आज़ादी विशेषांक / Freedom Special

अंक 13 / Issue 13

कंइ कोनिः संगीता गुन्देचा

जी कविताएँ

1.
बस एक बुखार की देर और है
जी कहती है
वह आँखें मटकाती एक हाथ से
दूसरे को मलती हुई आकाश की ओर देखती है :
बस एक बुखार को बदन और बच्यो!

2.
वह बीमार हुई और शहर के
डॉक्टर के पास जाने से मना कर दिया:
‘ऐ पूनमचन्द थारो जरा भी माजनो व्हे
तो म्हारे यांसे कंइ लइजावा मत दीजे
म्हारे तो यांज शान्तिनाथ को सायरो है.’

3.
जी के घर शान्तिनाथ हैं
वह रोज़ सुबह नहाकर उनकी पूजा करती है
केसर, चन्दन और गुलाब से
अपने पेड़ को फूलों से लदा देख
वह ताली बजाते हुए कहती है:
इ फूल कदी कम नी व्हइ सके
शान्तिनाथ के या सोरभ घणी हउ लगे!

4.
गाँव में लोगों को पता चल गया है
परकोटे की राजपूत स्त्रियाँ
रंग-बिरंगी साड़ियों में
घूँघट लेकर जी से मिलने आ रही हैं
अपने बच्चे को लेकर
पड़ोसी कुम्हार और उसकी पत्नी आये हैं
उनके मटकों पर चित्रकारी कैसी हो
यह वे जी से पूछते आ रहे हैं.

5.
गली में रम्भाती गायें
जी को पुकार रही हैं
उन्हें रोटी और उनके ग्वालों को
गाली देने वाली जी को उनके खुरों की आवाज+
पहले ही आ चुकी है
उसकी आँखों के कोर पर आ-आकर
आँसू आ लगे हैं

6.
जी अपने घाघरे, लुगड़े और काँचली में
  यहाँ से वहाँ फिसलती रहती
      गिलहरी की तरह

7.
अपने दोनों पैर गँवा चुके
जी के दोस्त अपने बेटे के कन्धों पर चलकर
उसे गुजराती – मन्त्र सुनाने आये हैं
एक सत्संगी औरत अभी-अभी
उसे भजन सुनाकर गयी है
आसपास बैठे लोगों के घेरे ने
उसे ज़ोर से दोहराया है:
      ‘एकला मति छोड़जो बन्जारा रे
      परदेस का हे मामला टेढ़ा ओ प्यारा रे ‘

8.
कराहती हुई जी के सिरहाने
मालिन गुलाब का फूल रख गयी है
माँ उसके कानों पर अपने ओंठ ले जाकर फुसफुसाती है :
जी थारे कंइ वेदना हो तो बता तो सई?
जी अपने पोपले मुँह से
बड़ी मुश्किल से कहती है :
‘कंइ कोनि ‘
जब उससे उसकी अन्तिम इच्छा पूछी जाती है
वह अपने पोपले मुँह से
बड़ी मुश्किल से कहती है :
‘कंइ कोनि !’

9.
जी के कमरे के बिल्कुल पास बने मन्दिर में
आज सुबह शान्तिनाथ की आरती गायी गयी
बेहोशी की देहरी पर खड़ी
वह उसे दोहराने लगी!

11.
आणन्द देइ सा कहकर
सीढ़ियों पर प्रतीक्षा कर रहे
गाँव के ब्राह्मण की ओर
अँजुरि भर जुवार ले जी
सुबह-सुबह दौड़ते हुए आँगन पार करती
अपने खाने से एक कोल बचाकर
उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में बदल
वह चींटियों के बिल पर रख आती
पक्षियों को चावल डालने
दोपहर में मुँडेर तक जाती
घर लौट रही अपनी प्रिय गायों को
संध्यासमय वह रोटियाँ खिलाती
दिनभर में जी की कई बलियाँ थीं
कम से कम तेरह दिन तक इन्हें
कोई ओर देता रहेगा

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