आज़ादी विशेषांक / Freedom Special

अंक 13 / Issue 13

बाबेल से पहले / Before Babel

1.

पिछले अंक में, मुख्य थीम ‘साहित्य और इतिहास’ पर बात करते हुए हमने, जानबूझकर भारतीय=औपनिवेशिक/उत्तर-औपनिवेशिक परिप्रेक्ष्य में अनुवाद की समस्यात्मकता को संबोधित नहीं किया था. खतरा साफ़ था/है: इस परिप्रेक्ष्य में कोई नई पोजिशन लेना सम्भव नहीं है.

यह कहने के लिए, कम से कम अब, किसी लंबे-चौडे शोध की ज़रूरत नहीं है कि अनुवाद, औपनिवेशिक परिप्रेक्ष्य में एक नृशास्त्रीय फलन थे और वे उपनिवेशिकृत को एक वांछित अन्य के रूप में निर्मित किए जाने में सहायक थे. एक उत्तर-औपनिवेशिक अनुवादक इस सब के प्रति सजग चाहे जितना हो, इससे अधिक कुछ नहीं कर सकता/ती कि जितनी बार और जितनी शक्ति से हो सके यह दोहराए कि वह इससे वाकिफ़ है कि अनुवादक के मन्तवव्य से निरपेक्ष, अनुवाद को कैसे ‘अवस्थित’ किया जाता है.

यद्यपि, जैसा डी.आर.नागराज अक्सर करते थे, वह अनुवादक उन सरंचनाओं से परे जाने की कोशिश कर सकता है जो औपनिवेशिक शक्तियों की पूर्ण विजय की धारणा पर आधारित हैं; और औपनिवेशिक और उपनिवेशीकृत के मध्य परस्पर रूपान्तरण की संभावनाओं के लिए अपनी दृष्टि को खुला रख सकता है. यह उसे देशजतावादी/पुनरुत्थानवादी वाग्ज़ाल के साथ साथ राजनीतिक ‘करेक्टनेस’ की उस तात्कालिकता से भी किसी हद तक बचा सकता है जो अनुवाद को ‘प्रतिरोध की पीठ’ बनाने के अभियान में खुद पाठ को ही फ़साने से गायब कर देती है.

उत्तर-औपनिवेशिक थियरी के दायरे में होने वाले सैद्धान्तीकरण उस हद तक ‘अनूदित पाठ’ पर निर्भर करते हैं कि ख़ुद पाठ की आवाज़ को अनसुना कर देते हैं. वे कोशिशें भी जो उत्तर-सरंचानावादी अंतर्दृष्टि का उपयोग उत्तर औपनिवेशिक राजनितिक प्रश्नों को हल करने में करना चाहती है, इसी तरह के सैद्धान्तीकरण का उदाहरण हैं जो, दुर्भाग्य से, ख़ुद ‘अनुवाद में ही सम्भव हैं’.

अनुवाद के मामले में, किसी भी तरह बात की जाय, ‘थियरी’ कुछ ज्यादा ही मंडराती है.

2.

आईये सुनें भारत के सबसे ‘महत्वपूर्ण अनुवादकों’ में से एक आलोक भल्ला क्या कहने का प्रयत्न कर रहे हैं –

मैंने अनुवाद की ‘कला’ और अनुवाद के ‘सिद्दांतों’ का घालमेल करने से हमेशा इंकार किया है. अनुवाद के सिद्दांतकार हमेशा इतने उदार नहीं होते. प्रायः वे विधि-निषेध बनाने वालों जैसा सख्त लहजा अख्तियार कर लेते हैं जिनके लिये अनुवादक सदैव एक अपराधी होता है, जिसका अपराध मूल पाठ के अर्थ का उदघाटन, विरूपण, व्याख्या, संशोधन, विस्तार, विनाश, स्पष्टीकरण, दूषण, तर्क-विनियोजन, कामविषयन, सरलीकरण, स्थगन, उदात्तीकरण, पुनर्लेखन, देशीकरण, विचित्रीकरण, स्त्रीकरण, घरेलूकरण, अल्पसंख्यककीरण, अन्यदेशीकरण, शोषण, उपनिवेशीकरण, उप-संस्करण, अप-प्रस्तुतिकरण करना या नहीं करना होता है; वैसे उनके कोड़ो की फटकार में और भी प्रताड़नाएँ होती हैं. वे अपरिहार्य रूप से किसी भाषा या संस्कृति के आदिम गौरव के ‘मूल’ के अनूदित न हो पाने की असंभावना के बारे में बोलते हैं. मेरा मानना है कि एक अनुवादक को न प्रचलित सत्ता-विमर्शों का बोझ ढोने की जरूरत होती है और न अपने को संस्कृति की मसीहाई आवाज़ मानने की. मेरी बात में थियरी की मेलोड्रामाई टंकार चाहे न हो, पर मुझे कुछ जोर देकर कहने दीजिये कि, एक अनुवादक के लिये किसी दूसरी भाषा की कल्पना कर सकना और इस तरह रहने और होने के दूसरे रूपों की कल्पना कर सकना संभव होता है; कि एक अनुवादक के लिये उन दूसरों से बात कर सकना संभव होता है जो यह समझते हैं कि कैसे हम उनसे बात करते हुए ‘मनुष्य’ होते हैं जिनके ‘मनुष्य’ होने का ढंग, ‘मनुष्य’ होने के हमारे ढंग से पूरी तरह भिन्न होता है. बौद्धिक विश्व-नागरिकता का मेरा अपना दावा (जो मुझे सांप्रदायिक अहमन्यता और अस्मिता राजनीति की सर्वनाशी सांघातिकता के इस दौर में बार-बार दोहराना पड़ता है) अनुवादकों की बिरादरी और उसके श्रम पर निर्भर करता है. जैसे कि मेरा यह दावा भी कि किसी अनुवादक के एक साहित्यिक पर्यावास का हिस्सा होने के लिये जरूरी है कि हम उन अहम तरीकों को समझें जिनसे अनुवाद सांस्कृतिक और नैतिक बहुलताओं के निर्माण में सहयोग करता है.

मूल पाठ के लय-विधान को, पदों को, सांस्कृतिक पूर्वमान्यताओं को, दार्शनिक या नैतिक पूर्वग्रहों को समझने के आलोचनात्मक उपकरण निर्मित करने के किसी सिद्दांतकार के काम और एक अनुवादक को प्रेरित करने वाले सरोकारों में मूलगामी भिन्नता होती है. कम से कम मेरे मामले में है. एक अनुवादक के लिये दो नैतिक या सौन्दर्यपरक दायित्वों को एक साथ, तत्क्षण पूरा करना अनिवार्य है. एक नयी कृति को रचते हुए यह अनिवार्य है कि अनूदित संस्करण मूल की अंतर्निष्ठा का सम्मान करे ताकि मूल के विजन को अनुवाद में उपलब्ध कराया जा सके. यह अनुवाद कर्म की न्यूनतम नैतिकता है. (मुझे अहसास है कि एक तरह का सरलमति, नैसर्गिक नॉस्टिलजिया इसमें लक्ष्य किया जा सकता है किंतु मैं उन सैद्धांतिक प्रलोभनों के बारे में भी खबरदार हूँ जिनके जरिये अनुवाद को ‘मूल’ की अवधारणा पर अविश्वास करने वाले हमारे संदेहत्रस्त, शंकालु समय का अंग बनाया जा सकता है.)

(“द आर्ट ऑफ़ पोएट्री ट्रांसलेशन“, पोएट्री इन्टरनेशनल वेब से, अनुवाद मेरा)

एक उत्तर-औपनिवेशिक अनुवादक के लिये शायद यह एक संभव मार्ग है कि वह इस ‘सरलमति, नैसर्गिक नॉस्टिलजिया’ को अपने भीतर बचा रहने दे, और जहाँ तक संभव हो न सिर्फ अपने समय के प्रचलित सत्ता विमर्शों के प्रति आलोचनात्मक बना रहे, ‘संस्कृति की मसीहाई आवाज़ होने का बोझ’ अपने ऊपर न लादे.

