आज़ादी विशेषांक / Freedom Special

दिसंबर २०१२ / December 2012

गिलहरी: रामकुमार सिंह

उसके ननिहाल में एक भूरा सा कुत्ता था. उससे उसका खास लगाव था. वह छोटा सा था तब अपनी माँ के साथ आया करता था. वह खुद जब बहुत ही छोटा बच्चा था तो अक्सरकुत्ते की दुम दबा दिया करता था. कुत्ता उसे काट लिया करता था. लेकिन उसने इस दुश्मनी को दिल पर नहीं लिया. कई बार उसने अलग रखी हुई कटोरी में कुत्ते को दूध रोटी देने के लिए भेजा जाता तो वह उसे चिढ़ाकर खिलाने के लिए दिया करता था. उसे मजा आता था. कुत्ता उस पर भौंकता रहता. यदि वह पेड़ से बंधा नहीं हो तो उससे छीनकर खा ले. राजू के लिए यह खेल था लेकिन जानवर उसकी शरारतों से परेशान था. इसलिए जब भी उसे मौका मिलता, राजू अकेला दिखता या कुत्ते की हद में रहता तो एक आध दांत वह उसको गड़ा ही दिया करता था. उसे रेबीजरोधी कोई इंजेक्शन भी नहीं लगाया गया था. उसे कोई डर नहीं लगता था क्योंकि तब तक उसे पता ही नहीं था कि रेबीज होता क्या है? जब कभी कुत्ते ने उसे काटा, वह बात को दबा गया . घरवाले पूछते तो कहता, बस खेलते हुए यूं ही चोट लग गई. वह सबका लाडला. 11 साल का हो गया था.

माँ बापू गर्व से देखते थे कि उनका राजू कितना बहादुर है? किसी से डरता ही नहीं.

लेकिन आजकल स्कूल में राजू को अजीब सा लगता था. कभी उसका मन होता था कि स्कूल में ही रहे. नई किताबों के पन्नों से आने वाली खुशबू उसे अच्छी लगती थी. नई किताबों के अक्षर उछल उछलकर उससे बातें करते थे. मास्टरजी तो किस्से कहानियां जब पढ़ाएंगे, तब पढ़ाएंगे, वह तो नई किताब हाथ में आते ही सारे किस्से कहानियां पहले ही पढकर दम लेता. मास्टर जब पढा रहा होता तो उसे पता होता था कि कलिंग की लड़ाई के बाद अशोक उदास क्यों हो गया था? लोकसभा में कितनी सीटें होती हैं? कुछ समय से विज्ञान की किताब में परागण, नर और मादा के भेद को भी वह पढ रहा था लेकिन किताब की कुछ बातें उलझी-सी होती और फिर गुरुजी पढाते हुए तो उन्हें और भी उलझा देते. लिहाजा ज्योंही स्कूल की छुट्टी होती तो उसके गली के गुरु सक्रिय हो जाते, जहाँ उसके दोस्त उसके साथ खेलने का इंतजार कर रहे होते थे.

अपने गाँव के बच्चों के बीच खेलते हुए वह कई नई बातें सीख रहा था. पिछले कुछ समय से उसके दिमाग में अजीब से खयाल चलते रहते थे. मसलन उसके ताऊजी के बेटे और आठवीं क्लास में पढने वाले भैया की शादी हुई थी. घर में भाभी आ गई थी. गोरी गोरी-सी. मखमली-से गाल थे उसके. वह भैया से दो ही क्लास नीचे था लेकिन भाभी उसका पूरा ध्यान रखती.

‘तेरा भाई, तेरी भाभी के साथ सोता है.’ स्कूल में उसकी क्लास के बच्चों ने उसे छेड़ा था. उसने कहा, यह सब झूठ है. क्योंकि भाभी के पास तो पूरी रात वही सोता रहता है. सहपाठियों ने उसका मजाक उड़ाया. उसे भोंदू बताया और कहा कि जब उस भोंदू को नींद आ जाती है तो चुपके से भाभी भैया के पास जाती है. फिर उसके जागने से पहले वापस उसके पास आकर सो जाती है.

उसे उलझन थी कि लडक़े ऐसा क्यों कहते हैं? उसे पूरा यकीन था क्योंकि उसने तो भाभी और भैया के आपस में बात करते हुए भी नहीं देखा था. जब भी भैया कुछ माँगते तो भाभी फुसफुसाकर कुछ कहती थी. वह घूंघट में ही घर में आई थी. उसे पूरा यकीन था कि भाभी का घूंघट उसके सामने ही खुलता है. माँ से, बापू से, घर मे आने वाले हर आदमी के सामने और यहाँ तक कि भैया के सामने भी घूंघट में रहती थी. यहाँ तक कि भैया को भोजन करना होता था तो वह उससे भी पूछता था कि भाभी से पूछ, खाना तैयार हो गया क्या?

‘लेकिन भाभी भैया के पास क्यों जाती है? और भाभी को भैया के पास जाना अच्छा लगता है तो वह मेरे सोने का इंतजार क्यों करती है?’

‘बेवकूफ शादी होती ही इसलिए है कि दोनों साथ सो सकें.’ उसके दोस्त बनवारी ने कहा था. बनवारी ने यह भी जोड़ दिया था कि इसी से बच्चे पैदा होते हैं. बनवारी बच्चे पैदा होने के इस फार्मूले से वे वह बिलकुल सहमत नहीं था.

माँ कहती थी, बनवारी उम्र में उससे 11 महीने बड़ा है. दीवाली की रात को चावल खाने के कारण उसकी माँ के पेट में दर्द हुआ था तो अगली सुबह बनवारी पैदा हो गया था. उसे यह जानकारी थी. अगली दीवाली से पहले ही राखी के आसपास एक दिन उसकी माँ ने भी चावल खा लिए थे. रात को उसके पेट में भी दर्द हुआ. अगली सुबह वह खेत पर नहीं जा पाई थी. उस दिन वह पैदा हो गया था. यह बातें उसे माँ ने सीधे नहीं कही थी. गाँव में जब कभी उसकी उम्र की बात चलती थी तो गाँव की औरतों के बीच से चल रही चर्चा के बीच से ही कुछ टुकड़े जोड़ तोडक़र उसने अपना अनुमान लगाया था कि बच्चे पैदा होने से रोकने हों तो त्योहार के दिनों में चावल नहीं खाने चाहिए. बनवारी की यह ठसक थी कि वह चूंकि उससे ग्यारह महीने बड़ा है तो उसकी जानकारी भी उससे ज्यादा है.

तो भैया और भाभी एक साथ सोते हैं. उसी वजह से बच्चे पैदा होते हैं. राजू के अनुमान पर आधारित उत्पत्ति के चावल सिद्धांत से इतर यह निष्कर्ष गाँव में किशोर होते समाजशास्त्री बनवारी ने निकाला था. राजू ने उसका तुरंत ही खंडन कर दिया था कि उसका निष्कर्ष गलत तथ्यों पर आधारित है. हालांकि उसके दिमाग में इस नई खोज और शादी जैसी संस्था की जरूरत को लेकर तरह तरह के प्रश्न प्रतिप्रश्न उठने लगे थे. अब वह हर चीज को बनवारी वाले ‘पॉइन्ट ऑव व्यू’ से भी देखने की कोशिश करता था.

