाद, छह माड़ आठ गुंठ के प्रति मेरी दृष्टि का निर्माण संभवतया इसके मौखिक प्रस्तुति वाले आयाम से होता है ,जो कि उपन्यास के पहले पठन से ही शुरू हो जाता है. मुझे याद है कि अपने किशोर अवस्था में  मेरे भाई जो उम्र में मुझसे ७ साल बड़े हैं, इस उपन्यास के हास्य-जनक प्रकरणों को मुझे पढ़ कर सुनाते समय इतने जोर से हंसा करते थे कि वो हँसते-हँसते कुर्सी से गिरने-गिरने को हो जाते. ओड़िशा में सेनापति का यह उपन्यास प्रामाणिक पाठ माना जाता है जिसके साथ मेरा पहला  संपर्क अकादमिक नहीं रहा और मुझे इस बात कि खुशी भी है. मेरा मानना यह भी है कि निश्चय ही उस तरह का उपन्यास नहीं है जिसको पहली बार औपचारिकतापूर्ण पांडित्य के साथ पढ़ा जाय.

कई दशकों से जाने-अनजाने मैं इस उपन्यास के बारे ये यह पता करने का प्रयास कर रहा हू की मेरा इस उपन्यास से पहला संपर्क इतना सजीव और उर्जावान क्यों है? क्या इसके कारण उपन्यास के पाठ और उसके संस्कृतिक स्त्रोतों में अंतर्निहित है? मुझे हाल  फ़िलहाल यह बात जानकर आश्चर्य नहीं हुआ, और मुझे लगता है आपको भी नहीं होगा कि छह माड़ आठ गुंठ बाद में पाल प्रस्तुति के लिए स्त्रोत-ग्रन्थ/पाठ बन गया जिसका इस्तेमाल ख़ास करके वाम संगठन ओडिसा के गांव में वहाँ के लोगों को राजनीतिक और संस्कृत रूप से शिक्षित करने के लिए कर रहे हैं.

प्रश्न:’उपनिवेशवाद,आधुनिकता और साहित्य के अधिकांश विश्लेषण का केन्द्र तुलनात्मकता है. इस संग्रह में लिखी गयी आपकी भूमिका यह बताती है कि भारतीय साहित्य [जो कि विभिन्न प्रदेशों और विभिन्न भाषाओं  में रचा गया है ] के प्रति एक सम्यक दृष्टि हमें उन सारी सम्यस्याओं से बचने में मदद करती है जिसकी उत्पत्ति क्षेत्रीय रूढ़ता और सांस्कृतिक उग्रभक्ति से होती है. क्या आप इसके बारे में संक्षेप में बताएँगे ?

प्रो. मोहंती: सांस्कृतिक उग्रभक्ति साहित्य के विद्यार्थियों के लिए जहर है. मैं समझता हूँ कि सांस्कृतिक उग्रभक्ति के कुछ भेद भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान शुरूआत में अपने शासक मालिकों द्वारा संस्कृति की जा रही अवमानना के प्रतिरक्षा में एक प्रकार के मिमिक्री के रूप में उत्पन्न हुए थे. विडंबना यह हुई की वास्तव  में इस तरह की प्रतिरक्षा ने १८-१९ सदी के यूरोप  की तरह यहाँ भी नृ-जातिकेन्द्रियता और नस्लवादी तर्कों का रूप ले लिया. इस संदर्भ में आप फ्रेंच रईस चिन्तक गोबिनाऊ के नस्लवादी शिध्द्यान्तो के बारे में विचार करे इसके साथ ही साथ आप ‘राष्ट्रीय’ साहित्य की संस्कृति विषय के बारे में मैंथ्यू अर्नोल्ड के नस्ल-आधारित मान्यता पर भी गौर फरमाए. इसी बात को के बारे में एक और प्रासंगिक सन्दर्भ अंग्रेजी को शास्त्रीय बना कर उसके मानकीकरण करने से जुड़ा विमर्श १८ सदी में इंग्लैंड में शुरू हुआ.

इस तरह के मिथ्या भाषावैज्ञानिक सिद्वान्त का बहुत गहरे रूप में जाति और वर्गाधारित मानवशास्त्रीय सिद्वान्तों से था, और भारत में एक शताब्दी के बाद ये सिद्वान्त विचारकों द्वारा फैलाये गये.  बुद्धिजीवी इतिहासकारों ने इन विचारों (जैसे कि ‘अंग्रेजीयत’ या ‘फ्रान्सीसीपन’) को यूरोपीय सन्दर्भो में काफी आलोचित-व्याख्यायित किया है परन्तु भारत में इन विचारों के प्रभाव क्या पड़ा इस ओर बहुत कम घ्यान दिया गया है. कम से कम एक इतिहासकार जोया चटर्जी का घ्यान इस बात की ओर गया है और उन्होंने यह तर्क दिया कि भारतीय सांस्कृतिक उग्रभक्ति के कुछ अंशों का विकास 19वीं शताब्दी में उस साम्प्रदायिक भावना के रूप में हुर्इ जो प्रकारांतर अस्मिता की विचारधारा के रूप में विकसित हो जाती है और इसलिए इस उग्रभक्ति का वर्ग आधार नवधनाढ्य जमींदारों जो कि अधिकाशंत: हिन्दू धर्म की उच्च जातियों के होते थे, में बना. सबसे पहले 1968 में ब्रूमफील्ड ने इस नवधनाढ्य वर्ग के सांस्कृतिक दृष्टिकोण के बारे में स्पष्ट रूप से लिखा. स्पष्ट रूप से कहूँ तो, इस मुददे पर प्रगतिवादी आलोचकों और इतिहासकारों द्वारा बहुत सारा कार्य किया जाता है.

साहित्य के अघ्येताओं के साथ एक ट्रेजडी यह होती है कि नकल के एक रूप में उग्रभक्ति ने साहित्य के बारे में एक विकट दृष्टिकोण पैदा करती है  जो साहित्य को एक बेडौल   विचारधारात्मक हथियार बना देता है. “मेरे साहित्य का इतिहास तुम्हारे साहित्य के इतिहास से पुराना है”, “अतीत के फलां फलां महान लेखकों का संबंध हमारी भाषा परंपरा से है आपकी से नहीं” आदि. यह विचारधारा उन पाठकों के लिए भी हानिकारक है जिन्हें जिनका संबंध किसी ख़ास प्रशंसित या पूजी जाने वाले परंपरा से होता है. दुर्भाग्य सांस्कृतिक देशभक्ति या उग्रभक्ति का ये रूप स्वतंत्रता के बाद हामरे क्षेत्रीय साहित्य अघ्ययन का मुख्य दृष्टि बन गया. इसके साथ ही एक महत्वपूर्ण घटना यह हुर्इ कि  हमलोग साहितय के अघ्ययन को छोड़कर एक अरूचिकर परियोजना में संलग्न होते  हैं जो पाठ के सूक्ष्म विश्लेषण को छोड़कर किसी लेखक के सतही प्रस्तुति को तरजीह देती  है और सायास अपना घ्यान अपनी भाषा परंपरा के एकाकी पक्ष पर केंद्रित  करती है और जो इस धारणा पर आधारित होती है कि साहित्य आलोचना का विभिन्न भाषा परंपराओं के बीच एक अविरत प्रतिद्वंद्विता है और लक्ष्य अपनी भाषा परंपरा को विशिष्ट बनाना है. यह विचारधारा अन्य भारतीय आधुनिक साहित्य परंपराओं के प्रति अज्ञान को न सिर्फ अनुमोदित करती है बल्कि संभवतः यह अज्ञान उसके लिए अनिवार्य भी होता है लेकिन जाहिर ही संस्कृत और यूरोपीय साहित्य के साथ सह-अस्तित्व से इसे कोई गुरेज नहीं. साहित्य अकादमी, दिल्ली द्वारा प्रकाशित क्षेत्रीय भाषाओं के आरंभिक इतिहास और लेखकों के मोनोग्राफ्रफ इस तथ्य के पर्याप्त उदाहरण हैं  जिसके बारे में बात कर रहा हूँ और इसे उन आरंभिक प्रवृतियों के आधार पर विश्लेषित करने के लिए कई  पीचडी शोधों की दरकार होगी.

अभी तक हमारे पास वैसी नैतिक रूप से उपयुक्त और युक्तिसंगत भाषा नहीं है सांस्कृतिक या विचारधारात्मक रूप से उग्रभक्ति के बारे में बात करने के लिए, इसिलए जब हम इसकी सार्वजनिक अभिव्यक्ति से दोचार होते होते हैं, किसी कांफ्रेंस में या प्रकाशन में, हम बस भौंहें चढाने या एक दूसरे से आँखों आँखों में कहने से ज्यादा कुछ नहीं कर पाते. लेकिन शीर्ष साहित्यिक व्यक्तित्वों द्वारा इसकी पहचान करने के साहसी प्रयत्न हुए हैं. उदहारण के लिए २००१ में द हिन्दू में गिरीश कर्नाड का लेख या बुक रिव्यू में ‘टैगोरभक्ति’ पर उनका ही लेख.

गिरीश कर्नाड दो मुख्य प्रश्नों को रेखांकित करते हैं. पहला यह कि एक कैनन के रूप में ‘भारतीय’ साहित्य को किस तरह से परिभाषित किया जाए और दूसरा यह कि साहितियक संकलनों के संदर्भ में एक संपादक की भूमिका क्या होनी चाहिए? मगर बात इतने से ही खत्म नहीं हो जाती यहाँ एक और सामान्य प्रश्न यह उभरता है कि भारतीय साहित्य के किसी विशेष रचना की व्याख्या हम किस प्रकार करें, जबकि उग्रभक्तिवादी दृष्टिकोण पाठ और लेखक की एक विकृत व्याख्या प्रस्तुत करता है. कल्पना किजिए की आप चार्ल्स डिकेंस को पढ़ते समय दिमाग में सबसे उपर इस बात को रक्खें कि इसमें निरूपित अंग्रेजी सभ्यता कितनी महान है, या फिर तुकाराम को आप मराठी संस्कृति के महानता के जश्न मनाने के उद्देश्य से पढ़ें या फिर १५वीं सदी में सरलादास द्वारा रामायाण और महाभारत के सबाल्टर्न संस्करण को ओडिया साहित्य इतिहास का गौरव गान करने के लिए. पाठ अर्थ-ग्रहण के ऐसे प्रयत्न गलत दिशा में होंगें  क्योंकि ऐसा करने से हम उस दृष्टि से वंचित हो जाते हैं जो हमें उन सांस्कृति अंतरधाराओं को देख पाने में सक्षम बनाती जिसने मघ्यकालीन और आंरभिक भारतीय संस्कृति का निर्माण किया है, वह संस्कृति जिसे नाथ योगियों और घुमक्कड कवियों ने एक इलाके से दूसरे में भटकते हुए निर्मित किया – उपमहाद्वीप के इतिहास में सचमुच ही एक नया क्षण. सरलादास और तुकाराम को संकुचित साहित्यिक-ऐतिहासिक प्ररिप्रेक्ष्यों में पढ़ना-समझना उनके स्वप्नदर्शी विचारों के पंख कतरने जैसा है उनकी क्रांतिकारी-सामाजिक शक्ति के प्रति अंधा होना है. मगर संस्कृति उग्रभक्ति या अंधभक्ति का आधुनिक रूप साहित्य के विधार्थियों को इस संकुचित दृष्टि से उपरोक्त दोनों लेखकों की रचनाओं के अध्ययन, पठन के लिए सहमत कर सकता है और आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्यूँकि भारत में क्षेत्रीय साहित्य का इतिहास इसी तरह लिखा जा रहा है.

सीएमएल की भूमिका में मेरा यह तर्क नहीं है कि साहित्येतिहास महत्वपूर्ण नहीं है, लेकिन इस सांस्कृतिक अंधभक्ति/उग्रभक्ति का मुकाबला करने के लिए गहन पाठगत व्याख्या और अंतर-क्षेत्रीय तुलनात्मक अध्ययन ज्यादा महत्वपूर्ण है. आजादी को ६० साल हो गये हैं और हमें राष्ट्रीय और क्षेत्रीय साहित्य इतिहास लेखन से एक लघु अवकाश लेने की जरूरत है ताकि हम ज्यादा से ज्यादा घ्यान सीधे-सीधे पाठ और कुछ और तुलनात्मक सांस्कृतिक विषयों पर केंद्रित कर सकें. जैसा कि प्रो. यू.आर. अनंतमूर्ति  कार्नेल विश्वविधालय में कर सके. जैसा उन्होंने व्यक्तव्य में कहा कि हमें आधुनिक भारतीय साहित्य रचनाओं की सुस्पष्ट व्याख्या के साथ-साथ ही अन्तर्क्षेत्रीय पाठ समुच्चयों को विवेचित करने की जरूरत है. भारतीय साहित्य विषय पर लिखे गये कुछ बेहतरीन लेख चाहे एज़ाज़ अहमद या शिशिर कुमार दास या अमीया देव और के. अयप्पा पनिक्कर के हों वो सभी तुलनात्मक अध्ययन की जरूरत पर बल देते है. इस संदर्भ में खासतौर पर मैं पणिक्कर के द्वारा पाठय समुच्चयों जो कि विभिन्न भाषार्इ क्षेत्रों के सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों और आन्दोलनों को परिभाषित करते हैं, पर ध्यान केंद्रित करने की बात को पसंद करता हूँ. अमीया देव ने जिसे ‘तह का इतिहास’ कहा है और शायद जिसमें हमे ब्रिटिश मार्क्सवादी इतिहासकारों की  परियोजना की झलक मिलती है, वह हमारे लिए महत्वपूर्ण हो सकता है मगर इससे पहले हमें एकांगी साहित्य इतिहास के प्रारूप से बचना होगा और हमें विभिन्न भाषा परंपराओं के तुलनात्मक अध्ययन के महत्वपूर्ण कार्य को भी पूरा करना होगा.

अब इसे एक उदाहरण देकर समझाना चाहिए. वास्तव में पांरपरिक साहित्य इतिहास का प्रथम लक्ष्य अपनी ही भाषा परंपरा के भीतर उस सीधी पंक्ति का अन्वेषण करना है जिससे उस भाषा परंपरा का साहित्य सीधे-सीधे प्रभावित होता है. जो हमें सांस्कृतिक संबंध और प्रसार के विकृत बोध की ओर ले जा सकता है. कुछ साल पहले मैंने १६वी सदी में बलराम दास द्वारा लिखे गये लक्ष्मी पुराण के  मूल रूप से कुछ नये तथ्यों को पाया और वह यह कि इसमें प्रतिदिन के श्रम को जिसमें गृहस्थिक श्रम भी शामिल है, काफी महत्व दिया गया है. तब मुझे ऐसा लगा कि श्रम को इतने महत्व देना वीरशैववाद के एक प्रमुख विचार को प्रतिबिंबित करता है. मुझे इस बात की पुष्टि के लिए कोर्इ पाठगत सबूत तो नहीं मिला, और साहित्य इतिहास की एक संकुचित दृष्टि मुझे इस लक्ष्मी पुराण में श्रम महत्व के प्रेरणास्रोत को श्रोत के रूप में पूर्ववर्ती उडि़या काव्यों को ही स्वीकार करने के लिए ही बाध्य करता है. मगर इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि १२वीं शताब्दी के कर्नाटक में वीरशैववाद एक लोकप्रिय सामाजिक आन्दोलन था जिसका प्रभाव दूर-दूर के प्रदेशों तक पड़ा. घुमक्कड़ों योगियों और साध्ओं ने इस सामाजिक आन्दोलन के विचार को दूर-दूर तक प्रसारित किया. इसलिए इस बात का निर्धारण करना कि लक्ष्मी पुराण के इस श्रम महत्व का श्रोत, केवल उडि़या संस्कृति के भीतर ही है मुर्खतापूर्ण होगा. इस संदर्भ में जैसा कि लक्ष्मी पुराण के बारे में लिखते समय मैंने बताया कि वीरशैव-विचार परंपरा और लक्ष्मी पुराण के क्रांतिकारी सुधारवादी विचारों के बीच जरूर कोर्इ सांस्कृतिक संपर्क रहा होगा. जिसे बलराम दास ने बखूवी संश्लेषित और विकसित किया. मुझे ऐसा लगता है कि मेरे इस रेखांकन को और सूक्ष्मता से जांचा-परखा जाए और शायद इसमें एक शोध-विषय होने की भी संभावना है जिसका विकास इन दो भाषा पंरपराओं से परिचित विद्वान कर सकते है और यह बहुत स्पष्ट है कि पारंपरिक इतिहास लेखन के जिस माडल को मैंने त्यागा वह मुझे लक्ष्मी पुराण में सक्रिय सांस्कृतिक अंर्तधारा को समझने में बिल्कुल ही मदद नहीं करता और मजबूरन मुझे लक्ष्मी पुराण के सारे वैचारिक आधारों के श्रोत के रूप में मजबूरन उडि़या भाषा पंरपरा को ही स्वीकारना पड़ता है.

हमें विभिन्न क्षेत्रीय भाषा पंरपराओं के बीच सांस्कृतिक अंत:क्रिया और आदान-प्रदान के एक जटिल और सही-सही प्रतिदर्श या नमूने की जरूरत है जो तुलनात्मक पाठगत अध्ययन से संभव है. भारतीय साहित्य के रूप-रेखा को स्पष्ट रूप से इसी अंतक्षेत्रीय आदान-प्रदान के संदर्भ में समझा जा सकता है, बजाय कि इसे किसी भी पारंपरिक रूप से परिभाषित साहित्य ऐतिहासिक भव्यकथनों के परिप्रेक्ष्य में जांचा-परखा जाए. सीएमएल भी इसी दिशा में किया गया एक प्रयास है जिसका लक्ष्य एकांगी साहित्य पर्यवेक्षण विश्लेषण और सांस्कृतिक अंधभक्ति के खिलाफ आलोचनात्मक तुलनात्मक की प्रतिष्ठवादी मगर इस दिशा में यह एक छोटा सा कदम है.

संयोग से यूरोप में ज्ञान के एक अनुशासन के रूप में तुलनात्मक साहित्य का उत्थान उस धुंधले दृष्टि के खिलाफ प्रतिक्रिया के रूप में हुआ था, जिसका कारण अन्य रूप से साहित्य अध्ययन था. 1870 में तुलनात्मक साहित्य के प्रथम पत्रिका के संस्थापक हुगा मेल्टज इस बात की जरूरत महसूस करते हैं कि एक ऐसी पत्रिका होनी चाहिए जो कि उस सांस्कृतिक प्रवृति की आलोचना प्रस्तुत कर सके जिसमें हर एक देश अपने को दूसरे अन्य देशों से महान समझता है, उन्होंने इस प्रवृति को राष्ट्रीयता का सिद्धांत नाम दिया जो कि यूरोप में १९वीं शताब्दी के साहित्य अध्ययन में काफी लोकप्रिय था. कहने की जरूरत नहीं है कि सांस्कृतिक स्वाभिमान और बंधुत्व की भावना के लिए किसी दूसरे समुदाय या देश की तुलना में अपने समुदाय या देश को प्रभुत्वशाली मानना अपरिहार्य है. उग्र राष्ट्रवाद या उग्रभक्ति एक अस्वास्थ्यकर सांस्कृतिक परिणति है जिसे किसी समुदाय या देश के वास्तविक गर्व के साथ जोड़कर भ्रम ना पैदा किया जाए.

