दिसम्बर २००९ / December 2009

कथेतर / Non-Fiction

आकी काउरिसमाकी – अबोलेपन का व्‍याकरण: गीत चतुर्वेदी

कथेतर / Non-Fiction

लगातार शून्‍य में देखते घबराए हुए-से चेहरे, देर तक की चुप्‍पी के बाद अप्रत्‍याशित रूप से आया कोई संवाद, निम्‍न मध्‍यवर्ग के जीवन की छोटी-छोटी आकांक्षाएं और उन्‍हें पूरा करने की राह में आने वाली बाधाएं, चीज़ों को न कर पाने, न कह पाने का बेचैन रोज़नामचा, लगातार टूटते और उसी रफ़्तार से नए बनते [...]



‘आठ और आधा’ के बहाने फ़ेल्‍लीनी पर कुछ फुटकर नोट्स: प्रमोद सिंह

कथेतर / Non-Fiction

कभी बात निकलती है तो मन में सवाल उठता ही है कि आख़ि‍र ऐसा क्‍या है फ़ेदेरिको फ़ेल्‍लीनी की फ़ि‍ल्‍मों में? ख़ास तौर पर उनकी अपनी इज़ाद विशिष्‍ट शैली के रचनात्‍मक चरम ओत्‍तो ए मेत्‍ज़ो में? बुनावट के वे क्‍या तत्‍व हैं आखिर कि उसे देखते हुए मन सिनेमा व उसकी सामाजिकता के ‘डेट’ व [...]



Poet of the Flaming Sutlej – Lal Singh Dil (1943-2007): Nirupama Dutt

कथेतर / Non-Fiction

How is one to remember Lal Singh Dil? The literary status of Dil in the world of Punjabi literature was never disputed, and he is often described as a poets’ poet. Punjabi poet Surjit Patar says, “He will be counted as one of the top Punjabi poets of the twentieth century.” However, there was more [...]



उधर के लोगों की यात्राएँ: अजय नावरिया

कथेतर / Non-Fiction

अपने बीते हुए दिनों के किन्हीं अहम अनुभवों को याद करना बिलकुल इस तरह है कि कोई किसी ऐसी रेलगाड़ी में बैठ जाए जो वक्त की दिशा से विपरीत चलती जाए. यह रेलगाड़ी एक्सप्रेस या सुपरफास्ट तो बिलकुल नहीं होनी चाहिए; यह पैसेंजर होनी चाहिए या फिर सबसे सुधीर ब्रांच लाईन की गाडी.मुझे याद आती [...]



मेरे नॉवेल और पंजाब का दलित साहित्य: देसराज काली

कथेतर / Non-Fiction

पंजाब के दलित साहित्य या अपने नॉवेलों पर बात करने से पहले मैं कुछ उन पहलुओं पर बात करना चाहता हूँ, जो पंजाब के दलित साहित्य को अलग दर्शाते हैं। मेरा मानना यह भी है कि किसी इलाके के इतिहास को जाने बगैर आप वहाँ के साहित्य की किसी भी धारा को समझ नहीं सकते। [...]



मा/प्रति-मा: गिरिराज किराड़ू

कथेतर / Non-Fiction

सुमन्त्रः
जयतु महा (इत्यर्धोक्ते सविषादम) अहो स्वरसादृश्यम। मन्ये प्रतिमास्थो व्यावहरतित।
रामः
कस्यासो सदृशतरः स्वरः पितुमे गाम्भीर्यात परिभवतीव मेघनादम्।
यः कुर्वन् मम हृदयस्य बंधुशंका सस्नेहः श्रुतिपथमिष्टतः प्रविष्टः।।

भास के प्रतिमानाटकम में भरत का स्वर ऐसा लगता है उनका नहीं है. पहले सुमन्त्र को लगता है भरत नहीं मृत दशरथ की प्रतिमा ही बोल रही है (III) और [...]



