मार्च + जून २०१० / March + June 2010

कथेतर / Non-Fiction

आधा गाँव – दो पाठ और एक अधूरा साक्षात्कारः गिरिराज किराड़ू

कथेतर / Non-Fiction

1 Over the years I have come to believe increasingly in the truth of Jacques Lacan’s formulation that each mode of discourse has its underlying fiction, and that the discourse collapses the moment the fiction is removed. The difference between literature and history rests on the supposition that history is a referential discourse while literature [...]



हर दिन चटनी: विष्णु गोपाल मीणा

कथेतर / Non-Fiction

अलवर जिले की उमरैण पंचायत समिति में एक गाँव है रूंध बीणक. शहर से मात्र 20 किमी की दूरी पर स्थित यह गाँव सीलीसेड झील के उस इलाके में है जहाँ के बरसाती पानी से सीलीसेड झील ही नहीं जिले के सबसे बड़े बांध जयसमंद में भी पानी जाता है. सरिस्का अभयारण्य के जंगल में [...]



समय के बदले जगह, राष्ट्र के बदले प्रान्त: सदन झा

कथेतर / Non-Fiction

रेणु साहित्य और आंचलिक आधुनिकता यह एक ऐतिहासिक संयोग भी हो सकता है कि महबूब खान की मशहूर सिनेमा मदर इंडिया और फणीश्वर नाथ रेणु का दूसरा उपन्यास परती: परिकथा 1957 में एक मास के भीतर ही रिलीज हुए. मदर इंडिया उस बरस पहले पहल 25 अक्टुबर को बम्बई और कलकत्ता में परदे पर आयी [...]



नेह छोह: शोभाकान्त

कथेतर / Non-Fiction

दिन भर की प्रचंड गर्मी, देर रात की ठिठकी हवा और उसके बाद निशा-शेष में जब दक्षिण पवन ग्रीष्म ऋतु की श्रान्त और शिथिल अलस प्रकृति नदी के सिमटे हुए आँचल को फहराने लगता तो ‘छिवही‘ आम के विशाल वृक्ष की निस्पन्द टहनियां उच्छवासित हो उठती ….. टप-टप-टप करके आम गिरने लगते. ठीक उसी वक्त [...]



मोही जोगिनी बना के कहाँ गइले रे जोगिया: गिरीन्द्र नाथ झा

कथेतर / Non-Fiction

(फणीश्वर नाथ रेणु मौजूद हैं अपने गाँव में या फिर ..) कोसी के दोनों पाटों के बीच गूंजती हैं चिड़िया-चूरमून की आवाजें…चूं..चूं.चूं.. भैया उठिए, आ गया रेणु का देश, भोर (सुबह) हो गई है. जम्हाई  लेते हुए, गाड़ी से बाहर देखता हूँ. बांस-फूस की बनी बस्तियां. कुछ पक्के मकान भी. मटमैल धोती और कुर्ते में [...]



A Counter-Enlightenment of Sorts: Purushottam Agrawal

कथेतर / Non-Fiction

(In conversation with Giriraj Kiradoo) Pratilipi The popular opinion about the ‘event’ (‘honor killing’) is almost consensual on two things. One: its geo-cultural location can only be a village (irrespective of the actual geographical location of the incident). And two: such acts are, by default, a ‘sign of the medieval’. Your book on Kabir, Akath [...]



Culture of Color: Ashutosh Bhardwaj

कथेतर / Non-Fiction

Among the many qualities of Piyush Daiya’s books of conversations with two of India’s leading artists, Haku Shah and Akhilesh, the most inspiring is his ability to efface the minutest traces of himself from the text. How he engaged the artists in conversation, we never know. We can only surmise that he must have been [...]



औपनिवेशिक आधुनिकता के बरक़्स कबीर: विनोद शाही

कथेतर / Non-Fiction

‘कबीर की कविता और उनके समय’ को पुरुषोत्तम अग्रवाल की इसी शीर्षक वाली किताब प्रेम की अकथ कहानी की तरह पढ़ने की कोशिश करती है. इस ‘पाठ’ या पुनपठि के कई निहितार्थ हैं. पहली बात तो कबीर को ‘कवि’ के रूप में ही स्वीकृत करने से जुड़ी दिक्कतों की है, जिनके समाधान के लिये ‘कबीर [...]