फिर बनवारी ने उससे पूछा था, ‘तुम्हारी शादी होगी तो तुम कहाँ सोओगे?’

‘वहीं जहाँ अभी सोता हूं. बाहर चौक में चारपाई डालकर.’

‘और तुम्हारी घरवाली?’

‘वैसे ही माँ के पास वाली चारपाई पर.’

‘धत् तेरे की. मैंने तो तय कर लिया है कि मैं तो अपनी घरवाली के साथ ही सोऊंगा.’ बनवारी ने पूरे आत्मविश्वास से कहा था. गर्व के साथ उसने कुछ और जानकारियां भी अपनी तरफ से जोड़ दी थीं, जो अपने सूत्रों से जुटा रहा था. लेकिन अपनी ही शादी और आने वाली पत्नी के साथ सोने के कारण का समाधान राजू चाहता था.

‘क्यों?’

‘शिव भगवान और पार्वती ने ऐसा कहा है.’

‘मतलब?’

‘मतलब कि चिपमचिपा.’ उसने दोनों हथेलियां रगडक़र उसे बताया था. उसे कुछ समझ में नहीं आया.

बनवारी की बातों में उसे मज़ा जरूर आता था. वह घंटों उसके साथ खेलता रहता था और बीच बीच में ऐसी बातें भी करता रहता. पहले कभी कभार खेलते हुए वे आपस में झगड़ा भी कर लिया करते थे लेकिन पिछले कुछ समय से राजू और बनवारी में झगड़े खत्म हो गए. वे एक दूसरे के प्रति अधिक नरम होकर बातचीत करने लगे. खेलते हुए पहले एक दूसरे के साथ धोखाधड़ी आम थी. जब राउंडर बॉल खेलते हुए वह बनवारी का चक्कर पूरा होने से पहले ही रेत की ढेरी पर गेंद मार दिया करता था. यह बहस कई बार मारपीट तक पहुंच जाती थी कि बनवारी आउट हुआ या नहीं. लेकिन अब तो खुद बनवारी ही हट जाता था कि चल अब तेरी बारी है. दोनों के रिश्ते में यह बदलाव क्यों था, इसकी खास वजह की जानकारी ना बनवारी को थी ना ही राजू को.

बनवारी के पास बेशुमार किस्से थे.

एक दिन दोनों खेत भी साथ गए थे. बकरियां चराने के लिए. गाँव से गुजरते हुए एक अजीब-सी बदबू से राजू का हाल खराब था. गाँव में घूमने वाला एक बड़ा बकरा उनकी बकरियों के झुंड में मिल गया था. यह बच्चों पर हमला भी कर देता था. अपनी लाठी से एक दो बार उसे हटाने की कोशिश भी की लेकिन वह सींग हिलाकर दोनों को डराने लगा. इधर उधर भागे तो बकरियां तीतर बितर हो गईं. थक हार कर उन्होंने सोचा इसे साथ ही चलने दो. बकरे से आ रही बदबू राजू को पसंद नहीं थी. उसने बनवारी से पूछा, ‘इसमें इतनी बदबू क्यों आती है?’

‘क्योंकि ये स्साला कभी नहाता नहीं है.’

दोनों जोर जोर से हंसने लगे थे.

उस बकरे ने दिनभर बकरियों को ठीक से घास नहीं चरने दिया. कभी वे झाडिय़ों पर आगे के दोनों पैर रखकर कांटों से खुद के मुंह को बचाते हुए हरी पत्तियां और बेर भी चबा जाती थी. उसे बकरियों के बेर खाने में ज्यादा मजा आता था. वे दिनभर चबाए हुए बेरों की गुठलियां रात के अपने खूंटे के पास एक एक कर वापस निकालती थीं. कितनी ही बार शाम के समय राजू ने बकरियों के मुंह को पकडक़र उन्हें पूरी ताकत से वापस खोलता था कि उसमें कितनी गुठलियां उनके मुंह में हैं लेकिन एक भी नहीं दिखती. उसे हमेशा रहस्यमय लगता कि इतनी गुठलियां अपने मुंह में रखने के बावजूद बकरियों के मुंह भरा हुआ नहीं दिखता.

राजू गौर से देखता था कि झाडिय़ों पर लगे लाल बेर के पास गिलहरियां मंडराती रहती थीं. कई बार तो बकरियों और गिलहरियों में हल्की सी ठन भी जाती थी कि बेर पहले कौन खाए? बकरियों को चरते हुए देखने के इस खेल में भी एक अलग आनंद था. लेकिन आज बकरियां दिनभर परेशान रहीं. यह जो बकरा उनके साथ आ गया था, वह बकरियों को चरने ही नहीं दे रहा था. निरीह सी दिख रहीं बकरियां इधर से उधर भाग रही थीं. बकरा इतनी उछल कूद मचा रहा था कि बनवारी और राजू दोनों मिलकर भी उसे भगा नहीं पा रहे थे. एक बकरे ने आकर लगभग एक दर्जन बकरियों का जीना दूभर कर दिया था. बनवारी को शरारत सूझी. बोला,

‘ओए राजू, आदमी भी स्साला औरतों को इसी तरह परेशान करता है.’

‘चल हट, ये तो जानवर हैं. कोई इंसान थोड़े ही हैं.’

बनवारी ने चुपके से उसे बुलाकर कहा कि उसने हेमू चाचा को देखा था, एक दिन छुपकर. ‘चाची उनको मार रही थी. वे दारू पिए हुए थे. चाची के कपड़े खींच रहे थे.’ फिर वह धीरे से मुस्कराया और बोला, ‘कभी गौर से देखना, हेमू चाचा की शक्ल इस बकरे से मिलती है.’

‘छि: इतनी गंदी बातें?’

‘इसमें गंदा क्या कहा? बता तो जरा.’ और वह बता नहीं पाता था.

उसकी नजर में बनवारी गंदा था, लेकिन वह किसी से उसकी शिकायत नहीं करता था.

भाभी उससे उमर में चार पांच साल ही तो बड़ी थी.

मन में उलझन थी. उसे कभी कभार लगता है, वह सब कुछ जानता है. कभी लगता था, वह कुछ नहीं जानता. असल में वह कुछ बातों को आपस में जोडक़र देखने की कोशिश करता था लेकिन कोई साफ तस्वीर नहीं बनती थी. भैया भाभी, बकरे बकरियां, लडक़ा लडक़ी, अजीब-सी उलझनें थीं. उसके साथ क्या हो रहा था? यह उसे खुद नहीं पता था. उसे बापू ने धमकी सी क्यों दी थी, ‘भैया भाभी एक साथ हों तो उनके उनके कमरे में कभी मत जाना.’

घर की छत पर बने कमरे में उसका जाना वर्जित था. भाभी धड़ल्ले से उस कमरे में ठुमकती हुई घुस जाती थी.

उस रात बहुत तेज बारिश हुई थी. सारे घर वाले सुबह सुबह खेत में चले गए थे.