भास की समकालीन व्याख्या: रतन थियम से संगीता गुन्देचा की बातचीत

कथेतर / Non-Fiction

मणिपुर के रंग निर्देशक रतन थियम पारम्परिक संस्कृत नाटकों को उनकी आधुनिक व्याख्या के साथ प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते है. उनका रंगकर्म अद्भुत रंग-संयोजन और अप्रतिम लय के कारण अनूठा है. वे अपना चित्रकार व कवि होना न सिर्फ़ अपनी चित्रकृतियों व कविताओं में व्यक्त करते है बल्कि उनका रंगकार्य भी इनका [...]



भास का अनुकीर्तन: कावालम नारायण पणिक्कर से संगीता गुन्देचा की बातचीत

कथेतर / Non-Fiction

केरल के सुविख्यात रंगनिर्देशक कावालम नारायण पणिक्कर संस्कृत के शास्त्रीय रंगमंच पर वर्षों से एक केन्द्रीय उपस्थिति रहे हैं. श्री पणिक्कर की अधिकांश रंगशिक्षा केरल के पारम्परिक परिवेश और वहाँ की कुडियाट्टम्‌ जैसी  पारम्परिक रंगशैलियों के मध्य हुई. पणिक्कर की नाट प्रस्तुतियों में संस्कृत रंगमंच की सदियों पुरानी परम्परा मानो हम तक अटूट चली आयी [...]



भास की उपस्थिति: संगीता गुन्देचा

कथेतर / Non-Fiction

(Kavalam Narayan Panikker’s production of Bhasa’s Karnabharam. Photo Courtesy Sangeeta Gundecha.)
शताब्दियों तक संस्कृत के आद्य नाट्यकार महाकवि भास के नाटक अनुपलब्ध थे. उनका नाम संस्कृत और अन्य साहित्य परिसरों में चन्द्रिका की तरह फैला हुआ था पर उनके नाटकों के लिखित प्रारूप अनुपलब्ध थे. अब से ठीक सौ बरस पहले केरल में टी. गणपति शास्त्री [...]



भास का लोकरंग: हबीब तनवीर से संगीता गुन्देचा की बातचीत

कथेतर / Non-Fiction

भारतीय रंगमंच पर लोक रंगपरम्परा को उसके पूरे वैभव और परिष्कार में व्यवहृत करने वाले रंगनिर्देशक हबीब तनवीर छत्तीसगढ़ी बोली और हिन्दी में संस्कृत नाटकों के मंचन के लिए सुविख्यात हैं. हबीब तनबीर ने संस्कृत नाटकों के अलावा ब्रेख़्त, शेक्सपीयर, स्टीफ़न ज़्वायग की कृतियों को भी छत्तीसगढ़ी में मंचित किया है. इन्होंने ख़ुद भी कई [...]



कोई दूसरा अंत: गीत चतुर्वेदी

कथेतर / Non-Fiction

दुनिया के ख़त्म होने के दिन का गीत
दुनिया को ख़त्म होना है जिस दिन
एक मक्खी मंडरा रही है घास की पत्तियों के गिर्द
मछुआरा लहराते जाल की मरम्‍मत कर रहा
छोटी डॉल्फि़नें ख़ुशी से कूद रहीं समंदर में
छज्जे के पास नन्ही गौरैया खेल रही हैं
और सांप की त्वचा हमेशा की तरह सुनहरी है
दुनिया को ख़त्म होना [...]



Thirteen Ways of Reading Sappho: Aseem Kaul

कथेतर / Non-Fiction

Thirteen Ways of Reading Sappho
Come, divine shell, / find your voice and sing.
-          Sappho
1.
So many translations.
Guy Davenport renders this: “Lead off, my lyre, / And we shall sing together”
Jim Powell: “Come now, my holy lyre, / Find your voice and speak to me”
Willis Barnstone : “Come, holy tortoise shell, my lyre, / speak to [...]



