आज़ादी विशेषांक / Freedom Special

अंक 13 / Issue 13

फीचर्स / Features

ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाही/ The City’s Forgotten Double

फीचर्स / Features

गाँव आधुनिकता और विकास की कर्मभूमि शहर का स्वाभाविक अन्य रहा है . इस भुला दिये गये अन्य के साथ शहर का संबंध निरंतर जटिल और अन्यायमूलक होता गया है. अमित चौधरी, सुनील गंगोपाध्याय और प्रेमेन्द्र मित्रा के लेखन और लोकप्रिय सिनेमा में गाँव की निर्मितियों को प्रश्नांकित करता हुआ युवा अंग्रेज़ी लेखक सुमना रॉय का निबंध इस अन्यता और अज़नबियत का पाठ खुद अपने लेखन के बरक़्स करता है. ऋत्विक घटक के सिनेमा पर कवि और अभिनेता ट्रिना बनर्जी का शोध-पत्र निर्वासन और यात्रा के रूपकों में शहर और गाँव के संबंध को समझने की कोशिश करता है. काशीनाथ सिंह के हिंदी उपन्यास काशी का अस्सी के अपने बेजोड़ पठन में युवा आलोचक हिमांशु पंड्या एक शहर के भीतर मौज़ूद देहात द्वारा किये जा रहे समूचे संसार के देहातीकरण को भूमंडलीकरण द्वारा किये जा रहे संस्कृतियों के समरूपीकरण के विरुद्ध एक प्रभावी प्रतिरोध की तरह पढ़ते हैं. वरूण ग्रोवर का टेलिविजन पर गाँव की छवियों की कथा कहता हुआ लेख खुद और मिहिर पंड्या का अपने छोटे शहर लौटने का वृतांत ऐसे पाठ हैं जिनमें अपने अपने देहात/देहातनुमा शहरों को छोड़ चुके आख्याता उसके साथ फिर एक संबंध बनाने की कोशिश करते हैं.

The village is the natural ‘other’ to the playground of modernity and progress that is the city. The city’s relationship to this forgotten other has progressively become more complex and unjust. Sumana Roy’s piece on this other-ness and alienation questions the representations of the village in the writings of Amit Chaudhuri, Sunil Gangopadhyay and Premendra Mitra, in popular cinema and, indeed, in her own work. Trina Banerjee’s paper on the cinema of Ritwik Ghatak tries to understand the metaphors of exile and travel in relation to the city and village. Himanshu Pandya’s piece on Kashinath Singh’s novel Kashi ka Assi reads the provincialization of the whole world by a village inside a city as an effective resistance against the normalization of cultures happening through globalization. Varun’s piece on representation of the village on TV and Mihir Pandya’s piece on his return to his small town are two texts in which an author who has left an almost-village home tries to reestablish a relationship with it.



(आपकी) सभ्यता के परे / Beyond (Your) Civilization

फीचर्स / Features

इस खंड के दो पाठों को आदिवासी जीवन पद्धति और आधुनिक राष्ट्र राज्य के उसके साथ विकटतर हो रहे संबंध की पृष्ठभूमि में पढ़ा जा सकता है. प्रसिद्ध गोंड-परधान चित्रकार जनगढ़ सिंह श्याम की कला पर लिखी गयी हिन्दी कवि-कथाकार उदयन वाजपेयी की पुस्तक पुस्तक जनगढ़ कलम, तेजी ग्रोवर और रुस्तम (सिंह) के अंग्रेजी अनुवाद में,उस साभ्यतिक काउंटर प्वाईंट को निरंतर कहने के साथ ही जो आदिवासी कल्पना में रहा आया है , उस व्यक्तिगत प्रतिभा की भी कथा कहती है जो एक परंपरा का पुनराविष्कार करती है. रणेन्द्र का उपन्यास ग्लोबल गाँव के देवता असुर समुदाय के समकालीन संकट का एक यथार्थवादी चित्रण है जो ‘विकास’ की आधुनिक एजेंसियों द्वारा किये जा रहे उपेक्षित समुदायों के नये हाशियाकरण की तरह पढ़ा गया है. उसके कुछ अंशों का अंग्रेज़ी अनुवाद राजेश कुमार ने किया है.

