आज़ादी विशेषांक / Freedom Special

अंक 13 / Issue 13

मार्च २००९ / March 2009

एक नये पीड़ित के सम्मुख

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एक संकेत के रूप में ‘आतंक’ को,उसके ‘अर्थ’ को, संभवतः, ‘हमारे समय’ में, उसे धारण और अतिव्याप्त करने वाले प्रत्यय (“वाद”) के संसर्ग से ही, संकेतन से ही समझा जा सकता है और उस पर कोई भी (प्र-)वचन सदैव उस संकेतन या संसर्ग की विधि से, उसके कूटों में ही संभव है; कि वह एक ‘वाद’, ‘एक अनुष्ठान’, एक नज़ारा (Spectacle), एक ‘संघटना’, एक ‘प्रति-वचन’ ‘प्रति-शोध’ है – यह वो प्रदत्त सिमेण्टिक पर्यावरण है जिसमें ही आतंक के बारे में कुछ (भी) कहा जा सकना संभव है मानो. समूचा ‘विमर्श’ एक कर्ता- विमर्श है; जो इस कर्म के लक्ष्य हैं वे इसमें या नहीं हैं, या अदृश्य हैं, मौन हैं या ‘सज्जा’ हैं – एक बलात् विषयांतर. वे ‘त्रासदी’ की वर्षगांठों के अनुष्ठान में अंकित हो गये हैं.

आतंक और प्रति-आतंक का वर्तमान, मुख्यधारा विमर्श,

1. एक अनुभव और एक अवधारणा के रूप में आतंक के समूचे अर्थ को ‘आतंकवाद’ में निश्शेष करता है; और ‘इसीलिये’ वह इस अनुभव के अन्य अर्थों, संकेतनों जिनमें इस अनुभव का ‘इतिहास’ भी शामिल है को ‘निष्प्रभावी’ करने का प्रयत्न करता है; वह ‘एसर्ट’ करता है कि आतंक(वाद) से पूर्व ‘आतंक’ का कोई इतिहास नहीं है. कि ‘आतंकवाद’ से ‘नियमित’ अर्थों के अलावा, उनसे परे इसके कोई ‘अर्थ’ नहीं हैं.

2. आतंक को निष्पादित करने वालों, उसे अंजाम देने वालों का विमर्श है – उसके ‘विक्टिम’ का नहीं.

बम धमाकों और सीरियल ब्लास्ट्स के साथ हम मनुष्य के इतिहास में एक नये चरण में प्रवेश कर गये है, हम एक सर्वथा नये विक्टिम के सम्मुख हैं – एक ऐसा मनुष्य जो अपनी चमड़ी के रंग, राष्ट्रीयता, घार्मिक/ जातीय/लैंगिक पहचान या सम्पत्ति या उसके अभाव के कारण नहीं बल्कि सिर्फ़ इसलिये एक विक्टिम है कि वो एक स्थान-विशेष पर, समय-विशेष के लिये उपस्थित था. इस विक्टिम को, उसकी अनूठी ‘अवस्थिति’ को उस पूरे विमर्श में केन्द्रीय बनाने का अर्थ होगाः इसका प्रतिशोध संभव नहीं है, यदि यह एक ‘रैन्डम हिंसा’ है तो प्रति-हिंसा को ‘उचित’, ‘न्यायोचित’ बना पाना बहुत मुश्किल है. ऐसी हिंसा को, जिसकी कोई नस्लीय/धार्मिक/जातीय/लैंगिक/विचारधारात्मक/वर्गीय वरीयताएँ नहीं है वह हमें सबसे विचित्र असमंजस में डालती है- बिना ऐसी स्पष्ट वरीयताओं के राजनीतिक कर्म, एक्टीविज्म, प्रतिशोध असंभव है और संभवतः इसे ‘रेशनलाइज’ करने की व्यग्रता में ही इसे ‘राष्ट्र’, ‘समूची मानवता’ जैसी अमूर्तताओं के ‘विरुद्ध’ ठहराया जाता है.

यह अंक आतंक के विमर्श में, उसके सार्वजनिक, मुख्यधारा वचन में इस सर्वथा नये विक्टिम की ‘त्रासदी’ को, उसकी ‘अनुपस्थिति’, उसके ‘मौन’, उसकी आवाज़ को सुनने-पढ़ने की एक छोटी-सी, कई तरह से अपर्याप्त कोशिश है.

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खुद इस विमर्श के भीतर यह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ‘सभ्यताओं का टकराव’ (Clash of Civilizations) है – किंतु सौभाग्य से इसे एक ‘सभ्यता के भीतर टकराव’ (Clashes with in a Civilization) – एक व्यक्ति/ समुदाय/संस्कृति के ‘हिंसक आत्म’ और ‘अहिंसक आत्म’ के बीच टकराव – की तरह पढ़ने-विश्लेषित करने की कोशिशें भी हुई हैं. (हमारा ईशारा मुख्यतः आशीष नंदी के काम की ओर है।)

इस अंक की कुछ सामग्री को भी ऐसी एक कोशिश की तरह पढ़ा जा सकता है.