अगर बच सका तो: गिरिराज किराड़ू

कथेतर / Non-Fiction

थोड़ा-सा: अशोक वाजपेयी
अगर बच सका
तो वही बचेगा
हम सबमें थोड़ा-सा आदमी –
जो रौब के सामने नहीं गिड़गिड़ाता,
अपने बच्चे के नम्बर बढ़वाने नहीं जाता मास्टर के घर,
जो रास्ते पर पड़े घायल को सब काम छोड़कर
सबसे पहले अस्पताल पहुँचाने का जतन करता है,
जो अपने सामने हुई वारदात की गवाही देने से नहीं हिचकिचाता –
वही थोड़ा-सा आदमी –
जो धोखा [...]



खुली हवा के गलियारे में – ‘अ’: अनिरुद्ध उमट

कथेतर / Non-Fiction

ज्योत्स्ना मिलन
चिट्ठी यानी हाथ की लिखी, असली वाली चिट्ठी, ई-मेल वाली बिना किसी पहचान की वर्च्युअल चिट्ठी नहीं . हाथ की लिखी हर चिट्ठी की अपनी एक अलग पहचान होती है . उसी ककहरे और बाराखड़ी से बनी होती है हर लिखावट, तब भी होती है कितनी अलग एक दूसरी से. हर  लिखावट एक अलग [...]



विशिष्टताओं के विरुद्ध: शिरीष कुमार मौर्य

कथेतर / Non-Fiction

हरेप्रकाश उपाध्याय के पहले संकलन ‘खिलाड़ी दोस्त तथा अन्य कविताएँ‘ पर एक फौरी पड़ताल
2000 के बाद की युवा कविता में जिन कवियों ने सबसे अधिक प्रभावित किया है, मेरे लिए उनमें हरेप्रकाश उपाध्याय का नाम बहुत ख़ासहै. उन्हें तीसरा अंकुर मिश्र कविता पुरस्कार मिला और अभी हाल में ही भारतीय ज्ञानपीठ से उनका पहला [...]



The Road To…: Stefan Jonsson

कथेतर / Non-Fiction

Lars Andersson’s sentences! Much of what is unique about his writing is encapsulated in this one small element: the construction of each individual sentence. If it weren’t for the fact that he squeezes every single word to its very limit, I would call his prose ecstatic. One might compare it to music, dance, or perhaps [...]



My Poetry: Firaq Gorakhpuri

कथेतर / Non-Fiction

My poetry predates my appearance as a poet. While I was yet a child, my mother and other members of my family noticed that I refused to go into the lap of an ugly woman or an un-handsome man. I detested not only physical ugliness, but showed an intense dislike for oddities of dress, conduct, [...]



Introducing Firaq Gorakhpuri (1896–1982): Noorul Hasan

कथेतर / Non-Fiction

It is difficult for me to write about Firaq Sahib entirely objectively. I was his student at Allahabad University even after he had officially retired. My association with him was confined not merely to the classroom – where he often spoke on a variety of subjects – but extended to his residence on Bank [...]



Women and the Film World: Saadat Hasan Manto

कथेतर / Non-Fiction

Now that the Indian film industry has left its infancy, many people are talking about whether respectable women should be allowed to participate in it or not.  Many believe that they should be strongly encouraged to join in order to cleanse the film world of “impure” women, but there are also those who believe that [...]



Why I Don’t Go to the Movies: Saadat Hasan Manto

कथेतर / Non-Fiction

For a long time I’ve wanted someone to ask me why I don’t go to the movies.  At home I’ll get asked over and over why I don’t eat okra, and my friends have long wanted to know why I don’t wear Western pants.  Then both at home and elsewhere people have asked me why [...]



Manto’s Life in Bombay: Matt Reeck & Aftab Ahmed

कथेतर / Non-Fiction

In 1936 Manto arrived in Bombay; he was twenty-four years old.  Nazir Ludhianvi had called him there to work at the Clare Road offices of his weekly, The Painter, and Manto slept in the paper’s offices until he had enough money to rent a room in a squalid tenement nearby — a two-story building with [...]