The texts in this section can be read against the backdrop of tribal life and its increasingly precarious relation to the modern nation state. Udayan Vajpeyi’s book on the art of famous Gond artist Jangadh Singh Shyam (in Teji Grover and Rustam (Singh)’s translation) tells not only the story of an individual talent rediscovering tradition, but also of the social counterpoint that has always lived in the tribal imagination. Ranendra’s novel God of the Global Village is a realistic depiction of the contemporary crisis in the Asur community, reading it as the marginalization of overlooked communities by the modern agencies of ‘progress’– an excerpt is presented here, in Rajesh Kumar’s English translation.



गाँव चलो / A Journey to the Village

फीचर्स / Features

इस खंड के सातों पाठों में एक शहरी/मेट्रोपोलिस आख्याता गाँव की यात्रा करता है. सुंदरवन के पर्यावरण संकट पर अध्ययन करने के सिलसिले में गीताश्री वहाँ जाती हैं और उनका गद्य संकट की एक प्रामाणिक रिपोर्ट प्रस्तुत करने के साथ साथ लेखक के भीतर शुरू हुई यात्रा का एक व्यक्तिगत वृतांत भी बन जाता है. ‘बिहार का शोक’ कही जाने वाली कोसी से गुजर रहे अध्ययनकर्ताओं व पत्रकारों के दल में शामिल दीपिका की नज़र एक बाहरी की तटस्थता के बावजूद नेहरूवादी विकास मॉडल को शोक के असली मानव-निर्मित कारक की तरह देख पाने से नहीं चूकती है. पंजाब के गाँवों में सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में भटकते हुए एनी ज़ैदी को कंकाल स्त्रियां मिलती हैं और वे पंजाब के ‘विकसित’ होने के लोकप्रिय मिथ के और ‘वर्ल्ड-क्लॉस’ विकास के हमारे सामूहिक आत्म-छल के पार देख पाती हैं. राजस्थान के गाँवों में अपनी सांवेदनिक बुनावद में गाँव के कवि प्रभात और उनके साथी विष्णु गोपाल मीणा यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि जंगल बचाने के लिये मनुष्यों को विस्थापित कर रही व्यवस्था के पास मनुष्यों को बचाने के लिये कोई जुगत है कि नहीं? एक कहानी की शक्ल में लिखा गया पीयूष दईया का पाठ उत्तरांचल में स्थित है और एक शिक्षापरक उद्देश्य के लिये लिखा गया है. यह कहानी आधुनिक शिक्षा में निहित औपनिवेशिकता के सम्मुख सर्जनात्मक कल्पना के सामर्थ्य का एक बेहतर उदाहरण है. शेष खंड से भिन्न दो पाठों में व्योमेश शुक्ल और गिरीन्द्रनाथ क्रमशः प्रेमचंद और फणीश्वरनाथ रेणु के गाँवों की यात्रा करते हैं यह जानने के लिये कि उनकी खुद अपने गाँवों में कैसी और कितनी उपस्थिति है? व्योमेश के वृतांत में प्रेमचंद की स्मृति के साथ स्थानीय लोगों और सरकार जैसी एजेंसियों के बदलते बर्ताव के बीच एक महान लेखक का मरणोपरांत जीवन फिर भी किसी तरह रहता है लेकिन लगाव और दूरी के बेहतरीन संतुलन से लिखे गये गिरीन्द्र के लेख में रेणु अपने गाँव में पूरी तरह अनुपस्थित हैं, एक तरह की अंतिम, निर्विकल्प, उदास अनुपस्थिति.