मेल्त की राष्ट्रीयता विरोधी दृष्टि उनके अपने समय की साहित्य अध्ययन की प्रमुख प्रवृति के खिलाफ एक जरूरी प्रतिकार थी मगर दुर्भाग्य से उनके द्वारा विकसित ज्ञान के इस अनुशासन का लक्ष्य इसके यूरोप केंद्रित उद्भव के परे नहीं जा सका. जबकि २०वीं शताब्दी में कर्इ ऐसी महत्वपूर्ण घटना घटी जिसके तुलनात्मक में साहित्य अध्ययन जरूरी था, उदाहरण के लिए तीसरी दुनिया का उपनिवेशीकरण, समाजवादी तथा नारीवादी अन्तर्रराष्ट्रीयता जैसे आंदोलनों का विकास. पाश्चात्य जगत के विद्वानों में विश्व साहित्य के विषय पर एक नए विमर्श का जन्म हो रहा है. फिर भी मुझे यह लगता है कि भारत के साहित्य के विधार्थी विश्व साहित्य के अऔपनिवेशक और समतावादी दृष्टिकोण में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं. मगर ये अऔपनिवेशक व्याख्याओं से होना चाहिए और इसका आधार संस्कृति के इतिहास का अनुभव आधरित ज्ञान होना चाहिए न कि अपने आत्मश्लाघी कथन शैलियों और एकांगी पंरपराओं के आधार पर.

प्रश्न: तो क्या आप इस बात से सहमत हैं कि साहित्य के उग्रभक्ति पूर्णदृष्टि के लिए कोर्इ दूसरा सिद्वांत जरूरी है जिसमें साहित्य अध्ययन को एक नियामक भाषिक परंपरा के रूप में देखना शामिल है. नि:संदेह इस एकभाषिकता और भाषिक अंधभक्ति/उग्रभक्ति का विरोध ‘छा माना आठ गुंथा’ के तेलगु, हिन्दी, बांग्ला जैसे विभिन्न क्षेत्रों के पाठक समूहों के बारे में चर्चा करते हुए करेंगे. उदाहरण के लिए कोर्इ यह कह सकता है कि प्रेमचंद के यथार्थवाद के प्रति उग्रभक्तिवादी या गैर उग्रभक्तिवादी/ अंधभक्तिवादी दृष्टि इस बात पर निर्भर करती है कि प्रेमचंद की रचनाओं को अंर्तक्षेत्रीय पंरपरा समुच्चयों के परिप्रेक्ष्य में देखा गया है या उनके यथार्थवादी उपन्यास और छोटी कहानियों की प्रेरणा विभिन्न साहित्य पंरपरा है या फिर तुलनात्मक रूप से आप इस बात पर सहमत होगें ‘छा माना आठ गुंथा’ के उग्रभक्तिवादी/अंधभक्तिवादी और गैर उग्रभक्तिवादी/अंधभक्तिवादी दृष्टिकोण के बीच की भेदक रेखा इस बात पर निर्भर करती है कि इसे उडि़या सांस्कृतिक आंदोलन के गौरवगान के रूप में देखा जाता है या इसे एक तुलनात्मक और अंर्तक्षेत्रीय व्याख्या की परंपरा के रूप में. क्या इस एक भाषिकतावादी दृष्टिकोण की आलोचना हिन्दी एवं उडि़या और अन्य भाषा के प्रारंभिक यथार्थवादी उपन्यासों और दक्षिणी एशियार्इ साहित्य के साहित्यिक यथार्थवाद परिक्षण की दूसरी सबसे तार्किक पद्वति है.

प्रोफेसर मोहन्ती: आपने जो कहा उस बात से मैं सहमत हूँ. साहित्य अध्ययन के इस उग्रभक्तिवादी दृष्टिकोण जो कि भारत में एक रूढ़ दृष्टिकोण बन गया है के आलावा न सिर्फ एक संस्कृतिवादी प्रदेशवादी पूर्वाग्रह से मुक्त होना होगा बल्कि हमें एक भाषिकतावादी पूर्वाग्रहों और दृष्टिकोण से भी अपने को बचाना होगा. अब आप इस बात को ही देखे कि यदि हम फ्रेंच या अंग्रेजी के साथ-साथ किसी अन्य भारतीय भाषा का अध्ययन करते हैं तो हमें कोर्इ पेरशानी नहीं होती है मगर यदि हम किन्हीं दो या दो से अधिक भारतीय भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं तो हमें समस्या का सामना करना पड़ता है. मगर साहित्य के सही-सही अध्ययन विश्लेषण के लिए इस तुलनात्मक अध्ययन की जरूरत भी भारतीय विद्वान स्वीकारते हैं. जैसे कि हमारे लेखक अपनी भाषा पंरपरा के आलावा भी दूसरी भाषा परंपरा के रचनाओं को पढ़ते हैं चाहे वे उसका अनुवाद क्यों न पढ़े और बहुत लाजमी है कि वे अपनी परंपराओं के आलावा अन्य भाषा पंरपराओं से भी प्रेरित और प्रभावित होते हैं. मगर उनके आलोचक और शोध अघ्येता इतने उदार नहीं है कि वे किसी लेखक की रचनाओं में अन्य भाषा पंरपराओं के प्रभाव को देख पाये और उनमें से अधिकांश अपने अध्ययन-विश्लेषण का कार्य एक भाषा पंरपरा के आलोक में ही सम्पन्न कर लेते हैं.

इस बात को मानने में विनम्रता होगी कि द्विभाषिकता और अन्तर्भाषिक संवाद पहले भारत में एक तार्किक और सामान्य प्रक्रिया रही है. मैंने सरला दास के विचित्र रामायण से अपने अध्ययन विश्लेषण का कार्य शुरू किया, सरलादास का विचित्रा रामायण प्रथम उडि़या महाकाव्य है जिसे १५वीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में रचा गया. यह रामायण का बहुत दिलचस्प संस्करण है और अपने सबल्टर्न पाठ, जिसकी कथन शैली के केंद्र में सीता है, के साथ एक मनोरम और आकर्षक कथा संसार की रचना करता है. सच्चिदानंद मिश्र इस बात की तरफ इशारा किया था, १७ वीं शताब्दी में इसका तेलगु अनुवाद हुआ था और तबसे इसके अन्य भाषाओं में अन्य चार अनुवाद किये जा चुके हैं. उत्तरी आंध्रप्रदेश और दक्षिणी उडि़सा के सांस्कृतिक संबंधों के बारे में तो हम अच्छी तरह से जानते हैं, मगर विचित्रा रामायण के तेलगु भाषा में अनुवाद वाले तथ्य की खोज हमें यह बताती है कि उडि़सा आंध्रप्रदेश के सीमांत में द्विभाषिक पंरपराएँ और कितनी सजीव और सक्रिय है. इस तरह की संस्कृति को केंद्र सरकार या साहित्य एकादमी से किसी तरह की अनुदान की जरूरत नहीं है. विचित्रा रामायण का अनुवाद इसलिए संभव हो सका क्योंकि उडि़या के अतिरिक्त अन्य भाषाओं में भी पाठक का ऐसा वर्ग था जो कि इस तरह के पुस्तकों में दिलचस्पी रखता था और इस समुदाय के लिए भाषा की सीमाएँ कोर्इ मायने नहीं रखती थी. वी. नारायण राव ने अपने कर्इ वक्तव्यों में स्पष्ट करने की कोशिश की है कि औपनिवेशिक भारत के पाठयक्रमों में अंग्रेजी को अनिवार्यत: शामिल किया जाना क्षेत्रीय भाषाओं की दूर्दशा का कारण बना, इसके साथ ही साथ अंग्रेजी और संस्कृत के पाठयक्रम में शामिल किये जाने से आधुनिक भारतीय भाषा पंरपरा समाप्त हो गर्इ. इसका परिणाम यह हुआ कि सक्रिय अंर्तक्षेत्रीय और सांस्कृतिक आदान प्रदानों के जगह एक भाषिकता और भाषागौरव का पूर्वाग्रह इन क्षेत्रीय भाषाओं में मुखर हो उठा.

जैसा कि कार्नेल विश्वविद्यालय में दिये गये एक वक्तव्य में यू.आर अन्नतमूर्ति ने इस वाद पर और बल देते हुए कहा कि अंर्तभाषिक साहित्यिक समुच्चयों का अध्ययन एक भाषा परंपरा के दूसरे भाषा परंपरा पर पड़ने वाले प्रभाव के विश्लेषण के दृष्टिकोण से ही महत्वपूर्ण नहीं है. बल्कि यह दो भाषाओं पंरपराओं के बीच अभिव्यक्ति पक्ष, कथन शैली, व्यंग्य आदि के समानताओं को भी समझने में हमारी मदद करता है. इसके साथ ही साथ इसके माध्यम से हम दो भाषा परंपराओं की रचनाओं में पाये जाने वाली विचारधारात्मक वैषम्य को भी स्पष्ट करता है. प्रो. अनंतमूर्ति का लक्ष्य भी करीब-करीब यही है, उन्होंने रविन्द्रनाथ की ‘गोरा’ और सेनापति के ‘छह माड़ आठ गुंठ’ के बीच में पाये जाने वाले वैषम्य को ही रेखांकित किया है. वो चाहते थे कि पाठक इस बात पर विचार करे कि किस तरह ‘छह माड़ आठ गुंठ’ और ‘गोरा’ में भाषा का संस्कृतनिष्ठ या विशुद्व रूप के साथ-साथ रोजमर्रा के काम काजी भाषा का भी प्रयोग हुआ है. बेशक यह एक मात्र उदाहरण है मगर यह हमें तुलनात्मक पाठगत विश्लेषण और साहित्यिक इतिहास की परंपराओं को देखने की एक नर्इ दृष्टि देता है. इस तरह के तुलनात्मक अघ्ययन के लिए गहन पाठगत विश्लेषण की जरूरत होती है.

प्रश्न: यह बात दिलचस्प है कि नस्ल आधरित दृषिटकोण, जो कि वीं सदी के यूरोपीय साहित्य इतिहास में प्रचलित थी कि अलोचना करते समय आपने मैथ्यू आर्नल्ड का संदर्भ दिया था. मगर मैथ्यू आर्नल्ड ने साहित्य आलोचना के जिस आध्यात्मिक दायित्व को स्पष्ट किया था वह एक प्रकार आचारशास्त्रीय आज्ञार्थ हैं, मगर आपने  और प्रो. अनंतमूर्ति ने इसे एक गहन आलोचनात्मक और तुलनात्मक अध्ययन के रूप में देखा जो कि सही अर्थो में एक समतावादी विश्व के निर्माण में सहायक है.

प्रो. मोहंती: वैसे साधारण तौर पर मैं साहित्य के किसी भी तरह के आलोचनात्मक दृष्टिकोण के आचारशस्त्रीय या नीतिपरक निहितार्थों के खिलाफ नहीं हूँ, मगर इस तरह का आचार शास्त्रीय नितिपरकक विचार पद्वति ही साहित्य अध्ययन का पर्याय नहीं है. यह हमारा खुद का अपना एक चुनाव हो सकता है कि हम इसे ध्यान में रखकर किसी साहित्य का अध्ययन कर सके. इसके साथ एक बात और भी जुड़ी है कि आर्नाल्ड का यह सिद्वांत जिसे उन्होंने हमारे दृष्टिकोण को अपने नस्लवादी और राष्ट्रवादी आधारों के कारण और भी संकुचित और तंग कर देता है. वैसे में यह स्पष्ट कर चुका हूँ कि मैं साहित्य की उस भूमिका को कहीं कमतर नहीं आकता हूँ जिसके मार्फ़त साहित्य एक सांस्कृतिक शिक्षक के रूप में कार्य करता है. वास्तव में साहित्य हमें सांस्कृतिक रूप से शिक्षित करता है और साहित्य की आलोचना इस विमर्श को और भी अधिक उत्पादन और रचनात्मक बना सकती है. इस तरह के विमर्शों को, जिसकी हम चर्चा कर रहे हैं, और भी पुष्ट और समृद्ध करने का सबसे बेहतर तरीका यह हो सकता है कि हम आर्नल्ड के सिद्धांत के परे जाकर और जनतांत्रिक बनाएँ, इसे संगोष्ठियों के आयोजनों से हटाकर कहवाघरों और देहात के नुक्कड़ चौराहे तक लाया जाय. उड़ीसा में कर्इ शताब्दियों से जगन्नाथ दास द्वारा लिखित भागवत की चर्चा और पाठन संप्रदायिक स्थलों जिसे उडि़या मे भागवत तुँगी कहा जाता है, में होता चला आ रहा है. ठीक इसी तरह से कर्इ अन्य प्रस्तुतिपरक पंरपराएँ जैसे कि  रामलीला आदि आलोचना की एक जनतांत्रिक संभावना को स्पष्ट करते रहें है क्योंकि इनका सीधा-सीधा संबंध लोक या जनता से होता है कोर्इ आलोचक या व्याख्याकार के माध्यम से ये प्रस्तुति की व्याख्या को नहीं समझते हैं. मेरा तर्क यह होगा कि जब भागवत और रामचरित जैसी रचनाएँ इन लोकवृतों मे बोली पढ़ी समझी जानी जाती रही है तो प्रेमचंद और गोदान जैसी रचनाएँ क्यों नहीं इस लोकवृत में समझी और मुल्यांकित हो सकती है. मुझे विश्वास है कि एक दिन ऐसा आएगा जब साहित्यिक आलोचना लोकप्रिय शिक्षा का एक अंग होगी. मेरे अनुसार जो विमर्श जितना ही लोकतांत्रिक होगा सांस्कृतिक विऔपनिवेशीकरण में उसकी भूमिका उतनी ही होगी और यह हमारे आलोचनात्मक चिंतन को भी प्रखर करेगा.

प्रश्न: क्या आप इस बात को नहीं मानते कि इस उपमहाद्वीप में घुमक्कड़ संतयोगियों, मौखिक कथा पंरपरा, प्रस्तुतिपरक विधायें  मिलकर एक समन्यवादी राजनीतिक और सामाजिक, जनतांत्रिक स्पेस का निर्माण किया है जिसकी आज इन विमर्शों के संदर्भ में बहुत जरूरत महसूस की जा रही है.

प्रो. मोहन्ती: मध्यकाल और प्राचीनकाल के हमारे देश कर्इ धुमक्कड़ साधु, योगी ऐसे हुए है जो सिर्फ घूम-घूम कर कहानी कहने के अलावा एक और महत्वपूर्ण काम कर रहे थे. वह यह था कि वो इस उपमहाद्वीप के विभिन्नप्रदेशों में एक विचारधारा का विकास कर रहे थे और उसे फैला रहे थे. ठीक इसी तरह का काम सूफियों ने भी किया था. कोर्इ यह तर्क भी दे सकता है कि एक घुमक्कड़ साधु और योगी कर्इ प्रांतों के लोग के विचारों, सिद्धांतों और मतों को भी संग्रह कर रहे थे और नए मतों का परिक्षण भी कर रहे थे. कुल मिलाकर ये सब बात इस तथ्य का साक्ष्य भी प्रस्तुत करती है कि इन विभिन्न प्रदेशों और भारत के उपसांस्कृतिक क्षेत्रों गीत और कहानियां किस तरह से स्वीकार की गर्इ. यदि आप कबीर के जीवन को ही उदाहरण के तौर पर देखे तो पाएंगें कि कबीर किस तरह से आज भी लोक में जीवित हैं. न जाने कितने ही गावों और क्षेत्रों के लोग कबीर के दोहे को न सिर्फ गाते हैं, बल्कि कबीर के मूर्तिमंजक मिजाज को भांपते हुए उस आधार पर दोहे की भी रचना करते हैं. इस तरह हम देखते हैं कि साहित्य और आलोचना का साहचर्य भारत के जन सामान्य में किस तरह से रची बसी है, जहाँ साहित्य है वहां आलोचना भी अपरिहार्य रूप से उपस्थित है.

शबनम विरमाणी द्वारा कबीर के ऊपर बनी वृत्तचित्र इसी तथ्य को रेखांकित करती है. अगर हम इस फिल्म के निहितार्थों को गंभीरता पूर्वक लें तो हम पाऐंगें कि किस तरह से कबीर को अकादमिक आलोचना-विवेचना से परे ले जाकर लोकप्रिय संस्कृति में उनकी उपस्थिति को समझा जा सकता है.

प्रश्न: जिस विश्व साहित्य की आप बात करते हैं उसे बाजरू बना देने से हमलोग कैसे रोक पाऐंगें?

 प्रो. मोहंती: विश्व साहित्य शब्द जैसा कि मैं इसका प्रयोग किया हूँ का उद्देश्य एक आलोचनात्मक पंरपरा का अंतर सांस्कृतिक संवाद है. इसका संबंध साहित्यिक रचनाओं से नहीं है, गोयथे ने भी जब इस शब्द का प्रथम बार प्रयोग किया था तो उनका संदर्भ उस प्रक्रिया से था जिसके मार्फत एक सामान्य पाठक और आलोचक यह सीखते हैं कि एक बहुलतावादी सांस्कृतिक स्पेस में हम किस तरह से सचेतन रूप से बुदिमता पूर्ण जीवनयापन कर पाते हैं. इस तरह से बहुलतावादी सांस्कृतिक स्पेसों का निर्माण अंर्तसांस्कृतिक आदान-प्रदान अनुवाद और आलोचना से होता है. गोयथे ने सांस्कृतिक खुलापन और सहिष्णुता के महत्व पर प्रकाश डाला है और खास कर के जब हम विश्व साहित्य के बारे में चर्चा करते हैं तो इनका महत्व और भी बढ़ जाता है. उन्होंने विद्वानों के उस प्रयास को भी सराहा है जिसके माध्यम से वे विभिन्न राष्ट्रों, प्रदेशों, नस्लों, जातियों के साहित्य को समझने की कोशिश करते हैं, और उन तक अपने साहित्य को पहुंचाने का प्रयत्न करते हैं. हमारा विश्वविद्यालय में आज इस साहित्य का एक संकलन बनाकर उसे विधार्थियों तक पहुँचा और पाठयक्रमों में शामिल किये जाने से हम अपने उद्देश्य में सफल हो पाऐंगें. इस संदर्भ में हमारे सामने जो समस्या मौजूद है वह यह कि हमलोग जिस संस्कृति मे पले-पढ़े हैं वह हमे पढ़ने और व्याख्या करने की एक खास समझ को सौंपती है, जिसे परिवर्तित कर पाना बहुत ही मुश्किल है.

प्रश्न: सीएमएल में आपके द्वारा निरूपित उदभावनाओं का केंद्रित विषय वैकल्पिक आधुनिकता है और जिसे आपने लक्ष्मी-पुराण के विश्लेषण के समय स्पष्ट रूप से पहचाना भी, तो क्या आप बता सकते हैं कि इस वैकिल्पक आधुनिकता का वर्तमान विश्व साहित्य परियोजना में क्या महत्व है?

प्रो. मोहंती: वैकलिक आधुनिकता विषय पर आधरित मेरी कर्इ रचनाएँ उस अंतरानुशासनिक परियोजना का एक भाग है, जिसकी उत्पति बहुआधुनिकता और प्राक आधुनिकता विषयों पर छपे लेखों और संपन्न हुए गोष्ठियों से हुआ है. यह सेमुअल आइजेन्स्डाट और शेल्डन पोलाक जैसे महान लोगों के विचारों से प्रेरित है. बेशक इसे उत्तर औपनिवेशिक अध्ययन के संदर्भ में दिलीप गांवकर और दिपेश चक्रवर्ती  के प्रयासों से प्रसिद्धि मिली. भारत में बनारस हिन्दु विश्वविधालय के अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर संजय कुमार तथा अर्चना कुमार और हिन्दी विभाग के राजकुमार द्वारा चीन अध्ययन के भारतीय विद्वान कमलशील आदि के सहयोग से होने वाले संगोष्ठियों और सम्मेलनों के द्वारा इस इस विषय को और विस्तार दिया गया. इस विचार की आधारभूत मान्यताएँ यह है कि हम आधुनिकता के जिस प्रभुत्वशाली रूप को जानते हैं, जिसका विकास यूरोप में पूँजीवाद के विकास के साथ हुआ, आधुनिकता का एक मात्र रूप वही नहीं है, इसके आलावा भी आधुनिकता के कर्इ विकल्प और कर्इ रूप हैं. इस विचार का प्रयास यह है कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अनुसंधानों के माध्यम से एक गैरपूंजीवादी आधुनिकता का खाका खींचा जा सके.