भाभी ने उसे बुलाया था. घर के पीछे बने झोंपड़े के पास एक साड़ी की ओट में बैठकर भाभी ने स्नान किया था. घर में कोई नहीं था.

उसने देखा था, भाभी के बाल उसकी खुली पीठ पर मंडरा रहे थे. एकदम गोरी गोरी पीठ उसने पहली बार देखी थी. उसे गुदगुदी-सी हुई. उसने सामने तौलिया डाल रखा था. एक ब्लाउज को अपनी दोनों बांहों में फंसा रखा था. पीछे की तरफ ब्लाउज के बटन लगे थे. भाभी ने कहा, ‘राजू, जरा ये बटन बंद कर दो.’

राजू रोमाँचित सा होकर बटन बंद करने गया था.

‘किसी को बताना मत कि मैंने बुलाया था. अपने दोस्तों को भी नहीं, वरना सब मजाक उड़ाएंगे तुम्हारा. अपने भैया को बिल्कुल नहीं, वरना मार पड़ेगी.’

उसके मन की उलझनें और गहरा गई थीं. भला बटन बंद करने की बात किसी को बताने ना बताने से क्या फर्क पड़ेगा? कोई मजाक क्यों उड़ाएगा?

‘तुम खुद क्यों नहीं बंद कर लेती फिर?’

‘मेरा हाथ नहीं पहुंचता पीछे. मुझे आदत नहीं है ब्लाउज पहनने की.’

‘तो मत पहनो.’

‘यह ससुराल है मेरा लल्लू, यहाँ सब करना पड़ता है?’

‘तो यह दिक्कत सबको होती होगी? ये लोग पीछे के बटनवाला ब्लाउज ही क्यों बनाते हैं?’

‘सामने बटन वाला भी होता है.’

‘तो तुम वही क्यों नहीं पहनती?’

तब तक वह सारे बटन बंद कर चुका था. भाभी अपने गीले बालों को झटकते हुए उसकी तरफ घूम गई थी.

‘सामने बटन होते तो मैं तुम्हें कैसे बुलाती? खुद ही बंद कर लेती.’ भाभी ने उसके दोनों गाल खींचते हुए कहा, ‘बहुत सवाल पूछते हो, बड़े हो गए हो. तुम्हारे भैया को कहकर देवरानी लानी ही पड़ेगी.’

वह शर्मा गया. आंखें झुक गई. उसे नहीं पता था ऐसा क्यों हुआ? उसकी आंखों के सामने बनवारी का चेहरा घूम रहा था, उसकी कुटिल मुस्कान दिख रही थी. शब्द जहन में गूंज रहे थे, ‘शिवभगवान, पार्वती का आदेश और चिपमचिपा.’

‘एक बात पूछूं?’ उसने हिम्मत जुटाई.

‘हाँ.’ भाभी खिलखिला रही थी.

‘तुम और भैया एक साथ सोते हो?’

‘तुम्हें यह किसने बताया?’

‘बस मुझे यूं ही मालूम है.’

‘तो फिर पूछ क्यों रहे हो?’ भाभी तो सिर्फ हंस रही थी.

‘बस यूं ही.’ वह बात को पी गया था. थोड़ा सा डर गया था कि भाभी पता नहीं क्या कह दे?

‘तुम्हारे भैया से बताऊं यह बात?’

उसका चेहरा सफेद झक हो गया. अगले ही पल उसे लगा कि ऐसा तो कुछ उसने नहीं पूछा, फिर भी उसे डर किस बात का लग रहा है. वह समझ नहीं पाया. उसके होंठ कांपने लगे. भाभी उसको देखते हुए मुस्कराती रही. जैसे उसकी यातना से ही उसे आनंद आ रहा हो.

‘नहीं, बताऊंगी, मजाक कर रही हूं.’

वह भाग गया वहाँ से. हाँफने लग गया था. वह बनवारी से तुरंत मिलना चाहता था. उसे इतनी छोटी-सी बात में बहुत मज़ा आया था. भाभी ने मना किया था लेकिन उसने सबसे पहले वही बात बनवारी को बताई.

‘मैंने ब्लाउज के बटन बंद किए थे. एकदम गोरी गोरी पीठ थी.’

‘तेरे को अच्छी लगी?’

‘बहुत.’

‘मुझे भी देखनी है.’

वह नहीं चाहता था कि बनवारी भी देखे. लेकिन वह खुद भी तो देखना चाहता था. वह चुप था. कुछ बोले उससे पहले ही बनवारी ने कहा,

‘एक आइडिया है.’

खेलते हुए दोनों छत पर पहुंच गए. छत पर बने कमरे की जाली से झांकने लगे. उसमें लगी टाट के पर्दे को पलट दिया. बनवारी ने बाहर से देखा तो राजू एकदम नहीं दिख रहा था. और वहाँ से वो झोंपड़े ओट साफ दिख रही थी. वहीं पे भाभी साड़ी टांगती थी. बनवारी की देखरेख में वह बंकर तैयार कर दिया गया था, जिससे अगले दिन भाभी की पीठ पर उनका सामूहिक हमला होने वाला था.

अगले दिन जब भाभी के स्नान का समय हुआ तो दोनों छत पर बने कमरे में पहुंच गए. मोर्चा लगा के. घूंघट में रहने वाली भाभी ने अपनी साड़ी खोली, उसका एक सिरा झोंपड़े में टांग और दूसरे सिरे को अलगनी को बांधने वाली थी कि उसे खुसर पुसर सुनाई दी.

उसने आवाज लगाई, ‘कौन है वहाँ?’

दोनों के चेहरे उतर गए.

‘मैं और बनवारी हैं भाभी.’ बनवारी ने धकेला तो वह बाहर आया था, ‘हम खेल रहे हैं यहाँ.’

‘नीचे खेलो दोनों. मैं नहाउंगी अब.’

दोनों पहले ही दिन पकड़े गए थे.

ननिहाल का वह कुत्ता अब बूढा हो गया था. वह उतना शरारती नहीं था. इस बार जब वह गया तो कुत्ते पर उसे प्यार आया. सब लोग परिवार में एक शादी के ताम झाम में उलझे हुए थे. उस बेचारे बूढ़े की तरफ किसी का ध्यान नहीं था. उसने उस कुत्ते के साथ खेतों में जाने की बात सोची. उसकी इच्छा का विरोध वहीं आई बुआ ने किया. फिर कोई एक दूर की रिश्तेदार एक लडक़ी को उसके साथ भेजा कि दोनों चले जाएं. वह भी शादी में आई थी. अपने भाई के साथ. भाई उससे तीन साल छोटा था.

लडक़ी ने कुत्ते के गले का पट्टा पकड़ लिया था, और वह हर पेड़ पर दिख रही गिलहरी को छड़ी दिखाकर भगाता. गिलहरी पेड़ से कूदती. बूढे कुत्ते की आंखों में चमक पैदा होती. लडक़ी उसकी रस्सी छोड़ देती. वह एक कुशल शिकारी की तरह गिलहरी पर लपकता और उसे पट से चट कर जाता.