In all the (seven) texts in this section, a narrator from the city travels to the village. Geeta Shree goes to the Sundarbans to study the environmental crisis there, and her text presents not only a factual report of the crisis but a description of the journey that starts inside the author as well. Deepika Arwind, part of a group of academics and journalists gone to study the sorrow of Bihar, i.e. the Kosi, does not, despite an outsider’s neutrality, shirk from seeing the Nehruvian development model as the real, man-made reason behind the sorrow. Wandering through the Public Health Centers of Punjab, Annie Zaidi meets malnourished women and sees through the popular myth of Punjab’s development’ and the mass delusion of ‘world-class’ development. Poet of the village, Prabhat, and Vishnu Gopal Meena travel through two Rajasthani villages, trying to understand whether a system that displaces human beings to save forests also has a solution to save humans. Piyush Daiya’s text, set in Uttaranchal and written as a fiction with educational motives, is a great example of the power of the creative imagination against the inherent colonialism of modern education.In the remaining two texts, Vyomesh Shukla and Girindranath visit the villages of Premchand and Phanishwar Nath Renu respectively, to find out how much and what kind of presence they retain in their own villages. In Vyomesh’s piece, one sees how, amidst the changing attitudes of the local people and governmental agencies towards the memory of Premchand, how a great writer still lives on after his death. But in Girindra’s text, finely balanced between emotion and detachment, Renu is completely absent from his village: a final, unequivocal, depressing absence.



प्रति-कल्पना / Counter-Imagination

फीचर्स / Features

दलित लेखन ने मुख्यधारा लेखन में परिकल्पित (इमेजिंड) के समांतर, अक़्सर उसके विरुद्ध, एक नया गाँव रचा है. उसके बारे में यह कहा जा सकता है कि वह भी उतना ही इमेजिंड है लेकिन उसने “गाँव” के आशयों में एक ऐसा विचलन घटित किया है कि बिना उसकी प्रति-कल्पना की सन्निधि के गाँव की कोई गाथा अब पूरी नहीं हो पायेगी. इसके साक्ष्य सुभाष नीरव और घनश्याम रंजन के हिन्दी अनुवादों में देसराज काली, भगवंत रसूलपुरी और मक्खन मान की पंजाबी कहानियों और मीना कंदसामी के अंग्रेज़ी अनुवाद में रविकुमार की तमिल कविताओं में पढ़े जा सकते हैं.

Dalit writing has often created a new village counter to the one imagined in mainstream writing. It could be said that that too is, to the same extent, imagined – but it has occasioned such a destabilization in the significations of ‘village’ that, without facing up to this counter-imagination, no story of the village can be complete. As proof of this, read the Punjabi stories by Desraj Kali, Bhagwant Rasoolpuri and Makhan Mann (in Subhash Neerav and Ghanshyam Ranjan’s Hindi translations), as well as Meena Kandasamy’s translations of Ravi Kumar’s Tamil poems.



गाँव और नये लेखकः कविता / Village and the New Writers: Poetry

फीचर्स / Features

ज्यादातर समकालीन लेखक शहरों में रहते हैं, उनमें से कई गाँवों से आये हैं. संसार को एक गाँव की तरह देखने वाली कल्पना और गाँव को भविष्य के स्थापत्य की तरह देखने वाली कल्पना के धीरे धीरे लुप्त होने के साथ साथ लेखन की संवेदन-भूमि के रूप में भी गाँव विस्थापित हुआ है. बोधिसत्व, एकांत श्रीवास्तव, विनोद पदरज हिन्दी में इस संवेदना के जाने माने कवि हैं; रॉबर्ट हक्सटेड के अंग्रेज़ी अनुवाद में कृष्ण मोहन झा की और मूल में प्रभात, मनोज कुमार झा और शरण्या की कविताएँ जहाँ संसार को एक गाँव की तरह देखने वाली कल्पना का सशक्त पुनराविष्कार हैं वहीं उमाशंकर चौधरी की कविता में एक व्यक्तिगत, सबऑल्टर्न संघर्ष को कवि एक राष्ट्रीय आख्यान से मिला देता हैः गाँव में पिता बहादुर शाह जफ़र हो जाते हैं और उनका संघर्ष 1857 का असफल विद्रोह.