जैसे कि कुछ जगहों में मैंने आपको बताया कि यह परियोजना अंतरानुशासनिक है. फिर भी इस परियोजना के अंतर्गत साहित्य के अध्ययन की एक विशिष्ट भूमिका है. जिस काल को हम प्राय: प्राक-आधुनिक कहते हैं उस समय का साहित्य हमें एक दिलचस्प और एक नए तथ्य से हमारा साक्षात्कार करता है. उस समय के साहित्य में हम अप्रभुत्वशाली संस्कृति और विचारों के कर्इ स्तरों को पाते हैं. अगर हम इसे वैकल्पिक आधुनिकता के दृष्टिकोण से देखने तो इन साहित्य पाठों में हमें अपने अतीत के बारे में एक जिज्ञासा जनक परिप्रेक्ष्य उपलब्ध होता है. जिसे पारंपरिक और रूढ़ अर्थों में साहित्यिक कहा जाता है वह अपने आप में मौखिक कथा कहानी प्रस्तुतिपरक विधा आदि के अतिरिक्त कुछ भी नहीं ठहरता.

वैकल्पिक आधुनिकता को लक्ष्य बनाकर उभरने वाली यह अंतरानुशासनिक धारा विश्व साहित्य के बारे में हमारी समझ को और पुष्ट या समृद्ध कर सकता है. मेरा मानना यह है कि यह कर सकता है. इन सब बातों के अतिरिक्त एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि क्या साहित्य के विद्वान इस तरह की विषयों में दिलचस्पी लेंगे और क्या दो अंर्तसांस्कृतिक सीमाओं के परे अपनी अनुशासनिक दृष्टि का विस्तार कर पाऐंगे? और मैं विद्वानों से निवेदन पूर्वक कहना चाहूँगा कि भारतीय आधुनिकता की शुरूआत औपनिवेशिक शासन के शुरूआत से नहीं होती है आधुनिकता के कर्इ ऐसे तत्व भारतीय समाज और संस्कृति में औपनिवेशक शासन के शुरूआत से पहले ही मिलने शुरू हो जाते हैं. और यदि ऐसा है कि आधुनिकता के बहुत सारे ऐसे रूप हो सकते हैं तो हम पूंजीवाद के उद्देश्य के सापेक्षता मे ही आधुनिकता का सर्वेक्षण नहीं कर सकते. इस तरह से साहित्य और संस्कृति के आलोचक आधुनिक विचारों मूल्यों सांस्कृतिक रूपों का अन्वेषण गहन पाठ विश्लेषण के माघ्यम से कर सकते हैं. इस तरह के विश्लेषण को मानव विज्ञान, समाजशास्त्र, इतिहासकारों आदि से प्रेरणा मिल सकती है.

प्रश्न: हमे लगता है कि सांस्कृतिक और नैतिक सापेक्षतावाद की आपकी आलोचना काफी प्रेरणास्पद है आपने अंर्तसांस्कृतिक अघ्ययन की जो वकालत की उसमे जोर इस बात पर नहीं है कि विभिन्न संस्कृतिओं के बीच एक सहिष्णु संवाद हो बल्कि आपने उन विभिन्न संस्कृतियों के बीच पाए जाने वाले विरोधों और अंतरो के विश्लेषणों को आपने महत्वपूर्ण माना. एक सांस्कृतिक व्याख्याकार असहमत होने और निर्णय लेने से डरता नहीं है. यह एक ऐसी आलोचनात्माक रूख है जिसमें असंगतिओं और विरोधी के पहचान एक नितांत आवश्यक शर्त है मगर इसे असंवेदनशील और असहिष्णु नहीं कहा जा सकता है.

प्रो. मोहंती: हां, आपने सही कहा, मुख्य समस्या उन विरोधों और असंगतियों की पहचान ही है और जैसा कि आपने ही कहा कि असहिष्णुता और असंवेदनशीलता से परे हैं. हमलोग ने नस्ल-केंद्रीयता के खतरों से बहुत कुछ सीखा और सापेक्षतावाद भी इसके विपरोत नहीं है, बल्कि मैं तो यह कहूंगा कि इसमें भी हमें नस्ल-केंद्रित खतरों की झलक मिलती है. हमे नस्ल-केंद्रीयता और सांस्कृतिक सापेक्षतावाद से परे जाना होगा और निर्णय देने के खतरे को भी उठाना पड़ेगा. मगर यह ध्यान रहे कि हमें अपने दृष्टिकोण की समय-समय पर पड़ताल भी करती रहनी होगी.

जैसा कि मैंने और कर्इ अन्य आलोचकों ने यह स्पष्ट किया कि वस्तुनिष्ठता की अप्रत्यक्षवादी लचीली और जटील अवधरणा एक आदर्श अन्वेषण में हमारी मदद कर सकती है. दाशर्निक यर्थाथवाद में यही तथ्य मुझे सबसे आकर्षक लगा. वस्तुनिष्ठता के बारे में यह धारणा कि यह एक संसोधनीय आदर्श है और इस विश्वास को संसोधित किया जा सकता है. एक खास तरह का नम्रता या लचीलापन पैदा करता है, और सांस्कृतिक अघ्ययन के विधार्थी के रूप में हमें जरूरत होती है. वर्तमान समय की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यूरोपीय साम्राज्य की बौद्धिक परछार्इ संकुचित हो रही है और हमें यह मौका है कि हम कर्इ विभिन्न संस्कृतिओं के साथ काम करे और सीखें. हमलोग के पास एक संभावना यह भी है कि हमलोग इस समस्या से टकराने के बजाय पीछे हट जाएं और एक खास और सामान्य के संदेहवाद को अपना लें – हमलोग अन्य संस्कृतियों को कैसे समझ सकते हैं? हमलोग वास्तव में कैसे किसी को जान सकते हैं? मगर में यह समझता हूँ कि ये सब प्रश्न फर्जी है, क्योंकि अपनी प्रकृति में ये काफी अमूर्त किस्म के प्रश्न हैं. संदेहवाद के कुछ प्रश्न हमारे लिए उपयोगी हो सकते है यदि वो हमारे बौद्धिक परिप्रेक्ष्यों को परिभाषित करने में मदद करते हैं, उनसे हम अपने गलतियों को समझने में सहायता पाते हैं.

यदि वस्तुनिष्ठता के आदर्श द्वारा प्रस्तावित ज्ञान मीमांसीय निर्देशों में विचार कर ले तो पाठगत व्याख्या के उद्देश्य के लिए साहित्य आलोचना के यर्थाथवादी सिद्धांत हमारे लिए कम उपयोगी हो जाते हैं.

साहित्यिक यथार्थवाद एक संदिग्ध और प्रचलित शब्द है जो कभी-कभी सामान्य रूढि़यों की तरफ इशारा करते हैं और कभी-कभी विश्लेषणात्मक उद्देश्य और गहरार्इ पर बल देते हैं. अगर हम संकलनों में लोकप्रिय प्रकाशनों द्वारा इसके इस्तेमाल पर ध्यान दे तो यह पाते हैं कि साहित्यिक यर्थाथवादी शब्द जल्दी गायब नहीं होगा बल्कि यह एक काल की विशिष्टता को रेखांकित करने वाले शब्द के रूप में रूढ़ हो जाऐंगें. यदि वर्णनात्मक और विश्लेषणात्मक यर्थाथवाद के अन्तर पर हम अपना ध्यान केंद्रित करे तो यह फायदेमंद साबित होगा. यह साहित्य आलोचना को और भी मजबूत करेगा ताकि यह एक बहुत बड़े परियोजना जिसमें ज्ञान के बहुत सारे अनुशासन जैसे इतिहास, समाजविज्ञान, दर्शनशास्त्र जैसे विषय शामिल हैं, और जिनका उद्देश्य वस्तुनिष्ठ सामाजिक यथार्थों को कर्इ विभिन्न पाठगत व्याख्याओं के तरीके से समझना है, मैं अपनी भूमिका तय कर सकता है. अनुकरणात्मक वर्णनों के संचयन के अतिरिक्त विश्लेषाणात्मक यथार्थवाद कर्इ अन्य तथ्यों की तरफ इशारा करता है, साथ ही साथ बतौर एक पाठक और पेशेवर आलोचक के रूप में हमें साहित्यिक और सांस्कृतिक विधाओं, शैलियों और रूढि़यों के द्वारा किये जाने वाले ज्ञान मीमांसीय कार्यो की तरफ भी हमारा घ्यान आकृष्ट करता है.

साहित्य और संस्कृति के संज्ञानात्मक दृष्टिकोण के अंतर्गत आनेवाला एक तरह संदेहवाद कुछ समय तक साहित्य आलोचना के कर्इ वृतो में बहुत लोकप्रिय था.

मुझे लगता है कि आपको आश्यर्च नहीं होगा जब मैं यह बताऊंगा कि मैं ‘विश्व साहित्य को एक यथार्थवादी और संज्ञानात्मक परियोजना के रूप में देखता हूं जिसका महत्व सिर्फ संसार भर के महत्वपूर्ण रचनाओं के संकलन या पहचान से कहीं अधिक है. इसका मतलब यह हुआ, जैसा कि गोयथे कहते हैं कि अन्य संस्कृतियों और साहित्यों के बीच हमारी ज्ञानमीमांसीय संलग्नता से हमें अपने संस्कृति और इतिहास की जड़ता के बारे में पता चलता है. अनुवाद इस तरह के परियोजना को काफी हद तक संभव करता है, मगर मुख्यत: यह एक व्याख्यात्मक प्रक्रिया है जिसमें अंतःप्रादेशिक और अंतर-राष्ट्रीय तुलनात्मक व्याख्या शामिल है. मेरे विचार से विश्व साहित्य पर अन्वेषण का कार्य अनिवार्यतः अंतरानुशासनिक है और यह साहित्य के लिए एक बहुत लचीली परिभाषा गढ़ता है. विश्व साहित्य की यह गैर सापेक्षता वादी अंर्तसांस्कृतिक परियोजना इस बात का सूचक है कि हमें गहरे पूर्वाग्रहों को भूलकर सोचने के नए तरीकों को सीखना होगा जिससे साहित्य के विवेचन-विश्लेषण की तमाम रूढि़यों से साहित्य-मुक्त हो जाएगा. मैंने “विश्व साहित्य” को उद्धरण चिह्नों के बीच में रखा है जो संकेत करता है कि यह किसी अच्छे नारे की तरह ही हो सकता है उस बेहतर भविष्य की कल्पना में उपयोगी जिसकी हम चाह करते हैं लेकिन उसे पुरी तरह कल्पित नहीं किया. और यह भविष्य केवल साहित्यिक नहीं राजनीतिक और सामाजिक आदर्शों से भी गढ़ा जाएगा. “दूसरी दुनिया संभव है” या “हम निन्यावे प्रतिशत है” जैसे अच्छे नारे  दिशा का सामान्य बोध  में मदद कर सकते हैं.  

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सांस्कृतिक उग्रभक्ति और साहित्यः सत्य पी. मोहंती

Art: Sunita

प्रो. सत्य पी. मोहंती से रश्मि दुबे भटनागर और राजेन्द्र कौर की बातचीत

मूल अंग्रेजी से अनुवाद: राजशेखर पाण्डेय 

यह साक्षात्कार अक्टूबर-नवंबर २०११में लिया गया था. दोनों साक्षात्कारकर्ता अमेरिकी विश्विद्यालयों में साहित्य के अध्यापन से जुडी हुई हैं : रश्मि भटनागर पित्त्सबर्ग विश्विद्यालय के मानविकी केन्द्र में विजिटिंग फेलो हैं तथा राजेंदर कौर साऊथ एशियन लिटरेरी एसोसियेशन की साम्प्रतिक अध्यक्ष और विलियम पिटरसन विश्विद्यालय के अंग्रेजी विभाग में सहायक अध्यापक हैं. यह साक्षात्कार संयुक्त राज्य अमेरिका की पत्रिका  साउथ एशियन रिव्यू में प्रकशित हुआ था.  मूल अंग्रेजी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें.

 

प्रश्न: हम अपने साक्षात्कार की शुरुआत आपके द्वारा संपादित नई पुस्तक उपनिवेशवाद, आधुनिकता और साहित्य: भारत से उठती हुई दृष्टि के बारे में कुछ प्रश्नों के साथ करना चाहते है जो तुलनात्मक भारतीय साहित्य के अध्ययन के लिए एक आदर्श प्रस्तुत करता है. ऐसा मालूम पड़ता है कि इस संग्रह को प्रस्तुत करने में आपको कई वर्ष लगे हैं और इस के लिए प्रेरणा आपको कॉर्नेल विश्वविद्यालय में २००० को हुए एक संगोष्ठी में यू. आर. अनन्तमूर्ति के एक अभिभाषण से मिली है.

प्रो. मोहंती:  हाँ, भारत में विभिन्न भाषा-विज्ञानी परम्पराओं के विद्वानों और अमेरिकी आलोचक, जो यूरोपीय और लातीनी अमेरिकी साहित्य के विशेषज्ञ हैं, के साथ मिल कर काम करना सच में रोमांचक रहा. लेकिन, निश्चित तौर पर प्रेरणा के स्त्रोत यू. आर. अनन्तमूर्ति और उनकी मानवीय, विश्व-बंधुत्व की दृष्टि रहे है. मेरे लेखों का संग्रह उन्ही को समर्पित है.  कॉर्नेल विश्वविद्यालय में दिया गया उनका अभिभाषण वैसे तो बहुत सारे विषयों से सम्बंधित है, परन्तु उन सबका आधार फकीर मोहन सेनापति के ‘छह माड़ आठ गुंठ’ [१८९७-१८९९] और रविन्द्रनाथ टैगोर के गोरा [१९०७-१९०९] का तुलनात्मक अध्ययन था, और इन दोनों ने अनंतमूर्ति को बहुत प्रभाबित किया.

प्रश्न:  अब हम आपके द्वारा भारतीय साहित्य पर किये गए कार्यों के निहितार्थ के विस्तार की तरफ लौटना चाहेंगे मगर उससे पहले क्या हम जान सकते है की भारतीय सहित्य के पाठों के अनुवाद एवं उसकी व्याख्या और आपके सैद्धांतिक संदर्भ के बीच किस तरह का संबंध है. आपको दार्शनिक यथार्थवाद पर काम करते हुए करीब करीब दो दशक हो गए हैं , और हाल-फ़िलहाल आपने साहित्यिक यथार्थवाद के बारे में भी लिखना शुरू किया है. क्या आप बता सकते है की सैद्धांतिक यथार्थवाद और साहित्यिक यथार्थवाद में आप क्या संबंध देखते है ? आपके सम्पूर्ण आलोचनात्मक लेखों में यह भाव विद्यमान है कि साहित्यिक आलोचना और वृहत्तर बौद्धिक प्रवृति, जिसमें मानवतावादी शोध और सामाजिक सर्वेक्षण शामिल है, के बीच अस्तित्वमान ‘संबंध’ में कई गंभीर दोष मौजूद है. फिर आपका जोर भी इस बात पर है कि विद्यार्थियों और विद्वानों को इस संबंध को आप्त-वाक्य की तरह स्वीकारना नहीं चाहिए बल्कि उन्हें इन संबंधो की पुन: पड़ताल करनी चाहिए. इस वृहत परियोजना के संदर्भ में, आपके लेखों में ‘यथार्थवाद’ कैसी भूमिका निभाता है ?

प्रो.मोहंती: मै समझता हूँ कि दार्शनिक एवं सैद्धांतिक यथार्थवाद और साहित्यिक यथार्थवाद के बीच के संबंध को बेहत्तर ढंग समझने के लिए हमे अपना ध्यान इस बात पर केंद्रित करना चाहिए की ‘ज्ञान’ के बारे इनमें से दोनों व्यक्त या अव्यक्त रूप से क्या कहते है ? और ख़ास करके हम सामाजिक जगत में चीजों को कैसे जान पाते है ? क्या सामाजिक तथ्यों को  समझते समय हम सब कभी भी पूर्णत: वस्तुनिष्ठ रह सकते हैं? क्या किसी भी सामाजिक विषय-वस्तु को समझते समय हम समाज में प्रभावशाली विचारधाराओं द्वारा उत्पन्न किये गए विरूपित बोध से बच पाते हैं ? जबकि इस तरह के विरूपित बोध हमारे सामने और भी यथार्थ वर्णन के साथ प्रकट होते हैं, और इस तरह के वर्णन हमें विश्वसनीय भी लग सकते हैं.

अब इन प्रश्नों के उत्तर बताने के क्रम में यह बताना जरुरी है कि मेरे जैसे साहित्यआलोचक की दिलचस्पी पहले दार्शनिक यथार्थवाद और उपरोक्त प्रश्नों के प्रति क्यों हुई?  १९८० के मध्य अपने आसपास के लोगों की तरह, मै भी उत्तर-संरचनावादी सिद्धांतों तथा मार्क्सवाद एवं नारीवाद जैसे भौतिकवादी और समाज आलोचनात्मक विचारों की विभिन्न परंपराओं में मेल बिठाने की कोशिश कर रहा था. परन्तु, बाद में मुझे यह महसूस हुआ कि उत्तर-संरचनावाद, जितना हम उसे साहित्यि के अध्ययन के सन्दर्भ से जानते हैं, कई दिलचस्प सवाल तो उठाती है पर वह उनमें से कुछ प्रश्नों का समाधान संतोषजनक तरीके से नहीं दे सकती.

इन प्रश्नों का गंभीरतम पक्ष  मूल-सिद्धांतवाद (foundationalism) की उतर-संरचनावादी आलोचना से उभरता है, जिसे देरिदा ने अपने विखंडनवाद के निरूपण के सन्दर्भ में एडमंड हुसर्रल की  ‘उपस्थिति’ की अवधारणा के माध्यम से समझाया है. यह अवधारणा  इस बात को मान कर चलती है कि हमारे अनुभव और निरीक्षण का एक आधारभूत स्तर हो सकता है जहाँ हम इस बात को लेकर पूर्णत: निश्चिन्त हो जाते है कि हम कुछ जानते है. आरंभिक विश्लेषणात्मक दर्शनशास्त्र की तरह मूल-सिद्धांतवाद की उतर-संरचनावादी आलोचना भी इस बात को पहचान लेने से संभव हुई कि  ऐसा कोई आधारभूत स्तर होता ही नहीं है, कि किसी व्यक्ति के निजी अनुभवों से लेकर प्रयोगशाला में वैज्ञानिक निरीक्षण के नतीजों तक कुछ भी हमें बिना प्रबल मध्यस्थता उपलब्ध नहीं होता. सबकुछ, जैसा कि विज्ञान के दार्शनिक मानते हैं, सिद्धांत-निर्भर होता है.

इस बात की स्वीकृति के साथ एक महत्वपूर्ण प्रश्न पैदा होता है क्योंकि सभी तरह का ज्ञान गहरे तक मध्यस्थों द्वारा निर्धारित होता है तो वस्तुनिष्ठ ज्ञान प्राप्त करना असंभव नहीं है ? क्या सभी ज्ञान एक ख़ास दृष्टिकोण के सापेक्ष नहीं है ? तो क्या एक प्रकार का ज्ञानमीमांसीय सापेक्षवाद ही सबसे तार्किक विचार-पद्धति है, जैसे कि इस तरह के तर्क कहते हैं [जैसे कि इस विषय पर ल्योतार का लेखन]?. 

