आज़ादी विशेषांक / Freedom Special

अंक 13 / Issue 13

रामू को जाली के पार से देखते हुए: तेजी ग्रोवर

१.

उसी दिन, रामू,
भरी सड़क के बीचों-बीच
दो गिरगिट प्रेम कर रहे थे

वध्य हो चला था पृथ्वी का हर कण

हम भी कोई दवा
या किताब ढूँढ़ते हुए
डर रहे थे अन्त से

उसी दिन, रामू,
तुमसे खुल नहीं पाया था द्वार

शुभ्र तुम्हारी वाणी का तेज
पूरे जीवन का अर्जित निष्कलुष आत्मतत्त्व
भीतर ही तड़प रहा था सदेह

उसी दिन, रामू,
कुछ अपथ्य खा रही थी
मेरी गली में घूमती हुई गाय।

२.

तुमने किताब भी लिखी, रामू,
तो छोड़ दिया उसे

इसी तरह एक-एक कर तुम्हारे कमरे की हर चीज़

किसी पुल पर खड़े
तुम कैसे किसी फ़िल्म की तरह
हमें दिखाते थे जीवन के चलते हुए कण
और कुछ विचित्र से अर्थों से भरते हुए
एकदम ख़ाली कर देते थे

वह कऊआ
जो तुमसे शादी करना चाहता था,
तुमसे या फिर किसी स्वीडी कवि से?

और उस कमरे की वह छत, रामू,
जहाँ तड़प रहा होता था
तुम्हारी आत्मा का तत्त्व
जब तुम चीज़ों से विदा माँगते थे

फिर एक दिन
दो एक दिन के लिए
तुमने अपनी लिखी हुई एक किताब
मुझसे माँगी थी

३.

किसी ने –
शायद तुम्हारे भाई ने-
एक दिन
तुम्हारे तकिये के नीचे
कुछ पैसा छोड़ दिया था
तुम्हारे इलाज के लिए

कैसे तुम हाथ में पैसा लिये
गली में उसके पीछे भागे थे, रामू

कैसे तुम
आसमान को देखा करते थे
ख़ाली हाथों को बाँधे …

और वे पेटभरी बिल्लियाँ
जो तुम्हारे पाँव में बैठी रहती थीं

४.

तुम मेरी उस कविता पर बात कर रहे थे
जिसमें एक स्वप्न के आईने में
बाबू की शक्ल
मेरे भाई जैसी थी

तुमने कहा था
“जब कोई प्रेम टूटता है
वह तुम्हारा भाई ही होता है,
तुम याद करो-
आईने में वह चेहरा
तुम्हारे भाई जैसा था
या तुम्हारा भाई था?”

७.

लिखना
एक रक्त-प्लावित पंक्ति को
जैसा कि मुझे लगता था,
उन कुछ क्षणों में जब मुझे प्रेम था तुमसे
और तुम्हें मुझसे-
उस क्षण के पार जाने की राह था
जो हम सह नहीं पाते थे, रामू,

फर तुम दिखा देते थे
कि किस तरह
किसी किताब तक को अलग कर देना होता है ख़ुद से
कैसे किसी रंग और राग के पार
धीरे से बैठ जाया करते हैं आसमान के भरोसे
और कैसे साफ़ हो जाता है मन!

और कैसे एक दिन
मेले में घूमते हुए
गरम-गरम चाय लेकर
अपने बाबा की मूर्ति के नीचे बैठ गये थे तुम
कैसे सुड़क रहे थे, रामू,
है न, कितना अच्छा दिन था वह-
कैसे मैं सबको बताती फिरती थी !

८.

एक बार तुमने कहा था
अब फिर खो दिया है तुमने एक प्रेम
बहुत समय तक अब ख़ाली ही रखना अपना मन
बहुत धैर्य से दो ढाई वर्ष तक सोचना
और सहना

मैं यहाँ तुम्हारे शब्दों को लिखती हुई नहीं बैठी, रामू,
तुम्हारे शब्द नहीं रहते मेरे पास
सिर्फ़ तुम्हारा शब्द और ख़ाली तुम्हारे हाथ
और आसमान से
निशब्द वार्तालाप करती हुईं धुली तुम्हारी आँखें

तुम्हारी गली की वे बिल्लियाँ
जो तुम्हारी मेज़ पर चढ़कर तुम्हारी ओर ताकती थीं

तुम्हारी वह स्वप्न में डूबी हुई सी छब, रामू,
जिसे मैं जाली के इस ओर से देखकर
लौट जाती थी, बिना तुमसे मिले !