आज हमारी रक्षार्थ आये आलोक का बेहद शुक्रिया लेकिन इतना और कहने की ज़रूरत है कि भूमण्डलीकरण और मुक्त बाजार में अनुवाद के नये मध्यस्थ और नये संकेतक सक्रिय हो गये हैं और यह भी कि अभी अनुवादकों को अपने आशिकाना पागलपन के बदले में जो मिलता है उसके चलते आने वाले दिनों में उन्हें ‘इश्क का ये कारोबार’ छोडने से रोक लेने वाले, शायद, ये नये मध्यस्थ ही होंगे.

3.

सीरियल धमाके अब एक नये ईलाके में, भारत के छोटे शहरों/कस्बों में प्रवेश कर चुके हैं. उनके द्वारा लक्ष्य आतंक और उनके बारे में लगभग-प्रोग्रैम्ड प्रतिक्रियाओं के परिप्रेक्ष्य में हमारे जीवन और चित्त में ‘आतंक के अनुभव’ की पड़ताल करने की ज़रूरत और शिद्दत से महसूस होती है. इसे अंजाम देने वालों और इसके पीड़ितों, दोनों के भीतर पहले से मौज़ूद, एक सोये हुए आतंक की पूर्वमान्यता के बगैर आतंक एक कारवाई बल्कि एक विचारधारा के रूप में इतनी व्यापक और स्वीकृत संघटना नहीं बन सकता था. हम जल्दी ही इस थीम पर लेखन आमंत्रित करेंगे.

4.

इस अंक से हमने अपना दायरा सिनेमा, संगीत और पॉपुलर कला तक फैलाया है.

श्रीदला स्वामी भारतीय डॉक्यूमेंटरी सिनेमा पर लेखन की एक श्रृंखला का संयोजन इस अंक से आरंभ कर रही हैं. हर अंक में दो फिल्मकार विभिन्न मुद्दों पर लिखेंगे.

श्रीधर थायिल का संगीत, उसके बारे में उनका गद्य और तथा शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ पर दो युवा हिन्दी कवियों के समझदार गद्य से हम संगीत पर फोकस की शुरुआत कर रहे हैं.

एक अलग खंड, ‘लोक-प्रिय’ उन कला रूपों पर शुरु कर रहे हैं जिन्हें ‘पॉपुलर’ कहा जाता है. पहली पेशकश में है सारनाथ बनर्जी के चित्र-गल्प (ग्राफिक उपन्यास) द बार्न आऊल’स वंडरस केपर्स के अंश हिन्दी अनुवाद में; अशोक बैंकर की कहानी और श्रीधर थायिल का संगीत.

1.

Our last issue’s lead theme, Literature and History, deliberately did not address the problematic of translation in the Indian colonial/postcolonial context. The danger was/is that there is hardly any new position one can take.

That translations, in the colonial context, were an ethnographical invention and that they helped the colonist to create a desired “other” is something that, at least now, doesn’t need elaborate reasoning. The post-colonial translator, aware as s/he may be of all this, can do little except declaring as often and as forcefully as possible that s/he is aware of what translation, irrespective of intention, is taken to be.

However one can, as D.R. Nagraj often did, go beyond the frameworks that accept the theory of total conquest of the colonized, and keep looking for possibilities of mutual transformation between the colonized and the colonizer. This, to a certain extent, helps one avoid both the nativist trap and the urgency of political correctess that, in trying to relocate translation as a site of resistance, ends up ignoring the text in question.

Most theorizations about translation in the post-colonial framework depend upon the translated version, to the extent that the text in question is often not allowed to speak. The attempts that try to negotiate post-structuralist insight with post-colonial political demands are examples of theorizing that exist, sadly, only ‘in translation’.

Whatever one’s approach, when it comes to translation, theory is too much with us.

2.

Let’s listen to what one of the ‘most significant’ Indian translators, Alok Bhalla, is trying to say:

I have always refused to mingle the ‘art’ of translation with any of the ‘theories’ of translation. I think both have their protocols. Theorists of translation are not always so generous. Many a time they adopt the tone of stern law-givers for whom the translator is always a guilty thing who does or does not, must or must not reveal, deform, explain, improve, expand, rationalize, eroticize, clarify, infect, simplify, defer, ennoble, rewrite, nativize, destroy, exoticize, feminize, domesticate, minoritize, foreignize, impoverish, colonize, subvert or misrepresent the meaning of the original text – there are other spurs on their whips of flagellation (the poor translator is always at the receiving end). They inevitably speak about the impossibility of translating the ‘original’, the ‘primal’ glory of a culture or its language. I don’t believe that a translator is required to carry the ontological burden of our times or be the messianic voice of a civilization. Let me at least assert, even if my assertion does not have the melodramatic bass of the theory: It is possible for a translator to imagine another language and hence other forms of living and being; and, it is possible for a translator to speak to others who understand how we become ‘human’ when we find ourselves in conversation with others who have an utterly different way of ‘being human’ than we have. My own claim to intellectual cosmopolitanism (which I need to declare again and again for I live in the midst of sectarian arrogance and the genocidal virulence of identity politics) depends upon the labour of a community of translators, as does my claim that for a translator to be part of a literary habitat we need to understand the important ways in which translation contributes to the creation of cultural and moral pluralities.

If the task of the theorist is to craft critical tools so as to understand what may have determined the rhythms, phrases, cultural presuppositions, philosophic or moral preoccupations of the original text, the translator is guided by radically other considerations. Or, at least, I as a translator I am. A translator must fulfill two ethical or aesthetic tasks simultaneously. Even as a translator crafts a new work, the translated version must respect the integrity of the original so that the vision of the original is made available. This is a minimum ethic (I know this has a naive Edenic nostalgia attached to it, just as I am aware of the theoretical temptations to make translation part of our more suspicious and skeptical age which distrusts the power of all ‘originals’).

(From “The Art of Poetry Translation“, Poetry International Web.)

One of the ways out for a postcolonial translator is to keep some degree of this ‘naive Edenic nostalgia’ about the act of translation intact and to try and free herself/himself of the ‘ontological burden of our times’ or the equally dangerous burden of being ‘the messianic voice of a civilization’.

We must thank Alok for bailing us out. However, we perhaps need to add that translation has found new mediators and signifiers with globalization and the market economy. And that, perhaps, these mediators hold the key to keeping translators interested in this act which, given what they get in reward, remains more or less a labor of love.

3.

As serial blasts enter a new territory – the smaller towns of India – in the context of the terror they intend and the almost-programmed responses they invoke, we once again feel the need to probe the experience of terror in our lives and psyche. Terrorism, as an act or even as an ideology, could not have become a pervasive and accepted phenomenon without presupposing some kind of prevalent, sleeping terror in the minds of those who inflict it and those who suffer it. We’ll soon come up with a call for writings on this theme.

4.

With this issue we have ventured into music, cinema and popular art.

Sridala Swami is curating a series of writings on Indian documentary films. In each issue, two filmmakers will write about the various issues involved.

Some numbers by Sridhar/Thayil and a write-up along with brilliant pieces by two young Hindi poets on shehnai-legend Bismillah Khan inaugurate our focus on music.

A separate section, Lok-Priya (Hindi for ‘popular’, literally ‘something that is dear to the public’) is also a new addition. We begin with translated excerpts from Sarnath Banerjee’s graphic novel The Barn Owl’s Wondrous Capers, Ashok Banker’s short story and the Sridhar/Thayil songs.

As always, we had a great time doing this and are very grateful to our contributors and readers.

One comment
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  1. sampadkiya men aapne kai mahatvapurna sawaal anuvaad ko lekar uthaye hain. pratilipi ki gambhirata is foohar samay men prabhavit karti hai, hindi ka naya gambhir space banane ki disha men achhi koshish hai.
    prabhat

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बाबेल से पहले / Before Babel

1.