Most contemporary writers live in the city; many of them have come from villages. While the imagining of the world as a village, or the village as a part of the future, has slowly disappeared, the village as the site of creative imagination has also been displaced. Bodhisattva, Ekant Srivastav and Vinod Padraj are the famous Hindi writers of this sensibility. The poems presented here, by Krishnamohan Jha (in Robert Hueckstedt’s translation), Prabhat, Manoj Kumar Jha and Sharanya Manivannan are a powerful rediscovery of an imagination that sees the world primarily as village, while Umashankar Chaudhary’s poem conflates an individual, subaltern struggle with the national narrative: the father in the village becomes Bahadur Shah Zafar, and his struggle the unsuccessful revolt of 1857.



गाँव और नये लेखकः कथा / Village and the New Writers: Fiction

फीचर्स / Features

मृदुला कोशी के अप्रकाशित, अब तक अनाम अंग्रेज़ी उपन्यास में कथा भारत के दक्षिण में केरल से अमेरिकी मिडवेस्ट तक फैली हुई है. प्रकाशित अंश में इसका मुख्य पात्र उन्नीकृष्णन हड़ताल और कम्युनिस्ट सरगर्मी के बैकड्रॉप में बरसों पुराना वह दिन याद कर रहा है जब एक स्त्री खुद को बिना कपड़ों के कैद किये जाने का प्रतिरोध करते हुए एक गाँव के बीच से निर्वस्त्र गुजर जाती है. हरे प्रकाश उपाध्याय और कुणाल सिंह के उपन्यास अंशों में दो भिन्न तरह के गाँव हैं. हरेप्रकाश की कथा में गाँव के जीवन के कुछ परिचित चित्र और शहर के साथ उसकी डॉयनमिक्स एक आत्मीय कथा-शैली में उभरते हैं जबकि कुणाल सिंह के आदिग्रामउपाख्यान में गाँव एक ऐसी डिस्टोपियाई फंतासी के कथावाचन की जगह है जिसमें कलिंग युद्ध तीसरा विश्व युद्ध बन जाता है और ‘सेनापति’ ‘राजा’ को एसएमएस से युद्ध शुरु होने की सूचना देते हैं. चरण सिंह पथिक न सिर्फ गाँव में रहते हैं वैसा ही उनका जीवन भी है. शायद इसी कारण, उनके लेखन में गाँव की उपस्थिति बहुत अंतरंग और जीवंत है. उनकी कहानी यात्रा में दो प्रतिस्पर्धी तीर्थयात्राएँ और उनके प्रति निवासियों की प्रतिक्रिया विज्ञापन-युद्ध का एक चुटीला देसी संस्करण बन जाती हैं. खंड की अंतिम कथा शरथ कुमारराजू की द क्लाक टावर है.

Mridula Koshy’s as-yet-unpublished novel ranges over Kerala and the American mid-west. In the excerpt here, the barber Unnikrishnan remembers Annakutty – a young woman who reacted with defiance when shewas caught with her lover and stripped of her clothes in an attempt to confine her to the house –against the backdrop of a rubber-tappers’ strike and Communist party machinations.There are two different sorts of villages in the novel-excerpts from Hare Prakash Upadhyay and Kunal Singh. In Hare Prakash’s story, some familiar images of village life and their dynamic with the city is explored in a personal narrative-style, whereas in Kunal’s Aadigramupakhyan, the village is the site for telling a dystopian fantasy where the Kalinga War turns into World War III and the ‘general’ informs the ‘king’ that the war has begun by sending an SMS. Charan Singh Pathik not only lives in a village but his lifestyle too is the same. Perhaps that is why the presence of the village in his writing is so intimate and lively. In his story, Yatra, two competing pilgrimages and the reaction of the villagers to them turns into a rural version of a media-war. The last piece in this feature is Sharath Komarraju’s The Clock Tower, the second story in his series of little mysteries, which plays out in a village.