राजू की आंखें गिलहरी को तुरंत देख लेती थीं. वह गिलहरी के कूदने से हमेशा रोमाँचित होता था. कितनी ही बार वह एक पेड़ के ऊपर से ही दूसरे पेड़ पर छलांग लगाकर भाग जाया करती थी. बंदर की तरह. अपनी जान बचाने के लिए. लेकिन अंतत: उसका कुत्ता उसे दबोच ही लेता था. लडक़ी को ताज्जुब हो रहा था कि वह गिलहरी को कैसे पहचान लेता है?

‘तुम्हारा नाम क्या है?’ लडक़ी ने पूछा था

‘राजू. तुम्हारा?’

‘पिंकी.’

बातचीत के दौरान यह तय हो गया था कि वह राजू से बाईस महीने बड़ी है. उसे यह भी पता चल गया था कि बनवारी ग्यारह महीने बड़ा उसका सबसे अच्छा दोस्त है तो पिंकी बाईस महीने बड़ी एक नई दोस्त बन गई है. उसे मन ही मन एक गुदगुदी सी हुई क्या पिंकी भी वैसी ही बातें कर पाएगी जैसी बनवारी करता रहा है.

पिंकी उसकी आदतों के बारे में पूछती रही.

‘तुम्हारी कोई लडक़ी भी दोस्त है?’ पिंकी ने पूछा था.

‘नहीं तो.’ वह सकपकाया.

हालांकि उसे याद आया था, स्कूल में खेलते समय एक दरवाजे से निकलकर दूसरे में घुसते समय वह जोर से एक लडक़ी से टकराया था. उसने बचने के लिए अपने दोनों हाथ ऊपर किए थे. उन हाथों में मुलायम-सा कुछ घुस गया था. उसकी गंध अब भी यदा कदा उसे आती थी. सब कुछ इतना नरम और गुनगुना था, जैसे रुई के फाहों की तरह हवा में तैरते बादलों को उसने मुटठी में पकड़ लिया हो, लेकिन अपने इस अनुभव को तो उसने बनवारी को भी नहीं बताया था. पिंकी को कैसे बताता? उस लडक़ी ने स्कूल में टीचर से शिकायत कर दी थी. वह लाख सफाई देता रहा था कि खेलते हुए गलती से टकरा गया लेकिन मास्टर ने हाथों पर डंडे मारकर लाल निशान बना दिए थे. इतनी मार के बावजूद उस मुलायम अहसास को वह भूल नहीं पाया था. फिर भी लडक़ी को छूने को लेकर एक डर मन में बैठ गया था. मार पडऩे की बात उसने भाभी को बताई थी तो भाभी टीचर पर खूब नाराज हुई थी. फिर भी उसने भाभी को उस मुलायम अहसास के बारे में जानबूझकर नहीं बताया, उसे लगता था, यह बता देने मात्र से उसे अपराधी मान लिया जाएगा.

कुत्ता थक गया था. वह सिर्फ भागकर गिलहरियों को मार ही रहा था. उसकी खाने में दिलचस्पी कम हो गई थी. एक गिलहरी को तो बेमन से पकड़ रहा था. उसकी दुम ही उसके मुंह में थी. जान बचाने की आखिरी कोशिश में गिलहरी ने उसके ऊपर वाले होंठ में अपने दांत घुसा दिए थे. कुत्ता दर्द के मारे चिल्लाया और संभल पाता इससे पहले ही गिलहरी लपककर दूसरे पेड़ पर चढ गई. अब तो उसने गिलहरी के पीछे भागना भी बंद कर दिया. पेड़ की ठंडी छाया वे दोनों बैठ गए. बगल में कुत्ता चुपचाप पसरा हुआ था.

लडक़ी ने उसे पूछा,

‘तुम्हें गिलहरी पर दया नहीं आती.’

‘आती है लेकिन कुत्ते को भी तो अच्छी लगती हैं.’

‘मैं तो नहीं देख पाती, तुम्हें पता कैसे चल जाता है कि किस पेड़ पर गिलहरी है.’

‘वह डरी हुई होती है, तो जोर जोर से बोलती है. बोलती है तो उसकी पूंछ ऊपर उठ जाती है. वह घने पत्तों में भी दिख जाती है.’

उसने बचपन में एक कहानी पढ़ी थी. जिसमें एक पालतू गिलहरी अपने मालिक के बच्चे से बिछुड़ जाती है. उस कहानी को पढकर वह बहुत उदास हुआ था. उसे गिलहरी पसंद थी. अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर मूंगफली के दाने खाती थी. दाने चबाते हुए वह बीच बीच में अपना मुंह पोंछ लेती थी. उसकी पीठ पर सफेद भूरी पट्टियां. रंग भले ही अलग हो लेकिन खूबसूरती के अहसास में वह भाभी की पीठ से काफी कुछ मिलती जुलती थी. फुदककर पेड़ पर चढ जाना. बचपन में बनवारी के साथ खेलते हुए उन्हें राजेश्वर ताऊ ने कह दिया था कि गिलहरी की खोपड़ी में पच्चीस पैसे का सिक्का होता है, तो उन्होंने राजेश्वर ताऊ की बात को यूं ही टाल दिया था, लेकिन ताऊ ने जब उन्हें गिलहरी को गौर से देखने को कहा. अगले दिन मूंगफली के दाने खाते हुए गिलहरी का सिर गोल गोल दिखा उसे. अपनी हथेली में रखी चवन्नी से वह दूर से ही वह अंदाजा लगाता रहा था और राजेश्वर की बात पर यकीन करने का मन हुआ. बनवारी और वह दिन भर घर के बाड़े में गिलहरियों को छकाते रहे थे. शाम तक गिलहरियां यह समझ ही नहीं पा रही थीं, रोजाना उन्हें भरपेट खिलाने वाले बच्चे आज उन्हें पकडऩे पर क्यों अमादा हैं. कुछ गिलहरियां जान बचाने की गरज से बाड़ा छोड़ गई कुछ ने वहाँ आना बंद कर दिया. उन्हें तो पता भी नहीं था कि उनके सिर में जो चवन्नी का सिक्का सा दिखता है, वह उनकी जान की आफत बन गया है.

‘तुम्हें अब भी लगता है कि गिलहरी के सिर में चवन्नी का सिक्का है.’

‘नहीं. मुझे लगता है, गिलहरी एक धोखेबाज है.’

‘ऐसा क्यों?’ लडक़ी ने पूछा. वे थक गए थे. घर से लाई केटली से पानी पिया उसने. राजू लेटना चाहता था. लडक़ी ने उसे पकडक़र उसका सिर अपनी गोद में रख लिया था. एक अजीब-सी गंध उसके नथुनों में घुस गई. नीम बेहोशी-सी आने लगी.

‘क्योंकि मैंने सोचा था कि उसके सिर में चवन्नी है, लेकिन अब पता है कि यह सच नहीं है.’

‘तो इसमें गिलहरी की क्या गलती है?’ लडक़ी उसके बालों में हाथ फिरा रही थी. उसके रोएं खड़े हो रहे थे. उसके होंठ कांप रहे थे.

‘पता नहीं.’

‘अच्छा बताओ, मैं तुम्हें कैसी लगती हूं.’