यह वो प्रश्न है जिस पर मैं ८० के दशक में लिख रहा था (जैसे कि ‘द येल जर्नल ऑफ क्रिटीसिज्म’ में १९८९  में प्रकाशित हुआ और फिर कई संग्रहों में संकलित मेरा लेख ‘हम और वे’) – सापेक्षवाद पर और इस पर कि क्या वही एक व्यवहार्य, वांछनीय ज्ञानमीमांसीय स्टांस है?. इस निबंध को लिखने के लिए मुझे दार्शनिक यथार्थवाद के ताजातरीन संस्करणों की  पड़ताल करना पड़ी जो मानते हैं कि वस्तुनिष्ठ ज्ञान संभव है लेकिन उसके लिए हमें २०वीं सदी की मूल-सिद्धांतवादी निश्चितता को त्यागने और वस्तुनिष्ठता को पुनर्विन्यस्त करने की जरुरत है, उसे और अर्थमूलक और चिन्तनपरक बनाने की ज़रूरत. इस दृष्टि से वास्तविक वस्तुनिष्ठता महज निष्पक्षता नहीं है. हमें वस्तुनिष्ठता की प्राप्ति कई अलग-अलग वस्तुगत दृष्टिकोणों एवं  हमारे सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों आदि के ज्ञानमीमांसीय निहितार्थों, विचारधाराओं और सामाजिक स्थिति  पर विचार करके प्राप्त होती है.  इन चीज़ों की पड़ताल करते समय मुझे विज्ञान के दार्शनिक और इतिहासविद थॉमस कुहन के काम के आस पास हो रही  विश्लेषणात्मक दर्शनशास्त्र के कई बहसों से बहुत कुछ सीखने को मिला.

प्रश्न: तो क्या दार्शनिक यथार्थवाद और साहित्यिक यथार्थवाद, वस्तुनिष्ठता के किसी रूप से सम्बंधित है ?

प्रो. मोहंती: बिलकुल, दार्शनिक यथार्थवाद और साहित्यिक यथार्थवाद में स्पष्ट रूप से समानता है. क्योंकि ये दोनो, सामाजिक और सांस्कृतिक यथार्थ के लिए प्राय: एक वस्तुनिष्ठ दृष्टि की मांग करते है और एक यथार्थवादी लेखक हमेशा इस बारे में बात करता है कि किस तरह से वो प्रभुत्वशाली विधाओं और रुढियों के प्रस्तुतिकरण को संशोधित कर रहा है. इस दृष्टि का उदाहरण आप जॉर्ज एलिएट में देख सकते हैं, उन्होंने अपने समय के लेखकों से आह्वान किया कि रचना को कल्पना (fancy) का पर्याय ना मानकर कल्पना के परे रचिए. (उनका मानना था कि कल्पना का प्रस्तुतिकरण बहुत ही सरलकाम होता है). ठीक इसी तरह का भाव सेनापति के लाल बिहारी द्वारा भारतीय गाँव के जड़ और प्राच्यवादी [‘सरल’] प्रस्तुतीकरण की आलोचना में प्राप्त होते है. प्रारंभिक यथार्थवादी यह कहते है कि  वो दृश्य, घटना आदि के प्रति अतिरिक्त वस्तुगत ईमानदारी प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहे है और ऐसा करने के प्रयास में उस समय के वर्तमान प्रस्तुतिकरण का परिहार कर रहे है या उसके परे जा रहे हैं क्योंकि वो किसी विचारधारा या अन्य कारणों से दूषित है. उनका अभीष्ट प्रभुत्वशाली दृष्टिकोणों द्वारा जितना सच बीनने की इज़ाज़त मिलती है उसके   बजाय वृहत्तर सत्य और वृहत्तर वस्तुनिष्ठता की प्राप्ति और प्रतिष्ठा था – लेकिन ऐसा  था कि वो प्रकृति के प्रति किसी चरम वर्णनात्मक निष्ठा के साथ नहीं. सर्वश्रेष्ठ यथार्थवादी लेखक यथार्थ के विश्लेषण को प्रस्तुत करने पर ध्यान देता है और संसार का उसके द्वारा किया जाने वाला पुर्नचित्रण उसके इस विश्लेषण को पुष्ट करने के लिए होता है. यद्यपि दार्शनिक और ज्ञानमीमांसीय यथार्थवाद तथा कुछ अंशो में साहित्यिक यथार्थवाद की परियोजना/लक्ष्य के बीच समानता का स्पष्ट निर्धारण अभी भी मुश्किल है तो ऐसा भी नहीं है कि सैद्धांतिक उत्तर-आधुनिकतावाद  (जिसमें वह भी शामिल है जिसे हम उत्तर सरंचनावाद कहते हैं) और साहित्यिक उत्तर-आधुनिकतावाद के बीच भी कोई जरुरी संबंध हो. साहित्यिक उत्तर-आधुनिकतावाद का संबंध एक ख़ास कथा में पाठगत वैशिष्ट्य और रूढियों से है जिनकी पहचान   साहित्येतिहासकारों के अनुसार साहित्यिक आधुनिकतावाद के ह्रास के बाद प्रकट होने वाली प्रवृतियों के रूप में की गयी है. साहित्यिक उत्तर-आधुनिकतावाद शब्द साहित्य-इतिहास से लिया गया है जबकि सैद्धांतिक उत्तर-आधुनिकतावाद एक ज्ञानमीमांसीय और सामान्य दार्शनिक मुद्रा या दृष्टि है.

आप एक उत्तर-आधुनिक उपन्यासकार या कवि हो सकते है और इस तरीके से सम्पादक आपको वर्गीकृत कर उचित संकलन में जगह दे देगा. मगर सिर्फ  इस बात से यह पता नहीं चल सकेगा कि दार्शनिक अर्थों में उत्तर-आधुनिकतावादी हैं या नहीं. कोई भी रचनाकार दार्शनिक यथार्थवादी परियोजना- [ एक परियोजना जो सामाजिक विकृतियों को बेनकाब करने का यत्न करती  है और यथार्थ के एक अधिक वस्तुनिष्ठ  संस्करण से हमारा साक्षात् कराती है ]- का अनुसरण करते हुए भी उत्तर-आधुनिक साहित्यिक रूढियों का प्रयोग कर सकता है.  आप रश्दी या पिंचों (Thomas Pynchon) की कथन शैली को अपनाकर कहानी लिखते हुए भी जॉर्ज एलिएट के लक्ष्य का अनुसरण कर सकते हैं. आप दिल से दार्शनिक यथार्थवादी रहते हुए भी साहित्यिक यथार्थवाद की  परम्पराओं/रुढियों के साथ खिलवाड़  भी कर  सकते हैं या उसके उलट भी जा सकते है. कुछ ऐसा ही तर्क करते हुए कुमकुम संगारी ने १९८० के दशक के मध्य में रश्दी और गार्सिया मार्केस पर एक बेहतरीन विश्लेषण लिखा जिसने पाठकों  की इस धारणा को कि बाद के दौर की रचनाओं में जादुई यथार्थवाद का प्रयोग अयथार्थवादी है, को झकझोर कर उसपर पुनर्विचार के लिए प्रोत्साहित किया. और यदि आप इकोनोमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में २००९ को गार्सिया मार्केस पर छपे जेनिफर हर्फोर्ड वर्गा के लेख को पढ़ें तो तो आप यही उद्भावना पायेंगे. दोनों आलोचनाएं प्रभावी ढंग से यही तर्क उपस्थित करती हैं कि जादुई यथार्थवादी लेखक के पास प्राय: एक यथार्थवादी ज्ञानमीमांसा होती है जिसका स्पष्ट मतलब होता है कि वे वस्तुनिष्ठ सामाजिक यथार्थ के करीब जाने का प्रयास कर रहे है.

यह उन कई कारणों में से एक है कि क्यों फकीर मोहन सेनापति का छह माड़ आठ गुंठ १८९० के उत्तरार्ध में औपनिवेशिक भारत में ऐसे एक दिलचस्प पाठ के रूप में लिखा गया. यह संदर्भों से भरी पैरोडी की शैली में लिखा गया है और उस शैली की याद दिलाता है जिसे साहित्य के आलोचक उत्तर-आधुनिकतावाद का नाम देते है. मगर उस शैली के नीचे तथा उन ध्वंसकारी कथानक युक्तियों के द्वारा सेनापति ने औपनिवेशिक काल के समाज और संस्कृति का बहुत ही गहरा वर्णनात्मक और विश्लेष्णात्मक विवरण प्रस्तुत किया है. इस तरह सेनापति पश्चिम में उत्तर-आधुनिकतावादी उपन्यास के आगमन से ६०-७० साल पहले के लेखक हैं जो दार्शनिक यथार्थवादी हैं  और  जिनके लेखन शैली में उत्तर-आधुनिकतावादी अभिलक्षण दिखाई पड़ते है.

 प्रश्न: आप  ‘छह माड़ आठ गुंठ’ की भूमिका में इस बात की चर्चा करते हैं कि कैसे सेनापति पाठकों को उपन्यास में प्रस्तुत यथार्थ का सक्रिय पाठक होने के लिए उकसाते है बजाय इस कि वो पहले से बने बनाये और तय यथार्थ के निष्क्रिय उपभोक्ता बने. सेनापति के उपन्यास ‘छह माड़ आठ गुंठ’ [और साथ ही साथ १६वीं शताब्दी में बलराम दास द्वारा एक नारीवादी रचना लक्ष्मी-पुराण जिसका  आपने विस्तृत विश्लेषण किया है के बारे में भी तर्क करना चाहेंगे] में आधुनिकता ‘अकथात्मक कथन शैली’ में है, और ख़ास करके सहयोगी कार्यकर्त्ता की भूमिका निभाते हुए ये ‘पाठ’ पाठकों पर वर्तमान सामाजिक ढांचे और राजनीतिक शक्ति की आलोचना के दायित्व को थोपते है. हमलोग आपके इस लेख को पढकर चकित हैं, इसमें आपने इस भूमिका को कथनात्मक/ज्ञानमीमांसीय आप्त प्रमाण का श्रेय दिया है, जहाँ तथ्यों का आख्यान में बदलना और सत्य से किसी विचारधारा के रुख का पता चलना एक ज्ञानमीमांसीय उत्कर्ष को प्राप्त करना होता है. पाठकों को अस्त-व्यस्त करने की सेनापति रणनीति प्रकारांतर से पाठकों को पाठों की  व्याख्या के लिए अधिकार भी देती है और साथ ही साथ या यह पाठकों के सत्य ग्रहण के पारंपरिक बोध को तोडती भी है. क्या आप सहमत हैं कि इन पाठों की यथार्थवादी कथन भंगिमा में एक तरह का बौद्धिक कौशल है और अपने पाठकों से यह एक ख़ास तरह की अपेक्षा करती है जिससे पाठक सामाजिक व्यवहारों और संस्थान के एक व्यष्टि इकाई के रूप में खुद ही  कई सारे नैतिक प्रश्नों से घिर जाता है. तो क्या यह एक तरह का नीतिशास्त्रीय आज्ञार्थ है ?

प्रो. मोहंती: बलराम दास का नारीवादी और जाति-विरोधी लक्ष्मी-पुराण उड़ीसा (जिसे २०१० के एक विधेयक के बाद आधिकारिक रूप से अब ‘ओडिशा’ कहा जाता है) की एक जीवित परंपरा है. यह आज भी उड़ीसा के हरेक गाँव और शहर में मार्गशीर्ष के महीने में हिंदू घरों की स्त्रियों द्वारा अनुष्ठानिक तौर पर पढ़ा जाता है. बलराम दास उड़ीसा के एक सुधारक संत-कवि थे जिनकी सबसे प्राथमिक उपलब्धि तत्कालीन सामाजिक परम्पराओं का नया प्रत्याख्यान रचने में है जिसका पाठ लगभग ४५० साल  से वहाँ की महिलाए करते आ रही हैं. वे अपनी सहेलियों  के साथ इसकी चर्चा करती हैं और इस पुराण के नारीवादी और जाति-विरोधी निहितार्थों को विश्लेषित करती हैं. इस परंपरा ने वहाँ एक सुधारवादी सामाजिक और राजनीतिक माहौल का निर्माण किया जिसका प्रयोग किसी भी प्रगतिशील उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जा सकता है.

सेनापति का उपन्यास भले ही एक्टिविज़्म की किसी परंपरा  से निकल कर न आया हो [यद्यपि दिल्ली विश्विद्यालय के नारीवादी विद्वान  विद्युत मोहंती का तर्क है कि ये अप्रत्यक्ष्य रूप से ‘लक्ष्मी-पुराण’  से प्रभावित है] मगर इस उपन्यास में कथा-वाचक कहानी कहने का सिर्फ एक तटस्थ जरिया ही नहीं है  इस उपन्यास में कहानी से भी अधिक महत्वपूर्ण इसके कथा-वाचक का चालाक मगर तीखा सामाजिक आलोचनात्मक रुख है, जिसकी पाठक उपन्यास को पढ़ते या दुबारा पढ़ते हुए प्रशंसा करना सीखते हैं. मै खुद को ऐसे उड़िया आलोचना कि धारा में सम्मिलित करते हुए , जिसमे कि रवि शंकर मिश्रा भी शामिल है और जिन्होंने विवेच्चय उपन्यास का बाख्तियन और देरिदियन पाठ-व्याख्या प्रस्तुत किया ,इस बात को दर्शाना चाहता हूँ कि इस उपन्यास के पाठ की शक्ति का केन्द्र भाषा और कथानक-शैली के पुनराविष्कार में है. इस तरह यह उपन्यास महज एक लालची जमींदार की कहानी भर नहीं ठहरती. [जैसा कि यू. आर. अनंतमूर्ति इस उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद ही पढ़ने भर से बहुत पहले ही समझ चुके थे] सेनापति का यह उपन्यास बहुत सारे स्तरों पर एक यथार्थवादी उपलब्धि है. जैसा कि शिशिर कुमार और कई अन्य विद्वान इस बात को रेखांकित करते हैं यह उपन्यास ग्रामीण प्ररिप्रेक्ष्य से उस समय के औपनिवेशिक भारतीय समाज का विस्तृत और यथार्थ चित्र उपस्थित करता है. मगर, जैसा कि मैंने उपन्यास की भूमिका में लिखा है, इन चित्रों की वास्तविकता प्रथमतया वर्णनात्मक ना होकर आलोचनात्मक और विश्लेषणात्मक है.

प्रश्न: यथार्थवादी साहित्य का विमर्श के बारे में एक रणनीतिक मानसिकता काम कर्ती है जो समय के रेखीय-बोध कि अवधारणा से संचालित होती है ,जिसमे यह माना जाता है कि सभी साहित्य का निर्माण अपने पूर्ववर्ती साहित्य के दाय से होता है इस रूप में वाह अपने पूर्ववर्ती साहित्य का ऋनी होता है. लेकिन आपके बारे में यह लगता है कि उपन्यास के आलोचनात्मक भूमिका में इस बात को स्वीकार कर कर कि , छ माना आठ घंटा का यथार्थवाद मुल्कराज आनन्द के प्रकृतिवाद की तुलना में सलमान रश्दी के रचनाओं से प्रतिबिंबित उत्तर-आधुनिकता के ज्यादा करीब है, आपने अपने आपको साहित्य-इतिहास में काल के अरेखीय धारणा के पक्ष में कर लिया है.क्या आप मानते है कि साहत्यिक-यथार्थवाद की युग बध्द  अवधारणा उस युग के पहले कि है जब यथार्थवाद का करीबी संबंध हीगेल और मार्क्स के इतिहास के विभिन्न चरणों से था ? इसके विपरीत , विश्व-सहित्य में यथार्थवाद के ऊपर हो रही आलोचनात्मक रचनाएं विश्व-सहित्य-समय की एक  अवधारणा के साथ-साथ चलता है जो की पूर्वानुमान के मुहाबरे  के साथ रेखीय-काल बोध के ध्वंस के लिए प्रत्य्ख्यान रचता है. साहित्यिक यथार्थवाद की राजनीतिक शक्ति बहुत मात्रा में यथार्थवाद, अल्पकलिकता और मानव इतिहास के बीच के संबंधों पर निर्भर करती है और यही से हमारा प्रश्न शुरू होता है.

प्रो. मोहंती: हाँ, विल्कुल, हमें साहित्य और संस्कृति की प्रगति और विकास के भोले-भाले प्रारूपों के इत्तर जाने की जरुरत है. अत: हमें भारतीय उपन्यास के इतिहास को अनगढ़ यथार्थवाद से स्वचेता-उत्तरआधुनिकतावाद एवं जादुई यथार्थवाद के क्रमिक विकास और महान से महानतम तक के परिष्कार के रूप में देखने की जरुरत नहीं है. इसके बजाय हमें विभिन्न तरह के यथार्थवाद के द्वारा किये गए विश्लेष्णात्मक और ज्ञानमीमान्सीय कार्यों के स्तर के बारें में जिसने अपने  समय और उसकी सच्चाईयों को  साथ जोड़ा, के प्रति एक ख़ास तरीके से इनके पाठों को लेकर और  अधिक जागरूक होना होगा.

दूसरा और अधिक जटिल प्रारूप [ विकास और प्रगति का] उस तरीके से भी उत्पन्न हो सकता है जिस तरीके से सहित्य प्राय:  आलोचनात्मक सामाजिक-विज्ञान के शोध-खोजों से पुर्व-अपेक्षाएं रखता है  भारत में यथार्थवादी उपन्यास के बारें में यह बात बिलकुल सत्य है  वसुधा डालमिया ने प्रेमचंद के उपन्यास गोदान के अंग्रेजी अनुवाद की भूमिका में इस दृष्टि का निरूपण किया है. इस सन्दर्भ में डालमिया और अन्य आलोचक सही भी हैं: साहित्य प्राय: इतिहासवेत्ताओं और सामाजिक चिंतको की अंतर्दृष्टि और निष्कर्षों  से पूर्व-अपेक्षाएँ रखता है और हम जैसे साहित्य आलोचक एक बहु-अनुशासनिक परियोजना के निर्माण में मदद कर सकते है जिसे हम ‘तह से एक साहित्य दृष्टि’ कह सकते है [जैसा की ई. पी. थॉम्पसन के द्वारा १९६६ के टाइम्स लिटरेरी सप्लिमेंट एस्से में छपे एक लेख से प्रतिध्वनित होता है, और थॉम्पसन के प्रमुख घोषणापत्र का शीर्षक भी ‘तह से इतिहास’ है ] हरीश त्रिवेदी के साथ मिलकर मैंने २००६ के इकोनोमिक एंड पॉलिटिकल वीकली के विशेष भाग का संपादन किया जिसमे ‘तह से साहित्य दृष्टि’ मुहावरे का शीर्षक के रूप में प्रयोग उस इतिहास लेखन सम्बन्धी परियोजना की ओर संकेत करता है और साथ ही साथ इसी शीर्षक से तुलनात्मक भारतीय साहित्य विषय पर मनोरंजन मोहंती के साथ मिलकर मैंने २००८ में दिल्ली विश्वविद्यालय और कर्नेल विश्वविद्यालय में दो संगोष्ठियों का आयोजन भी किया.

प्रश्न:  आपने पाठकों को सेनापति के इस उपन्यास के बारे में ऐसा सोचने के लिए प्रोत्साहित किया है कि सेनापति का यथार्थ ‘वर्णनात्मक’ न होकर ‘विश्लेष्णात्मक’ है. विश्लेष्णात्मक यथार्थवाद की जो धारणा आप प्रस्तावित करते हैं उसके दो प्रभाव दृष्टिगोचर होते हैं.पहला यह कि यथार्थवाद के बारे में बने बनाये ढंग से बात करने को लेकर जो असंतोष है उसे विश्लेष्णात्मक यथार्थवाद अपने में जगह देता है. इसके प्रमाण स्पष्ट ही सायेर (Sawyer), मोहपात्रा और नारायण राव की रचनाओं में  देंखे जा सकते हैं: एक आलोचक के लिए उपलब्ध बौद्धिक पोजीशन के दायरे में. दूसरा यह कि, विश्लेषणात्मक यथार्थवाद ने उपन्यास अध्ययन के  सन्दर्भ में विश्लेषण के तरीको और प्रविधियों को सुधारते हुए पूर्णत: बदल दिया है, और अब हम भारतीय या अफ़्रीकी भाषाओं में लिखे गए यथार्थवादी उपन्यासों को यथार्थवाद के उपलब्ध यूरोपीय वर्गीकरण के खांचे में फिट करने का प्रयास भी नहीं करते.