कबीर काव्य – संवेदना का ‘महावृत्तान्त’: राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय

कथेतर / Non-Fiction

कबीर एक विचारक, क्रान्तिकारी और समाज परिवर्तन के महत्त्वपूर्ण कारक के रूप में हिन्दी भाषी जनता ही नहीं सम्पूर्ण भारतीय जनमानस को प्रेरित-प्रभावित करते रहे हैं. कबीर को दलितों और वंचितों की आवाज़ के रूप में समझकर पढ़ा जाने लगा. कुछ के लिए कबीर एक रहस्यवादी कवि के रूप में महत्त्वपूर्ण रहे और उनकी आध्यात्मिक [...]



मीरा की कविता का पुनर्पाठ: माधव हाड़ा

कथेतर / Non-Fiction

पहले धार्मिक सांप्रदायिक चरित्र-आख्यानों और बाद में उपनिवेशकालीन इतिहासकारों ने मीरा की, जो संत-भक्त और रहस्यवादी कवयित्री छवि निर्मित की, उससे उसकी कविता का सही मूल्यांकन नहीं हो पाया। मीरा पारंपरिक अर्थ में संत-भक्त नहीं थी, उसने राजसत्ता और पितृसत्ता के विरुद्ध अपने विद्रोह को भक्ति के आवरण में व्यक्त किया, जिसके पर्याप्त साक्ष्य उसकी [...]



एक था गाँव: वरूण

कथेतर / Non-Fiction

हमारे देश में टीवी मेरे जन्म से बहुत पहले आया. हमारे घर में मेरे पैदा होने के ७ साल बाद. टीवी पर गाँव मैंने शायद टीवी आने के पहले दिन ही देख लिया (कृषि दर्शन मेरा पसंदीदा कार्यक्रम था, क्यूंकि इसमें आउट डोर बहुत दिखता था). असल ज़िंदगी में सचमुच** का गाँव अभी देखा है [...]



किसी दूसरे कालखंड में: मिहिर पंड्या

कथेतर / Non-Fiction

“इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूँ है” (1) “छोटे-छोटे शहरों से खाली बोर दुपहरों से हम तो झोला उठाके चले बारिश कम-कम लगती है नदिया मद्धम लगती है हम समन्दर के अन्दर चले हम चले, हम चले, ओये रामचंद रे…” – गुलज़ार. ’बंटी और बबली’, 2005 (2) फ़िल्म में भी उनका नाम ’बंटी’ [...]



To Be Fortunate: Rustam (Singh)

कथेतर / Non-Fiction

To be fortunate means to be able to think, to be able to receive thought, to be able to respond to it from the very centre of one’s being, and to be able to do all of this despite the twists in one’s fortune.[1] However, there is a kind of thinking, a kind of ability [...]



जहाँ मीठा पानी एक सपना हैः गीताश्री

कथेतर / Non-Fiction

अनादि राय दरार पड़े खेत की तरफ फटी फटी आंखों से देख रहा है. वहाँ से उसकी निगाहें खारे पानी के तालाब की तरफ जाती है और उसकी आंख में तालाब का खारा पानी भर जाता है. डूबते द्वीप के साथ उसका दिल भी डूब रहा है. ना फटी जमीन का कोई रफूगर है ना [...]



रामपाली: प्रभात

कथेतर / Non-Fiction

राजस्थान के अजमेर जिले में, केकड़ी तहसील हैडक्वाटर से, छह किलोमीटर की दूरी पर स्थित है गाँव-रामपाली. केकड़ी से रामपाली आते हुए सड़क के दोनों ओर जहाँ तक निगाह पहुंच रही थी, सूखे काले खेतों के सिवा कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था. कहीं-कहीं जूली-फ्लोरा की झाड़ियां जरूर दिखाईं दी. ये झाड़ियां चूल्हे के [...]



कार्तिक की कहानी: पीयूष दईया

कथेतर / Non-Fiction

अनुपम मिश्र व संतोष पासी के लिए पहाड़ों के घेरे में एक छोटा-सा गाँव था. गाँव में लुभावने सीढ़ीनुमा खेतों के छोरों पर एक छोटे दरवाजे व दो छोटी खिड़कियों वाला एक सुंदर व मजबूत घर था. पहाड़ी ढलान के ऊपरी हिस्से से इसमें सीधे, बिना सीढ़ी के दूसरे मंज़िल में प्रवेश होता था और ढलान [...]