‘तुम्हारी शक्ल गिलहरी से मिलती है.’ यह कहकर वह जोर से हंसा था. लडक़ी एकदम उदास हो गई थी. हालांकि राजू जानता था कि उसने मजाक किया है पर लडक़ी को उदास देखकर उसने कहा था,

‘तुम ऐसे ही बातें करती हो, जैसे भाभी करती है.’

‘वो क्या बातें करती हैं, तुमसे?’

‘पता नहीं. लेकिन जब वो बातें करती है, तो मन होता है, बस उसके पास बैठा बातें ही करता रहूं.’ वह चुप हो गया. वह कहीं खो गया था.

उस दिन बनवारी ने उसे फिर तैयार कर लिया था कि वे लोग अगले दिन भाभी की गोरी पीठ देखने की कोशिश करेंगे. बनवारी चला गया तो भाभी ने उसे बुलाया था,

‘राजू, तैयार हो जाओ, खेत चलना है.’

‘लेकिन भाभी, बारिश आने वाली है.’

‘छतरी लो, जल्दी करो, बकरियां अकेली हैं वहाँ, लेकर आना है.’

वह चुपचाप भाभी के साथ हो लिया था. शीतल हवा चल रही थी. आसमान में बादल उछलकूद कर रहे थे. हल्की हल्की बूंदाबांदी शूरू हो गई थी. हवा तेज हो गई थी. उसकी छतरी उलटने को ही थी कि भाभी ने थाम ली. उसकी साड़ी भी उड़ उड़ जा रही थी. भाभी ने अपने हाथ का तौलिया राजू को दिया,

‘इसे ओढ लो, नही तो भीग जाओगे.’

‘मैंने तो कहा था, बारिश भी आने वाली है.’

लेकिन भाभी को शायद राजू की बात नहीं सुननी थी.

‘तुम बनवारी के साथ छत पर क्यों गए थे?’

अचानक भाभी का ये सवाल उसको परेशान कर गया था.

‘बस यूं ही खेलने के लिए.’

‘मेरी तरफ देखकर बोलो.’ भाभी ने थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए बोला.

उसके हाथ पांव कांपने लगे, जैसे चोरी पकड़ी गई हो. फिर भी उसने हिम्मत नहीं छोड़ी.

‘सच कहूंगा तो तुम मुझे मारोगी?’

‘नहीं, तुम बोलो तो.’

‘बनवारी ने कहा था, वो तुम्हारी गोरी पीठ देखना चाहता है.’

‘तुमको शर्म नहीं आती. अपनी भाभी की पीठ दिखाने उस आवारा को छत पर ले गए.’

बारिश थमने का नाम नहीं दे ले रही थी. वे खेत में बने झोंपड़े में बैठ गए.

वह गुमसुम गर्दन झुकाए बैठे रहा.

‘जवाब दो. तुम कुछ और भी देखना चाहते थे?’

वह चुप था.

‘बहुत दिलचस्पी है तुम्हें इन सबमें? मैं दिखाती हूं तुम्हें. लो देखो.’ कहकर भाभी ने अपने ब्लाउज के बटन से सामने से खोले और फिर पेटीकोट का एक सिरा उठा दिया.

उसके बदन पर जैसे सैकड़ों गिलहरियां एक साथ दौड़ गईं. गुदगुदी, मुलायम और धारीदार. उसकी आंखों में पानी भर आया. होंठ कांपने लगे. बदन पानी से पहले से ही गीला था. वह और गीला हो गया. उसने तो कल्पना भी नहीं थी कि जिन चीजों को लेकर वह अक्सर कल्पनाएं करता रहा है, वे सब एक दिन अचानक इतनी स्थूल तरीके से सामने आ जाएंगी.

‘यह सबमें एक जैसा ही होता है. इसमें छुपकर देखने जैसी कोई बात नहीं होती.’ भाभी अब सामान्य अवस्था में आ गई थी लेकिन उसके जीवन में जैसे बहुत कुछ महत्त्वपूर्ण घटित हो गया था. उस रात वह सो नहीं पाया था. उस रात ही क्या, शायद कई रातें और दिन उसके उलझन और बेखुदी में बीत रहे थे.

ननिहाल में शादी के गीत गाए जा रहे थे. अंधेरा हो चुका था. सब औरतें नाच रही थीं. एक दूसरी से छेड़छाड़ चल रही थी. वह बैठा था. नाचती औरतों के गाने सुन रहा था. भाभी यहाँ साथ आई थीं. वह भी नाच रही थी. एकदम झूम झूम के. उसे कभी समझ में नहीं आया कि वह इतनी खुश क्यों रहती है? ये सब औरतें और लड़कियां इतनी खुश क्यों हैं? जबकि उसके दिमाग में चौबीसों घंटे अजीब किस्म के खयाल आते रहते हैं. नाचती हुई लड़कियों में उसकी दिलचस्पी ज्यादा रहती है. उसको भाभी का वो चेहरा याद आता है. वह कुछ तय नहीं कर पा रहा है कि उस दिन भाभी मुस्कुरा रही थी या गुस्से में थी. अचानक उसके पीछे से कंधे पर एक हाथ टिका था. यह पिंकी थी. शादी के इस माहौल में पिछले तीन चार दिन में वह अक्सर उसके साथ ही खेलती थी. साथ घूमती थी. दोनों के पास बेशुमार किस्से थे. स्कूल के मास्टरजी से लेकर, राजा, रानी, राक्षस और शैतान जादूगर के.

‘यहाँ क्या कर रहे हो, चलो ना खेलते हैं?’

वह अनमना सा उठा. धीरे धीरे कूदने फांदने लगे. सीढिय़ों में छिपते छिपाते वे छत पर पहुंच गए. चांदनी रात में दीवार की ओट में बैठ गए दोनों. पिंकी ने उसे पकड़ा और उसके दोनों गाल बहुत जोर से खींच लिए. वह दर्द के मारे चिल्लाया तो पिंकी ने उसके गाल पर एक गहरा चुंबन जड़ दिया.

‘चलो एक नया गेम खेलते हैं आज.’

‘क्या?’

‘चिपमचिपा.’

उसे बनवारी याद आया. शिवभगवान, पार्वती का आदेश और चिपमचिपा.

‘ये क्या होता है?’

‘किसी को बताओगे नहीं.’

‘नहीं.’

‘भाभी को भी नहीं.’

‘नहीं.’

लडक़ी उसे उठाकर छत पर बने कमरे में ले गई.

लडक़ी ने कमीज के बटन खोले.

‘मुझे डर लग रहा है.’ वह बोला.

लडक़ी तब तक उसके दोनों हाथों को अपने जिस्म पर ले आई थी.

‘इसमें डरने की कोई बात नहीं. सब खेलते हैं. तुम्हें अच्छा लगेगा.’

‘भैया भाभी भी ऐसा ही गेम खेलते हैं?’

‘हाँ.’ लडक़ी जैसे सब कुछ जानती थी.

