आज़ादी विशेषांक / Freedom Special

अंक 13 / Issue 13

कथेतर / Non-Fiction

मुश्किल में पड़े देश की कविताएं : शिरीष कुमार मौर्य

कथेतर / Non-Fiction

अगर आठवें दशक पर नज़र टिकायें, तो वक़्त के साथ यह दर्पण की तरह साफ़ और निश्चित हो चला है कि उसके महत्त्वपूर्ण कवि कौन हैं. विचारधारा के स्तर पर यहाँ दो धाराएँ हैं–एक, `अल्ट्रा लेफ़्ट´, यानी क्रान्तिकारी वाम( दूसरे, लचीला या `सॉफ़्ट लेफ़्ट´, यानी किंचित् उदार और व्यापक वाम. `अल्ट्रा लेफ़्ट´ के प्रमुख कवि साबित होते हैं आलोकधन्वा, गोरख पाण्डेय और वीरेन […]



जीवन और मृत्‍यु के बीच जो संवाद-सा कुछ है: शिरीष कुमार मौर्य

कथेतर / Non-Fiction

मृत्‍युबोध एक जटिल विषय है. मृत्‍यु के बारे में सोचते हुए या उसे अपने आसपास घटित होते देखते हुए कोई ज़रूरी नहीं है कि आप उससे भयभीत भी हों …  इसलिए सबसे पहले तो यही कहना चाहूँगा कि मृत्‍युबोध अलग वस्‍तु है और मृत्‍युभय अलग…. इन्‍हें मिला देना बहुत कुछ गड़बड़ कर देना है ..ख़ासकर […]



नदी के द्वीप: प्रतीक और विचार – प्रणय कृष्ण

कथेतर / Non-Fiction

हम नदी के द्वीप हैं. हम नहीं कहते कि हमको छोड़कर स्रोतस्विनी बह जाए. वह हमें आकार देती है. हमारे कोण, गलियाँ, अंतरीप, उभार, सैकत-कूल सब गोलाइयाँ उसकी गढ़ी हैं. माँ है वह! है, इसी से हम बने हैं. किंतु हम हैं द्वीप. हम धारा नहीं हैं. स्थिर समर्पण है हमारा. हम सदा से द्वीप […]



लोकप्रियता और राग दरबारी: अमितेश कुमार

कथेतर / Non-Fiction

राग दरबारी पर कुछ लिखने का प्रस्ताव मिलने से हुए अनुभव को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता. प्रस्ताव पर स्वीकृति की मुहर लगाने के बाद समस्या यह थी कि लिखने का विषय क्या हो? बहुत सारे विषय एक एक कर दिमाग में धक्कम पेल करने लगे. ‘घास खोदने’ की पद्धति का अनुसरण करते […]



तुलसी की कवितार्इ और आधुनिक हिन्दी का मानस: केदारनाथ सिंह

कथेतर / Non-Fiction

श्री देवताले जी, रामप्रकाश जी, श्री राजेश जोशी, आग्नेय जी, रमेशचन्द्र शाह और मेरे कर्इ सारे प्रिय बन्धु, जो मेरे सामने बैठे हैं, और मानस में गहरी पैठ रखने वाले ध्रुव शुक्ल, मेरे सामने बैठे हुए हैं. मैं इस विषय के साथ थोड़ी छेड़छाड़ करूँगा, आपकी अनुमति से. मैं तुलसीदास की दो प्रसिद्ध पंक्तियों का […]



दोहरे मरण की पहचान: कृष्णमोहन झा

कथेतर / Non-Fiction

कवि की अमरता ग़लतफ़हमी पर निर्भर करती है. जिस कवि में ग़लत समझे जाने का जितना अधिक सामर्थ्य होता है वह उतना ही दीर्घ-जीवी होता है. (विजयदेवनारायण साही)   मेरे सारे शब्द प्यार के किसी दूर विगता के जूठे : तुम्हें मनाने हाय कहाँ से ले आऊँ मैं भाव अनूठे? तुम देती हो अनुकम्पा से मैं […]



Tension as a Bridge towards Release: Ajñeya’s Poem “Nāc”[i] – Nicola Pozza

कथेतर / Non-Fiction

  सच्चा सम्पूर्ण निश्छाय कालातीत शुद्ध क्षण वही होगा जिस में न स्मृति का संस्पर्श, न आकांक्षा का, और न तनाव का – ऐसा ही क्षण (मिले तो) जीवन्मुक्ति का क्षण होगा… (Ajñeya, Bhavantī, Rājpāl & Sons, 1989 [1971]: 146-47) “The true, complete, shadowless, timeless, pure instant will be one which is untouched by memory, […]



अथ आडंबर: आशुतोष भारद्वाज

कथेतर / Non-Fiction

मतियाया  सागर लहराया . तरंग की पंखयुक्त वीणा पर पवन से भर उमंग से गाया . फेन-झालरदार मखमली चादर पर मचलती किरण-अप्सराएँ भारहीन पैरों से थिरकीं — जल पर आलते की छाप छोड़ पल-पल बदलती . दूर धुँधला किनारा झूम-झूम आया, डगमगाया किया . मेरे भीतर जागा दाता बोला : लो, यह सागर मैंने तुम्हें दिया […]



नए कवि के सम्मुख अज्ञेय: महेश वर्मा

कथेतर / Non-Fiction

किसी का सत्य था  मैं ने सन्दर्भ में जोड़ दिया. कोई मधु-कोष काट लाया था मैं ने निचोड़ लिया.   किसी की उक्ति में गरिमा थी मैं ने उसे थोड़ा-सा सँवार दिया, किसी की संवेदना में आग का-सा ताप था मैं ने दूर हटते-हटते उसे धिक्कार दिया. कोई हुनरमन्द था : मैं ने देखा और कहा, […]



अप्रकट करुणा के पक्ष में : ही भी किन्तु परन्तु रंगनाथ – हिमांशु पंड्या

कथेतर / Non-Fiction

“कुछ ही दिनों में रंगनाथ को शिवपालगंज के बारे में ऐसा लगने लगा कि महाभारत की तरह, जो कहीं नहीं है वह यहाँ है, और जो यहाँ नहीं है वह कहीं नहीं है. उसे जान पड़ा कि हम भारतवासी एक हैं और हर जगह हमारी बुद्धि एक सी है. उसने देखा कि जिसकी प्रशंसा में […]