लमही वतन है: व्योमेश शुक्ल

कथेतर / Non-Fiction

१ लमही वतन है। दूसरी जगहें गाँव घर मुहल्ला गली शहर या जन्मस्थल होती हैं, लमही वतन हो जाती है और लेखक को अपने वतन लौटते रहना चाहिये। लेखक को दूसरे लेखकों के वतन भी लौटना चाहिए। जाँच-परख या टीका-टिप्पणी करने नहीं, रहने के लिए। जितनी देर तक वहाँ ठहरिये, रह जाइये। वतन जाकर रहने [...]



When They ‘Tamed’ the Kosi: Deepika Arwind

कथेतर / Non-Fiction

IN PATNA, AND SOON OUT OF IT… We arrive in Patna by the afternoon of March 8. The only news streaming out of the television is of the Women’s Reservation Bill. Lalu Prasad Yadav and Mulayam Singh Yadav are protesting the bill vociferously somewhere in this city, threatening to pull out of the UPA coalition [...]



‘World Class’: Annie Zaidi

कथेतर / Non-Fiction

There are times when I wonder if the point of travel is not to broaden one’s horizons as much as narrow them down. Not to teach us to embrace all differences, but to observe the gulf between us and them and to burn with the contrast. Narrow dusty roads and endless azure umbrellas of unstable [...]



An Ambiguous Journey to the City: A Dialogue with Ashis Nandy

कथेतर / Non-Fiction

(By Ashutosh Bhardwaj and Giriraj Kiradoo) 1. Pratilipi An Ambiguous Journey to the City reworks the myth of the journey to explore the South Asian interface of city and village. You have argued that, in spite of their modest acquaintance with village life and manners, Gandhi and Satyajit Ray could discover their own villages because [...]



जो फड़ा सो झड़ा, जो जला सो बुझा: सच्चिदानंद सिन्हा से मनोज कुमार झा की बातचीत

कथेतर / Non-Fiction

मनोज कहते हैं कि परिवेश बदलने के साथ और समय के साथ अलग अनुभव तो प्राप्त होते ही हैं, अनुभव-प्राप्ति का तरीका भी बदल जाता है, गाँव की तुलना में अनुभव-प्राप्ति का यह तरीका शहर के संदर्भ में कैसे बदलता है. सच्चिदा बाबू अनुभव साफ स्लेट पर लिखावट जैसा नहीं होता. जिस तरह कोई चित्र, [...]



Jangarh Kalam: Udayan Vajpeyi

कथेतर / Non-Fiction

Come over O Bada Dev, sit in the dense shade of the Saja tree. Come, create the world, create it once again. Where the village comes to an end keep vigil O Mahrilin Devi. Let no illness, no disease head our way, stop it right there. At the edge of the forest stand guard O [...]



Village: Sumana Roy

कथेतर / Non-Fiction

Village Evening’s a cow with a rope round its neck. It can only look ahead. Something changes forever, without its consent. Dust is a gunshot fired from a silencer. It settles like the spray from a sneeze. Evening’s a shawl wrapped around an old woman’s head. It slips from her hair. She pulls it up [...]



कुदाल की जगह: कृष्णमोहन झा

कथेतर / Non-Fiction

क्या कभी कविता नमक की तरह अनिवार्य हो सकती है? कम से कम आधुनिक युग के तुमुल कोलाहल कलह में व्यस्त तथा अभिशप्त जीवन में इसकी संभावना नहीं दीखती. बल्कि ऐसा सोचना भी अटपटा और बचकाना लगता है. कहना कठिन है कि विगत में कभी कविता को ऐसी भूमिका निभाने का अवसर मिला या नहीं. [...]



शिवमूर्ति-संगत: प्रभात रंजन

कथेतर / Non-Fiction

प्रभात अभी हाल में नया ज्ञानोदय में आपका उपन्यास आखिरी छलांग प्रकाशित हुआ. उसको पढ़ते हुए लगता है जैसे गांव का जो स्वप्न है वह टूट गया है. पूंजीवादी यथार्थ के सामने उसने सरेंडर कर दिया है. आज गांव का एक खाता-पीता किसान भी खेती के बूते अपने बच्चों को चाहे भी तो बेहतर शिक्षा [...]



एक नये अनृत का प्रस्ताव: मदन सोनी

कथेतर / Non-Fiction

औपन्यासिक वास्तविकता और औपन्यासिक कल्पना: – पहली जो शुद्ध बौद्धिक वस्तु है; भाषादैहिक है; पाठ है; पठन, मनन, चर्वण, व्याख्या, के अधीन है; जिसमें भाषा एक विशिष्ट फलन में सक्रिय है; जिसमें भाषेतर पदार्थ-जगत के साथ भाषा का एक अद्वितीय सम्बन्ध विकसित है; जिसका अपना एक अभिसमय, अपनी एक वंशावली है जो उसकी पहचान का [...]