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प्रतिलिपि का पहला अंक 2 अप्रैल 2008 को रिलीज हुआ था और यह पहला वार्षिकांक 2 अप्रैल 2009 को रिलीज हो रहा है. हम लेखकों/पाठकों/मित्रों के सहयोग और उत्साहवर्धन के लिये शुक्रगुज़ार हैं. संदेहों, बल्कि उच्च-कोटि के संदेहवाद की, कोई कमी नहीं थी – पत्रिका के नाम से लेकर उसकी ‘लाईफ एक्सपेक्टेन्सी’ सब के बारेमें. हमारी तैयारी अब भी सिर्फ एक अंक भर होती है, संसाधन अब भी उतने ही हैं (हमारा कुल वार्षिक विज्ञापन राजस्व तीन हज़ार रूपये है) किंतु कुछ मित्र हैं जो हम तीनों की ही तरह इसके ‘संसाधन’ हो गये हैं – तेजी ग्रोवर, सुधीर चंद्र, गीतांजलि श्री, और इस अंक के साथ, आलोक भल्ला. उनका शुक्रिया कैसे करें?

हम गुलज़ार, सुकृता पॉल कुमार, देवयानी, आरूणी कश्यप, नंदिता दास और व्योमेश शुक्ल के शुक्रगुजार हैं – इन सब मित्रों के सहयोग के बिना यह वार्षिकांक संभव नहीं होता. अंतिम आभार विष्णु खरे का जिन्होंने एस्टोनियन कवियों हैसो क्रुल और कैरोलिना से हमारा परिचय कराया.

Before a New Victim

1

The sign of terror and its ‘meaning’ are not readable in ‘our times’ except with the suffix ‘ism’ that has ‘effectively’ taken it over. Any discourse on terror is possible only when dictated by that suffix and its controlled significations/codes, and that terror is an ‘ism’, is a ‘ritual’, a ‘spectacle’, a ‘phenomenon’, a counter-discourse, a revenge – this is the given semantic environment in which saying some/anything about terror seems to possible. It’s the discourse of the doer. Those who are its target(s) are either not there, or invisible, or mute, or (at worst) an ‘exhibit’ – a forced digression. The victims are the permanent showpieces in the rituals of ‘tragedy’.

The present mainstream discourse of terror and counter-terror:

1. Reduces the whole significance of terror as an experience and as a concept into ‘terrorism’ and that’s why it tries to render all other manifestations of terror, including its history, ineffective. It asserts that, before terrorism, terror has no history. That, except those dictated by the ‘ism’, it has no other ‘meanings’.

2 Is entirely a discourse of/about those who ‘perform’ it – not of those who suffer from it.

With bombings and serial blasts, we have entered a unique phase in human history. We are confronting a completely new, unprecedented kind of victim who is victimized not for his/her gender, color, caste, nationality, identity, ideology, property, wealth or lack of it. Instead, this is a victim who is victimized only because s/he happened to be there at a particular place at a particular time. Making this victim and his/her unique situation central to the terror-discourse would mean that it cannot be avenged. If violence is ‘random’, counter-violence cannot be justified. Violence that has no ethnic/racial/ideological or caste/gender/nationality/class specific preferences is problematic because no political remedy, activism, revenge is possible without such clearly defined preferences. And this is perhaps why, in a desperate attempt to rationalize such violence, it is attributed to be ‘against’ abstractions like ‘the nation’ or ‘the whole of humanity’.

This issue of Pratilipi is a humble and, in many ways, inadequate effort to listen to the ‘tragedy’ of this unique victim and his/her absence or silence in the mainstream discourse on terror.

2

Openly or discreetly, it’s a clash of civilizations for the mainstream discourse. But fortunately, it has also been read/analyzed as ‘clashes within a civilization’ – as a clash between the ‘violent’ and the ‘non-violent’ selves of a person/community/culture. (We mostly have Ashis Nandy’s works in mind)

Some pieces in this issue can also be read as an attempt of this kind.

3

Pratilipi’s first issue came out on 2nd April 2008, and this anniversary issue on 2nd April 2009. We are grateful to our writers/readers/friends for their help, support and encouragement. There was no shortage of doubts, no shortage indeed, of the highest-quality skepticism – from the name of magazine to the matter of its ‘life expectancy’.

Our preparation still extends only to the next issue; our resources, too, have not increased. (We earned a grand total of Rs. 3000 from advertisements last year.) But we have friends who, like the three of us, have become ‘resources’ – Teji Grover, Sudhir Chandra, Geetanjali Shree, and now Alok Bhalla. How can we even begin to thank them?

We are also grateful to Gulzar, Sukrita Paul Kumar, Devyani, Aruni Kashyap, Nandita Das and Vyomesh Shukla – without their cooperation, this anniversary issue would not have been possible. Last, but not the least, our thanks to Vishnu Khare who introduced us to the Estonian poets Hasso Krull and Carolina Pihelgas.

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