गल्प विशेषांक / Fiction Special

नवम्बर २०११ / November 2011

वही एक रंग: निशांत

सैयद हैदर रज़ा की एक पेंटिंग देखकर

उसने देखा
एक रंग
और चुप हो गया

उसने बनाई धरती
और शांत हो गया

उसने रचा
ब्रह्माण्ड का वितान
और मौन हो गया

उसके अन्दर
हमेशा बजता रहता
एक अनहद नाद

सारे संसार में
चुप्पी
मौन शांति के सौंदर्य का साम्राज्य
धीरे धीरे फ़ैल रहा था
उससे ले कर थोडा सा उधार
वही एक रंग

के.आर.सुवन्ना की एक पेंटिंग देखकर

अन्दर से
एक जानवर निकला
बाहर शिकार की तरफ दौड़ पड़ा

अन्दर से
दूसरा जानवर निकला
वह भी बाहर शिकार की तरफ दौड़ा

फिर
तीसरा
चौथा
पांचवा

मैं
आश्चर्यचकित
इतने जानवर अन्दर थे
मनुष्य का सिर्फ आवरण था उनके ऊपर

दूर से
एक स्त्री
हाँकते हुए ला रही है उन जानवरों को

पहले
एक अन्दर गया
फिर दूसरा, तीसरा, चौथा
पाँचवा….

‘ये लो, इन्हें अन्दर रक्खो’
और
आँखों से हंसते हुए चली गयी

जानवर सारे
सो रहे हैं सुख की नींद

जोगेन चौधरी की एक पेंटिंग देखकर

चाँदनी रातों में
हमेश एक शेर दौड़ा करता
इधर-उधर, जिधर-तिधर

अँधेरे बंद कमरे में
हमेशा एक आदमी के अन्दर

पृथ्वी पर पड़ी रहती
हमेशा एक स्त्री

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