पिछले अंक में, मुख्य थीम ‘साहित्य और इतिहास’ पर बात करते हुए हमने, जानबूझकर भारतीय=औपनिवेशिक/उत्तर-औपनिवेशिक परिप्रेक्ष्य में अनुवाद की समस्यात्मकता को संबोधित नहीं किया था. खतरा साफ़ था/है: इस परिप्रेक्ष्य में कोई नई पोजिशन लेना सम्भव नहीं है.

यह कहने के लिए, कम से कम अब, किसी लंबे-चौडे शोध की ज़रूरत नहीं है कि अनुवाद, औपनिवेशिक परिप्रेक्ष्य में एक नृशास्त्रीय फलन थे और वे उपनिवेशिकृत को एक वांछित अन्य के रूप में निर्मित किए जाने में सहायक थे. एक उत्तर-औपनिवेशिक अनुवादक इस सब के प्रति सजग चाहे जितना हो, इससे अधिक कुछ नहीं कर सकता/ती कि जितनी बार और जितनी शक्ति से हो सके यह दोहराए कि वह इससे वाकिफ़ है कि अनुवादक के मन्तवव्य से निरपेक्ष, अनुवाद को कैसे ‘अवस्थित’ किया जाता है.

यद्यपि, जैसा डी.आर.नागराज अक्सर करते थे, वह अनुवादक उन सरंचनाओं से परे जाने की कोशिश कर सकता है जो औपनिवेशिक शक्तियों की पूर्ण विजय की धारणा पर आधारित हैं; और औपनिवेशिक और उपनिवेशीकृत के मध्य परस्पर रूपान्तरण की संभावनाओं के लिए अपनी दृष्टि को खुला रख सकता है. यह उसे देशजतावादी/पुनरुत्थानवादी वाग्ज़ाल के साथ साथ राजनीतिक ‘करेक्टनेस’ की उस तात्कालिकता से भी किसी हद तक बचा सकता है जो अनुवाद को ‘प्रतिरोध की पीठ’ बनाने के अभियान में खुद पाठ को ही फ़साने से गायब कर देती है.

उत्तर-औपनिवेशिक थियरी के दायरे में होने वाले सैद्धान्तीकरण उस हद तक ‘अनूदित पाठ’ पर निर्भर करते हैं कि ख़ुद पाठ की आवाज़ को अनसुना कर देते हैं. वे कोशिशें भी जो उत्तर-सरंचानावादी अंतर्दृष्टि का उपयोग उत्तर औपनिवेशिक राजनितिक प्रश्नों को हल करने में करना चाहती है, इसी तरह के सैद्धान्तीकरण का उदाहरण हैं जो, दुर्भाग्य से, ख़ुद ‘अनुवाद में ही सम्भव हैं’.

अनुवाद के मामले में, किसी भी तरह बात की जाय, ‘थियरी’ कुछ ज्यादा ही मंडराती है.

2.

आईये सुनें भारत के सबसे ‘महत्वपूर्ण अनुवादकों’ में से एक आलोक भल्ला क्या कहने का प्रयत्न कर रहे हैं –

मैंने अनुवाद की ‘कला’ और अनुवाद के ‘सिद्दांतों’ का घालमेल करने से हमेशा इंकार किया है. अनुवाद के सिद्दांतकार हमेशा इतने उदार नहीं होते. प्रायः वे विधि-निषेध बनाने वालों जैसा सख्त लहजा अख्तियार कर लेते हैं जिनके लिये अनुवादक सदैव एक अपराधी होता है, जिसका अपराध मूल पाठ के अर्थ का उदघाटन, विरूपण, व्याख्या, संशोधन, विस्तार, विनाश, स्पष्टीकरण, दूषण, तर्क-विनियोजन, कामविषयन, सरलीकरण, स्थगन, उदात्तीकरण, पुनर्लेखन, देशीकरण, विचित्रीकरण, स्त्रीकरण, घरेलूकरण, अल्पसंख्यककीरण, अन्यदेशीकरण, शोषण, उपनिवेशीकरण, उप-संस्करण, अप-प्रस्तुतिकरण करना या नहीं करना होता है; वैसे उनके कोड़ो की फटकार में और भी प्रताड़नाएँ होती हैं. वे अपरिहार्य रूप से किसी भाषा या संस्कृति के आदिम गौरव के ‘मूल’ के अनूदित न हो पाने की असंभावना के बारे में बोलते हैं. मेरा मानना है कि एक अनुवादक को न प्रचलित सत्ता-विमर्शों का बोझ ढोने की जरूरत होती है और न अपने को संस्कृति की मसीहाई आवाज़ मानने की. मेरी बात में थियरी की मेलोड्रामाई टंकार चाहे न हो, पर मुझे कुछ जोर देकर कहने दीजिये कि, एक अनुवादक के लिये किसी दूसरी भाषा की कल्पना कर सकना और इस तरह रहने और होने के दूसरे रूपों की कल्पना कर सकना संभव होता है; कि एक अनुवादक के लिये उन दूसरों से बात कर सकना संभव होता है जो यह समझते हैं कि कैसे हम उनसे बात करते हुए ‘मनुष्य’ होते हैं जिनके ‘मनुष्य’ होने का ढंग, ‘मनुष्य’ होने के हमारे ढंग से पूरी तरह भिन्न होता है. बौद्धिक विश्व-नागरिकता का मेरा अपना दावा (जो मुझे सांप्रदायिक अहमन्यता और अस्मिता राजनीति की सर्वनाशी सांघातिकता के इस दौर में बार-बार दोहराना पड़ता है) अनुवादकों की बिरादरी और उसके श्रम पर निर्भर करता है. जैसे कि मेरा यह दावा भी कि किसी अनुवादक के एक साहित्यिक पर्यावास का हिस्सा होने के लिये जरूरी है कि हम उन अहम तरीकों को समझें जिनसे अनुवाद सांस्कृतिक और नैतिक बहुलताओं के निर्माण में सहयोग करता है.

मूल पाठ के लय-विधान को, पदों को, सांस्कृतिक पूर्वमान्यताओं को, दार्शनिक या नैतिक पूर्वग्रहों को समझने के आलोचनात्मक उपकरण निर्मित करने के किसी सिद्दांतकार के काम और एक अनुवादक को प्रेरित करने वाले सरोकारों में मूलगामी भिन्नता होती है. कम से कम मेरे मामले में है. एक अनुवादक के लिये दो नैतिक या सौन्दर्यपरक दायित्वों को एक साथ, तत्क्षण पूरा करना अनिवार्य है. एक नयी कृति को रचते हुए यह अनिवार्य है कि अनूदित संस्करण मूल की अंतर्निष्ठा का सम्मान करे ताकि मूल के विजन को अनुवाद में उपलब्ध कराया जा सके. यह अनुवाद कर्म की न्यूनतम नैतिकता है. (मुझे अहसास है कि एक तरह का सरलमति, नैसर्गिक नॉस्टिलजिया इसमें लक्ष्य किया जा सकता है किंतु मैं उन सैद्धांतिक प्रलोभनों के बारे में भी खबरदार हूँ जिनके जरिये अनुवाद को ‘मूल’ की अवधारणा पर अविश्वास करने वाले हमारे संदेहत्रस्त, शंकालु समय का अंग बनाया जा सकता है.)

(“द आर्ट ऑफ़ पोएट्री ट्रांसलेशन“, पोएट्री इन्टरनेशनल वेब से, अनुवाद मेरा)

एक उत्तर-औपनिवेशिक अनुवादक के लिये शायद यह एक संभव मार्ग है कि वह इस ‘सरलमति, नैसर्गिक नॉस्टिलजिया’ को अपने भीतर बचा रहने दे, और जहाँ तक संभव हो न सिर्फ अपने समय के प्रचलित सत्ता विमर्शों के प्रति आलोचनात्मक बना रहे, ‘संस्कृति की मसीहाई आवाज़ होने का बोझ’ अपने ऊपर न लादे.