प्रो. मोहंती: विश्लेष्णात्मक यथार्थवाद और वर्णनात्मक यथार्थवाद का यह अंतर जॉर्ज लुकाच के द्वारा किये गए उपन्यास के दो भेदों को प्रतिध्वनित करने के लिए किया गया है. जॉर्जे लुकाच के अनुसार पहली कोटि में ‘प्रकृतवादी’ उपन्यास आते है जिसमे वर्णनों की प्रचुरता और विस्तार तो रहता है पर उनमें व्याख्यात्मक गहराई का नितांत आभाव होता है. मगर दूसरी कोटि के उपन्यासों [जैसे कि बॉल्जाक के उपन्यास] में गंभीर अर्थों में ‘यथार्थवादी’ उपन्यास आते हैं, चूँकि ये आधारभूत सामाजिक एवं एतिहासिक रिवाजों और ताकतों, जो अनौपचारिक रूप किसी विवेच्य संस्कृति के उपरी वर्णनात्मक ब्यौरों से ज्यादा महत्वपूर्ण हो उठती हैं, की व्याख्या प्रस्तुत करती हैं. लुकाच का यह वर्गीकरण बहुत ही मूल्यवान है, यद्यपि उसकी इस सैद्धांतिक अंतर्दृष्टि का साहित्यिक रचनाओं के लिए अनुप्रयोग हमेशा सफल नहीं हुआ. यूरोप के कुछ आरंभिक आधुनिकतावादी लेखकों के संदर्भ में लुकाच की रूचि ही उनकी सीमा थी और उनके प्रति लुकाच की प्रतिक्रिया असंगत और भ्रामक थी. मगर हमारे प्रयोजन के लिए इनके दो प्रकारों के बीच के अंतर, एक अधिक वर्णनात्मक यथार्थवादी उपन्यास और दूसरा अधिक व्याख्यात्मक यथार्थवादी उपन्यास, पर अपना ध्यान केंद्रित करना उपयोगी होगा. चूँकि यह अंतर को समझने के क्रम में हम, औपचारिक नवाचार के स्तर पर भी उपन्यास द्वारा किये जाने वाले ज्ञानमीमांसीय कार्यों को  मूल्यांकन और मूल्य-निरूपण का मौका पाते है. मैंने एक तर्क प्रस्तावित किया था , और बहुत सारे आलोचकों ने इसे पुष्ट भी किया है कि सेनापति के उपन्यास का कथा-वाचक एक बहुत बड़ी साहित्यिक खोज है. यह उपन्यास में ठीक उसी तरह से चित्रित है जिस तरह से मौखिक और सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराओं के कथा-वाचक होते हैं , और यह सेनापति की कथन-शैली है जो कथा-वाचक को यथार्थ के एक गंभीरतम रूप को रचने कि शक्ति प्रदान करती है. उपन्यास में यथार्थ के जिस गंभीरतम रूप के साक्षात् होते हैं वो बाह्य यथार्थ की महज अनुकृति और सामाजिक दृश्य-प्रपंचो एवं घटनाक्रमों के बदलते बाहरी रूपों के ईमानदार वर्णण से संभब नहीं था. ‘छह माड़ आठ गुंठ’ का कथा-वाचक हमें एक सक्रिय पाठक होने के लिए मजबूर करता है और खुद को कथानक के अर्थ निकालने में संलग्न करता है मगर सामाजिक पूर्वाग्रहों और विचारधाराओं का परिहार करते हुए क्योंकि ये दुनिया के बारे में हमारी समझ को विकृत और दूषित करती हैं. साहित्य-आलोचना के अर्थ में इस उपन्यास को ‘उत्तर-आधुनिकतावादी’ कह सकते हैं मगर इस उपन्यास की उपलब्धि दार्शनिक अर्थों में गंभीर रूप से यथार्थवादी है.

पॉल सवयेर ने पहले पहल इस विचार को एलिएट और सेनापति के बारे में लिखते हुए विकसित किया और बाद में हिमांशु मोहपात्रा भी प्रेमचंद के गोदान और सेनापति के ‘छह माड़ आठ गुंठ’ के बीच तुलना करते हुए इस विचार को रेखांकित करते हैं. इसके अलावा आप २००६ के  ‘इकोनोमिक एंड पॉलिटीकल वीकली’ में श्रीलाल शुक्ल और सेनापति पर अलका अंजारिया के लेख के साथ साथ जेनिफर हाफोर्ड वर्गाज द्वारा सेनापति और गार्सिया मार्केस पर किये गए तुलनात्मक अध्ययन को भी देखें. कुछ इसी तरह की बात आपको बरुआ और सेनापति के ऊपर नारायण राव द्वारा किये गए तुलनात्मक अध्ययन और तिलोत्तमा मिश्रा की आलोचनात्मक रचनाओं में मिलेगी           [बरुआ सेनापति से २० साल पहले असमिया में लिख रहे थे] मेरा विचार यह है कि जिन लेखों के बारे में मैंने अभी-अभी जिक्र किया है उनमे से प्रत्येक एक बहुवर्षीय शोध परियोजना के लिए प्रेरक हो सकते हैं.और इसकी उपलब्धि एक शोध पत्र या किताब के रूप में हो सकती है जो वर्णनात्मक बनाम विश्लेष्णात्मक यथार्थवाद के प्रश्न को और अधिक ऐतिहासिक विस्तार और गहराई से खोज सकेगी और हमलोग इस तरह के अध्ययन से, ख़ास करके भारतीय सन्दर्भ में, साहित्यिक यथार्थवाद के बारे में अधिक जान पाएंगे. और ठीक इसी तरह की बात सांगरी  द्वारा १९८० में सलमान रश्दी और गार्सिया मार्केस के ऊपर लिखे गए लेख,जिसका मैंने पहले उल्लेख किया था या २०१० के ‘इकोनोमिक एंड पॉलिटिकल वीकली’ में छपे मुक्ति लाखी संघाराम द्वारा उड़िया आदिवासी कवि भीमा भोई और स्वामी विवेकानंद के विस्तृत तुलनात्मक अध्ययन, के  बारे में कही जा सकती है.      

प्रश्न: अब विश्लेष्णात्मक यथार्थवाद के बारे आपके द्वारा प्रतिपादित बिंदु के दूसरे निहितार्थ की तरफ लौटते हुए हम जानना चाहेंगे कि क्या १९वीं  सदी में भारत में यथार्थवाद एक साहित्यिक शैली के रूप में विकसित हुआ और यदि हम सबाल्टर्न परिप्रेक्ष्य से देंखे तो उसका प्रयोग उपनिवेश-विरोधी चेतना के साथ मिलकर काम करने के लिए किया जाता था. आपके द्वारा प्रस्तुत विमर्श में आपका ध्यान वस्तुनिष्ठ यथार्थवाद, सामाजिक संघर्ष, बुर्जुआ वर्ग का उदय और बुर्जुआ कि विश्व-दृष्टि जैसे प्रमुख यूरोपीय आलोचनात्मक सरोकारों से हटकर यथार्थवाद की परियोजना पर केंद्रित होता है जिसके आधारभूत घटक हैं कथा-वाचक की आवाज, लहजा, सबकुछ देख सकने वाली दृष्टि , व्यंगपूर्ण टिप्पणी की शैली, कथानक की रूढ़ता और मौन तथा उद्घाटन यादि. क्या यथार्थवाद एक स्तर पर ओड़िया और आसामी पला जैसी परम्पराओं की कौतुकपूर्ण अभिव्यक्ति और संस्कृतनिष्ठ एवं आधुनिक शिक्षण की  बाबू-विरोधी आलोचना के बीच एक करीबी मुठभेड़ है? यथार्थवाद की इस तरह की आलोचना हमें किस निष्कर्ष की  तरफ ले जाती है और हम यथार्थवाद के बारे में क्या समझ पाते है.

प्रो. मोहंती: मै सभी यथार्थवादी उपन्यासों के बारे में इस बात को इतनी जल्दी सामान्यीकृत नहीं करूँगा चूँकि अभी बहुत सारा ऐतिहासिक और पाठगत अन्वेषण करना बाकी है और जिसे पूरा करने कि भी जरुरत है. मगर इस तरह के विश्लेषण की  एक कड़ी हमें सबाल्टर्न अभिकरणों के बारे में बहुत कुछ बता पायेगी और हमें उस तरह के अतिशयोक्तिपूर्ण संदेहवाद से परे ले जायेगी जिसकि उत्पत्ति साहित्यिक-सिद्धांत परिवृत  में सबाल्टर्न चिन्तनो और विचारों पर चर्चा करते वक्त होती है. अत: कुछ ही संदर्भो में इस तरह की व्याख्या को उल्लेखित करना बुद्धिमानी होगा, क्योंकि यह अंशत: गूढ़ हो सकता है. इस विश्लेषण से संबंधित प्रभुत्वशाली विमर्शो ने सबाल्टर्न परिप्रेक्ष्य को कम करके लगभग अदृश्य ही बना दिया है और इसिलए सबाल्टर्न परिप्रेक्ष्य के बारे में अतिसामान्यकृत एवं अ-संदर्भित संदेहवाद अनुचित है. सबाल्टर्न अभिकरणों का प्रश्न प्रथमतया और शुद्ध रूप से सैद्धांतिक नहीं है. ऐसे बहुत सारे अनुभवजन्य ज्ञान जिसका हम सब में अभाव है और हमें इस ज्ञान तक पहुचने के लिए कई चिन्तनपरक और सन्दर्भ के प्रति संवेदनशील सैद्धांतिक युक्तियों की जरुरत है. इस जगह पर पहुँच कर इतिहास-वेत्ताओं और सामाजिक वैज्ञानिकों का काम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है , और उनके द्वारा एक प्रकार का किया जाने वाला साहित्यिक विश्लेषण भी प्रासंगिक हो जाता है. और इस तरह के शास्त्रीय अन्वेषण में हमें अतिशयोक्तिपूर्ण संदेहवाद के कोई चिन्ह नहीं मिलते जिसके सबसे बढ़िया उदहारण है थॉम्पसन द्वारा १९७१ में लिखी ‘भीड़ का नैतिक अर्थशात्र’ और जेम्स स्कॉट का ‘कमजोर का हथियार’.अगर हम एरिक हॉब्सबाम कि रचना ‘ग्रासरूट हिस्ट्री’ पर एक नजर डालेंगे तो पता चलेगा कि इसी बात को अभिव्यक्त करने में वो कितने सावधान और स्पष्ट हैं इसके साथ ही उन्होंने संदेहवाद को अनुसन्धान के सही संदर्भों, विचारधारात्मक पूर्वाग्रहों एवं सैद्धांतिक प्रविधि के आधार के रूप में नियोजित किया. [यह लेख १९८५ में पहली बार प्रकाशित हुआ था जिसका शीर्षक था ‘तह से इतिहास कुछ झलकियाँ’] इसलिए उत्तर-संरचनावादी वृतों में एक तरह का जो अतिशयोक्तिपूर्ण संदेहवाद देखने को मिलता है वो संदेहवाद का एकमात्र प्रकार नहीं है. इस संदेहवाद की अतिशयोक्तिपूर्ण मुद्रा के अलावा कई अन्य प्रकार भी हैं. इस जगह पर पहुच कर आलोचक एक उपयोगी हस्तक्षेप कर सकता है. इससे पहले कि साहित्य आलोचक इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सबाल्टर्न कुछ अभिव्यक्त नहीं कार सकता या जो कुछ भी अभिव्यक्त कर सकता है उसे हम समझ नहीं सकते , उनसे [आलोचक से ] ये पूछना अच्छा होगा कि हमारे समृद्ध क्षेत्रीय और भाषाओं के साहित्य में विकसित हुआ साहित्य-रूप [ मौखिक परदर्शन-परक परम्पराओं के अनुसार चित्रित ] किस तरह कि आलोचना को दर्शाते है. असमिया लेखक हेमचन्द्र बरुआ और फकीर मोहन सेनापति को साथ साथ पढ़ना हमारे इस विश्लेषण पर आपका ध्यान केंद्रित करने में मदद करेगा जैसा कि सीएमएल में प्रकाशित  तिलोत्तमा मिश्रा का आलोचनात्मक लेख इशारा करता है. [या आप मौखिकता और उपन्यास के विश्लेषण का विस्तार इस महाद्वीप के पार भी, सेनापति के उपन्यास और अमोस तुतुओला कि उपन्यास ‘द पाम-वाइन-ड्रिंकार्ड’, जो कि योरुबा लोककथाओं पर आधारित है, की कथन शैली के तुलनात्मक अध्यन के जरिये कर सकते है.]

अब आपकी बात की तरफ लौटते हुए मुझे इस बात का निर्देश कर देना चाहिए कि, कथन की पद्धति, शिल्प पर मेरे द्वारा दिए जाने वाले जोर का मतलब इस बात का अस्वीकार बिलकुल भी नहीं है कि वस्तुनिष्ठ सामाजिक यथार्थ यथार्थवादी उपन्यास के लिए महत्वपूर्ण है. जो कुछ भी मैं कह रहा हूँ वह ये है कि उपन्यास में वस्तुनिष्ठ यथार्थ का प्रस्तुतिकरण उसे प्रकृति का दर्पण बनाकर या जो कुछ भी सूक्ष्म ब्यौरे हम देखते हैं उनके वर्णन से नहीं किया जा सकता. जिन उपन्यासों की हम चर्चा कर रहे हैं वही हमें यह दिखा देंगे कि प्रस्तुतीकरण में “कैसे” पर अक्सर ज्ञानमीमांसीय महत्व टिका होता है. भारतीय एवं अफ़्रीकी उपन्यास का अध्ययन और उन परम्परागत लोक रूपों का भी जिसके आधार पर वे रचे गए है का विश्लेषण करते समय उपरोक्त बातों को ध्यान में रखने की जरुरत है.

प्रश्न: अब हमलोग अनुवाद के बारे में चर्चा करें, ख़ास करके ‘छह माड़ आठ गुंठ’ के आपके द्वारा किये गये सहयोगी अनुवाद की. क्या कभी ऐसा समय आया जब चार अन्य अनुवादकों में से आप सेनापति के इस असमतल, उबड़-खाबड़ भरे सांकेतिक सतह वाले उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद करते हुए किसी कठिनाई में फंसे हों? क्या आपने इस उपन्यास के मौखिक, प्रदर्शनपरक और भंगिमापरक आयामों, ख़ास करके कथा-वाचक द्वारा अपनाए गए विभिन्न अर्थ-भंगिमायों के विस्तार को जिसमे  मूक-विलंबन, या  संदेहवाद जो  खुले तौर या वक्रता के साथ प्रकट होता है, कोई भी निर्णय देने के संकोची अस्वीकार आदि सम्मिलित हैं, के अनुवाद के लिए कोई रणनीति बनाई ?  उपन्यास की आपकी  भूमिका में इस बारे में कुछ संकेत किये गए हैं. उदहारण के लिए , आपने भूमिका में इस बात का जिक्र किया है की कैसे गाँव के तालाब से गुजरना और तालाब के पास औरतों की गप्प-शप्प अपने आप में माननीय लाल बिहारी डे के प्राच्यवादी नृ-शास्त्रीय स्पष्टीकरण का परोडी अनुवाद है. तब हमें इस बात के लिए आश्चर्य करना होगा की अनुवाद की यह प्रक्रिया आपको और आपके सहयोगी अनुवादकों को १९वीं सदी भारतीय यथार्थवादी उपन्यास के यथार्थवाद की धारणा तक पुख्ता तौर पर सीधे सीधे नहीं ले जाती है प्रत्युत  पाठ में अंतर्निहित कई ‘भाषाओं’ के अनुवाद के माध्यम से परत दर परत ले जाती है.

प्रो. मोहंती: हाँ , इसका अनुवाद करते समय हम प्राय: मुश्किल में पड़ जाते थे और अनुवाद की प्रक्रिया वास्तव में बहुत मुश्किल थी. इस बात को ध्यान में रखते हुए की सेनापति की भाषा में कई स्तर हैं एक साधारण किसान की परिचित भाषा से लेकर ऊँची जातियों की ओड़िया भाषा का अति-संस्कृतनिष्ठ संस्करण, और इसमे फारसी-संक्रमित भाषा से लेकर सत्ता और शक्ति के भाषा के रूप प्रतिध्वनित होती हुई अंग्रेजी और संस्कृत की सीधी मौजूदगी है और लय के अप्रत्याशित बदलाव सीधे, दोटूक चलते हुए अचानक विडंबनात्मक और पैरोडीमय हो उठना.  हमें अनुमान था कि अंग्रेजी अनुवाद में अनिवार्य रूप से बहुत सारी चीजों को सपाट करना ही होगा.        [इसके पूर्व हिन्दी और तेलगु में किया गये अनुवाद बेहतरीन हैं. बांग्ला अनुवाद के कुछ पाठक यह बता रहे थे की अनुवाद के क्रम में कथन भंगिमा की क्षति हुई है क्यूंकि बांग्ला साहित्य में जिस अति-संस्कृतनिष्ठ, ‘साधू’ भाषा का प्रभुत्व है.]

चूँकि हम चाहते थे की उपन्यास की पहुँच विस्तृत पाठक वर्ग तक हो और  अकादमिक विशेषज्ञों के आलावा इसे हरेक रूचि के लोग पढ़ें, हमलोगों ने उपन्यास के अंत में शब्दार्थ के अतिरिक्त  केवल जरुरी पाद-टिप्पणियों देने का फैसला किया. यूनीवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया प्रेस की हमारी संपादक लिंडा नोर्टन ने मुझसे कहा कि उपन्यास की भूमिका कुछ एसी होनी चाहिय जो संसार भर के गैर-अकादमिक पाठक वर्ग को संबोधित करे जो कि इस उपन्यास को पहली बार पढ़ रहे होंगे, और मुझे इस बात की खुशी है की जब मै भूमिका लिख रहा था तब यह बात मेरे दिमाग में चल रही थी. मै इस उपन्यास के बारे में एक और बात, एकदम साफ़ साफ़ कहना चाहूँगा कि “इस उपन्यास को दो बार पढ़ें. क्योंकि पहली बार पढ़ते समय आपका सारा ध्यान कहानी पर ही केंद्रित रहेगा और इस उपन्यास की बहुत सारी दिलचस्प चीजें आपसे छूट जायेंगी”.