वह कुछ भी विरोध नहीं कर पा रहा था. उसके जिस्म में अजीब-सी जुंबिश थी जो आज तक उसने कभी महसूस नहीं की थी. तब भी नहीं जब भाभी ने उसे वो सब दिखाया दिया था. तब भी नहीं जब उसने भाभी के ब्लाउज के बटन बंद किए थे और उसकी नंगी पीठ देख ली थी.

तब भी नहीं जब स्कूल में दौड़ती लडक़ी के मखमली रूई के फाहे उसकी हथेलियों से गुजर गए थे.

अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई.

धक्का लगा और दरवाजा खुल गया.

दोनों की आंखें रोशनी से चुंधिया गईं.

टार्च हाथ में लिए कोई खड़ा था. उसके मामा थे शायद. उसकी आंखों पर रोशनी थी. वह कुछ साफ देख नहीं पाया.

उन्होंने पिंकी को पकड़ा और नीचे ले गया.

उससे तो मामा ने बात भी नहीं की. वह बुरी तरह डर गया था. मामाजी अक्सर उसे गणित के सवाल गलत हो जाने पर डंडे से पीटते थे. उसे यकीन हो गया था कि आज उसकी किसी भी कीमत पर खैर नहीं.

वह वहाँ से भाग जाना चाहता था. लेकिन अब तो सारे घर को खबर लग गई होगी.

नीचे पिंकी का क्या हो रहा होगा? वह सोच ही रहा था.

पिंकी को घेरे घर की महिलाएं बैठी थीं.

वह रोने लग गई थी. उसने आश्वस्त किया था कि आज पहली बार ही उसको राजू ने पकड़ लिया था.

‘मैं चिल्लाना चाहती थी लेकिन उसने कसम दिलाई थी.’

‘उसने कुछ नहीं किया. सिर्फ कपड़े उतारे थे.’

लकड़ी की माँ आ गई थी. उसे चुपचाप उसके साथ भेज दिया गया. भाभी को कहा कि वह जाए और राजू से बात करे.

भाभी छत पर पहुंची कमरा खाली था. उसने आवाज लगाई. राजू का कोई अता पता नहीं था. टॉर्च लेकर उसकी तलाश शुरू हुई. सब लोग परेशान थे कि उसे जाते हुए किसी ने नहीं देखा.

‘डरकर भाग गया होगा.’ घर की ही एक महिला ने अनुमान लगाया.

‘बच्चा है, इतनी रात को कहाँ गया होगा?’ दूसरी ने कहा.

‘आप उसे बच्चा कहते हैं? बच्चे कभी ऐसा करते हैं.’ गुस्से में राजू की माँ ने कहा.

रातभर लोग जागते रहे. घूमते रहे. हर घर में उसके दोस्तों से पूछ लिया कि राजू गया कहाँ.

सुबह सुबह बाड़े में जाने वाली महिलाओं के मुंह से चीख निकल गई. छत के पिछवाड़े में कोई लडक़ा गिरा था.

खून से सिर सना हुआ था. उसके सिर में एक पत्थर चुभा हुआ था. वह गिलहरी की तरह कूदकर भाग जाना चाहता था शायद.

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  1. …….baal manovigyaan ki gahri samajh ….samjhati thos kahani…….

  2. इस कहानी का अनगढ़ रिव्यू, जो मैंने अपने पोर्टल पर लिखा…

    एक अक्सरहा सुना शेर है, कुछ यूं — बच्चों के छोटे हाथों को चांद-सितारे छूने दो, चार किताबें पढ़कर वे भी हम जैसे हो जाएंगे। बात एकदम सही है, लेकिन बचपन जैसे ही जवानी तक पहुंचने के आधे रास्ते तक पहुंचकर ठिठकता है, गोया किशोर होता है, उसके मन में बहुतेरी उत्सुकताओं के बवंडर मचलने लगते हैं। अफ़सोस… साधारण-सी उत्सुकता का हल साफतौर पर, सही तरीके से कभी नहीं मिलता। नैतिकता के कितने ही पैबंदों में उलझा जब कोई समाधान सामने आता है, तो उसमें धज्जियों की भरमार ऐन सामने होती है। `वह’, यानी एक गंवई किशोर की कहानी भी इससे ज़ुदा नहीं है। बच्चा जब जानना चाहता है कि उसका जन्म कैसे हुआ, तो पता चलता है — `माँ ने चावल खा लिए थे. रात को उसके पेट में भी दर्द हुआ. अगली सुबह वह खेत पर नहीं जा पाई थी. उस दिन वह पैदा हो गया था’. वह दौर, जब `वह’ ननिहाल में मौजूद भूरे कुत्ते को टहलाता, खिलाता, खिजाता बड़ा हुआ था, इन दिनों 11 साल का होने पर कलिंग की लड़ाई के संदर्भ और लोकसभा की सीटों और विज्ञान की किताब से निकालकर परागण, नर और मादा के भेद को पढ रहा था, तब बच्चे कैसे पैदा होते हैं, इसके जवाब में उसे चावल खा लेने से बच्चा होने की परिभाषाएं समझाई जा रही थीं…हालांकि `ज्योंही स्कूल की छुट्टी होती तो उसके गली के गुरु सक्रिय हो जाते’। इन्हीं दिनों में वह `कई नई बातें सीख रहा था’. घर में आई भाभी `गोरी गोरी-सी. मखमली-से गाल’ वाली। सहपाठी बताते कि ‘तेरा भाई, तेरी भाभी के साथ सोता है.’ और इसी बीच `वह’ जान पाता कि जब दो लोग साथ सोते हैं, तब `इसी से बच्चे पैदा होते हैं’। गली के गुरु उससे उम्र में कुछ महीने बड़े हैं और वह भले ही अब तक सोचता रहा था कि `बच्चे पैदा होने से रोकने हों तो त्योहार के दिनों में चावल नहीं खाने चाहिए’, लेकिन अब उसका ‘पॉइन्ट ऑव व्यू’ भी बदल रहा था। इसी बीच `वह’ एक और ज्ञान प्राप्त करता है कि साथ सोना इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि `शिव भगवान और पार्वती ने ऐसा कहा है.’। नई-नई बातों के बीच बकरियों को तंग करते बकरों को देखते हुए साथी बनवारी एक अलग ही समझदारी दिखाता है ‘ओए राजू, आदमी भी स्साला औरतों को इसी तरह परेशान करता है.’ और राजू को वह ये भी बताता है कि `हेमू चाचा दारू पिए हुए थे. चाची के कपड़े खींच रहे थे.’ ‘कभी गौर से देखना, हेमू चाचा की शक्ल इस बकरे से मिलती है.’
    … कुछ तो गंदा था इसमें। क्या और कितना, राजू नहीं जानता। इस बीच `उससे उमर में चार पांच साल ही तो बड़ी’ भाभी उसे एक अलग ही प्रदेश में ले जाती हैं। कितनी ही सुप्त कामनाओं, उत्सुकताओं और रोमांच के वर्जित प्रदेश में। एक अलभ्य, बहु-प्रतीक्षित दर्शन-सुख के इस प्रदेश के बाद राजू और बनवारी योजना बनाते हैं– राजू के दिमाग में एक ही बात चलती है — ‘शिवभगवान, पार्वती का आदेश और चिपमचिपा.’ … बात यहीं खत्म नहीं होती। `अगले दिन भाभी की पीठ पर उनका सामूहिक हमला होने वाला था’।