आज हमारी रक्षार्थ आये आलोक का बेहद शुक्रिया लेकिन इतना और कहने की ज़रूरत है कि भूमण्डलीकरण और मुक्त बाजार में अनुवाद के नये मध्यस्थ और नये संकेतक सक्रिय हो गये हैं और यह भी कि अभी अनुवादकों को अपने आशिकाना पागलपन के बदले में जो मिलता है उसके चलते आने वाले दिनों में उन्हें ‘इश्क का ये कारोबार’ छोडने से रोक लेने वाले, शायद, ये नये मध्यस्थ ही होंगे.

3.

सीरियल धमाके अब एक नये ईलाके में, भारत के छोटे शहरों/कस्बों में प्रवेश कर चुके हैं. उनके द्वारा लक्ष्य आतंक और उनके बारे में लगभग-प्रोग्रैम्ड प्रतिक्रियाओं के परिप्रेक्ष्य में हमारे जीवन और चित्त में ‘आतंक के अनुभव’ की पड़ताल करने की ज़रूरत और शिद्दत से महसूस होती है. इसे अंजाम देने वालों और इसके पीड़ितों, दोनों के भीतर पहले से मौज़ूद, एक सोये हुए आतंक की पूर्वमान्यता के बगैर आतंक एक कारवाई बल्कि एक विचारधारा के रूप में इतनी व्यापक और स्वीकृत संघटना नहीं बन सकता था. हम जल्दी ही इस थीम पर लेखन आमंत्रित करेंगे.

4.

इस अंक से हमने अपना दायरा सिनेमा, संगीत और पॉपुलर कला तक फैलाया है.

श्रीदला स्वामी भारतीय डॉक्यूमेंटरी सिनेमा पर लेखन की एक श्रृंखला का संयोजन इस अंक से आरंभ कर रही हैं. हर अंक में दो फिल्मकार विभिन्न मुद्दों पर लिखेंगे.

श्रीधर थायिल का संगीत, उसके बारे में उनका गद्य और तथा शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ पर दो युवा हिन्दी कवियों के समझदार गद्य से हम संगीत पर फोकस की शुरुआत कर रहे हैं.

एक अलग खंड, ‘लोक-प्रिय’ उन कला रूपों पर शुरु कर रहे हैं जिन्हें ‘पॉपुलर’ कहा जाता है. पहली पेशकश में है सारनाथ बनर्जी के चित्र-गल्प (ग्राफिक उपन्यास) द बार्न आऊल’स वंडरस केपर्स के अंश हिन्दी अनुवाद में; अशोक बैंकर की कहानी और श्रीधर थायिल का संगीत.

1.

Our last issue’s lead theme, Literature and History, deliberately did not address the problematic of translation in the Indian colonial/postcolonial context. The danger was/is that there is hardly any new position one can take.

That translations, in the colonial context, were an ethnographical invention and that they helped the colonist to create a desired “other” is something that, at least now, doesn’t need elaborate reasoning. The post-colonial translator, aware as s/he may be of all this, can do little except declaring as often and as forcefully as possible that s/he is aware of what translation, irrespective of intention, is taken to be.

However one can, as D.R. Nagraj often did, go beyond the frameworks that accept the theory of total conquest of the colonized, and keep looking for possibilities of mutual transformation between the colonized and the colonizer. This, to a certain extent, helps one avoid both the nativist trap and the urgency of political correctess that, in trying to relocate translation as a site of resistance, ends up ignoring the text in question.

Most theorizations about translation in the post-colonial framework depend upon the translated version, to the extent that the text in question is often not allowed to speak. The attempts that try to negotiate post-structuralist insight with post-colonial political demands are examples of theorizing that exist, sadly, only ‘in translation’.

Whatever one’s approach, when it comes to translation, theory is too much with us.

2.

Let’s listen to what one of the ‘most significant’ Indian translators, Alok Bhalla, is trying to say:

I have always refused to mingle the ‘art’ of translation with any of the ‘theories’ of translation. I think both have their protocols. Theorists of translation are not always so generous. Many a time they adopt the tone of stern law-givers for whom the translator is always a guilty thing who does or does not, must or must not reveal, deform, explain, improve, expand, rationalize, eroticize, clarify, infect, simplify, defer, ennoble, rewrite, nativize, destroy, exoticize, feminize, domesticate, minoritize, foreignize, impoverish, colonize, subvert or misrepresent the meaning of the original text – there are other spurs on their whips of flagellation (the poor translator is always at the receiving end). They inevitably speak about the impossibility of translating the ‘original’, the ‘primal’ glory of a culture or its language. I don’t believe that a translator is required to carry the ontological burden of our times or be the messianic voice of a civilization. Let me at least assert, even if my assertion does not have the melodramatic bass of the theory: It is possible for a translator to imagine another language and hence other forms of living and being; and, it is possible for a translator to speak to others who understand how we become ‘human’ when we find ourselves in conversation with others who have an utterly different way of ‘being human’ than we have. My own claim to intellectual cosmopolitanism (which I need to declare again and again for I live in the midst of sectarian arrogance and the genocidal virulence of identity politics) depends upon the labour of a community of translators, as does my claim that for a translator to be part of a literary habitat we need to understand the important ways in which translation contributes to the creation of cultural and moral pluralities.

If the task of the theorist is to craft critical tools so as to understand what may have determined the rhythms, phrases, cultural presuppositions, philosophic or moral preoccupations of the original text, the translator is guided by radically other considerations. Or, at least, I as a translator I am. A translator must fulfill two ethical or aesthetic tasks simultaneously. Even as a translator crafts a new work, the translated version must respect the integrity of the original so that the vision of the original is made available. This is a minimum ethic (I know this has a naive Edenic nostalgia attached to it, just as I am aware of the theoretical temptations to make translation part of our more suspicious and skeptical age which distrusts the power of all ‘originals’).

(From “The Art of Poetry Translation“, Poetry International Web.)

One of the ways out for a postcolonial translator is to keep some degree of this ‘naive Edenic nostalgia’ about the act of translation intact and to try and free herself/himself of the ‘ontological burden of our times’ or the equally dangerous burden of being ‘the messianic voice of a civilization’.

We must thank Alok for bailing us out. However, we perhaps need to add that translation has found new mediators and signifiers with globalization and the market economy. And that, perhaps, these mediators hold the key to keeping translators interested in this act which, given what they get in reward, remains more or less a labor of love.

3.

As serial blasts enter a new territory – the smaller towns of India – in the context of the terror they intend and the almost-programmed responses they invoke, we once again feel the need to probe the experience of terror in our lives and psyche. Terrorism, as an act or even as an ideology, could not have become a pervasive and accepted phenomenon without presupposing some kind of prevalent, sleeping terror in the minds of those who inflict it and those who suffer it. We’ll soon come up with a call for writings on this theme.

4.

With this issue we have ventured into music, cinema and popular art.

Sridala Swami is curating a series of writings on Indian documentary films. In each issue, two filmmakers will write about the various issues involved.

Some numbers by Sridhar/Thayil and a write-up along with brilliant pieces by two young Hindi poets on shehnai-legend Bismillah Khan inaugurate our focus on music.

A separate section, Lok-Priya (Hindi for ‘popular’, literally ‘something that is dear to the public’) is also a new addition. We begin with translated excerpts from Sarnath Banerjee’s graphic novel The Barn Owl’s Wondrous Capers, Ashok Banker’s short story and the Sridhar/Thayil songs.

As always, we had a great time doing this and are very grateful to our contributors and readers.

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  1. sampadkiya men aapne kai mahatvapurna sawaal anuvaad ko lekar uthaye hain. pratilipi ki gambhirata is foohar samay men prabhavit karti hai, hindi ka naya gambhir space banane ki disha men achhi koshish hai.
    prabhat

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बाबेल से पहले / Before Babel

1.