९.

कितने दिन, रामू
तुम काटते बैठे रहे थे अपने घर
रंगीन काग़ज़ों की चिप्पियाँ
और ढाँपते रह गये थे अगले कुछ दिन
अपनी दीवारों में फैलती हुई सीलन

कैसा जगमगा उठा था वह कमरा, रामू,
कि चाहता तो सुस्ता सकता था वहाँ
एक कमरे की सीलन से डसा हुआ
उन्नीसवीं सदी का कोई रूसी किरदार

और वे छिपकलियाँ, रामू,
जिन्हें तुम अलग-अलग चीन्हते थे
अपनी नानी या दादी की तरह
अब रंग-बिरंगी चिप्पियों पर
विहार करती थीं

चाय की वह केतली
कैसा रूप निखर आया था उसका
जिसे तुम बाथरूम में रखकर चाय बनाते थे

फिर जब तुम रुष्ट हो जाते थे, रामू,
जब क्रोध खरोंच देता था तुम्हारी भवों को
तब दीवार पर घूमती हुई
तुम्हारी कोई पुरखा नानी या दादी
तुम्हें लुभा ले जाती थी अपने लोक में

१०

उन क्षणों में
क्या हो जाती थी तुम्हारी करुणा
जब लगने लगता था तुम्हें
“कि क्षमा के भी योग्य नहीं है मनुष्य”
और बिलख रहा होता था तुम्हारा अन्तस
प्राणियों की अक्षम्य पीड़ा से

तुम किसी श्वान की तरह स्वर्ग तक छोड़ आने को राज़ी थे उसे
जो पृथ्वी के किसी काम का नहीं था

फिर भी तीन वर्ष से मूर्छा में पड़े हुए मंजीत के लिए
प्यार भेजा था तुमने

और क्षमा कर दिया था मुझे
जब तुम्हारा व्याख्यान सुनते हुए एक दिन
मैं खुले मुँह भरी सभा में सो गयी थी, रामू !

१२.

रुस्तम जब बीमार थे, रामू,
तो उन्हीं दिनों मैंने देखा
आप सफ़ेद चादर में लिपटे हुए
एक हौद में लेटे हैं,
रुस्तम और उदयन
दोनों ओर बैठे हैं
और कर्पूर की टिकिया से
चादर की मालिश कर रहे हैं।

मैं पूछती हूँ, रामू?
वे कहते हैं, हाँ,
हम उन्हें वापस बुला रहे हैं,

मैं देखती हूँ, रामू,
कि कुछ ही देर में
मुस्कुराते हुए उठ कर बैठ जाते हैं आप
और कि आपका चेहरा रुस्तम का है
दाढ़ी इतनी श्वेत भी नहीं है

और श्वेत दाढ़ी के रुस्तम को देख
कितने प्रेम से मुस्कुरा रहे हैं आप!

१३.

तुम्हारे जाने के कुछ ही दिन बाद
पृथ्वी के किसी सुदूर कोने पर
पृथ्वी से कई मंज़िल ऊपर
टायलेट में पड़ी सीट के छिद्र से
एक अजगर सरक कर बाहर निकल रहा था

अगर खुल भी जाता तुमसे उस रात
उस कठिन से कक्ष का द्वार

तो बाहर ऐसा कुछ भी नहीं था, रामू,
जो तुम्हें बचा सकता था

१४.

जब कुमुदिनियों से भरा हुआ था वह कुण्ड
लाल मछलियाँ धूप भरे जल में घूम रही होती थीं
और बाँस के पत्तों से छने हुए धूप के चकत्ते
सैर करते दिख जाया करते थे
तुम्हारी नींबू की चाय में

तुम बैठे होते थे वहाँ, जहाँ रोज़ बैठने आते थे तुम
पृथ्वी के उस टुकड़े और आसमान की उस धुँआसी नीलाई में
अपनी देह-यष्टि को टिकाये –
चौकीदार रामू, जैसा तुम ख़ुद के बारे में कहते थे।

१५.