माँस की जमीन पर: तुषार धवल

कथेतर / Non-Fiction

कवि चित्रकार-अनुवादक-फिल्मकार दिलीप चित्रे)
दिलीप चित्रे की कविताओं को पढ़ना जीवन के दुरूह बीहड़ से गुजरने जैसा है। जीवन के जिन ऊबड़ खाबड़ और दुर्गम रास्तों से कवि गुजरा है उसी से उसने अपना सत्य, अपना अस्तित्व तलाशा है। चित्रे की कविताओं का जगत उलझनों, गहरी पीड़ा, आक्रोश और मांसलता का कार्यव्यापार है जो मृत्यु  से [...]



निर्मल वर्मा की चिट्ठियों के वे दिन: ज्योत्स्ना मिलन

कथेतर / Non-Fiction

कितना अच्छा था कि निर्मलजी से परिचय और दोस्ती के वे दिन अभी चिट्ठियाँ लिखने के दिन थे. चिट्ठी यानी हाथ की लिखी, असलीवाली चिट्ठी, ई-मेल वाली बिना किसी पहचान की, वर्च्युअल चिट्ठी नहीं. हाथ की लिखी हर चिट्ठी की अपनी एक अलग पहचान होती है. उसी उसी ककहरे और बाराखड़ी से बनी होती है [...]



अकथ कहानी प्रेम कीः पुरूषोत्तम अग्रवाल

कथेतर / Non-Fiction

कबीर के प्रसंग में जो बात सबसे पहले ध्यान खींचती है, वह है उन्हें कवि मानने में सर्वव्यापी संकोच। लिंडा हैस्स ने जरूर कबीर को प्राथमिक रूप से कवि मानते हुए विचार किया है; बाकी अध्येता कबीर की व्यंग्य-प्रतिभा की प्रखरता मानते हुए भी, कबीर को ‘वाणी का डिक्टेटर’ मानते हुए भी, उनके कवित्व को [...]



मैं चुपके से कहता अपना प्यार: जॉन बर्ज़र

कथेतर / Non-Fiction

John Berger’s fascinating piece in memory of Nazim Hikmet — in which it is near- impossible to ascertain whether the ‘memories’ it describes are real or imaginary — in an equally fascinating Hindi translation by Bharatbhooshan Tiwari.

जॉन बर्ज़र का नाजिम हिकमत की स्मृति में सम्मोहक गद्य, जो यह तय कर सकना बहुत मुश्किल कर देता है कि वह स्मृति ‘वास्तविक’ है या ‘काल्पनिक’; भारतभूषण तिवारी के उतने ही सम्मोहक हिन्दी अनुवाद में.



जीवन महाकाव्य: राय आनंद कृष्ण और व्योमेश शुक्ल

कथेतर / Non-Fiction

Hindi poet Vyomesh Shukla’s dialogue on art critic Rai Krishna Das, with his son and well-known art historian Rai Anandkrishna, is also a dialogue about Kashi and its elite of the nineteenth century, the ‘Kashi Renaissance’ and its leading personality Bhartendu Harishchandra, and some of Hindi’s old ‘in-house’ controversies – the ‘myth of Premchand’s poverty’ and the mystery behind the first modern, canonical critic Ramchandra Shukla’s appointment in the Hindi Department of the Benares Hindu University.

कलावंत रायकृष्णदास के बारे में उनके पुत्र, जाने माने कलाइतिहासकार राय आनंदकृष्ण से हिन्दी कवि व्योमेश शुक्ल का संवाद जो काशी और उसके उन्नीसवीं सदी के ‘रईसों’, ‘काशी नवजागरण’ और उसके शीर्ष व्यक्तित्व भारतेंदु हरीशचन्द्र और हिन्दी के कुछ पुराने इन-हाउस विवादों – ‘प्रेमचंद की गरीबी का मिथक’ और पहले आधुनिक, कैननिकल आलोचक रामचन्द्र शुक्ल की बीएचयू में नियुक्ति – पर भी एक संवाद है.



A Poet Bursting into Color: Teji Grover

कथेतर / Non-Fiction

कैनवस और रंगों के साथ उनके एडवेंचर्स के बारे में कवि तेजी ग्रोवर का गद्य

Teji Grover on when writers turn to painting.