पिछले अंक में, मुख्य थीम ‘साहित्य और इतिहास’ पर बात करते हुए हमने, जानबूझकर भारतीय=औपनिवेशिक/उत्तर-औपनिवेशिक परिप्रेक्ष्य में अनुवाद की समस्यात्मकता को संबोधित नहीं किया था. खतरा साफ़ था/है: इस परिप्रेक्ष्य में कोई नई पोजिशन लेना सम्भव नहीं है.

यह कहने के लिए, कम से कम अब, किसी लंबे-चौडे शोध की ज़रूरत नहीं है कि अनुवाद, औपनिवेशिक परिप्रेक्ष्य में एक नृशास्त्रीय फलन थे और वे उपनिवेशिकृत को एक वांछित अन्य के रूप में निर्मित किए जाने में सहायक थे. एक उत्तर-औपनिवेशिक अनुवादक इस सब के प्रति सजग चाहे जितना हो, इससे अधिक कुछ नहीं कर सकता/ती कि जितनी बार और जितनी शक्ति से हो सके यह दोहराए कि वह इससे वाकिफ़ है कि अनुवादक के मन्तवव्य से निरपेक्ष, अनुवाद को कैसे ‘अवस्थित’ किया जाता है.

यद्यपि, जैसा डी.आर.नागराज अक्सर करते थे, वह अनुवादक उन सरंचनाओं से परे जाने की कोशिश कर सकता है जो औपनिवेशिक शक्तियों की पूर्ण विजय की धारणा पर आधारित हैं; और औपनिवेशिक और उपनिवेशीकृत के मध्य परस्पर रूपान्तरण की संभावनाओं के लिए अपनी दृष्टि को खुला रख सकता है. यह उसे देशजतावादी/पुनरुत्थानवादी वाग्ज़ाल के साथ साथ राजनीतिक ‘करेक्टनेस’ की उस तात्कालिकता से भी किसी हद तक बचा सकता है जो अनुवाद को ‘प्रतिरोध की पीठ’ बनाने के अभियान में खुद पाठ को ही फ़साने से गायब कर देती है.

उत्तर-औपनिवेशिक थियरी के दायरे में होने वाले सैद्धान्तीकरण उस हद तक ‘अनूदित पाठ’ पर निर्भर करते हैं कि ख़ुद पाठ की आवाज़ को अनसुना कर देते हैं. वे कोशिशें भी जो उत्तर-सरंचानावादी अंतर्दृष्टि का उपयोग उत्तर औपनिवेशिक राजनितिक प्रश्नों को हल करने में करना चाहती है, इसी तरह के सैद्धान्तीकरण का उदाहरण हैं जो, दुर्भाग्य से, ख़ुद ‘अनुवाद में ही सम्भव हैं’.

अनुवाद के मामले में, किसी भी तरह बात की जाय, ‘थियरी’ कुछ ज्यादा ही मंडराती है.

2.

आईये सुनें भारत के सबसे ‘महत्वपूर्ण अनुवादकों’ में से एक आलोक भल्ला क्या कहने का प्रयत्न कर रहे हैं –

मैंने अनुवाद की ‘कला’ और अनुवाद के ‘सिद्दांतों’ का घालमेल करने से हमेशा इंकार किया है. अनुवाद के सिद्दांतकार हमेशा इतने उदार नहीं होते. प्रायः वे विधि-निषेध बनाने वालों जैसा सख्त लहजा अख्तियार कर लेते हैं जिनके लिये अनुवादक सदैव एक अपराधी होता है, जिसका अपराध मूल पाठ के अर्थ का उदघाटन, विरूपण, व्याख्या, संशोधन, विस्तार, विनाश, स्पष्टीकरण, दूषण, तर्क-विनियोजन, कामविषयन, सरलीकरण, स्थगन, उदात्तीकरण, पुनर्लेखन, देशीकरण, विचित्रीकरण, स्त्रीकरण, घरेलूकरण, अल्पसंख्यककीरण, अन्यदेशीकरण, शोषण, उपनिवेशीकरण, उप-संस्करण, अप-प्रस्तुतिकरण करना या नहीं करना होता है; वैसे उनके कोड़ो की फटकार में और भी प्रताड़नाएँ होती हैं. वे अपरिहार्य रूप से किसी भाषा या संस्कृति के आदिम गौरव के ‘मूल’ के अनूदित न हो पाने की असंभावना के बारे में बोलते हैं. मेरा मानना है कि एक अनुवादक को न प्रचलित सत्ता-विमर्शों का बोझ ढोने की जरूरत होती है और न अपने को संस्कृति की मसीहाई आवाज़ मानने की. मेरी बात में थियरी की मेलोड्रामाई टंकार चाहे न हो, पर मुझे कुछ जोर देकर कहने दीजिये कि, एक अनुवादक के लिये किसी दूसरी भाषा की कल्पना कर सकना और इस तरह रहने और होने के दूसरे रूपों की कल्पना कर सकना संभव होता है; कि एक अनुवादक के लिये उन दूसरों से बात कर सकना संभव होता है जो यह समझते हैं कि कैसे हम उनसे बात करते हुए ‘मनुष्य’ होते हैं जिनके ‘मनुष्य’ होने का ढंग, ‘मनुष्य’ होने के हमारे ढंग से पूरी तरह भिन्न होता है. बौद्धिक विश्व-नागरिकता का मेरा अपना दावा (जो मुझे सांप्रदायिक अहमन्यता और अस्मिता राजनीति की सर्वनाशी सांघातिकता के इस दौर में बार-बार दोहराना पड़ता है) अनुवादकों की बिरादरी और उसके श्रम पर निर्भर करता है. जैसे कि मेरा यह दावा भी कि किसी अनुवादक के एक साहित्यिक पर्यावास का हिस्सा होने के लिये जरूरी है कि हम उन अहम तरीकों को समझें जिनसे अनुवाद सांस्कृतिक और नैतिक बहुलताओं के निर्माण में सहयोग करता है.

मूल पाठ के लय-विधान को, पदों को, सांस्कृतिक पूर्वमान्यताओं को, दार्शनिक या नैतिक पूर्वग्रहों को समझने के आलोचनात्मक उपकरण निर्मित करने के किसी सिद्दांतकार के काम और एक अनुवादक को प्रेरित करने वाले सरोकारों में मूलगामी भिन्नता होती है. कम से कम मेरे मामले में है. एक अनुवादक के लिये दो नैतिक या सौन्दर्यपरक दायित्वों को एक साथ, तत्क्षण पूरा करना अनिवार्य है. एक नयी कृति को रचते हुए यह अनिवार्य है कि अनूदित संस्करण मूल की अंतर्निष्ठा का सम्मान करे ताकि मूल के विजन को अनुवाद में उपलब्ध कराया जा सके. यह अनुवाद कर्म की न्यूनतम नैतिकता है. (मुझे अहसास है कि एक तरह का सरलमति, नैसर्गिक नॉस्टिलजिया इसमें लक्ष्य किया जा सकता है किंतु मैं उन सैद्धांतिक प्रलोभनों के बारे में भी खबरदार हूँ जिनके जरिये अनुवाद को ‘मूल’ की अवधारणा पर अविश्वास करने वाले हमारे संदेहत्रस्त, शंकालु समय का अंग बनाया जा सकता है.)

(“द आर्ट ऑफ़ पोएट्री ट्रांसलेशन“, पोएट्री इन्टरनेशनल वेब से, अनुवाद मेरा)

एक उत्तर-औपनिवेशिक अनुवादक के लिये शायद यह एक संभव मार्ग है कि वह इस ‘सरलमति, नैसर्गिक नॉस्टिलजिया’ को अपने भीतर बचा रहने दे, और जहाँ तक संभव हो न सिर्फ अपने समय के प्रचलित सत्ता विमर्शों के प्रति आलोचनात्मक बना रहे, ‘संस्कृति की मसीहाई आवाज़ होने का बोझ’ अपने ऊपर न लादे.