देशज आधुनिकता का जन्म / The Birth of Indian Modernity

फीचर्स / Features

पुरूषोत्तम अग्रवाल की पुस्तक अकथ कहानी प्रेम की कबीर के कालखंड को देशज आधुनिकता के उदय होने के समय की तरह स्थापित करती है. इस पुस्तक पर विनोद शाही और राजेन्द्र पॉण्डेय की समीक्षाएँ और मीरां की कविता का एक नया पाठ करता हुआ माधव हाडा का लेख मिलकर इस खंड को पूरा करते हैं.

Purushottam Agrawal’s book Akath Kahani Prem Ki establishes Kabir’s period as the time of the birth of Indian modernity. This feature comprises readings of the book by Vinod Shahi and Rajendra Pandey, as well as a new reading of Mira’s poetry by Madhav Hada.



बिज्जी / Bijji

फीचर्स / Features

समकालीन भारतीय लेखकों में बिज्जी सबसे अनूठे हैं. अपना सारा जीवन जोधपुर के एक गाँव बोरूंदा में बिताने वाला यह डोकरा भारतीय आत्मा का लोक गायक है. यह अंक बिज्जी और उनके अभिन्न मित्र दिवंगत लोक कला मर्मज्ञ कोमल कोठारी के जीवन और कर्म को समर्पित है. क्रिस्टी मेरिल द्वारा अनूदित उनकी कहानी के प्रकाशन की अनुमति देने के लिये कथा के और हिन्दी कवि-कथाकार उदय प्रकाश द्वारा उन पर बनाई गई फिल्म को अपलोड करने की अनुमति के लिये हम निर्देशक और साहित्य अकादेमी के आभारी हैं.

Bijji is unique among contemporary Indian writers. He is the folk-singer of the Indian soul. This issue is dedicated to Bijji and to his dear friend, the folklorist and ethnomusicologist Komal Kothari, their life and work. We are thankful to Katha for permitting us to carry Christi Merrill’s translation of Bijji’s story, and to Uday Prakash and the Sahitya Akademi for permitting us to upload Uday’s film on Bijji.



असबाब में देवता: वार्षिकांक विशेष कविता / A God in Your Luggage: Anniversary Special Poetry

फीचर्स / Features

अशोक वाजपेयी और वीरेन डंगवाल से अधिक एक दूसरे से भिन्न दो कवि हिन्दी में नहीं हैं. एक मध्यकालीन फ्रेंच मठ/गाँव आविन्यों में रहते हुए लिखी गई अशोक वाजपेयी की कविताओं और कविता-जैसे-ही गद्य में अनुपस्थिति, ईश्वरहीनता, नश्वरता, जीवन में कविता की जगह और सब चीज़ों के पड़ोस के रूप में पृथ्वी जैसी उनके लेखन की कुछ स्थायी थीमें एक दूसरे देश-काल की छाया में पुनर्विन्यस्त हैं. वीरेन डंगवाल की कविता कटरी की रुकुमिनी और उसकी माता की खंडित गद्यकथा विट् और उम्मीद के उनके काव्यशास्त्र में एक कथात्मक, गद्यमय विषयांतर है जो इधर उनकी अन्य कविताओं में भी घटित हुआ है. दोनों कवि राहुल सोनी के अंग्रेज़ी अनुवाद में. आर्लीन ज़ीद और तेजी ग्रोवर के अंग्रेज़ी अनुवादों में कमलेश और शिरीष ढोबले की हिन्दी कविताएँ; इन्ग्रिड स्टोरहॉमेन की नार्वीज़ी कविताएँ तथा स्वयं अपनी काव्य-श्रृंखला कठपुतली की आँख तेजी के ही अंग्रेज़ी अनुवाद में; और अनिरुद्ध उमट की नयी हिन्दी कविताएँ हमारा परिचय ऐसी आवाज़ों से कराती हैं जो हाशिये और एकांत में रहती हुई अपनी भाषा में, और मानवीय अस्तित्व के हमारे अनुभव में कुछ बिल्कुल विलक्षण जोड़ती रहती हैं. खंड में लक्ष्मी आर्य की तीन अंग्रेज़ी और समर्थ वाशिष्ठ की तीन हिन्दी कविताएँ भी शामिल हैं.