    ख़ैर… मैं भटक गया। यह सब एक कहानी का बयान है, शीर्षक है `गिलहरी’, जिसकी पूरी कथा ही मैं सुनाने में अटक गया था। लिखना ये चाहता था कि बहुत अरसे बाद कोई रोचक और अद्भुत कहानी पढ़ी है। जो पहली बार में शुद्धता और नैतिकतावादियों को अश्लील लगेगी। यक़ीनन और पुरज़ोर लगेगी, लेकिन जिन्हें प्रेम, देह, लालसा, उत्सुकता और बचपन की छानबीन खुले दिमाग से करने का मन होगा, वे इस कहानी को सह पाएंगे। कहानी लिखी है रामकुमार सिंह ने। रामकुमार जी से महीने में एक-दो-तीन बार मिलना होता भी है। उनकी कुछ कहानियां पहले भी पढ़ी हैं, लेकिन इस बार भाषा, ट्रीटमेंट और कथ्य की बुनावट के लिहाज से वे पुराने लेखन पर भारी पड़े हैं।
    रामकुमार जयपुर में रहते हैं। एक अखबार में काम करते हैं। दो-तीन फिल्मों में कहानियां और गीत का डिपार्टमेंट संभाल चुके हैं….पर यह उनका सामान्य-सा परिचय है। सच तो ये है कि रामकुमार प्रचार और संपर्क जुटाने से कतिपय दूर, एक बेहतरीन लेखक हैं। कहानियों के मामले में कम से कम बहुत बेहतरीन। बाकी का काम भी अच्छा है।
    कुछ ज्यादा ही उत्साहित हूं, इसलिए बार-बार भटक रहा हूं। गिलहरी कहानी की भाषा पर कुछ कहने का भी मन है। यह कहानी मुहावरों, शब्द संरचना-चमत्कार-इमेज़री-विज़न-
    इफेक्ट्स-कोलाज से दूर है। सीधी-सपाट, शायद इसीलिए सीधा असर करती है। रामकुमार की भाषा में `विट’ है और यह अक्सर हंसाते हुए परेशान भी करता है, तब वे तीखी बातें सीधे-सरल तरीके से कह जाते हैं। इस तथाकथित रिव्यू में इन्वर्टेड कॉमा `’ में शामिल सभी वाक्य कहानी गिलहरी से कॉपी किए गए हैं. प्रमाण सामने है, देख लीजिए।
    खास बात एक और बाकी है। गिलहरी यहां प्रतीक है। एक पेड़ की डाल से कूदकर दूसरे पर चढ़ने की कोशिश में कुत्ते के मुंह में समाती हुई गिलहरी। और उसकी जान ख़तरे में इसलिए है, क्योंकि किसी ने उसे बताया था कि गिलहरी के सिर में चवन्नी छुपी होती है। शायद ऐसा ही कुछ। क्या स्त्री का रूप-सौंदर्य-देह भी ऐसी ही है। ऐसा ही आकर्षण? और पुरुष यहां किस रूप में मौजूद है? हो सकता है– रामकुमार ने ऐसा न सोचा हो… और यह मेरा शरारती दिमाग हो…।
    कहानी चौंकाती है अपने क्लाइमेक्स के ज़रिए। एक किशोर नहीं जानता कि क्या वर्जनीय है, लेकिन जिस तरह राजू की मृत्यु होती है, वह तो संकेत ही है — अंधेरे गलियारे में ठोकर लगती है। बिना किसी नैतिक शिक्षा के यह कहानी हाजिर है, कई तहों को टटोलती हुई। व्यंग्य, चुटकियां, चिंता के अनेक पुटों के साथ।
    गिलहरी में हम ढेरों प्रतीक देखते हैं। कहीं स्पष्ट तो कहीं कथ्य के संग गुंफित। यहां जो गांव है, वह पूरी तरह उन्मुक्त है और ठीक उसी हद तक बंधा हुआ भी। रामकुमार को बधाई इस बात की भी दी जानी चाहिए कि वे बंद निगाह और ठस, जकड़े दिमाग के साथ सबकुछ पवित्र-पवित्र नहीं बताते रहते। गिलहरी बालपन से उबरे, उम्र में बढ़े और दिल से ठहरे हुए बचपन में मन की बहुत-सी परतें खोलती है और उतना ही हमें उलझाती भी है। गिलहरी के कूदने से रोमांचित हुए राजू की दोस्त कोई लड़की हो सकती है या नहीं, यह बड़ा सवाल नहीं है। प्रश्न ये भी नहीं है कि `नरम और गुनगुना’ और `रुई के फाहों की तरह हवा में तैरते बादलों’ का ज़िक्र दरअस्ल, किन चीजों के लिए किया गया है और ये अश्लील-श्लील के आईने में कितने फिट होते हैं, सवाल बस एक है — नैतिकता के मायने इतने रूढ़ क्यों हैं कि सहज उत्सुकताओं को गिलहरी की मौत मरना पड़ता है।
    * रामकुमार शायद हंसेंगे मेरी इस राय पर, लेकिन मेरी नज़र में गिलहरी को सेक्स एजुकेशन की पाठ्य सामग्री में शामिल किया जाना चाहिए।
    - बहुत पहले प्रियंवद की कहानी खरगोश पर बनी टेलीफिल्म देखी थी। बेहद उम्दा उस कहानी के बाद रामकुमार की गिलहरी पढ़ना रोमांचक है। दोनों कहानियों में ऐसे ही अनदेखे-छुपे संसार के लिए कौतूहल और नायिकाओं के कदरन समान व्यवहार का हवाला है, लेकिन गिलहरी का अंत और अलग भावभूमि, क्षेत्र और ट्रीटमेंट, खासतौर पर क्लाइमेक्स इसे खरगोश से अलग करता है। यूं, दोनों की तुलना नहीं है। महज ऐसी ही एक कहानी याद आई, इसलिए ज़िक्र किया। मुझे यकीन है कि मेरा नाम जोकर में अपनी टीचर को चाहने वाला ऋषि तो प्रियंवद और रामकुमार के दिमाग में नहीं रहा होगा… क्योंकि ऐसा बचपन तो हम सबका होता है… एक-सा। तमाम दुत्कारों, वर्जनाओं, कल्पित कहानियों के बावज़ूद, कहीं-कुछ टटोल-तलाश लेने की होड़ में भागता और अक्सर बिंधता हुआ।
    श्लील-अश्लील के चश्मे पहनने वालों से क्षमा याचना सहित एक सुझाव… गिलहरी ज़रूर पढ़ें। अच्छी कहानी है। मुझे यह कहानी पढ़ते हुए मंटो की मुतरी भी याद आई… क्यों, शायद वहां मूत्रालय में लिखे हुए संवाद भी अतृप्त मन की परतों से बहकर कहीं उभर आए होंगे।

  3. एक अच्छी कहानी……………..
    बाल सुलभ चंचलता व उत्सुकता से परिपूर्ण
    जब यह लिखी गई होगी तब शायद बालविवाह होते रहे होंगे
    बस इतना ही

  4. बहुत ही उम्‍दा कहानी है। किशोरावस्‍था की सहज जिज्ञासाओं को परत दर परत उकेरती हुई… लेकिन मैं इस अंत से सहत नहीं हूं… कहानी का यह दुखांत इतना अप्रत्‍याशित है कि सायास लगता है।

  5. Sir
    acchi kahani hai. khas tor se banwari aur raju ka character bahut dilchasp laga. ek bar shuru karne ke baad poori kiya bina man nahi mana.