आज हमारी रक्षार्थ आये आलोक का बेहद शुक्रिया लेकिन इतना और कहने की ज़रूरत है कि भूमण्डलीकरण और मुक्त बाजार में अनुवाद के नये मध्यस्थ और नये संकेतक सक्रिय हो गये हैं और यह भी कि अभी अनुवादकों को अपने आशिकाना पागलपन के बदले में जो मिलता है उसके चलते आने वाले दिनों में उन्हें ‘इश्क का ये कारोबार’ छोडने से रोक लेने वाले, शायद, ये नये मध्यस्थ ही होंगे.

3.

सीरियल धमाके अब एक नये ईलाके में, भारत के छोटे शहरों/कस्बों में प्रवेश कर चुके हैं. उनके द्वारा लक्ष्य आतंक और उनके बारे में लगभग-प्रोग्रैम्ड प्रतिक्रियाओं के परिप्रेक्ष्य में हमारे जीवन और चित्त में ‘आतंक के अनुभव’ की पड़ताल करने की ज़रूरत और शिद्दत से महसूस होती है. इसे अंजाम देने वालों और इसके पीड़ितों, दोनों के भीतर पहले से मौज़ूद, एक सोये हुए आतंक की पूर्वमान्यता के बगैर आतंक एक कारवाई बल्कि एक विचारधारा के रूप में इतनी व्यापक और स्वीकृत संघटना नहीं बन सकता था. हम जल्दी ही इस थीम पर लेखन आमंत्रित करेंगे.

4.

इस अंक से हमने अपना दायरा सिनेमा, संगीत और पॉपुलर कला तक फैलाया है.

श्रीदला स्वामी भारतीय डॉक्यूमेंटरी सिनेमा पर लेखन की एक श्रृंखला का संयोजन इस अंक से आरंभ कर रही हैं. हर अंक में दो फिल्मकार विभिन्न मुद्दों पर लिखेंगे.

श्रीधर थायिल का संगीत, उसके बारे में उनका गद्य और तथा शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ पर दो युवा हिन्दी कवियों के समझदार गद्य से हम संगीत पर फोकस की शुरुआत कर रहे हैं.

एक अलग खंड, ‘लोक-प्रिय’ उन कला रूपों पर शुरु कर रहे हैं जिन्हें ‘पॉपुलर’ कहा जाता है. पहली पेशकश में है सारनाथ बनर्जी के चित्र-गल्प (ग्राफिक उपन्यास) द बार्न आऊल’स वंडरस केपर्स के अंश हिन्दी अनुवाद में; अशोक बैंकर की कहानी और श्रीधर थायिल का संगीत.

1.

Our last issue’s lead theme, Literature and History, deliberately did not address the problematic of translation in the Indian colonial/postcolonial context. The danger was/is that there is hardly any new position one can take.

That translations, in the colonial context, were an ethnographical invention and that they helped the colonist to create a desired “other” is something that, at least now, doesn’t need elaborate reasoning. The post-colonial translator, aware as s/he may be of all this, can do little except declaring as often and as forcefully as possible that s/he is aware of what translation, irrespective of intention, is taken to be.

However one can, as D.R. Nagraj often did, go beyond the frameworks that accept the theory of total conquest of the colonized, and keep looking for possibilities of mutual transformation between the colonized and the colonizer. This, to a certain extent, helps one avoid both the nativist trap and the urgency of political correctess that, in trying to relocate translation as a site of resistance, ends up ignoring the text in question.

Most theorizations about translation in the post-colonial framework depend upon the translated version, to the extent that the text in question is often not allowed to speak. The attempts that try to negotiate post-structuralist insight with post-colonial political demands are examples of theorizing that exist, sadly, only ‘in translation’.

Whatever one’s approach, when it comes to translation, theory is too much with us.

2.

Let’s listen to what one of the ‘most significant’ Indian translators, Alok Bhalla, is trying to say:

I have always refused to mingle the ‘art’ of translation with any of the ‘theories’ of translation. I think both have their protocols. Theorists of translation are not always so generous. Many a time they adopt the tone of stern law-givers for whom the translator is always a guilty thing who does or does not, must or must not reveal, deform, explain, improve, expand, rationalize, eroticize, clarify, infect, simplify, defer, ennoble, rewrite, nativize, destroy, exoticize, feminize, domesticate, minoritize, foreignize, impoverish, colonize, subvert or misrepresent the meaning of the original text – there are other spurs on their whips of flagellation (the poor translator is always at the receiving end). They inevitably speak about the impossibility of translating the ‘original’, the ‘primal’ glory of a culture or its language. I don’t believe that a translator is required to carry the ontological burden of our times or be the messianic voice of a civilization. Let me at least assert, even if my assertion does not have the melodramatic bass of the theory: It is possible for a translator to imagine another language and hence other forms of living and being; and, it is possible for a translator to speak to others who understand how we become ‘human’ when we find ourselves in conversation with others who have an utterly different way of ‘being human’ than we have. My own claim to intellectual cosmopolitanism (which I need to declare again and again for I live in the midst of sectarian arrogance and the genocidal virulence of identity politics) depends upon the labour of a community of translators, as does my claim that for a translator to be part of a literary habitat we need to understand the important ways in which translation contributes to the creation of cultural and moral pluralities.

If the task of the theorist is to craft critical tools so as to understand what may have determined the rhythms, phrases, cultural presuppositions, philosophic or moral preoccupations of the original text, the translator is guided by radically other considerations. Or, at least, I as a translator I am. A translator must fulfill two ethical or aesthetic tasks simultaneously. Even as a translator crafts a new work, the translated version must respect the integrity of the original so that the vision of the original is made available. This is a minimum ethic (I know this has a naive Edenic nostalgia attached to it, just as I am aware of the theoretical temptations to make translation part of our more suspicious and skeptical age which distrusts the power of all ‘originals’).

(From “The Art of Poetry Translation“, Poetry International Web.)

One of the ways out for a postcolonial translator is to keep some degree of this ‘naive Edenic nostalgia’ about the act of translation intact and to try and free herself/himself of the ‘ontological burden of our times’ or the equally dangerous burden of being ‘the messianic voice of a civilization’.

We must thank Alok for bailing us out. However, we perhaps need to add that translation has found new mediators and signifiers with globalization and the market economy. And that, perhaps, these mediators hold the key to keeping translators interested in this act which, given what they get in reward, remains more or less a labor of love.

3.

As serial blasts enter a new territory – the smaller towns of India – in the context of the terror they intend and the almost-programmed responses they invoke, we once again feel the need to probe the experience of terror in our lives and psyche. Terrorism, as an act or even as an ideology, could not have become a pervasive and accepted phenomenon without presupposing some kind of prevalent, sleeping terror in the minds of those who inflict it and those who suffer it. We’ll soon come up with a call for writings on this theme.

4.

With this issue we have ventured into music, cinema and popular art.

Sridala Swami is curating a series of writings on Indian documentary films. In each issue, two filmmakers will write about the various issues involved.

Some numbers by Sridhar/Thayil and a write-up along with brilliant pieces by two young Hindi poets on shehnai-legend Bismillah Khan inaugurate our focus on music.

A separate section, Lok-Priya (Hindi for ‘popular’, literally ‘something that is dear to the public’) is also a new addition. We begin with translated excerpts from Sarnath Banerjee’s graphic novel The Barn Owl’s Wondrous Capers, Ashok Banker’s short story and the Sridhar/Thayil songs.

As always, we had a great time doing this and are very grateful to our contributors and readers.

One comment
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  1. sampadkiya men aapne kai mahatvapurna sawaal anuvaad ko lekar uthaye hain. pratilipi ki gambhirata is foohar samay men prabhavit karti hai, hindi ka naya gambhir space banane ki disha men achhi koshish hai.
    prabhat

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बाबेल से पहले / Before Babel

1.