गति के महाआख्यान में फुर्सत का खंड: हिमांशु पण्ड्या

कथेतर / Non-Fiction

मित्रो, अस्सी का अपना शब्द कल्पद्रुम है- दुनिया जानती है। इसके पास और कुछ नहीं, शब्दों की ही खेती है। वह इसी फसल के अन्न का निर्यात करता है देश-विदेश में। आज से पचास साल पहले अपने ‘फार्म हाउस’ में उसने दो शब्द उगाए थे- ‘व्यवस्था’ और ‘कार्यक्रम’। कार्यक्रम उसे अपने काम का नहीं लगा। [...]



Journeys of No Return: Trina Nileena Banerjee

कथेतर / Non-Fiction

Exile and Travel in the Films of Ritwik Ghatak Edward Said writes in his essay ‘Reflections on Exile’: “Exile is strangely compelling to think about but terrible to experience. It is the unhealable rift forced between a human being and a native place, between the self and its true home: its essential sadness can never [...]



नोबडीज़ डिट्रॉइट: फिलिप लवीन

कथेतर / Non-Fiction

मैंने डिट्रॉइट 1954 में छोड़ा था. तब मैं छब्बीस साल का था और मैंने अंग्रेज़ी में बीए कर रखा था. मैंने वह नौकरी छोड़ी जो मुझे पसंद थी, हर साइज़ की इलेक्ट्रिक मोटरें सुधारने वाली एक कम्पनी के लिए “ट्रक चलाना” – जैसा कि उन दिनों कहा जाता. वह नौकरी मुझे ताज़ा  हवा में ले [...]



Private Faces in Public Spaces: Amitava Kumar

कथेतर / Non-Fiction

The Art of Anunaya Chaubey Through my teenage years, I went to school in Patna. The school was called St. Michael’s High School, its buildings dwarfing the small houses around it, the walls of the school going down to the Ganges. Classes were held in English, though that changed later. St. Michael’s was run by [...]



आकी काउरिसमाकी – अबोलेपन का व्‍याकरण: गीत चतुर्वेदी

कथेतर / Non-Fiction

लगातार शून्‍य में देखते घबराए हुए-से चेहरे, देर तक की चुप्‍पी के बाद अप्रत्‍याशित रूप से आया कोई संवाद, निम्‍न मध्‍यवर्ग के जीवन की छोटी-छोटी आकांक्षाएं और उन्‍हें पूरा करने की राह में आने वाली बाधाएं, चीज़ों को न कर पाने, न कह पाने का बेचैन रोज़नामचा, लगातार टूटते और उसी रफ़्तार से नए बनते [...]



‘आठ और आधा’ के बहाने फ़ेल्‍लीनी पर कुछ फुटकर नोट्स: प्रमोद सिंह

कथेतर / Non-Fiction

कभी बात निकलती है तो मन में सवाल उठता ही है कि आख़ि‍र ऐसा क्‍या है फ़ेदेरिको फ़ेल्‍लीनी की फ़ि‍ल्‍मों में? ख़ास तौर पर उनकी अपनी इज़ाद विशिष्‍ट शैली के रचनात्‍मक चरम ओत्‍तो ए मेत्‍ज़ो में? बुनावट के वे क्‍या तत्‍व हैं आखिर कि उसे देखते हुए मन सिनेमा व उसकी सामाजिकता के ‘डेट’ व [...]



Poet of the Flaming Sutlej – Lal Singh Dil (1943-2007): Nirupama Dutt

कथेतर / Non-Fiction

How is one to remember Lal Singh Dil? The literary status of Dil in the world of Punjabi literature was never disputed, and he is often described as a poets’ poet. Punjabi poet Surjit Patar says, “He will be counted as one of the top Punjabi poets of the twentieth century.” However, there was more [...]



उधर के लोगों की यात्राएँ: अजय नावरिया

कथेतर / Non-Fiction

अपने बीते हुए दिनों के किन्हीं अहम अनुभवों को याद करना बिलकुल इस तरह है कि कोई किसी ऐसी रेलगाड़ी में बैठ जाए जो वक्त की दिशा से विपरीत चलती जाए. यह रेलगाड़ी एक्सप्रेस या सुपरफास्ट तो बिलकुल नहीं होनी चाहिए; यह पैसेंजर होनी चाहिए या फिर सबसे सुधीर ब्रांच लाईन की गाडी.मुझे याद आती [...]