बैंत की कुर्सी डाले, रामू,
मच्छरों से भरी हुई उस हरीकच्च ज़मीन पर
भरीपूरी कामकाजी दुनिया के बीचों-बीच
अपने ख़ाली क्षणों को हमें दिखाते
हर रोज़ समय के ठीक उन्हीं क्षणों में
बैठे रहा करते थे तुम

माली की नातिन आकर घेर लेती थी तुम्हें
और बाज़ी मार ले जाती थी तुम्हारे कवि मित्रों से
जो दूर से देखते रह जाते थे तुम्हें।

१६.

पता नहीं यह कैसे हुआ रामू-
आउशविट्ज की उस पटड़ी पर
रेल के डिब्बों से उतरते हुए यहूदियों के बीच
मैं आँख मीचे तुम्हें देख रही हूँ
अब जहाँ गुलाब के गुलदस्ते बिछे रहते हैं
और पार्श्व में चमक रही है विस्ला नदी
जिसमें शवगृहों की राख उँड़ेल रहे है शिविर के डोम …

फिर मेरी आँख के पर्दे पर ही तुम्हारी आवाज़ आती है मुझेः

“आश्चर्य मत करना कि यह सब कोई कैसे कर सकता था
हम में से कोई भी
कुछ भी कर सकता है
किसी भी क्षण ”

और पटड़ी पर झुक कर एक गुलाब उठा लेते हो तुम

तभी मेरे कमरे में बिना दस्तक दिये
सिल्वी चली आती है, रामू,
वैसा ही नदी-प्रेम, जैसी कि वह है, तुम्हारी तरह का निष्कलुष आत्मतत्त्व
बात करते हुए वह रोने लगी थी
उसे हर रोज़ पहले से भी कहीं अधिक सुन्दर
और प्यारे लोग मिलते चले जाते हैं, कभी नौ तो कभी दस
डूब में आती हुई नर्मदा की घाटी में !

मैं निराश नहीं हूँ
वह कहती हुई गयी थी मेरे घर से।

१७.

वे ख़ाली क्षण तुम्हारे, रामू, जिन्हें हम दूर से देखते थे
गिलहरी की गन्ध से भरे हुए थे
वही जो तुमसे कुछ खाने को माँगती थी
टुकुर टुकुर ताकती हुई तुम्हें

तुम्हारी गली की बिल्लियाँ भी
जो तुम्हारी मेज़ पर बैठी देखती थीं तुम्हें

और हम जो टेक लेने आते थे
टुकुर टुकुर ताक सकते थे तुम्हें
जाली के पार से

मच्छर काट कर चले गये थे एक दिन तुम्हें बुखार में छोड़कर
और कैसे तुम अपनी देह में उनका अंश महसूस करते रहे
किस किस चीज़ के लिए कृतज्ञ हो जाते थे, रामू!

१८.

अब जबकि सत्रह बार, रामू,
मैं तुम्हें जाली के पार से देख रही हूँ
मैं लिख सकती हूँ इसे
अट्ठहारवीं कविता की जगह

उसी रात, मेरे राम जियो,
तुमसे बहुत दूर
पृथ्वी के एक सुदूर कोने में
एक लिफ्ट थी रामू, जो मुझसे खुल नहीं रही थी
और भीतर तड़प रहा था मेरी आत्मा का तत्त्व

वे ठण्डी निर्जीव चीजें जिन्हें हम कभी सीख नहीं पाये, रामू
और नीली पड़ गयी थी दाहिने हाथ की तुम्हारी तर्जनी
अन्तिम क्षणों से जूझते हुए

उसी रात, रामू, ठीक वही क्षण रहे होंगे
वह किवाड़ जो तुमसे खुल नहीं रहा था –
तुम खोल रहे थे क्या मेरे लिए
पृथ्वी के एक सुदूर कोने में

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