जब हम और पॉल पिएरे जब इस परियोजना में पहली बार जुटे, तब अनुवाद का आरंभिक स्वरूप जो हमने देखा वह बहुत ही कच्चा था मगर इसके साथ एक विशेषता यह थी कि इसने सेनापति के इस उपन्यास के बहुस्तरीय बाख्तियन स्वर एवं भंगिमा को पकड़ लिया था क्यूँकि यह उस व्याख्या को प्रतिबिंबित कर रहा था जिसका आधार रविशंकर मिश्रा का ओड़िया और अंग्रेजी में प्रकाशित एक लेख था. [अनुवाद के इस प्रारूप को रविशंकर मिश्र ने ही जतिन्द्र नायक के साथ मिलकर तैयार किया था] इस परियोजना में हमारा उद्देश्य प्रारूप को सावधानीपूर्वक संशोधित करना था ताकि यह सेनापति की उड़िया की सारी विशेषताओं  को ठीक ठीक अनुवाद कर सके मुहावरे और शैली को सुपाठ्य बनाये रखते हुए. इसके साथ ही हमलोगों ने एक फैसला किया कि उपन्यास के कुछ शब्दों को अंग्रेजी अनुवाद में ज्यों का त्यों ले लिया जाय क्योंकि उनमे से कई के अंग्रेजी में कोई पर्याय उपलब्ध नहीं हैं (जैसे उदाहरण के लिए ‘नबता’)  पर ये शब्द जिस अर्थ कि तरफ इशारा करते है वो सन्दर्भ से स्पष्ट हो जाता है. इसके अलावा उपन्यास में ऐसे कई शब्द हैं जो सेनापति के समय तो प्रचलित थे मगर वर्तमान ओड़िया में उनका प्रयोग नहीं होता मसलन कोस जिसका प्रयोग सेनापति के समय में दो किलोमीटर के अर्थ में होता था अब वर्तमान उड़िया में इसका प्रयोग नहीं होता है, और इस तरह के शव्दों को उपन्यास में बिना अनुवाद ही छोड़ दिया जिससे सेनापति और हमारे समय के बीच कि दूरी और अधिक स्पष्ट हो. और अंत में हम उन शब्दों के संधान में सफल हो पाए जो कि गैर-भारतीय पाठकों के लिए शब्द के सूक्ष्म अर्थच्छटाओं को प्रतिध्वनित कर सके. जैसे कि हमने चरित्र शब्द का अनुवाद उसे सन्दर्भ से जोड़कर और अधिक स्पष्ट रूप से किया रामचंद्र मंगराज का चरित्र. फिर इसे बड़े अक्षरों [कैपिटल लेटर ] में लिखा क्योंकि पश्चिमी जगत में संतो के नाम के शीर्षक के रूप में लिखते समय ऐसा ही करते है ऐसा करने से सेनापति के उपन्यास का विडंबनात्मक व्यंग्य का लहजा भी अंग्रेजी अनुवाद में आ गया जो कि संभव नहीं था यदि इसका अनुवाद रामचंद्र मंगराज की जीवनी किया जाता. कुछ चीजों का अनुवाद और व्याख्या विस्तृत पाद-टिप्पणियों के सहारे किया जाना था , जिसे मैंने रविशंकर मिश्रा के साथ मिलकर युनीवर्सिटी कैलिफोर्निया प्रेस के हमारे कॉपी एडिटर के महत्वपूर्ण सुझाव कि सहायता से परियोजना के सबसे अंतिम अबस्था में किया.उपन्यास के आरंभिक दौर में जो भारतीय दर्शन के न्याय संप्रदाय का सन्दर्भ मिला था उसका संकेत आगे चलकर और अधिक विस्तृत हो गया था , और हमलोग को अनुवाद में उन सांकेतिक स्तरों पर ध्यान देने कि जरुरत थी वो भी प्रत्येक संदर्भो के साथ न्याय दर्शन की कोई टिप्पणी दिए बिना, और वास्तव में ऐसा करना बहुत ही विद्वतापूर्ण था.

इस तरह के तर्क के बारे में भी सोचा जा सकता है कि उपन्यास की भूमिका में मैंने जो व्याख्या प्रस्तुत की थी वह एक तरह का अनुवाद ही है. रविशंकर मिश्रा ने १९९-९२ में प्रकाशित अपने लेख इस तरह की व्याख्या की जैसा की पॉल पिएरे  भी अपने एक लेख में अनुवाद सिद्धांत के परिप्रेक्ष्य से इस उपन्यास के बारे में कर चुके थे. कथावाचक की केन्द्रीयता के अतिरिक्त मैं उन सांकेतिक अंतर-पाठीय स्तरों को ,जिसे मैंने  लाक्षणिक उप-पाठ नाम दिया है, जो उपन्यास के मौलिक सबाल्टर्न मूल्यों को मुख्य कथानक की तुलना में कई गुना अधिक प्रकट करते हैं, दर्शाना चाहता था.  अत: एक तरीके से अनुवाद को एक क्रमबद्ध अवस्था वाले कार्य के रूप में समझा जाना चाहिए जिसके नैरंतर्य में पहले वाक्य रचना और मुहावरे का चुनाव फिर पाद-टिप्पणियां और व्याख्यात्मक लेख शामिल हैं और इसी के माध्यम से पाठकों के भारतीय उपन्यास ख़ास करके ग्रामीण जीवन से सम्बंधित एक उपन्यास की मान्यताओं को चुनौती दी जाती है या उसे संशोधित किया जाता है. अनुवाद बहुत कुछ व्याख्यात्मक लेखों की तरह हमारे अपने समय का आलोचना कर्म है. बतौर एक पाठक हम अपनी मान्यताओं को प्रश्नांकित करते हैं,  अपने दृष्टिकोण अपने पूर्वाग्रह और प्रतिरोध को संशोधित करते हैं, इसीलिए अनुवाद को निरंतर अपडेट करते रहने की जरुरत है जिससे उसमे और प्रासंगिक ब्यौरे जोड़ा जा सके. ‘छह माड़ आठ गुंठ’ जैसे उपन्यास का जटिल पाठ हमें एक अच्छा पाठक होना सिखलाता है. समय के साथ क्रमश: यह अपने पाठक-वर्ग का भी निर्माण करता है. और जिस प्रक्रिया, जिसके द्वारा हम बेहतर पाठक और प्रबुद्ध पाठक बनना सिखाते है, वह संकुचित अर्थ में साहित्यिक होना नहीं है, चूँकि इसमें एक वृहततर सांस्कृतिक विमर्श अंतर्निहित है जिसमे हमारे जिद्दी आदते दृढ विश्वास और विचारधारात्मक निवेश शामिल है.  छह माड़ आठ गुंठ के संबंध में हम पाते है यह हमारी एक मान्यता             [विचारधारात्मक-निवेश ] की जड़ें खोदता है उसे चुनौती देता है, और वह मान्यता है, हमारा बाबू-संस्कृति-सुलभ विश्वास जिसमें अवश्यम्भावी रूप से ग्रामीण परिप्रेक्ष्य की तुलना में शहरी परिप्रेक्ष्य की सर्वोच्चता का भाव जुड़ा होता है और साथ ही साथ वाचिक परम्परा की तुलना में लिखित परंपरा को श्रेष्ठ समझना भी. 

उपन्यास में मौखिक परंपरा का आयाम अनुवाद के सबसे अंतिम संस्करण में प्रकट होता है, लेकिन उड़िया लोक प्रदर्शनपरक कलारूपों के साथ पाल-गायन के संवंध का ख़याल मेरे मन में बाद में पैदा हुआ. मैंने उपन्यास की भूमिका में ससंकोच स्पष्ट किया है कि यह उपन्यास पाल-गायक [ मुख्य गायक/ कथा-वाचक ] की चचेरी बहन है क्यूंकि दोनों संवेग-पूर्ण संवादों का प्रयोग करती है. इस तथ्य की पुष्टि तब हुई जब मैं हेमचन्द्र बरुआ ‘फेयर विदाउट, फाउल विदइन’ का तिलोत्तमा मिश्रा द्वारा किया गया अनुवाद पढ़ा , और इस बात को समझ पाया कि असम और ओडिशा की थिया-पाल परंपरा में कितना करीबी संबंध है. एक बातचीत में तिलोतमा मिश्रा ने मुझे यह बताया कि १५वीं शताब्दी में शंकर देव के समय से ही ओडिशा और असम के बीच व्यापक सांस्कृतिक संपर्क और अदन-प्रदान का सिलसिला शुरू हो गया था और लोक-परम्पराओं के असमी  विद्वान इस बात को मानते है की इन शताब्दियों में असमी और ओड़िया पाल-गायन एक दूसरे को प्रभावित किया होगा. और इसी बात की मैं सूक्ष्मता से छानवीन करना चाहता था.मेरी जानकारी में ऐसा कोई नहीं है जो इस विषय पर शोध कर रहा हो. बरुआ और सेनापति के उपन्यासों में पाल [ भारत के दो भिन्न प्रदेशों के सामान कलारूपों] की पाठगत प्रतिध्वनियों को सावधानी-पूर्वक छानवीन करना भी बेहतर होगा. पूर्वी भारत में पाल और साहित्य के संबंध को सामान्य तरीके से समझने के लिए, असम बंगाल और ओडिशा में विभिन्न प्रकार से विकसित होने वाले पाल के ठोस इतिहास की जरुरत है. तीन भाषाई प्रदेशों में पाल का तुलनात्मक अध्द्ययन इसमें मददगार साबित होगा. मुझे खोज के लिए इस बात ने बहुत ही आकर्षित किया कि असम के पाल की जड़ें कबीलाई पूजा परम्पराओं में हैं. जैसा कि मैं समझता हूँ बहुत सम्भव है प्रस्तुति [पाल-गायन] का यह संवादात्मक रूप, बहु-विधात्मक शैक्षणिक कीर्तन परंपरा से जरुर प्रभावित हुआ होगा जिसको १४ सदी में नामदेव ने महाराष्ट्र में लोकप्रिय बनाया था.

इतने विश्लेषण के बाद, छह माड़ आठ गुंठ के प्रति मेरी दृष्टि का निर्माण संभवतया इसके मौखिक प्रस्तुति वाले आयाम से होता है ,जो कि उपन्यास के पहले पठन से ही शुरू हो जाता है. मुझे याद है कि अपने किशोर अवस्था में  मेरे भाई जो उम्र में मुझसे ७ साल बड़े हैं, इस उपन्यास के हास्य-जनक प्रकरणों को मुझे पढ़ कर सुनाते समय इतने जोर से हंसा करते थे कि वो हँसते-हँसते कुर्सी से गिरने-गिरने को हो जाते. ओड़िशा में सेनापति का यह उपन्यास प्रामाणिक पाठ माना जाता है जिसके साथ मेरा पहला  संपर्क अकादमिक नहीं रहा और मुझे इस बात कि खुशी भी है. मेरा मानना यह भी है कि निश्चय ही उस तरह का उपन्यास नहीं है जिसको पहली बार औपचारिकतापूर्ण पांडित्य के साथ पढ़ा जाय.

कई दशकों से जाने-अनजाने मैं इस उपन्यास के बारे ये यह पता करने का प्रयास कर रहा हू की मेरा इस उपन्यास से पहला संपर्क इतना सजीव और उर्जावान क्यों है? क्या इसके कारण उपन्यास के पाठ और उसके संस्कृतिक स्त्रोतों में अंतर्निहित है? मुझे हाल  फ़िलहाल यह बात जानकर आश्चर्य नहीं हुआ, और मुझे लगता है आपको भी नहीं होगा कि छह माड़ आठ गुंठ बाद में पाल प्रस्तुति के लिए स्त्रोत-ग्रन्थ/पाठ बन गया जिसका इस्तेमाल ख़ास करके वाम संगठन ओडिसा के गांव में वहाँ के लोगों को राजनीतिक और संस्कृत रूप से शिक्षित करने के लिए कर रहे हैं.

प्रश्न:’उपनिवेशवाद,आधुनिकता और साहित्य के अधिकांश विश्लेषण का केन्द्र तुलनात्मकता है. इस संग्रह में लिखी गयी आपकी भूमिका यह बताती है कि भारतीय साहित्य [जो कि विभिन्न प्रदेशों और विभिन्न भाषाओं  में रचा गया है ] के प्रति एक सम्यक दृष्टि हमें उन सारी सम्यस्याओं से बचने में मदद करती है जिसकी उत्पत्ति क्षेत्रीय रूढ़ता और सांस्कृतिक उग्रभक्ति से होती है. क्या आप इसके बारे में संक्षेप में बताएँगे ?

प्रो. मोहंती: सांस्कृतिक उग्रभक्ति साहित्य के विद्यार्थियों के लिए जहर है. मैं समझता हूँ कि सांस्कृतिक उग्रभक्ति के कुछ भेद भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान शुरूआत में अपने शासक मालिकों द्वारा संस्कृति की जा रही अवमानना के प्रतिरक्षा में एक प्रकार के मिमिक्री के रूप में उत्पन्न हुए थे. विडंबना यह हुई की वास्तव  में इस तरह की प्रतिरक्षा ने १८-१९ सदी के यूरोप  की तरह यहाँ भी नृ-जातिकेन्द्रियता और नस्लवादी तर्कों का रूप ले लिया. इस संदर्भ में आप फ्रेंच रईस चिन्तक गोबिनाऊ के नस्लवादी शिध्द्यान्तो के बारे में विचार करे इसके साथ ही साथ आप ‘राष्ट्रीय’ साहित्य की संस्कृति विषय के बारे में मैंथ्यू अर्नोल्ड के नस्ल-आधारित मान्यता पर भी गौर फरमाए. इसी बात को के बारे में एक और प्रासंगिक सन्दर्भ अंग्रेजी को शास्त्रीय बना कर उसके मानकीकरण करने से जुड़ा विमर्श १८ सदी में इंग्लैंड में शुरू हुआ.

इस तरह के मिथ्या भाषावैज्ञानिक सिद्वान्त का बहुत गहरे रूप में जाति और वर्गाधारित मानवशास्त्रीय सिद्वान्तों से था, और भारत में एक शताब्दी के बाद ये सिद्वान्त विचारकों द्वारा फैलाये गये.  बुद्धिजीवी इतिहासकारों ने इन विचारों (जैसे कि ‘अंग्रेजीयत’ या ‘फ्रान्सीसीपन’) को यूरोपीय सन्दर्भो में काफी आलोचित-व्याख्यायित किया है परन्तु भारत में इन विचारों के प्रभाव क्या पड़ा इस ओर बहुत कम घ्यान दिया गया है. कम से कम एक इतिहासकार जोया चटर्जी का घ्यान इस बात की ओर गया है और उन्होंने यह तर्क दिया कि भारतीय सांस्कृतिक उग्रभक्ति के कुछ अंशों का विकास 19वीं शताब्दी में उस साम्प्रदायिक भावना के रूप में हुर्इ जो प्रकारांतर अस्मिता की विचारधारा के रूप में विकसित हो जाती है और इसलिए इस उग्रभक्ति का वर्ग आधार नवधनाढ्य जमींदारों जो कि अधिकाशंत: हिन्दू धर्म की उच्च जातियों के होते थे, में बना. सबसे पहले 1968 में ब्रूमफील्ड ने इस नवधनाढ्य वर्ग के सांस्कृतिक दृष्टिकोण के बारे में स्पष्ट रूप से लिखा. स्पष्ट रूप से कहूँ तो, इस मुददे पर प्रगतिवादी आलोचकों और इतिहासकारों द्वारा बहुत सारा कार्य किया जाता है.

साहित्य के अघ्येताओं के साथ एक ट्रेजडी यह होती है कि नकल के एक रूप में उग्रभक्ति ने साहित्य के बारे में एक विकट दृष्टिकोण पैदा करती है  जो साहित्य को एक बेडौल   विचारधारात्मक हथियार बना देता है. “मेरे साहित्य का इतिहास तुम्हारे साहित्य के इतिहास से पुराना है”, “अतीत के फलां फलां महान लेखकों का संबंध हमारी भाषा परंपरा से है आपकी से नहीं” आदि. यह विचारधारा उन पाठकों के लिए भी हानिकारक है जिन्हें जिनका संबंध किसी ख़ास प्रशंसित या पूजी जाने वाले परंपरा से होता है. दुर्भाग्य सांस्कृतिक देशभक्ति या उग्रभक्ति का ये रूप स्वतंत्रता के बाद हामरे क्षेत्रीय साहित्य अघ्ययन का मुख्य दृष्टि बन गया. इसके साथ ही एक महत्वपूर्ण घटना यह हुर्इ कि  हमलोग साहितय के अघ्ययन को छोड़कर एक अरूचिकर परियोजना में संलग्न होते  हैं जो पाठ के सूक्ष्म विश्लेषण को छोड़कर किसी लेखक के सतही प्रस्तुति को तरजीह देती  है और सायास अपना घ्यान अपनी भाषा परंपरा के एकाकी पक्ष पर केंद्रित  करती है और जो इस धारणा पर आधारित होती है कि साहित्य आलोचना का विभिन्न भाषा परंपराओं के बीच एक अविरत प्रतिद्वंद्विता है और लक्ष्य अपनी भाषा परंपरा को विशिष्ट बनाना है. यह विचारधारा अन्य भारतीय आधुनिक साहित्य परंपराओं के प्रति अज्ञान को न सिर्फ अनुमोदित करती है बल्कि संभवतः यह अज्ञान उसके लिए अनिवार्य भी होता है लेकिन जाहिर ही संस्कृत और यूरोपीय साहित्य के साथ सह-अस्तित्व से इसे कोई गुरेज नहीं. साहित्य अकादमी, दिल्ली द्वारा प्रकाशित क्षेत्रीय भाषाओं के आरंभिक इतिहास और लेखकों के मोनोग्राफ्रफ इस तथ्य के पर्याप्त उदाहरण हैं  जिसके बारे में बात कर रहा हूँ और इसे उन आरंभिक प्रवृतियों के आधार पर विश्लेषित करने के लिए कई  पीचडी शोधों की दरकार होगी.

अभी तक हमारे पास वैसी नैतिक रूप से उपयुक्त और युक्तिसंगत भाषा नहीं है सांस्कृतिक या विचारधारात्मक रूप से उग्रभक्ति के बारे में बात करने के लिए, इसिलए जब हम इसकी सार्वजनिक अभिव्यक्ति से दोचार होते होते हैं, किसी कांफ्रेंस में या प्रकाशन में, हम बस भौंहें चढाने या एक दूसरे से आँखों आँखों में कहने से ज्यादा कुछ नहीं कर पाते. लेकिन शीर्ष साहित्यिक व्यक्तित्वों द्वारा इसकी पहचान करने के साहसी प्रयत्न हुए हैं. उदहारण के लिए २००१ में द हिन्दू में गिरीश कर्नाड का लेख या बुक रिव्यू में ‘टैगोरभक्ति’ पर उनका ही लेख.

गिरीश कर्नाड दो मुख्य प्रश्नों को रेखांकित करते हैं. पहला यह कि एक कैनन के रूप में ‘भारतीय’ साहित्य को किस तरह से परिभाषित किया जाए और दूसरा यह कि साहितियक संकलनों के संदर्भ में एक संपादक की भूमिका क्या होनी चाहिए? मगर बात इतने से ही खत्म नहीं हो जाती यहाँ एक और सामान्य प्रश्न यह उभरता है कि भारतीय साहित्य के किसी विशेष रचना की व्याख्या हम किस प्रकार करें, जबकि उग्रभक्तिवादी दृष्टिकोण पाठ और लेखक की एक विकृत व्याख्या प्रस्तुत करता है. कल्पना किजिए की आप चार्ल्स डिकेंस को पढ़ते समय दिमाग में सबसे उपर इस बात को रक्खें कि इसमें निरूपित अंग्रेजी सभ्यता कितनी महान है, या फिर तुकाराम को आप मराठी संस्कृति के महानता के जश्न मनाने के उद्देश्य से पढ़ें या फिर १५वीं सदी में सरलादास द्वारा रामायाण और महाभारत के सबाल्टर्न संस्करण को ओडिया साहित्य इतिहास का गौरव गान करने के लिए. पाठ अर्थ-ग्रहण के ऐसे प्रयत्न गलत दिशा में होंगें  क्योंकि ऐसा करने से हम उस दृष्टि से वंचित हो जाते हैं जो हमें उन सांस्कृति अंतरधाराओं को देख पाने में सक्षम बनाती जिसने मघ्यकालीन और आंरभिक भारतीय संस्कृति का निर्माण किया है, वह संस्कृति जिसे नाथ योगियों और घुमक्कड कवियों ने एक इलाके से दूसरे में भटकते हुए निर्मित किया – उपमहाद्वीप के इतिहास में सचमुच ही एक नया क्षण. सरलादास और तुकाराम को संकुचित साहित्यिक-ऐतिहासिक प्ररिप्रेक्ष्यों में पढ़ना-समझना उनके स्वप्नदर्शी विचारों के पंख कतरने जैसा है उनकी क्रांतिकारी-सामाजिक शक्ति के प्रति अंधा होना है. मगर संस्कृति उग्रभक्ति या अंधभक्ति का आधुनिक रूप साहित्य के विधार्थियों को इस संकुचित दृष्टि से उपरोक्त दोनों लेखकों की रचनाओं के अध्ययन, पठन के लिए सहमत कर सकता है और आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्यूँकि भारत में क्षेत्रीय साहित्य का इतिहास इसी तरह लिखा जा रहा है.

