आज़ादी विशेषांक / Freedom Special

अंक 13 / Issue 13

सितम्बर २००९ / September 2009

अनुवाद, और हिंसा

अनुवाद और मूल के बीच कुछ वैसी नैतिक, भावात्मक हॉयरार्की रही है जैसी आत्म और अन्य, स्वदेश और परदेश के बीच रही है. इसे पलटकर अनुवाद के पक्ष में हुआ जा सकता है लेकिन उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के लम्बे सिलसिले के बाद यह कह पाना कठिन है कि अनुवाद सदैव एक ‘मानवतावादी’ कर्म है; शायद उसके आत्म-छल उतने ही उजागर हैं जितने स्वयं मानवतावाद के. अनुवाद, जैसा बहुत सारे अध्ययनों ने सिद्ध किया है, अन्य को अभिव्यक्त करने की बजाय उसे अनूकूलित और नियंत्रित करने और अंततः उसका ‘मनचाहा प्रतिनिधि’ बनने की सुव्यवस्थित परियोजनाओं का सबसे महत्वपूर्ण उपकरण रहा है.

लेकिन इसके बावजूद अनुवाद में उम्मीद रहती है. यहाँ हम हर कृतत्व को अमौलिक मानने वाली संस्कृत परंपरा और हर ‘ऑरिजिनरी वृतांत’ को संदेह से देखने वाले उत्तर-संरचनावादियों के साथ साथ बोर्खेज़ जैसे लेखकों का भी स्मरण कर सकते हैं जिन्होंने ‘मूल’ और ‘अनुवाद’, ‘मौलिक’ और ‘अमौलिक’ की पारस्परिक तथाकथित-ता को न सिर्फ विसर्जित कर दिया, लगभग ‘बेमानी’ बना दिया. अनुवाद के बारे में यह नज़र ‘आत्म’ की किसी भी परिभाषा के लिये शायद उतनी ही जरूरी है जितनी अपने मूल(=जड़ों?) के बारे में कोई भी नज़र.

इस अंक की शीर्ष कथा आत्म और उसके अनुवाद प्रतिलिपि के लिये अपने होने की एक नितांत दैनिक और व्यावहारिक समस्या है. इस पत्रिका का जो भी आत्म है वह कई अनूदित और तथाकथित ‘मूल’ पाठों/आत्मों से बना है जिनमें परस्पर कोई एकरूपता या समरसता न है ना काम्य है.

उम्मीद है संवाद की कुछ संभावनाएँ जरूर बनी हैं.

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माओवादियों के विरुद्ध भारतीय सरकार का “ऑपरेशन ग्रीन हंट” (स्वयं यह नामकरण जीवन के पर्याय ‘हरे’ के अभिप्रायों के साथ एक तरह की हिंसा है और परमाणु शक्ति का संकेत बना दिये गये ‘बुद्ध मुस्कुराये’ की याद दिलाता है जिसमें अहिंसा के प्रेरक प्रतीक बुद्ध को हिंसा के संकेत में बदल दिया गया था) शुरू होने के साथ यह बहस और तीव्र हो रही है कि राज्य की हिंसा और राज्य के विरूद्ध हिंसा में से कौनसी हिंसा ‘जायज़’ है? आधुनिक राष्ट्र राज्य (उसका औपचारिक, फंक्शनल रूप चाहे कुछ भी हो) राज्य द्वारा हिंसा के मोनोपोलीकरण के बिना संभव नहीं है और कम-से-कम इस अर्थ में पूर्व-आधुनिक राजतंत्रों से बहुत भिन्न नहीं है. हिन्दी कवि आलोकधन्वा ने 1972 में पूछा थाः

आदमीयत को जीवित रखने के लिए अगर
एक दरोग़ा को गोली दागने का अधिकार है
तो मुझे क्यों नहीं?

हिंसा/प्रतिहिंसा के तर्क अब भी, और सदैव, वही हैं. हिंसा/प्रतिहिंसा से मुक्त कोई यूटोपिया तो शायद संभव है, ‘व्यवस्था’ नहीं. यह कविता हिंसा पर राज्य के एकाधिकार को प्रश्नांकित करती है. ‘आदमीयत को जीवित’ रखने का गोली दागने के अलावा कोई और तरीका नहीं है, किसी के भी पास?