There cannot be two more different poets in Hindi than Ashok Vajpeyi and Viren Dangwal. Ashok Vajpeyi’s poems and poem-like-pieces written while staying at a chartreuse in Avignon revisit some of his poetry’s permanent themes, i.e. absence, godlessness, mortality, poetry’s place in life and the earth as the neighborhood of all things – but under the shadow of a foreign time and space. Viren Dangwal’s poem Katri Ki Rukmini is an excursion into prose within his poetics of wit and hope, a tendency also seen in some of his other recent work. Kamlesh and Shirish Dhoble’s poems, in Arlene Zide and Teji Grover’s translation, Ingrid Storholmen’s Norwegian poems and Teji’s own poem-sequence Puppet’s Eye, in Teji’s translations, and some new poems by Aniruddh Umat introduce us to some voices that, while living in solitude, have added something extraordinary to both language and human experience. The feature also includes poems by Samartha Vashishtha and Lakshmi Arya.



जिन्हें स्मार्ट लोग छोड़ गए उनके किस्से: वार्षिकांक विशेष कथेतर / Lives and Texts without Smart People: Anniversary Special Non-Fiction

फीचर्स / Features

नोबडीज़ डिट्रॉइट में पुलित्ज़र पुरस्कार से सम्मानित अमेरिकी कवि फिलिप लवीन अपने छोटे शहर लौटते हैं अपने एक अध्यापक के सेवानिवृति समारोह में ‘सरप्राईज स्पीकर’ बन कर, एक ऐसे शहर जहाँ से ‘सारे स्मार्ट लोग चले गये’. भारतभूषण तिवारी के हिंदी अनुवाद में. अंग्रेज़ी उपन्यासकार अमिताव कुमार का गद्य भी अंशतः संस्मरणात्मक है और हमारा परिचय अनुनय चौबे की चित्रकला से कराता है जिसमें स्मार्ट लोगों द्वारा पीछे छोड़ दिये गये शहर और चरित्र अपनी हार्डकोर यथार्थमयता से सीधे हमारी आँखों और दृष्टि को बींध देते हैं. इन दोनों से बहुत भिन्न एक पाठ में कवि-दार्शनिक रुस्तम (सिंह) ‘सौभाग्य’ पर, और इस तरह ‘दुर्भाग्य’ पर, मनन करते हैं. यह काव्यमय और दार्शनिक के मेल से नहीं, उनकी एक दूसरे से प्रति बहुत बारीक घृणा से उपजता हुआ आत्म-प्रतिष्ठ लेखन है जिसे पढ़ने की खुद उसी के फरेब में आ जाने के अलावा कोई और विधि शायद नहीं है. भारत के दो अग्रणी चित्रकारों हकु शाह और अखिलेश के साथ हिन्दी लेखक-सम्पादक पीयूष के संवाद की दो अत्यंत मौलिक और महत्वपूर्ण पुस्तकों पर आशुतोष भारद्वाज की समझदार टिप्पणी इस खंड की अंतिम पेशकश है.

In Nobody’s Detroit, Pulitzer Prize winning poet Philip Levine returns to the city of his childhood – a city from which all the smart people have left – as a surprise speaker at his teacher’s retirement ceremony. (In Bharatbhooshan Tiwari’s Hindi translation.) Amitava Kumar’s memoir-ish piece introduces us to the art of Anunaya Chaubey in which a city and characters left behind by the smart people stare at us with a piercing, uncompromising verisimilitude. Very different from those two texts is Rustam’s poetic-philosophic reflection on ‘fortune’ and, therefore, on ‘misfortune’. This is an ‘self’-rooted text that comes not from the meeting of the poetic and philosophical but from their mutual disdain, and the only way to read it is perhaps to let yourself be completely beguiled by its delicate forgeries. The last piece in the feature is Ashutosh Bhardwaj’s commentary on Piyush Daiya’s two original and important books of conversations with leading Indian painters, Haku Shah and Akhilesh.