सीएमएल की भूमिका में मेरा यह तर्क नहीं है कि साहित्येतिहास महत्वपूर्ण नहीं है, लेकिन इस सांस्कृतिक अंधभक्ति/उग्रभक्ति का मुकाबला करने के लिए गहन पाठगत व्याख्या और अंतर-क्षेत्रीय तुलनात्मक अध्ययन ज्यादा महत्वपूर्ण है. आजादी को ६० साल हो गये हैं और हमें राष्ट्रीय और क्षेत्रीय साहित्य इतिहास लेखन से एक लघु अवकाश लेने की जरूरत है ताकि हम ज्यादा से ज्यादा घ्यान सीधे-सीधे पाठ और कुछ और तुलनात्मक सांस्कृतिक विषयों पर केंद्रित कर सकें. जैसा कि प्रो. यू.आर. अनंतमूर्ति  कार्नेल विश्वविधालय में कर सके. जैसा उन्होंने व्यक्तव्य में कहा कि हमें आधुनिक भारतीय साहित्य रचनाओं की सुस्पष्ट व्याख्या के साथ-साथ ही अन्तर्क्षेत्रीय पाठ समुच्चयों को विवेचित करने की जरूरत है. भारतीय साहित्य विषय पर लिखे गये कुछ बेहतरीन लेख चाहे एज़ाज़ अहमद या शिशिर कुमार दास या अमीया देव और के. अयप्पा पनिक्कर के हों वो सभी तुलनात्मक अध्ययन की जरूरत पर बल देते है. इस संदर्भ में खासतौर पर मैं पणिक्कर के द्वारा पाठय समुच्चयों जो कि विभिन्न भाषार्इ क्षेत्रों के सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों और आन्दोलनों को परिभाषित करते हैं, पर ध्यान केंद्रित करने की बात को पसंद करता हूँ. अमीया देव ने जिसे ‘तह का इतिहास’ कहा है और शायद जिसमें हमे ब्रिटिश मार्क्सवादी इतिहासकारों की  परियोजना की झलक मिलती है, वह हमारे लिए महत्वपूर्ण हो सकता है मगर इससे पहले हमें एकांगी साहित्य इतिहास के प्रारूप से बचना होगा और हमें विभिन्न भाषा परंपराओं के तुलनात्मक अध्ययन के महत्वपूर्ण कार्य को भी पूरा करना होगा.

अब इसे एक उदाहरण देकर समझाना चाहिए. वास्तव में पांरपरिक साहित्य इतिहास का प्रथम लक्ष्य अपनी ही भाषा परंपरा के भीतर उस सीधी पंक्ति का अन्वेषण करना है जिससे उस भाषा परंपरा का साहित्य सीधे-सीधे प्रभावित होता है. जो हमें सांस्कृतिक संबंध और प्रसार के विकृत बोध की ओर ले जा सकता है. कुछ साल पहले मैंने १६वी सदी में बलराम दास द्वारा लिखे गये लक्ष्मी पुराण के  मूल रूप से कुछ नये तथ्यों को पाया और वह यह कि इसमें प्रतिदिन के श्रम को जिसमें गृहस्थिक श्रम भी शामिल है, काफी महत्व दिया गया है. तब मुझे ऐसा लगा कि श्रम को इतने महत्व देना वीरशैववाद के एक प्रमुख विचार को प्रतिबिंबित करता है. मुझे इस बात की पुष्टि के लिए कोर्इ पाठगत सबूत तो नहीं मिला, और साहित्य इतिहास की एक संकुचित दृष्टि मुझे इस लक्ष्मी पुराण में श्रम महत्व के प्रेरणास्रोत को श्रोत के रूप में पूर्ववर्ती उडि़या काव्यों को ही स्वीकार करने के लिए ही बाध्य करता है. मगर इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि १२वीं शताब्दी के कर्नाटक में वीरशैववाद एक लोकप्रिय सामाजिक आन्दोलन था जिसका प्रभाव दूर-दूर के प्रदेशों तक पड़ा. घुमक्कड़ों योगियों और साध्ओं ने इस सामाजिक आन्दोलन के विचार को दूर-दूर तक प्रसारित किया. इसलिए इस बात का निर्धारण करना कि लक्ष्मी पुराण के इस श्रम महत्व का श्रोत, केवल उडि़या संस्कृति के भीतर ही है मुर्खतापूर्ण होगा. इस संदर्भ में जैसा कि लक्ष्मी पुराण के बारे में लिखते समय मैंने बताया कि वीरशैव-विचार परंपरा और लक्ष्मी पुराण के क्रांतिकारी सुधारवादी विचारों के बीच जरूर कोर्इ सांस्कृतिक संपर्क रहा होगा. जिसे बलराम दास ने बखूवी संश्लेषित और विकसित किया. मुझे ऐसा लगता है कि मेरे इस रेखांकन को और सूक्ष्मता से जांचा-परखा जाए और शायद इसमें एक शोध-विषय होने की भी संभावना है जिसका विकास इन दो भाषा पंरपराओं से परिचित विद्वान कर सकते है और यह बहुत स्पष्ट है कि पारंपरिक इतिहास लेखन के जिस माडल को मैंने त्यागा वह मुझे लक्ष्मी पुराण में सक्रिय सांस्कृतिक अंर्तधारा को समझने में बिल्कुल ही मदद नहीं करता और मजबूरन मुझे लक्ष्मी पुराण के सारे वैचारिक आधारों के श्रोत के रूप में मजबूरन उडि़या भाषा पंरपरा को ही स्वीकारना पड़ता है.

हमें विभिन्न क्षेत्रीय भाषा पंरपराओं के बीच सांस्कृतिक अंत:क्रिया और आदान-प्रदान के एक जटिल और सही-सही प्रतिदर्श या नमूने की जरूरत है जो तुलनात्मक पाठगत अध्ययन से संभव है. भारतीय साहित्य के रूप-रेखा को स्पष्ट रूप से इसी अंतक्षेत्रीय आदान-प्रदान के संदर्भ में समझा जा सकता है, बजाय कि इसे किसी भी पारंपरिक रूप से परिभाषित साहित्य ऐतिहासिक भव्यकथनों के परिप्रेक्ष्य में जांचा-परखा जाए. सीएमएल भी इसी दिशा में किया गया एक प्रयास है जिसका लक्ष्य एकांगी साहित्य पर्यवेक्षण विश्लेषण और सांस्कृतिक अंधभक्ति के खिलाफ आलोचनात्मक तुलनात्मक की प्रतिष्ठवादी मगर इस दिशा में यह एक छोटा सा कदम है.

संयोग से यूरोप में ज्ञान के एक अनुशासन के रूप में तुलनात्मक साहित्य का उत्थान उस धुंधले दृष्टि के खिलाफ प्रतिक्रिया के रूप में हुआ था, जिसका कारण अन्य रूप से साहित्य अध्ययन था. 1870 में तुलनात्मक साहित्य के प्रथम पत्रिका के संस्थापक हुगा मेल्टज इस बात की जरूरत महसूस करते हैं कि एक ऐसी पत्रिका होनी चाहिए जो कि उस सांस्कृतिक प्रवृति की आलोचना प्रस्तुत कर सके जिसमें हर एक देश अपने को दूसरे अन्य देशों से महान समझता है, उन्होंने इस प्रवृति को राष्ट्रीयता का सिद्धांत नाम दिया जो कि यूरोप में १९वीं शताब्दी के साहित्य अध्ययन में काफी लोकप्रिय था. कहने की जरूरत नहीं है कि सांस्कृतिक स्वाभिमान और बंधुत्व की भावना के लिए किसी दूसरे समुदाय या देश की तुलना में अपने समुदाय या देश को प्रभुत्वशाली मानना अपरिहार्य है. उग्र राष्ट्रवाद या उग्रभक्ति एक अस्वास्थ्यकर सांस्कृतिक परिणति है जिसे किसी समुदाय या देश के वास्तविक गर्व के साथ जोड़कर भ्रम ना पैदा किया जाए.

मेल्त की राष्ट्रीयता विरोधी दृष्टि उनके अपने समय की साहित्य अध्ययन की प्रमुख प्रवृति के खिलाफ एक जरूरी प्रतिकार थी मगर दुर्भाग्य से उनके द्वारा विकसित ज्ञान के इस अनुशासन का लक्ष्य इसके यूरोप केंद्रित उद्भव के परे नहीं जा सका. जबकि २०वीं शताब्दी में कर्इ ऐसी महत्वपूर्ण घटना घटी जिसके तुलनात्मक में साहित्य अध्ययन जरूरी था, उदाहरण के लिए तीसरी दुनिया का उपनिवेशीकरण, समाजवादी तथा नारीवादी अन्तर्रराष्ट्रीयता जैसे आंदोलनों का विकास. पाश्चात्य जगत के विद्वानों में विश्व साहित्य के विषय पर एक नए विमर्श का जन्म हो रहा है. फिर भी मुझे यह लगता है कि भारत के साहित्य के विधार्थी विश्व साहित्य के अऔपनिवेशक और समतावादी दृष्टिकोण में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं. मगर ये अऔपनिवेशक व्याख्याओं से होना चाहिए और इसका आधार संस्कृति के इतिहास का अनुभव आधरित ज्ञान होना चाहिए न कि अपने आत्मश्लाघी कथन शैलियों और एकांगी पंरपराओं के आधार पर.

प्रश्न: तो क्या आप इस बात से सहमत हैं कि साहित्य के उग्रभक्ति पूर्णदृष्टि के लिए कोर्इ दूसरा सिद्वांत जरूरी है जिसमें साहित्य अध्ययन को एक नियामक भाषिक परंपरा के रूप में देखना शामिल है. नि:संदेह इस एकभाषिकता और भाषिक अंधभक्ति/उग्रभक्ति का विरोध ‘छा माना आठ गुंथा’ के तेलगु, हिन्दी, बांग्ला जैसे विभिन्न क्षेत्रों के पाठक समूहों के बारे में चर्चा करते हुए करेंगे. उदाहरण के लिए कोर्इ यह कह सकता है कि प्रेमचंद के यथार्थवाद के प्रति उग्रभक्तिवादी या गैर उग्रभक्तिवादी/ अंधभक्तिवादी दृष्टि इस बात पर निर्भर करती है कि प्रेमचंद की रचनाओं को अंर्तक्षेत्रीय पंरपरा समुच्चयों के परिप्रेक्ष्य में देखा गया है या उनके यथार्थवादी उपन्यास और छोटी कहानियों की प्रेरणा विभिन्न साहित्य पंरपरा है या फिर तुलनात्मक रूप से आप इस बात पर सहमत होगें ‘छा माना आठ गुंथा’ के उग्रभक्तिवादी/अंधभक्तिवादी और गैर उग्रभक्तिवादी/अंधभक्तिवादी दृष्टिकोण के बीच की भेदक रेखा इस बात पर निर्भर करती है कि इसे उडि़या सांस्कृतिक आंदोलन के गौरवगान के रूप में देखा जाता है या इसे एक तुलनात्मक और अंर्तक्षेत्रीय व्याख्या की परंपरा के रूप में. क्या इस एक भाषिकतावादी दृष्टिकोण की आलोचना हिन्दी एवं उडि़या और अन्य भाषा के प्रारंभिक यथार्थवादी उपन्यासों और दक्षिणी एशियार्इ साहित्य के साहित्यिक यथार्थवाद परिक्षण की दूसरी सबसे तार्किक पद्वति है.

प्रोफेसर मोहन्ती: आपने जो कहा उस बात से मैं सहमत हूँ. साहित्य अध्ययन के इस उग्रभक्तिवादी दृष्टिकोण जो कि भारत में एक रूढ़ दृष्टिकोण बन गया है के आलावा न सिर्फ एक संस्कृतिवादी प्रदेशवादी पूर्वाग्रह से मुक्त होना होगा बल्कि हमें एक भाषिकतावादी पूर्वाग्रहों और दृष्टिकोण से भी अपने को बचाना होगा. अब आप इस बात को ही देखे कि यदि हम फ्रेंच या अंग्रेजी के साथ-साथ किसी अन्य भारतीय भाषा का अध्ययन करते हैं तो हमें कोर्इ पेरशानी नहीं होती है मगर यदि हम किन्हीं दो या दो से अधिक भारतीय भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं तो हमें समस्या का सामना करना पड़ता है. मगर साहित्य के सही-सही अध्ययन विश्लेषण के लिए इस तुलनात्मक अध्ययन की जरूरत भी भारतीय विद्वान स्वीकारते हैं. जैसे कि हमारे लेखक अपनी भाषा पंरपरा के आलावा भी दूसरी भाषा परंपरा के रचनाओं को पढ़ते हैं चाहे वे उसका अनुवाद क्यों न पढ़े और बहुत लाजमी है कि वे अपनी परंपराओं के आलावा अन्य भाषा पंरपराओं से भी प्रेरित और प्रभावित होते हैं. मगर उनके आलोचक और शोध अघ्येता इतने उदार नहीं है कि वे किसी लेखक की रचनाओं में अन्य भाषा पंरपराओं के प्रभाव को देख पाये और उनमें से अधिकांश अपने अध्ययन-विश्लेषण का कार्य एक भाषा पंरपरा के आलोक में ही सम्पन्न कर लेते हैं.

इस बात को मानने में विनम्रता होगी कि द्विभाषिकता और अन्तर्भाषिक संवाद पहले भारत में एक तार्किक और सामान्य प्रक्रिया रही है. मैंने सरला दास के विचित्र रामायण से अपने अध्ययन विश्लेषण का कार्य शुरू किया, सरलादास का विचित्रा रामायण प्रथम उडि़या महाकाव्य है जिसे १५वीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में रचा गया. यह रामायण का बहुत दिलचस्प संस्करण है और अपने सबल्टर्न पाठ, जिसकी कथन शैली के केंद्र में सीता है, के साथ एक मनोरम और आकर्षक कथा संसार की रचना करता है. सच्चिदानंद मिश्र इस बात की तरफ इशारा किया था, १७ वीं शताब्दी में इसका तेलगु अनुवाद हुआ था और तबसे इसके अन्य भाषाओं में अन्य चार अनुवाद किये जा चुके हैं. उत्तरी आंध्रप्रदेश और दक्षिणी उडि़सा के सांस्कृतिक संबंधों के बारे में तो हम अच्छी तरह से जानते हैं, मगर विचित्रा रामायण के तेलगु भाषा में अनुवाद वाले तथ्य की खोज हमें यह बताती है कि उडि़सा आंध्रप्रदेश के सीमांत में द्विभाषिक पंरपराएँ और कितनी सजीव और सक्रिय है. इस तरह की संस्कृति को केंद्र सरकार या साहित्य एकादमी से किसी तरह की अनुदान की जरूरत नहीं है. विचित्रा रामायण का अनुवाद इसलिए संभव हो सका क्योंकि उडि़या के अतिरिक्त अन्य भाषाओं में भी पाठक का ऐसा वर्ग था जो कि इस तरह के पुस्तकों में दिलचस्पी रखता था और इस समुदाय के लिए भाषा की सीमाएँ कोर्इ मायने नहीं रखती थी. वी. नारायण राव ने अपने कर्इ वक्तव्यों में स्पष्ट करने की कोशिश की है कि औपनिवेशिक भारत के पाठयक्रमों में अंग्रेजी को अनिवार्यत: शामिल किया जाना क्षेत्रीय भाषाओं की दूर्दशा का कारण बना, इसके साथ ही साथ अंग्रेजी और संस्कृत के पाठयक्रम में शामिल किये जाने से आधुनिक भारतीय भाषा पंरपरा समाप्त हो गर्इ. इसका परिणाम यह हुआ कि सक्रिय अंर्तक्षेत्रीय और सांस्कृतिक आदान प्रदानों के जगह एक भाषिकता और भाषागौरव का पूर्वाग्रह इन क्षेत्रीय भाषाओं में मुखर हो उठा.

जैसा कि कार्नेल विश्वविद्यालय में दिये गये एक वक्तव्य में यू.आर अन्नतमूर्ति ने इस वाद पर और बल देते हुए कहा कि अंर्तभाषिक साहित्यिक समुच्चयों का अध्ययन एक भाषा परंपरा के दूसरे भाषा परंपरा पर पड़ने वाले प्रभाव के विश्लेषण के दृष्टिकोण से ही महत्वपूर्ण नहीं है. बल्कि यह दो भाषाओं पंरपराओं के बीच अभिव्यक्ति पक्ष, कथन शैली, व्यंग्य आदि के समानताओं को भी समझने में हमारी मदद करता है. इसके साथ ही साथ इसके माध्यम से हम दो भाषा परंपराओं की रचनाओं में पाये जाने वाली विचारधारात्मक वैषम्य को भी स्पष्ट करता है. प्रो. अनंतमूर्ति का लक्ष्य भी करीब-करीब यही है, उन्होंने रविन्द्रनाथ की ‘गोरा’ और सेनापति के ‘छह माड़ आठ गुंठ’ के बीच में पाये जाने वाले वैषम्य को ही रेखांकित किया है. वो चाहते थे कि पाठक इस बात पर विचार करे कि किस तरह ‘छह माड़ आठ गुंठ’ और ‘गोरा’ में भाषा का संस्कृतनिष्ठ या विशुद्व रूप के साथ-साथ रोजमर्रा के काम काजी भाषा का भी प्रयोग हुआ है. बेशक यह एक मात्र उदाहरण है मगर यह हमें तुलनात्मक पाठगत विश्लेषण और साहित्यिक इतिहास की परंपराओं को देखने की एक नर्इ दृष्टि देता है. इस तरह के तुलनात्मक अघ्ययन के लिए गहन पाठगत विश्लेषण की जरूरत होती है.

प्रश्न: यह बात दिलचस्प है कि नस्ल आधरित दृषिटकोण, जो कि वीं सदी के यूरोपीय साहित्य इतिहास में प्रचलित थी कि अलोचना करते समय आपने मैथ्यू आर्नल्ड का संदर्भ दिया था. मगर मैथ्यू आर्नल्ड ने साहित्य आलोचना के जिस आध्यात्मिक दायित्व को स्पष्ट किया था वह एक प्रकार आचारशास्त्रीय आज्ञार्थ हैं, मगर आपने  और प्रो. अनंतमूर्ति ने इसे एक गहन आलोचनात्मक और तुलनात्मक अध्ययन के रूप में देखा जो कि सही अर्थो में एक समतावादी विश्व के निर्माण में सहायक है.