Notes on Comfort: Akhil Katyal

कथेतर / Non-Fiction

‘आराम के विमर्श’ पर अखिल कात्याल का ललित निबंध, अंग्रेजी में
Akhil Katyal’s essay on the ‘rhetoric of comfort’.



एक वैकल्पिक धर्म-लोक: काँचा इलैया

कथेतर / Non-Fiction

दलित बहुजन देवियाँ और देवता
कई ऐसे देवी-देवता हैं जिनकी जातिगत या क्षेत्रीय खासियतें हैं. मगर इन सबमें एक चरित्रगत समानता है. वे जिस चेतना को बढ़ाते हैं या उनका जो परिप्रेक्ष्य आधार है उसमें वे एकसमान हैं. इन देवी-देवताओं  के इर्द-गिर्द जिस चेतना का निर्माण होता
है वह चेतना उत्पादन प्रक्रियाओं से गहरे जुड़ी है. [...]



द्विभाषी बौद्धिकता का उत्‍थान और पतन: रामचंद्र गुहा

कथेतर / Non-Fiction

1
यह निबंध विद्वान लाइब्रेरियन बी एस केशवन और उनके पुत्र मुकुल के बीच हुई बहस से प्रेरित है, जिसमें मैं एक मूकदर्शक की तरह शामिल था। मैं अब भूल गया हूं कि वे किस बात पर लड़ रहे थे। लेकिन मुझे याद आता है कि पिता 90 वर्ष की उम्र के बावजूद अपनी [...]



वो कई दूसरे जो मैं हुआ करते थे और यह एक मैं: गिरिराज किराड़ू

कथेतर / Non-Fiction

An album of contexts and texts: Self as Translation(s)
The original is not faithful to the translation. (Borges?)
1. मैं एक बढ़ई हूँ, 1982-1983/ I am a Carpenter, 1982-83
मैं यह सब लिखते हुए वहाँ जा कर उसे नाप नहीं सकता ना फोन करके किसी से ठीक ठीक जान लेना चाहता हूँ पर वो शायद 18×30 के प्लाट [...]



Kunwar Narain’s Speech On The Occasion Of The 41st Jnanpith Award

कथेतर / Non-Fiction

अपूर्व नारायण के अंग्रेजी अनुवाद में.

In English translation by Apurva Narain.



बनारसः अनिल यादव

कथेतर / Non-Fiction

Anil Yadav’s non-fiction piece on Banaras.

एक ‘अपात्र’ बनारसी का बनारस और बनारस पर पड़ने वाली देशी-विदेशी नज़रों पर गद्य.



तय था हत्या होगी: पल्लव

कथेतर / Non-Fiction

Non-fiction piece by Pallav that tries to locate farmers in Hindi fiction in the context of their post-liberalisation tragedy and suicides.

भारतीय किसानों की उत्तर-उदारीकरण त्रासदी और उनकी आत्महत्याओं की पृष्ठभूमि में हिंदी के कथा संसार में किसानों को ढूँढने का प्रयत्न करता हुआ पल्लव का निबंध.



विधि का विधान: गिरिराज किराड़ू

कथेतर / Non-Fiction

गिरीश के लिये
श्याम के सपने
स्वर्ग के फाटक पर रामधन खड़ा है अन्दर जमना सफ़ेद कपडे पहने हुए एकदम शांत गंभीर फाटक के ऊपर आपने वो जो नाल दिखायी थी घोडे की वो नाल जड़ी हुई है दूर क्षितिज से एक लकीर की तरह रास्ता चला जा रहा है उसी पे तन्ना घिसटते हुए जा रहा [...]



अनोखी सती कथाएँ और एक ‘अवध्य’ पुस्तक: गिरिराज किराड़ू

कथेतर / Non-Fiction

एक किताब पर लिखने के बारे में लिखने की कोशिशें
झूमा सती
मिथराऊ नाम का एक गाँव था. आजकल पाकिस्तान में है. वहाँ के निवासी बलूची लोगों के हमलों से इतना डर गये कि उन्होंने सोचा यदि हमारे गाँव के लिये कोई सती हो जाये तो शायद उसी के तेज से बलूच डर जायें. पर पूरे गाँव [...]