मेरे नॉवेल और पंजाब का दलित साहित्य: देसराज काली

कथेतर / Non-Fiction

पंजाब के दलित साहित्य या अपने नॉवेलों पर बात करने से पहले मैं कुछ उन पहलुओं पर बात करना चाहता हूँ, जो पंजाब के दलित साहित्य को अलग दर्शाते हैं। मेरा मानना यह भी है कि किसी इलाके के इतिहास को जाने बगैर आप वहाँ के साहित्य की किसी भी धारा को समझ नहीं सकते। [...]



मा/प्रति-मा: गिरिराज किराड़ू

कथेतर / Non-Fiction

सुमन्त्रः जयतु महा (इत्यर्धोक्ते सविषादम) अहो स्वरसादृश्यम। मन्ये प्रतिमास्थो व्यावहरतित। रामः कस्यासो सदृशतरः स्वरः पितुमे गाम्भीर्यात परिभवतीव मेघनादम्। यः कुर्वन् मम हृदयस्य बंधुशंका सस्नेहः श्रुतिपथमिष्टतः प्रविष्टः।। भास के प्रतिमानाटकम में भरत का स्वर ऐसा लगता है उनका नहीं है. पहले सुमन्त्र को लगता है भरत नहीं मृत दशरथ की प्रतिमा ही बोल रही है (III) [...]



भास की समकालीन व्याख्या: रतन थियम से संगीता गुन्देचा की बातचीत

कथेतर / Non-Fiction

मणिपुर के रंग निर्देशक रतन थियम पारम्परिक संस्कृत नाटकों को उनकी आधुनिक व्याख्या के साथ प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते है. उनका रंगकर्म अद्भुत रंग-संयोजन और अप्रतिम लय के कारण अनूठा है. वे अपना चित्रकार व कवि होना न सिर्फ़ अपनी चित्रकृतियों व कविताओं में व्यक्त करते है बल्कि उनका रंगकार्य भी इनका अचूक [...]



भास का अनुकीर्तन: कावालम नारायण पणिक्कर से संगीता गुन्देचा की बातचीत

कथेतर / Non-Fiction

केरल के सुविख्यात रंगनिर्देशक कावालम नारायण पणिक्कर संस्कृत के शास्त्रीय रंगमंच पर वर्षों से एक केन्द्रीय उपस्थिति रहे हैं. श्री पणिक्कर की अधिकांश रंगशिक्षा केरल के पारम्परिक परिवेश और वहाँ की कुडियाट्टम्‌ जैसी  पारम्परिक रंगशैलियों के मध्य हुई. पणिक्कर की नाट प्रस्तुतियों में संस्कृत रंगमंच की सदियों पुरानी परम्परा मानो हम तक अटूट चली आयी [...]



भास की उपस्थिति: संगीता गुन्देचा

कथेतर / Non-Fiction

(Kavalam Narayan Panikker’s production of Bhasa’s Karnabharam. Photo Courtesy Sangeeta Gundecha.) शताब्दियों तक संस्कृत के आद्य नाट्यकार महाकवि भास के नाटक अनुपलब्ध थे. उनका नाम संस्कृत और अन्य साहित्य परिसरों में चन्द्रिका की तरह फैला हुआ था पर उनके नाटकों के लिखित प्रारूप अनुपलब्ध थे. अब से ठीक सौ बरस पहले केरल में टी. गणपति [...]



भास का लोकरंग: हबीब तनवीर से संगीता गुन्देचा की बातचीत

कथेतर / Non-Fiction

भारतीय रंगमंच पर लोक रंगपरम्परा को उसके पूरे वैभव और परिष्कार में व्यवहृत करने वाले रंगनिर्देशक हबीब तनवीर छत्तीसगढ़ी बोली और हिन्दी में संस्कृत नाटकों के मंचन के लिए सुविख्यात हैं. हबीब तनबीर ने संस्कृत नाटकों के अलावा ब्रेख़्त, शेक्सपीयर, स्टीफ़न ज़्वायग की कृतियों को भी छत्तीसगढ़ी में मंचित किया है. इन्होंने ख़ुद भी कई [...]