प्रो. मोहंती: वैसे साधारण तौर पर मैं साहित्य के किसी भी तरह के आलोचनात्मक दृष्टिकोण के आचारशस्त्रीय या नीतिपरक निहितार्थों के खिलाफ नहीं हूँ, मगर इस तरह का आचार शास्त्रीय नितिपरकक विचार पद्वति ही साहित्य अध्ययन का पर्याय नहीं है. यह हमारा खुद का अपना एक चुनाव हो सकता है कि हम इसे ध्यान में रखकर किसी साहित्य का अध्ययन कर सके. इसके साथ एक बात और भी जुड़ी है कि आर्नाल्ड का यह सिद्वांत जिसे उन्होंने हमारे दृष्टिकोण को अपने नस्लवादी और राष्ट्रवादी आधारों के कारण और भी संकुचित और तंग कर देता है. वैसे में यह स्पष्ट कर चुका हूँ कि मैं साहित्य की उस भूमिका को कहीं कमतर नहीं आकता हूँ जिसके मार्फ़त साहित्य एक सांस्कृतिक शिक्षक के रूप में कार्य करता है. वास्तव में साहित्य हमें सांस्कृतिक रूप से शिक्षित करता है और साहित्य की आलोचना इस विमर्श को और भी अधिक उत्पादन और रचनात्मक बना सकती है. इस तरह के विमर्शों को, जिसकी हम चर्चा कर रहे हैं, और भी पुष्ट और समृद्ध करने का सबसे बेहतर तरीका यह हो सकता है कि हम आर्नल्ड के सिद्धांत के परे जाकर और जनतांत्रिक बनाएँ, इसे संगोष्ठियों के आयोजनों से हटाकर कहवाघरों और देहात के नुक्कड़ चौराहे तक लाया जाय. उड़ीसा में कर्इ शताब्दियों से जगन्नाथ दास द्वारा लिखित भागवत की चर्चा और पाठन संप्रदायिक स्थलों जिसे उडि़या मे भागवत तुँगी कहा जाता है, में होता चला आ रहा है. ठीक इसी तरह से कर्इ अन्य प्रस्तुतिपरक पंरपराएँ जैसे कि  रामलीला आदि आलोचना की एक जनतांत्रिक संभावना को स्पष्ट करते रहें है क्योंकि इनका सीधा-सीधा संबंध लोक या जनता से होता है कोर्इ आलोचक या व्याख्याकार के माध्यम से ये प्रस्तुति की व्याख्या को नहीं समझते हैं. मेरा तर्क यह होगा कि जब भागवत और रामचरित जैसी रचनाएँ इन लोकवृतों मे बोली पढ़ी समझी जानी जाती रही है तो प्रेमचंद और गोदान जैसी रचनाएँ क्यों नहीं इस लोकवृत में समझी और मुल्यांकित हो सकती है. मुझे विश्वास है कि एक दिन ऐसा आएगा जब साहित्यिक आलोचना लोकप्रिय शिक्षा का एक अंग होगी. मेरे अनुसार जो विमर्श जितना ही लोकतांत्रिक होगा सांस्कृतिक विऔपनिवेशीकरण में उसकी भूमिका उतनी ही होगी और यह हमारे आलोचनात्मक चिंतन को भी प्रखर करेगा.

प्रश्न: क्या आप इस बात को नहीं मानते कि इस उपमहाद्वीप में घुमक्कड़ संतयोगियों, मौखिक कथा पंरपरा, प्रस्तुतिपरक विधायें  मिलकर एक समन्यवादी राजनीतिक और सामाजिक, जनतांत्रिक स्पेस का निर्माण किया है जिसकी आज इन विमर्शों के संदर्भ में बहुत जरूरत महसूस की जा रही है.

प्रो. मोहन्ती: मध्यकाल और प्राचीनकाल के हमारे देश कर्इ धुमक्कड़ साधु, योगी ऐसे हुए है जो सिर्फ घूम-घूम कर कहानी कहने के अलावा एक और महत्वपूर्ण काम कर रहे थे. वह यह था कि वो इस उपमहाद्वीप के विभिन्नप्रदेशों में एक विचारधारा का विकास कर रहे थे और उसे फैला रहे थे. ठीक इसी तरह का काम सूफियों ने भी किया था. कोर्इ यह तर्क भी दे सकता है कि एक घुमक्कड़ साधु और योगी कर्इ प्रांतों के लोग के विचारों, सिद्धांतों और मतों को भी संग्रह कर रहे थे और नए मतों का परिक्षण भी कर रहे थे. कुल मिलाकर ये सब बात इस तथ्य का साक्ष्य भी प्रस्तुत करती है कि इन विभिन्न प्रदेशों और भारत के उपसांस्कृतिक क्षेत्रों गीत और कहानियां किस तरह से स्वीकार की गर्इ. यदि आप कबीर के जीवन को ही उदाहरण के तौर पर देखे तो पाएंगें कि कबीर किस तरह से आज भी लोक में जीवित हैं. न जाने कितने ही गावों और क्षेत्रों के लोग कबीर के दोहे को न सिर्फ गाते हैं, बल्कि कबीर के मूर्तिमंजक मिजाज को भांपते हुए उस आधार पर दोहे की भी रचना करते हैं. इस तरह हम देखते हैं कि साहित्य और आलोचना का साहचर्य भारत के जन सामान्य में किस तरह से रची बसी है, जहाँ साहित्य है वहां आलोचना भी अपरिहार्य रूप से उपस्थित है.

शबनम विरमाणी द्वारा कबीर के ऊपर बनी वृत्तचित्र इसी तथ्य को रेखांकित करती है. अगर हम इस फिल्म के निहितार्थों को गंभीरता पूर्वक लें तो हम पाऐंगें कि किस तरह से कबीर को अकादमिक आलोचना-विवेचना से परे ले जाकर लोकप्रिय संस्कृति में उनकी उपस्थिति को समझा जा सकता है.

प्रश्न: जिस विश्व साहित्य की आप बात करते हैं उसे बाजरू बना देने से हमलोग कैसे रोक पाऐंगें?

 प्रो. मोहंती: विश्व साहित्य शब्द जैसा कि मैं इसका प्रयोग किया हूँ का उद्देश्य एक आलोचनात्मक पंरपरा का अंतर सांस्कृतिक संवाद है. इसका संबंध साहित्यिक रचनाओं से नहीं है, गोयथे ने भी जब इस शब्द का प्रथम बार प्रयोग किया था तो उनका संदर्भ उस प्रक्रिया से था जिसके मार्फत एक सामान्य पाठक और आलोचक यह सीखते हैं कि एक बहुलतावादी सांस्कृतिक स्पेस में हम किस तरह से सचेतन रूप से बुदिमता पूर्ण जीवनयापन कर पाते हैं. इस तरह से बहुलतावादी सांस्कृतिक स्पेसों का निर्माण अंर्तसांस्कृतिक आदान-प्रदान अनुवाद और आलोचना से होता है. गोयथे ने सांस्कृतिक खुलापन और सहिष्णुता के महत्व पर प्रकाश डाला है और खास कर के जब हम विश्व साहित्य के बारे में चर्चा करते हैं तो इनका महत्व और भी बढ़ जाता है. उन्होंने विद्वानों के उस प्रयास को भी सराहा है जिसके माध्यम से वे विभिन्न राष्ट्रों, प्रदेशों, नस्लों, जातियों के साहित्य को समझने की कोशिश करते हैं, और उन तक अपने साहित्य को पहुंचाने का प्रयत्न करते हैं. हमारा विश्वविद्यालय में आज इस साहित्य का एक संकलन बनाकर उसे विधार्थियों तक पहुँचा और पाठयक्रमों में शामिल किये जाने से हम अपने उद्देश्य में सफल हो पाऐंगें. इस संदर्भ में हमारे सामने जो समस्या मौजूद है वह यह कि हमलोग जिस संस्कृति मे पले-पढ़े हैं वह हमे पढ़ने और व्याख्या करने की एक खास समझ को सौंपती है, जिसे परिवर्तित कर पाना बहुत ही मुश्किल है.

प्रश्न: सीएमएल में आपके द्वारा निरूपित उदभावनाओं का केंद्रित विषय वैकल्पिक आधुनिकता है और जिसे आपने लक्ष्मी-पुराण के विश्लेषण के समय स्पष्ट रूप से पहचाना भी, तो क्या आप बता सकते हैं कि इस वैकिल्पक आधुनिकता का वर्तमान विश्व साहित्य परियोजना में क्या महत्व है?

प्रो. मोहंती: वैकलिक आधुनिकता विषय पर आधरित मेरी कर्इ रचनाएँ उस अंतरानुशासनिक परियोजना का एक भाग है, जिसकी उत्पति बहुआधुनिकता और प्राक आधुनिकता विषयों पर छपे लेखों और संपन्न हुए गोष्ठियों से हुआ है. यह सेमुअल आइजेन्स्डाट और शेल्डन पोलाक जैसे महान लोगों के विचारों से प्रेरित है. बेशक इसे उत्तर औपनिवेशिक अध्ययन के संदर्भ में दिलीप गांवकर और दिपेश चक्रवर्ती  के प्रयासों से प्रसिद्धि मिली. भारत में बनारस हिन्दु विश्वविधालय के अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर संजय कुमार तथा अर्चना कुमार और हिन्दी विभाग के राजकुमार द्वारा चीन अध्ययन के भारतीय विद्वान कमलशील आदि के सहयोग से होने वाले संगोष्ठियों और सम्मेलनों के द्वारा इस इस विषय को और विस्तार दिया गया. इस विचार की आधारभूत मान्यताएँ यह है कि हम आधुनिकता के जिस प्रभुत्वशाली रूप को जानते हैं, जिसका विकास यूरोप में पूँजीवाद के विकास के साथ हुआ, आधुनिकता का एक मात्र रूप वही नहीं है, इसके आलावा भी आधुनिकता के कर्इ विकल्प और कर्इ रूप हैं. इस विचार का प्रयास यह है कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अनुसंधानों के माध्यम से एक गैरपूंजीवादी आधुनिकता का खाका खींचा जा सके.

जैसे कि कुछ जगहों में मैंने आपको बताया कि यह परियोजना अंतरानुशासनिक है. फिर भी इस परियोजना के अंतर्गत साहित्य के अध्ययन की एक विशिष्ट भूमिका है. जिस काल को हम प्राय: प्राक-आधुनिक कहते हैं उस समय का साहित्य हमें एक दिलचस्प और एक नए तथ्य से हमारा साक्षात्कार करता है. उस समय के साहित्य में हम अप्रभुत्वशाली संस्कृति और विचारों के कर्इ स्तरों को पाते हैं. अगर हम इसे वैकल्पिक आधुनिकता के दृष्टिकोण से देखने तो इन साहित्य पाठों में हमें अपने अतीत के बारे में एक जिज्ञासा जनक परिप्रेक्ष्य उपलब्ध होता है. जिसे पारंपरिक और रूढ़ अर्थों में साहित्यिक कहा जाता है वह अपने आप में मौखिक कथा कहानी प्रस्तुतिपरक विधा आदि के अतिरिक्त कुछ भी नहीं ठहरता.

वैकल्पिक आधुनिकता को लक्ष्य बनाकर उभरने वाली यह अंतरानुशासनिक धारा विश्व साहित्य के बारे में हमारी समझ को और पुष्ट या समृद्ध कर सकता है. मेरा मानना यह है कि यह कर सकता है. इन सब बातों के अतिरिक्त एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि क्या साहित्य के विद्वान इस तरह की विषयों में दिलचस्पी लेंगे और क्या दो अंर्तसांस्कृतिक सीमाओं के परे अपनी अनुशासनिक दृष्टि का विस्तार कर पाऐंगे? और मैं विद्वानों से निवेदन पूर्वक कहना चाहूँगा कि भारतीय आधुनिकता की शुरूआत औपनिवेशिक शासन के शुरूआत से नहीं होती है आधुनिकता के कर्इ ऐसे तत्व भारतीय समाज और संस्कृति में औपनिवेशक शासन के शुरूआत से पहले ही मिलने शुरू हो जाते हैं. और यदि ऐसा है कि आधुनिकता के बहुत सारे ऐसे रूप हो सकते हैं तो हम पूंजीवाद के उद्देश्य के सापेक्षता मे ही आधुनिकता का सर्वेक्षण नहीं कर सकते. इस तरह से साहित्य और संस्कृति के आलोचक आधुनिक विचारों मूल्यों सांस्कृतिक रूपों का अन्वेषण गहन पाठ विश्लेषण के माघ्यम से कर सकते हैं. इस तरह के विश्लेषण को मानव विज्ञान, समाजशास्त्र, इतिहासकारों आदि से प्रेरणा मिल सकती है.

प्रश्न: हमे लगता है कि सांस्कृतिक और नैतिक सापेक्षतावाद की आपकी आलोचना काफी प्रेरणास्पद है आपने अंर्तसांस्कृतिक अघ्ययन की जो वकालत की उसमे जोर इस बात पर नहीं है कि विभिन्न संस्कृतिओं के बीच एक सहिष्णु संवाद हो बल्कि आपने उन विभिन्न संस्कृतियों के बीच पाए जाने वाले विरोधों और अंतरो के विश्लेषणों को आपने महत्वपूर्ण माना. एक सांस्कृतिक व्याख्याकार असहमत होने और निर्णय लेने से डरता नहीं है. यह एक ऐसी आलोचनात्माक रूख है जिसमें असंगतिओं और विरोधी के पहचान एक नितांत आवश्यक शर्त है मगर इसे असंवेदनशील और असहिष्णु नहीं कहा जा सकता है.

प्रो. मोहंती: हां, आपने सही कहा, मुख्य समस्या उन विरोधों और असंगतियों की पहचान ही है और जैसा कि आपने ही कहा कि असहिष्णुता और असंवेदनशीलता से परे हैं. हमलोग ने नस्ल-केंद्रीयता के खतरों से बहुत कुछ सीखा और सापेक्षतावाद भी इसके विपरोत नहीं है, बल्कि मैं तो यह कहूंगा कि इसमें भी हमें नस्ल-केंद्रित खतरों की झलक मिलती है. हमे नस्ल-केंद्रीयता और सांस्कृतिक सापेक्षतावाद से परे जाना होगा और निर्णय देने के खतरे को भी उठाना पड़ेगा. मगर यह ध्यान रहे कि हमें अपने दृष्टिकोण की समय-समय पर पड़ताल भी करती रहनी होगी.

जैसा कि मैंने और कर्इ अन्य आलोचकों ने यह स्पष्ट किया कि वस्तुनिष्ठता की अप्रत्यक्षवादी लचीली और जटील अवधरणा एक आदर्श अन्वेषण में हमारी मदद कर सकती है. दाशर्निक यर्थाथवाद में यही तथ्य मुझे सबसे आकर्षक लगा. वस्तुनिष्ठता के बारे में यह धारणा कि यह एक संसोधनीय आदर्श है और इस विश्वास को संसोधित किया जा सकता है. एक खास तरह का नम्रता या लचीलापन पैदा करता है, और सांस्कृतिक अघ्ययन के विधार्थी के रूप में हमें जरूरत होती है. वर्तमान समय की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यूरोपीय साम्राज्य की बौद्धिक परछार्इ संकुचित हो रही है और हमें यह मौका है कि हम कर्इ विभिन्न संस्कृतिओं के साथ काम करे और सीखें. हमलोग के पास एक संभावना यह भी है कि हमलोग इस समस्या से टकराने के बजाय पीछे हट जाएं और एक खास और सामान्य के संदेहवाद को अपना लें – हमलोग अन्य संस्कृतियों को कैसे समझ सकते हैं? हमलोग वास्तव में कैसे किसी को जान सकते हैं? मगर में यह समझता हूँ कि ये सब प्रश्न फर्जी है, क्योंकि अपनी प्रकृति में ये काफी अमूर्त किस्म के प्रश्न हैं. संदेहवाद के कुछ प्रश्न हमारे लिए उपयोगी हो सकते है यदि वो हमारे बौद्धिक परिप्रेक्ष्यों को परिभाषित करने में मदद करते हैं, उनसे हम अपने गलतियों को समझने में सहायता पाते हैं.

यदि वस्तुनिष्ठता के आदर्श द्वारा प्रस्तावित ज्ञान मीमांसीय निर्देशों में विचार कर ले तो पाठगत व्याख्या के उद्देश्य के लिए साहित्य आलोचना के यर्थाथवादी सिद्धांत हमारे लिए कम उपयोगी हो जाते हैं.

साहित्यिक यथार्थवाद एक संदिग्ध और प्रचलित शब्द है जो कभी-कभी सामान्य रूढि़यों की तरफ इशारा करते हैं और कभी-कभी विश्लेषणात्मक उद्देश्य और गहरार्इ पर बल देते हैं. अगर हम संकलनों में लोकप्रिय प्रकाशनों द्वारा इसके इस्तेमाल पर ध्यान दे तो यह पाते हैं कि साहित्यिक यर्थाथवादी शब्द जल्दी गायब नहीं होगा बल्कि यह एक काल की विशिष्टता को रेखांकित करने वाले शब्द के रूप में रूढ़ हो जाऐंगें. यदि वर्णनात्मक और विश्लेषणात्मक यर्थाथवाद के अन्तर पर हम अपना ध्यान केंद्रित करे तो यह फायदेमंद साबित होगा. यह साहित्य आलोचना को और भी मजबूत करेगा ताकि यह एक बहुत बड़े परियोजना जिसमें ज्ञान के बहुत सारे अनुशासन जैसे इतिहास, समाजविज्ञान, दर्शनशास्त्र जैसे विषय शामिल हैं, और जिनका उद्देश्य वस्तुनिष्ठ सामाजिक यथार्थों को कर्इ विभिन्न पाठगत व्याख्याओं के तरीके से समझना है, मैं अपनी भूमिका तय कर सकता है. अनुकरणात्मक वर्णनों के संचयन के अतिरिक्त विश्लेषाणात्मक यथार्थवाद कर्इ अन्य तथ्यों की तरफ इशारा करता है, साथ ही साथ बतौर एक पाठक और पेशेवर आलोचक के रूप में हमें साहित्यिक और सांस्कृतिक विधाओं, शैलियों और रूढि़यों के द्वारा किये जाने वाले ज्ञान मीमांसीय कार्यो की तरफ भी हमारा घ्यान आकृष्ट करता है.

साहित्य और संस्कृति के संज्ञानात्मक दृष्टिकोण के अंतर्गत आनेवाला एक तरह संदेहवाद कुछ समय तक साहित्य आलोचना के कर्इ वृतो में बहुत लोकप्रिय था.

मुझे लगता है कि आपको आश्यर्च नहीं होगा जब मैं यह बताऊंगा कि मैं ‘विश्व साहित्य को एक यथार्थवादी और संज्ञानात्मक परियोजना के रूप में देखता हूं जिसका महत्व सिर्फ संसार भर के महत्वपूर्ण रचनाओं के संकलन या पहचान से कहीं अधिक है. इसका मतलब यह हुआ, जैसा कि गोयथे कहते हैं कि अन्य संस्कृतियों और साहित्यों के बीच हमारी ज्ञानमीमांसीय संलग्नता से हमें अपने संस्कृति और इतिहास की जड़ता के बारे में पता चलता है. अनुवाद इस तरह के परियोजना को काफी हद तक संभव करता है, मगर मुख्यत: यह एक व्याख्यात्मक प्रक्रिया है जिसमें अंतःप्रादेशिक और अंतर-राष्ट्रीय तुलनात्मक व्याख्या शामिल है. मेरे विचार से विश्व साहित्य पर अन्वेषण का कार्य अनिवार्यतः अंतरानुशासनिक है और यह साहित्य के लिए एक बहुत लचीली परिभाषा गढ़ता है. विश्व साहित्य की यह गैर सापेक्षता वादी अंर्तसांस्कृतिक परियोजना इस बात का सूचक है कि हमें गहरे पूर्वाग्रहों को भूलकर सोचने के नए तरीकों को सीखना होगा जिससे साहित्य के विवेचन-विश्लेषण की तमाम रूढि़यों से साहित्य-मुक्त हो जाएगा. मैंने “विश्व साहित्य” को उद्धरण चिह्नों के बीच में रखा है जो संकेत करता है कि यह किसी अच्छे नारे की तरह ही हो सकता है उस बेहतर भविष्य की कल्पना में उपयोगी जिसकी हम चाह करते हैं लेकिन उसे पुरी तरह कल्पित नहीं किया. और यह भविष्य केवल साहित्यिक नहीं राजनीतिक और सामाजिक आदर्शों से भी गढ़ा जाएगा. “दूसरी दुनिया संभव है” या “हम निन्यावे प्रतिशत है” जैसे अच्छे नारे  दिशा का सामान्य बोध  में मदद कर सकते हैं.  

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