अमिताव घोष और उनका उपन्यास सी ऑफ पॉपीज (अफीम का सागर): प्रभात रंजन

कथेतर / Non-Fiction

अमिताव घोष अंग्रेजी में लिखने वाले समकालीन भारतीय लेखकों में प्रथम पंक्ति के लेखकों में गिने जाते हैं। सलमान रूश्दी और विक्रम सेठ के साथ घोष को उन लेखकों में गिना जा सकता है जिनके उपन्यासों ने भारतीय अंग्रेजी लेखन की विष्वव्यापी पहचान स्थापित की। सी ऑफ पॉपीज उनका सातवां और अब तक का सबसे [...]



अपने मूल निवास का यही तिलिस्म है: गिरिराज किराड़ू

कथेतर / Non-Fiction

पानी गिर रहा है
पानी गिर रहा है
बरसात की जगह –
जहाँ मैं रह रहा हूँ
बरसात का मेरा घर
बरसात की मेरी सड़क
बार बार भींगते हुए
बरसात का मूल निवासी ।
अरी! बरसात की गीली चिड़िया
पंख फड़फड़ा
शाखा पर भीगते बैठी रह
अभी आकाश बरसात का है
पानी के बंद होते ही
बरसात से सब कुछ होगा निर्वासित
मैं भी!
अपने मूल निवास का यही तिलिस्म [...]



सरेनिटी का संगीत: भारत भूषण तिवारी

कथेतर / Non-Fiction

काबुल नदी में कपड़े धोती औरतें
न्यू यॉर्क टाईम्स में एक तस्वीर
15 नवम्बर 2001
कल वे थीं,
काली पुती खिड़कियों वाले
घरों में ठुँसी हुईं
आज, वे घूमती हैं
इस नदी के किनारे
रेन्वा की पेंटिंग में
बतियाती औरतों की मानिंद.
बैंगनी, चटख हरे, नारंगी
रंग-बिरंगे कपड़ों का अक्स
पानी में पड़ता है,
ऊपर तक भरी टोकरियाँ,
चटकीले बुर्के
बेपरवाही से ओढ़े गए, ढलके हुए,
नंगे पाँव, सर फिर [...]



विष्णु खरे की कविता ‘जो मार खा रोईं नहीं’ का एक ख़याल-पाठ: गीत चतुर्वेदी

कथेतर / Non-Fiction

हिंदी कविता के पारंपरिक काव्‍य-आस्‍वादन-पठन-अभिरुचियों की रूढ़ता को विष्‍णु खरे की कविता जिस तरह-जितनी बार-जितने तरीक़ों से तोड़ती है, उनकी कविता के बारे में उतने ही रूढ़ शब्‍द-क्रम में बात की जाती है- मसलन वह रूखे गद्य के कवि हैं, तफ़सीलों का बोझ उनकी कविता को दोहरा कर देता है, ‘अगर कुछ कम कहते या [...]



The City and (Im)Passivity: Nitasha Kaul

कथेतर / Non-Fiction

Cities are often seen as sites of exaggerated movement – as busy and bustling places of constant activity – where neon signs flash, cars honk, and people jostle in crowds.
In contrast, the images I’ve chosen for this photo-essay deliberately begin with the ‘Stop’ sign; they convey the city through stillness. The subjects of these pictures [...]



खूबसूरत टैंकों के देश में जहाँ सरस्वती को हाकडा कहते हैं: प्रेम चन्द गांधी

कथेतर / Non-Fiction

पिछली बार मैं यहाँ दिसम्बर की कड़कड़ाती ठण्ड में आया था। उस वक्त फलों और सूखे मेवे की पेटियां लिए कुली दौड़ते चले आ रहे थे। नीली वर्दी में भारतीय और में पाकिस्तानी कुली। इस बार बस इक्का-दुक्का कुली नजर आ रहे हैं। पहले भारतीय सीमा पर हुई जाँच के बाद पाक सीमा पर एक [...]