पिछले अंक में, मुख्य थीम ‘साहित्य और इतिहास’ पर बात करते हुए हमने, जानबूझकर भारतीय=औपनिवेशिक/उत्तर-औपनिवेशिक परिप्रेक्ष्य में अनुवाद की समस्यात्मकता को संबोधित नहीं किया था. खतरा साफ़ था/है: इस परिप्रेक्ष्य में कोई नई पोजिशन लेना सम्भव नहीं है.

यह कहने के लिए, कम से कम अब, किसी लंबे-चौडे शोध की ज़रूरत नहीं है कि अनुवाद, औपनिवेशिक परिप्रेक्ष्य में एक नृशास्त्रीय फलन थे और वे उपनिवेशिकृत को एक वांछित अन्य के रूप में निर्मित किए जाने में सहायक थे. एक उत्तर-औपनिवेशिक अनुवादक इस सब के प्रति सजग चाहे जितना हो, इससे अधिक कुछ नहीं कर सकता/ती कि जितनी बार और जितनी शक्ति से हो सके यह दोहराए कि वह इससे वाकिफ़ है कि अनुवादक के मन्तवव्य से निरपेक्ष, अनुवाद को कैसे ‘अवस्थित’ किया जाता है.

यद्यपि, जैसा डी.आर.नागराज अक्सर करते थे, वह अनुवादक उन सरंचनाओं से परे जाने की कोशिश कर सकता है जो औपनिवेशिक शक्तियों की पूर्ण विजय की धारणा पर आधारित हैं; और औपनिवेशिक और उपनिवेशीकृत के मध्य परस्पर रूपान्तरण की संभावनाओं के लिए अपनी दृष्टि को खुला रख सकता है. यह उसे देशजतावादी/पुनरुत्थानवादी वाग्ज़ाल के साथ साथ राजनीतिक ‘करेक्टनेस’ की उस तात्कालिकता से भी किसी हद तक बचा सकता है जो अनुवाद को ‘प्रतिरोध की पीठ’ बनाने के अभियान में खुद पाठ को ही फ़साने से गायब कर देती है.

उत्तर-औपनिवेशिक थियरी के दायरे में होने वाले सैद्धान्तीकरण उस हद तक ‘अनूदित पाठ’ पर निर्भर करते हैं कि ख़ुद पाठ की आवाज़ को अनसुना कर देते हैं. वे कोशिशें भी जो उत्तर-सरंचानावादी अंतर्दृष्टि का उपयोग उत्तर औपनिवेशिक राजनितिक प्रश्नों को हल करने में करना चाहती है, इसी तरह के सैद्धान्तीकरण का उदाहरण हैं जो, दुर्भाग्य से, ख़ुद ‘अनुवाद में ही सम्भव हैं’.

अनुवाद के मामले में, किसी भी तरह बात की जाय, ‘थियरी’ कुछ ज्यादा ही मंडराती है.

2.

आईये सुनें भारत के सबसे ‘महत्वपूर्ण अनुवादकों’ में से एक आलोक भल्ला क्या कहने का प्रयत्न कर रहे हैं –

मैंने अनुवाद की ‘कला’ और अनुवाद के ‘सिद्दांतों’ का घालमेल करने से हमेशा इंकार किया है. अनुवाद के सिद्दांतकार हमेशा इतने उदार नहीं होते. प्रायः वे विधि-निषेध बनाने वालों जैसा सख्त लहजा अख्तियार कर लेते हैं जिनके लिये अनुवादक सदैव एक अपराधी होता है, जिसका अपराध मूल पाठ के अर्थ का उदघाटन, विरूपण, व्याख्या, संशोधन, विस्तार, विनाश, स्पष्टीकरण, दूषण, तर्क-विनियोजन, कामविषयन, सरलीकरण, स्थगन, उदात्तीकरण, पुनर्लेखन, देशीकरण, विचित्रीकरण, स्त्रीकरण, घरेलूकरण, अल्पसंख्यककीरण, अन्यदेशीकरण, शोषण, उपनिवेशीकरण, उप-संस्करण, अप-प्रस्तुतिकरण करना या नहीं करना होता है; वैसे उनके कोड़ो की फटकार में और भी प्रताड़नाएँ होती हैं. वे अपरिहार्य रूप से किसी भाषा या संस्कृति के आदिम गौरव के ‘मूल’ के अनूदित न हो पाने की असंभावना के बारे में बोलते हैं. मेरा मानना है कि एक अनुवादक को न प्रचलित सत्ता-विमर्शों का बोझ ढोने की जरूरत होती है और न अपने को संस्कृति की मसीहाई आवाज़ मानने की. मेरी बात में थियरी की मेलोड्रामाई टंकार चाहे न हो, पर मुझे कुछ जोर देकर कहने दीजिये कि, एक अनुवादक के लिये किसी दूसरी भाषा की कल्पना कर सकना और इस तरह रहने और होने के दूसरे रूपों की कल्पना कर सकना संभव होता है; कि एक अनुवादक के लिये उन दूसरों से बात कर सकना संभव होता है जो यह समझते हैं कि कैसे हम उनसे बात करते हुए ‘मनुष्य’ होते हैं जिनके ‘मनुष्य’ होने का ढंग, ‘मनुष्य’ होने के हमारे ढंग से पूरी तरह भिन्न होता है. बौद्धिक विश्व-नागरिकता का मेरा अपना दावा (जो मुझे सांप्रदायिक अहमन्यता और अस्मिता राजनीति की सर्वनाशी सांघातिकता के इस दौर में बार-बार दोहराना पड़ता है) अनुवादकों की बिरादरी और उसके श्रम पर निर्भर करता है. जैसे कि मेरा यह दावा भी कि किसी अनुवादक के एक साहित्यिक पर्यावास का हिस्सा होने के लिये जरूरी है कि हम उन अहम तरीकों को समझें जिनसे अनुवाद सांस्कृतिक और नैतिक बहुलताओं के निर्माण में सहयोग करता है.

मूल पाठ के लय-विधान को, पदों को, सांस्कृतिक पूर्वमान्यताओं को, दार्शनिक या नैतिक पूर्वग्रहों को समझने के आलोचनात्मक उपकरण निर्मित करने के किसी सिद्दांतकार के काम और एक अनुवादक को प्रेरित करने वाले सरोकारों में मूलगामी भिन्नता होती है. कम से कम मेरे मामले में है. एक अनुवादक के लिये दो नैतिक या सौन्दर्यपरक दायित्वों को एक साथ, तत्क्षण पूरा करना अनिवार्य है. एक नयी कृति को रचते हुए यह अनिवार्य है कि अनूदित संस्करण मूल की अंतर्निष्ठा का सम्मान करे ताकि मूल के विजन को अनुवाद में उपलब्ध कराया जा सके. यह अनुवाद कर्म की न्यूनतम नैतिकता है. (मुझे अहसास है कि एक तरह का सरलमति, नैसर्गिक नॉस्टिलजिया इसमें लक्ष्य किया जा सकता है किंतु मैं उन सैद्धांतिक प्रलोभनों के बारे में भी खबरदार हूँ जिनके जरिये अनुवाद को ‘मूल’ की अवधारणा पर अविश्वास करने वाले हमारे संदेहत्रस्त, शंकालु समय का अंग बनाया जा सकता है.)

(“द आर्ट ऑफ़ पोएट्री ट्रांसलेशन“, पोएट्री इन्टरनेशनल वेब से, अनुवाद मेरा)

एक उत्तर-औपनिवेशिक अनुवादक के लिये शायद यह एक संभव मार्ग है कि वह इस ‘सरलमति, नैसर्गिक नॉस्टिलजिया’ को अपने भीतर बचा रहने दे, और जहाँ तक संभव हो न सिर्फ अपने समय के प्रचलित सत्ता विमर्शों के प्रति आलोचनात्मक बना रहे, ‘संस्कृति की मसीहाई आवाज़ होने का बोझ’ अपने ऊपर न लादे.