  6. सहज और सरल भाषा, कहानी की पकड़ कहीं ढीली नहीं होती, पढता ही चला गया ! चरित्र चित्रण बेजोड है !!

  7. एक किशोर बेटे कि माँ हूँ तो एक सास में ही पूरी कहानी पड़ डाली बेहतरीन है ये कहानी पर अंत दुखांत …………मन देहल गया …………

  8. Very good, keep it up the spirit as u have innate bring ,wishing 4 a new creation which is roaming in your brain ,once again congrats

  9. Bahut.khoobsurat.abhivyakti.balman.ki.jigyasa.ko.ukerti.kahani.Badhai.ho.bhaisahab.

  10. सुना है की सभी प्रजातियों में मादा ज्यादा खतरनाक होती है, आपकी कहानियां पढ़कर ऐसा ही लगता है. अच्छा भी लगता है की स्त्री बेचारी और दया की पात्र नहीं है. खतरनाक है, क्यूँ है ऐसी, एक कहानी यूँ भी बनती है. मैंने फिर चुरा ली आपकी कहानी से एक कहानी अपने लिए. मुग्ध करने वाली आपकी भाषा में वर्जित बाल मनोविज्ञान भी सहज ही लगा.. आपको बधाई

  11. …….achhi kahani hai….bachhon ko samajhne men saari peedhiyaan hi naakaam rahi hain….is sach ko sarvthaa maulik tarike se bataati hai ….punah padhne ki maang karne vaali kahani…..badhaayee….

  12. मेरे सभी प्रिय पाठकों का दिल से आभार। शुक्रिया गिरिराज भाई और संपादक मंडल का भी। चंडीदत्त शुक्ल जैसे पाठक और मित्र हों तो लेखक का दिमाग और जिंदगी खराब करने का पर्याप्त कारण बन जाता है। उन्हें अच्छी लगी तो इसमें मेरा क्या कसूर?
    भाई प्रेम चंद गांधी और कुछ अन्य लोगों के मुताबिक कहानी का अंत सायास है तो इसका कोई जवाब मेरे लेखक के पास नहीं है। असल में लिखते समय मुझे खुद पता नहीं रहता कि मेरे पात्र क्या हरकत करने लगे हैं और वे किस तरह के सरोकारों या मूल्यों का संघर्ष कर रहे हैं। मैं सायास तो लिख ही नहीं पाता वरना अब तक मन में उलझा हुआ उपन्यास खिंच गया होता।
    उमा का सवाल है कि मादा खतरनाक क्यों हैं? मेरी कुछ और कहानियों में भी ऐसा दिखता है। मुझे असल में पता ही नहीं चलता। बाल की खाल निकालने का हुनर भी मुझमें नहीं लेकिन मेरी स्त्रियां लगभग उतनी ही ताकतवर और उच्छृंखल हैं जितना पुरुष है। मेरे पुरुष और स्त्रियां मासूम नहीं हैं। मुझे खलनायक हमेशा अच्छे लगते हैं क्योंकि उनकी जिंदगी में थ्रिल होता है, वे नायकों से कहीं ज्यादा गहरे संघर्ष करते हुए लगते हैं मुझे। आंतरिक और बाहरी दोनों ही किस्म के संघर्ष।

    आप सब का पुन: आभार इस मुहब्बत के लिए।

  13. अच्‍छी कहानी है .

  14. ramkumar ji kaya kahani likhi hai ek saans main bina ruke puri kahnai padhli great prayas jaari rakhe.

  15. ramkumarji shaandar pryas hai

  16. रामकुमार जी,
    सबसे पहले तो आपको “गिलहरी” कहानी के लिए अनेकॊं शुभकामनाएँ एवं बधाईयाँ!

    कहानी पढते वक़्त मुझे बचपन के कई सारे किस्से याद आ गए। कैसे मित्र-मंडली में मस्तिष्क-प्रदूषण की पहली पैठ हुई थी, कैसे हम न जाने किन-किन तरह की बातें कर लिया करते थे और फिर पूरा दिन उन बातों को समझने में हीं बीता देते थे, कैसे सही माध्यम के अभाव में हमने “गलत” तरीकों से “इन” बातों को जाना था… ऐसे न जाने कितने दृश्य मेरी आँखों के सामने आ गए। कई जगहों पर मैं खुद को इस कहानी से जोड़ गया तो कई जगहों पर मेरे दोस्तों के उदाहरण मेरी नज़र में आ गए।

    सच कहूँ तो आपने बाल-मन को सही पकड़ा है।

    कोशिश करूँगा कि मैं भी इस दिशा में कुछ लिख सकूँ, विषय जाना-पहचाना है और सामग्री तो ढेर सारी है।

    धन्यवाद!

  17. बुहत अच्छी कहानी है

  18. जीवंत रचना। बाल मनोजगत का गहरा पर्यवेक्षण-चित्रण या आकलन…बधाई…

  19. bahoot pahle krishna khatwani ki saat din upnyasika padhi thi. aapki kahaani main ka ye vakya usski bhawnaaon se judta hai, “makhmali rui ke Phohe Hathon se gujar gay the. shaandar kahaani ke liye badhaai.”

  20. yah kahani graamin parivesh ke baal manovigyaan ka sachitra varnan prastut karati hai. ram kumar ji ne bahut hi achchha prayas kiya hai.bahut bahut shubhkamanayem

  21. रामकुमार सिंह जी के बारे में अखबार में कल पढ़ा तब से इनकी कहानी की किताब “भोभर तथा अन्य कहानियां” खोजने लगा हूँ.. किताब कहाँ से मिलेगी यह नहीं पता. कुछ ऑनलाइन बुक स्टोर्स पर भी देखा लेकिन निराशा हाथ लगी. क्या रामकुमार सिंह जी की ई-मेल आई डी मिल सकती है? या फिर संपर्क करने का कोई और जरिया.. ?
    कृपया सहायता करें..

  22. शुक्रिया मनीष जी, किताब आपको लोकायत प्रकाशन जयपुर से मिल सकती है। लोकायत प्रकाशन के नंबर हैं- 09461304810 मेरा ई मेल आई डी है indiark@gmail.com
    आपके इस स्‍नेह के लिए आभार।

  23. बहुत रोचक और सुन्दर कहानी , लेखक बधाई के पात्र हैं

  24. kahaniya to bahut si padhi hai but is kahani ko padkar jo ahsas hua kabi kisi kahani ko padkar nahi hua
    realy me bahut hi sundar varnan kiya hai ramkumar ji ne
    or jo title diya hai GILAHARI ekdam sahi hai

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