वह भी कोई देश है महाराज 2: अनिल यादव

कथेतर / Non-Fiction

हम दोनों को ही जोरदार पूर्वाभास था कि कहाँ जाना है और वहाँ हमारा स्वागत करने वाले लोग कौन होंगे.
…लेकिन स्टेशन से बाहर निकलते ही सबसे पहले तामुल खाना चाहता था. इस नशीली सुपारी से मेरा बचपन से भय, जुगुप्सा, अपराध बोध और आकर्षण का संबंध रहा है. सबसे पहले इस तामुल ने ही मेरे [...]



Exploring the Sakshi Bhava: Nand Kishore Acharya in Conversation

कथेतर / Non-Fiction

Giriraj: Your creative talent, given the popular difference between the creative and the critical, has found expression in lyrical and dramatic forms, which according to Aristotle are types of poetry or poesy. This could be my preface to our dialogue on your plays and as well as an indicator to see it as an abiding [...]



मुझे बस उत्सव में शामिल कर लोः मनोज कुमार झा

कथेतर / Non-Fiction

बाँसक ओधि उखाड़ि करै छी जारनि
हमर दिन नहि घुरतकि हे जगतारिनि
(नागार्जुन, पत्रहीन नग्न गाछ, १९६८)
(बाँस की जड़ें खोदकर लाता और मात्र वही जलावन, ऐ जगतारनी क्या मेरे दिन नहीं फिरेंगे?)
एक स्त्री के द्वारा बाँस की जड़ें उखाड़कर अपने हिस्से की आग जुटाने का कठिन श्रम, उस जड़ के जलने से उठ रहे पुतली झँवा देने [...]



कविता चींटियों की बांबी में लगी ख़तरे की घंटी है: गीत चतुर्वेदी

कथेतर / Non-Fiction

आज की कविता के बारे में कुछ भी बोलने से पहले मैं उस समाज के बारे में सोचता हूँ, जिसमें मैं रहता हूँ, जो कि बोर्हेस के शब्दों में ‘स्मृतियों और उम्मीदों से पूर्णत: मुक्त, असीमित, अमूर्त, लगभग भविष्य-सा’ है; मैं उस भाषा के बारे में सोचता हूँ, जिसमें मैं सोचता-लिखता हूँ, जो कि, जैसा [...]



Muslim Rantings In The Land Of Buddhist Oral Tradition: Noor Zaheer

कथेतर / Non-Fiction

A contention is often made by scholars and critics that, for a writer, the exterior atmosphere is something that is always present in the ‘self’, and invariably affects the creative thought process. My presentation is about the process of expanding the ‘self’ or adding other ‘selfs’ through a change of the exterior. Moving away to [...]



Lost Loves: Arshia Sattar

कथेतर / Non-Fiction

EXPLORING RAMA’S ANGUISH IN THE VALMIKI RAMAYANA
My abridged translation of Valmiki’s Ramayana was published at the very end of 1996. When I got the first copies, I was awed by the gravitas the work had acquired by being transformed into a heavy, black-jacketed hardback book. I put it away in my book shelf and never [...]



The Bahuroopiya in a Bhoolbuliya: Priya Sarukkai Chabria

कथेतर / Non-Fiction

Rupture and Rapture
The processes of creativity fascinate me as much as the act of writing itself. What are the transformations occurring in the writer’s imagination and persona that make for a spell of writing? How can this be sustained? Is there another, less explored aspect beyond or beneath the pull of creative expression that propels [...]



Self and Beyond: K. Satchidanandan

कथेतर / Non-Fiction

The Impossibility of Translation
Stammer is no handicap.
It is a mode of speech.
Stammer is the silence that falls
between the word and its meaning,
just as lameness is the silence
that falls between the word and the deed.
Did stammer precede language
or succeed it? Is it only
a dialect or a language itself? :
These questions make the linguists stammer.
Each time we [...]