इस पूरे तर्क में जो एक चीज़ निर्विवाद है वह है हिंसा का औचित्य. दोनों पक्षों के लिये. दोनों की हिंसा, खुद उनके अनुसार, ‘मूल’ नहीं ‘अनुवाद’ है, हिंसा नहीं, प्रतिहिंसा है. यदि आधुनिक राष्ट्र राज्य हिंसा का मोनोपोलीकरण ‘हिंसा’ को नियंत्रित करने के लिये, ‘विधि-सम्मत’/ ‘उचित’ हिंसा और ‘बिधि-विरूद्ध’/‘अनुचित’ हिंसा के बीच अंतर निश्चित करने के लिये करता है तो पिछले सौ बरस में, पूरे संसार में, वह ऐसा कर पाने में अक्सर असफल रहा है. यह नैतिकता में शक्ति के नहीं, शक्ति में नैतिकता के विलय, विलोप की कहानी रही है.

अहिंसा की संभावना से भी वंचित इस परिदृश्य में, 1997 में आलोकधन्वा के ही लिखी हुई एक दूसरी कविता याद आती हैः

जब भगत सिंह फाँसी के तख्ते की ओर बढ़े
तो अहिंसा ही थी
उनका सबसे मुश्किल सरोकार

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इस अंक को तैयार करने में प्रतिलिपि के अभिन्न मित्रों तेजी ग्रोवर, प्रेमचंद गाँधी और प्रभात रंजन से मिली मदद के लिये हम उनके शुक्रगुज़ार हैं.

Translation and Violence

Between the original and the translation exists the same sort of ethical, emotional hierarchy that exists between the self and the other, between home and abroad. One could turn this in favor of translation, but after long periods of colonialism and imperialism, it becomes hard to say that translation has always been a “humanitarian” task; its self-delusions are perhaps as transparent as those of humanitarianism. Translation, as many studies have proved, has been one of the prime tools in the organized programs of conditioning and controlling the other and of ultimately becoming its “representative”, instead of being a mode of expressing the other.

But despite this, there is always some hope in translation. Here we should recall not only the Sanskrit tradition of regarding every creation as un-original, and the post-structuralists who viewed “originary” narratives with suspicion, but also writers like Borges who not only dissolved the mutual so-called-ness between “original” and “translation”, between “original” and “un-original”, but made it almost irrelevant. This view of translation is probably as important to any definition of the “self” as any view on one’s origins.

The lead story in this issue, “The Self and Its Translations”, is the story of Pratilipi. Whatever self this magazine has, is made of up many translated and supposedly “original” texts/selves, which don’t have, nor should have, much in common.

One hopes this can initiate some sort of dialogue.

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After the Indian Government’s launch of “Operation Green Hunt” (the nomenclature itself is a kind of violence against the symbolic meanings of “green” and reminds one of the time when the phrase “Buddha Smiles” was turned into a euphemism for the nuclear tests…) the argument has intensified on what is more acceptable – the State’s violence, or violence against the State? The modern nation-state (whatever its official, functional manifestation may be) is not possible without the monopolization of violence by the State and, at least in this sense, is not too different from pre-modern states. The Hindi poet Alok Dhanva had written in 1972:

if a constable has the right to fire a bullet
to save humanity
why don’t I?

The logic behind violence/counter-violence has always been the same. One could imagine a Utopia without violence/counter-violence, but no ‘system’. This poem questioned the State’s right to a monopoly over violence. Does no one have a better way to “save humanity” than firing bullets?

In all this, the one thing that has been beyond debate is the appropriateness of violence. For both sides. For both, their violence is not the “original”, but a “translation”. Not violence, but counter-violence. If the modern nation-state monopolizes violence in order to control it, to decide between “legal” / “proper” and “illegal” / “improper” violence, then it has often, the world over, in the past 100 years, been unsuccessful in doing so. This is not the story of power submitting to the ethical, but the other way round.

In a time that is bereft of even the possibility of non-violence, Alok Dhanva’s 1997 poem comes to mind:

when Bhagat Singh stepped to the scaffold
it was non-violence
which was his toughest task

3

We thank our friends Teji Grover, Prem Chand Gandhi and Prabhat Ranjan for their help in preparing this issue of Pratilipi.

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