आज हमारी रक्षार्थ आये आलोक का बेहद शुक्रिया लेकिन इतना और कहने की ज़रूरत है कि भूमण्डलीकरण और मुक्त बाजार में अनुवाद के नये मध्यस्थ और नये संकेतक सक्रिय हो गये हैं और यह भी कि अभी अनुवादकों को अपने आशिकाना पागलपन के बदले में जो मिलता है उसके चलते आने वाले दिनों में उन्हें ‘इश्क का ये कारोबार’ छोडने से रोक लेने वाले, शायद, ये नये मध्यस्थ ही होंगे.

3.

सीरियल धमाके अब एक नये ईलाके में, भारत के छोटे शहरों/कस्बों में प्रवेश कर चुके हैं. उनके द्वारा लक्ष्य आतंक और उनके बारे में लगभग-प्रोग्रैम्ड प्रतिक्रियाओं के परिप्रेक्ष्य में हमारे जीवन और चित्त में ‘आतंक के अनुभव’ की पड़ताल करने की ज़रूरत और शिद्दत से महसूस होती है. इसे अंजाम देने वालों और इसके पीड़ितों, दोनों के भीतर पहले से मौज़ूद, एक सोये हुए आतंक की पूर्वमान्यता के बगैर आतंक एक कारवाई बल्कि एक विचारधारा के रूप में इतनी व्यापक और स्वीकृत संघटना नहीं बन सकता था. हम जल्दी ही इस थीम पर लेखन आमंत्रित करेंगे.

4.

इस अंक से हमने अपना दायरा सिनेमा, संगीत और पॉपुलर कला तक फैलाया है.

श्रीदला स्वामी भारतीय डॉक्यूमेंटरी सिनेमा पर लेखन की एक श्रृंखला का संयोजन इस अंक से आरंभ कर रही हैं. हर अंक में दो फिल्मकार विभिन्न मुद्दों पर लिखेंगे.

श्रीधर थायिल का संगीत, उसके बारे में उनका गद्य और तथा शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ पर दो युवा हिन्दी कवियों के समझदार गद्य से हम संगीत पर फोकस की शुरुआत कर रहे हैं.

एक अलग खंड, ‘लोक-प्रिय’ उन कला रूपों पर शुरु कर रहे हैं जिन्हें ‘पॉपुलर’ कहा जाता है. पहली पेशकश में है सारनाथ बनर्जी के चित्र-गल्प (ग्राफिक उपन्यास) द बार्न आऊल’स वंडरस केपर्स के अंश हिन्दी अनुवाद में; अशोक बैंकर की कहानी और श्रीधर थायिल का संगीत.

1.

Our last issue’s lead theme, Literature and History, deliberately did not address the problematic of translation in the Indian colonial/postcolonial context. The danger was/is that there is hardly any new position one can take.

That translations, in the colonial context, were an ethnographical invention and that they helped the colonist to create a desired “other” is something that, at least now, doesn’t need elaborate reasoning. The post-colonial translator, aware as s/he may be of all this, can do little except declaring as often and as forcefully as possible that s/he is aware of what translation, irrespective of intention, is taken to be.

However one can, as D.R. Nagraj often did, go beyond the frameworks that accept the theory of total conquest of the colonized, and keep looking for possibilities of mutual transformation between the colonized and the colonizer. This, to a certain extent, helps one avoid both the nativist trap and the urgency of political correctess that, in trying to relocate translation as a site of resistance, ends up ignoring the text in question.

Most theorizations about translation in the post-colonial framework depend upon the translated version, to the extent that the text in question is often not allowed to speak. The attempts that try to negotiate post-structuralist insight with post-colonial political demands are examples of theorizing that exist, sadly, only ‘in translation’.

Whatever one’s approach, when it comes to translation, theory is too much with us.

2.

Let’s listen to what one of the ‘most significant’ Indian translators, Alok Bhalla, is trying to say:

I have always refused to mingle the ‘art’ of translation with any of the ‘theories’ of translation. I think both have their protocols. Theorists of translation are not always so generous. Many a time they adopt the tone of stern law-givers for whom the translator is always a guilty thing who does or does not, must or must not reveal, deform, explain, improve, expand, rationalize, eroticize, clarify, infect, simplify, defer, ennoble, rewrite, nativize, destroy, exoticize, feminize, domesticate, minoritize, foreignize, impoverish, colonize, subvert or misrepresent the meaning of the original text – there are other spurs on their whips of flagellation (the poor translator is always at the receiving end). They inevitably speak about the impossibility of translating the ‘original’, the ‘primal’ glory of a culture or its language. I don’t believe that a translator is required to carry the ontological burden of our times or be the messianic voice of a civilization. Let me at least assert, even if my assertion does not have the melodramatic bass of the theory: It is possible for a translator to imagine another language and hence other forms of living and being; and, it is possible for a translator to speak to others who understand how we become ‘human’ when we find ourselves in conversation with others who have an utterly different way of ‘being human’ than we have. My own claim to intellectual cosmopolitanism (which I need to declare again and again for I live in the midst of sectarian arrogance and the genocidal virulence of identity politics) depends upon the labour of a community of translators, as does my claim that for a translator to be part of a literary habitat we need to understand the important ways in which translation contributes to the creation of cultural and moral pluralities.

If the task of the theorist is to craft critical tools so as to understand what may have determined the rhythms, phrases, cultural presuppositions, philosophic or moral preoccupations of the original text, the translator is guided by radically other considerations. Or, at least, I as a translator I am. A translator must fulfill two ethical or aesthetic tasks simultaneously. Even as a translator crafts a new work, the translated version must respect the integrity of the original so that the vision of the original is made available. This is a minimum ethic (I know this has a naive Edenic nostalgia attached to it, just as I am aware of the theoretical temptations to make translation part of our more suspicious and skeptical age which distrusts the power of all ‘originals’).

(From “The Art of Poetry Translation“, Poetry International Web.)

One of the ways out for a postcolonial translator is to keep some degree of this ‘naive Edenic nostalgia’ about the act of translation intact and to try and free herself/himself of the ‘ontological burden of our times’ or the equally dangerous burden of being ‘the messianic voice of a civilization’.

We must thank Alok for bailing us out. However, we perhaps need to add that translation has found new mediators and signifiers with globalization and the market economy. And that, perhaps, these mediators hold the key to keeping translators interested in this act which, given what they get in reward, remains more or less a labor of love.

3.

As serial blasts enter a new territory – the smaller towns of India – in the context of the terror they intend and the almost-programmed responses they invoke, we once again feel the need to probe the experience of terror in our lives and psyche. Terrorism, as an act or even as an ideology, could not have become a pervasive and accepted phenomenon without presupposing some kind of prevalent, sleeping terror in the minds of those who inflict it and those who suffer it. We’ll soon come up with a call for writings on this theme.

4.

With this issue we have ventured into music, cinema and popular art.

Sridala Swami is curating a series of writings on Indian documentary films. In each issue, two filmmakers will write about the various issues involved.

Some numbers by Sridhar/Thayil and a write-up along with brilliant pieces by two young Hindi poets on shehnai-legend Bismillah Khan inaugurate our focus on music.

A separate section, Lok-Priya (Hindi for ‘popular’, literally ‘something that is dear to the public’) is also a new addition. We begin with translated excerpts from Sarnath Banerjee’s graphic novel The Barn Owl’s Wondrous Capers, Ashok Banker’s short story and the Sridhar/Thayil songs.

As always, we had a great time doing this and are very grateful to our contributors and readers.

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  1. sampadkiya men aapne kai mahatvapurna sawaal anuvaad ko lekar uthaye hain. pratilipi ki gambhirata is foohar samay men prabhavit karti hai, hindi ka naya gambhir space banane ki disha men achhi koshish hai.
    prabhat

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