कोई दूसरा अंत: गीत चतुर्वेदी

कथेतर / Non-Fiction

दुनिया के ख़त्म होने के दिन का गीत दुनिया को ख़त्म होना है जिस दिन एक मक्खी मंडरा रही है घास की पत्तियों के गिर्द मछुआरा लहराते जाल की मरम्‍मत कर रहा छोटी डॉल्फि़नें ख़ुशी से कूद रहीं समंदर में छज्जे के पास नन्ही गौरैया खेल रही हैं और सांप की त्वचा हमेशा की तरह [...]



Thirteen Ways of Reading Sappho: Aseem Kaul

कथेतर / Non-Fiction

Thirteen Ways of Reading Sappho Come, divine shell, / find your voice and sing. -          Sappho 1. So many translations. Guy Davenport renders this: “Lead off, my lyre, / And we shall sing together” Jim Powell: “Come now, my holy lyre, / Find your voice and speak to me” Willis Barnstone : “Come, holy tortoise [...]



अगर बच सका तो: गिरिराज किराड़ू

कथेतर / Non-Fiction

थोड़ा-सा: अशोक वाजपेयी अगर बच सका तो वही बचेगा हम सबमें थोड़ा-सा आदमी – जो रौब के सामने नहीं गिड़गिड़ाता, अपने बच्चे के नम्बर बढ़वाने नहीं जाता मास्टर के घर, जो रास्ते पर पड़े घायल को सब काम छोड़कर सबसे पहले अस्पताल पहुँचाने का जतन करता है, जो अपने सामने हुई वारदात की गवाही देने [...]



खुली हवा के गलियारे में – ‘अ’: अनिरुद्ध उमट

कथेतर / Non-Fiction

ज्योत्स्ना मिलन चिट्ठी यानी हाथ की लिखी, असली वाली चिट्ठी, ई-मेल वाली बिना किसी पहचान की वर्च्युअल चिट्ठी नहीं . हाथ की लिखी हर चिट्ठी की अपनी एक अलग पहचान होती है . उसी ककहरे और बाराखड़ी से बनी होती है हर लिखावट, तब भी होती है कितनी अलग एक दूसरी से. हर  लिखावट एक [...]



विशिष्टताओं के विरुद्ध: शिरीष कुमार मौर्य

कथेतर / Non-Fiction

हरेप्रकाश उपाध्याय के पहले संकलन ‘खिलाड़ी दोस्त तथा अन्य कविताएँ‘ पर एक फौरी पड़ताल 2000 के बाद की युवा कविता में जिन कवियों ने सबसे अधिक प्रभावित किया है, मेरे लिए उनमें हरेप्रकाश उपाध्याय का नाम बहुत ख़ासहै. उन्हें तीसरा अंकुर मिश्र कविता पुरस्कार मिला और अभी हाल में ही भारतीय ज्ञानपीठ से उनका पहला [...]



The Road To…: Stefan Jonsson

कथेतर / Non-Fiction

Lars Andersson’s sentences! Much of what is unique about his writing is encapsulated in this one small element: the construction of each individual sentence. If it weren’t for the fact that he squeezes every single word to its very limit, I would call his prose ecstatic. One might compare it to music, dance, or perhaps [...]



My Poetry: Firaq Gorakhpuri

कथेतर / Non-Fiction

My poetry predates my appearance as a poet. While I was yet a child, my mother and other members of my family noticed that I refused to go into the lap of an ugly woman or an un-handsome man. I detested not only physical ugliness, but showed an intense dislike for oddities of dress, conduct, [...]



Introducing Firaq Gorakhpuri (1896–1982): Noorul Hasan

कथेतर / Non-Fiction

It is difficult for me to write about Firaq Sahib entirely objectively. I was his student at Allahabad University even after he had officially retired. My association with him was confined not merely to the classroom – where he often spoke on a variety of subjects – but extended to his residence on Bank Road, [...]



Women and the Film World: Saadat Hasan Manto

कथेतर / Non-Fiction

Now that the Indian film industry has left its infancy, many people are talking about whether respectable women should be allowed to participate in it or not.  Many believe that they should be strongly encouraged to join in order to cleanse the film world of “impure” women, but there are also those who believe that [...]



Why I Don’t Go to the Movies: Saadat Hasan Manto

कथेतर / Non-Fiction

For a long time I’ve wanted someone to ask me why I don’t go to the movies.  At home I’ll get asked over and over why I don’t eat okra, and my friends have long wanted to know why I don’t wear Western pants.  Then both at home and elsewhere people have asked me why [...]