गल्प विशेषांक / Fiction Special

नवम्बर २०११ / November 2011

आईआईटी का युद्ध और पिता के सूरज: पूर्णेंदु घोष

मेरे दादू तीस वर्ष की उम्र में ठाकुमा के साथ कलकत्ता से कानपुर आये और यहीं बस गये। आने का कारण यहाँ के आर्डिनेन्स फैक्टरी में उनका तबादला। मेरे पिताजी का जन्म यहीं हुआ। बचपन आरमापुर में कटा। यहीं के स्कूल में पढ़ाई शुरू की। अच्छे विद्यार्थियों में पिताजी की गिनती होती थी।

दादी के कारण घर का वातावरण संगीतमय रहता था। हर समय घर में जमघट। कलकत्ता से लोगों का आना-जाना भी लगा रहता। दुर्गा पूजा के समय की तो बात ही निराली थी। दादू पूजा और रामलीला के आयोजन में महीनों पहले से अपने आपको समर्पित कर देते। ठाकुमा के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में योगदान के बगैर मानो पूजा अधूरी रह जाती। मैं तो तब पैदा भी नहीं हुआ था। ठाकुमा ने अपने प्रिय मित्र से यह कहानियाँ कई किश्तों में कई बार सुनाई।

दादू की आकस्मिक मृत्यु ने घर का सारा वातावरण बदल डाला। आरमापुर छोड़ना पड़ा। पिताजी अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाये। पूरी नहीं कर पाये कहना ठीक नहीं होगा। जो वह पढ़ना चाहते थे पढ़ नहीं पाये। जायंट एंटरेन्स एग्जाम (जे०ई०ई०) में ३६१ रैंक मिलने के बावजूद भी वह आई०आई०टी० में दाखिला नहीं ले पाये। पिताजी ने मन मारकर बी०एस०सी० किया। एम०एस०सी० करने के बाद पिताजी को डिफेंस लेबोरेटरी में केमिस्ट की नौकरी मिली। नौकरी के दो साल बाद माँ से शादी और उसके दो साल बाद मेरा जन्म।

दादू पूरी तरह निश्चित थे कि एक दिन उनका पुत्र उनका मुख उज्ज्वल करेगा। इतनी जल्दी मुखाग्नि के लिये न वह प्रस्तुत थे ना उनका पुत्र, यानि कि मेरे पिताजी। समय का या विधि का विधान कोई नहीं टाल सकता सोचकर ठाकुमा आहें भर लेती थी। लेकिन पिताजी भूल न सके कि वे आई०आई०टी० में नहीं पढ़ पाये। मन में एक सांत्वना लिये मेरे बड़े होने का इंतज़ार करते रहे। पता नहीं क्यों मेरे ऊपर उनकी आस्था जमी थी और उनको विश्वास था कि जो वो नहीं कर पाये उसे उनका पुत्र पूरा करेगा।

जैसे लड़की पैदा होते ही कुछ पिता उसकी शादी की तैयारी शुरू कर देते हैं वैसे ही मेरे पिताजी ने मेरे आई०आई०टी० में एडमिशन की तैयारी शुरू कर दी।

सारे फिजूल खरचों में कटौती उनमें से एक थी। शहर के अच्छे स्कूल में मेरा दाखिला करवाया गया। इस स्कूल में पढ़ाने का खरचा पिताजी की हैसियत से बाहर था। लेकिन मेरी पढ़ाई के लिये कोई भी खरचा पिताजी की नजरों में न फिजूल था न हैसियत के बाहर। ठाकुमा और माँ मात्र दर्शक थे। मेरे बारे में कोई फैसला लेने का अधिकार सिर्फ पिताजी को था। ठाकुमा और माँ प्यार या दुलार दे सकती थी अगर वह मेरी प्रगति में बाधा सृष्टि न करे। पिताजी ऑफिस जाते और घर आते। उनकी दुनिया में ठाकुमा या माँ नहीं, सिर्फ मैं था।

मुझे ताज्जुब होता है कि ठाकुमा और माँ ने कभी इन बातों का बुरा नहीं माना। आखिर बुरा मानते भी क्यों ? पिताजी के पास माँ के लिये समय नहीं था। शायद उन्हें माँ के साथ समय बिताना फिजूल खरची लगती हो। माँ सोचती थी जब समय आयेगा पिताजी समय दे पायेंगे। माँ के मन में शायद यह विचार भी आया होगा कि जब समय आयेगा तो काफी देर हो चुकी होगी।

मैंने छोटी क्लास से ही पिताजी की मेरे ऊपर आस्था को घटने नहीं दिया। दसवीं की परीक्षा मैंने अच्छे नम्बरों से पास की। पिताजी मेरी प्रगति से खुश थे। क्या मैं खुश था ? पता नहीं। और पता होने से होगा भी क्या। कभी किसी ने मुझसे पूछा भी नहीं कि मैं क्या चाहता हूँ ? मुझे तो पिताजी का सपना पूरा करना है। किसी और को क्यों दोष दें। मैं खुद नहीं जानता था कि मैं क्या चाहता हूँ।

ग्यारहवीं कक्षा में प्रवेश के बाद ऐसा लगने लगा कि मुझे एक बड़े पैमाने के युद्ध में हिस्सा लेना है। किसी युद्ध में हिस्सा लेने के लिये दो बातों की जानकारी अनिवार्य है। एक अपनी शक्ति और मनोबल के बारे में सही धारणा और दूसरी शत्रु की शक्ति और मनोबल का सही मापदण्ड। मैं रणभूमि में जाने की तैयारी करने लगा। शत्रु पक्ष कमजोर नहीं था। उसके ऊपर विजय पाने के लिये मुझे और प्रयत्नशील होना पड़ा। कई प्रिय चीजें छोड़नी पड़ी। जैसे दोस्तों से मिलना, फिल्में देखना, गाने सुनना, क्रिकेट खेलना इत्यादि। मुझे समझाया गया कि बारहवीं कक्षा में अच्छे नम्बर लाने से ज्यादा जरूरी है जे०ई०ई० में अच्छा रैंक लाना। जे०ई०ई०के कला कौशल स्कूल में नहीं, कोचिंग क्लासेज़ में सिखाये जाते हैं। ऐसा क्यों, मेरे आज तक समझ में नहीं आया। युद्ध जीतना है बस। युद्ध जीतने के लिये अपनाया गया कोई भी तरीका मान्य होता है। जैसे कि स्कूल से अनुपस्थिति और उस समय का सदुपयोग कोचिंग क्लास जाकर करना। मेरे स्कूल ना अटैंड करने पर भी मेरी अटेंडेन्स में कमी नहीं आयेगी, इस बात का आश्वासन मुझे मिल चुका था। मैं कोचिंग क्लास की शरण में आया। लेकिन मैं स्कूल न जाने के बहकावे में नहीं आया। बारहवीं की परीक्षा से निपटने के बाद सामने सिर्फ जे०ई०ई० की युद्ध भूमि मुझे दिखने लगी। पिताजी और कम बोलने लगे। छुट्टी लेकर घर बैठ गये। मुझे जिस तरह के अस्त्र की जरूरत थी उसे देने में वह असमर्थ थे लेकिन उनको जुटाने में कोई त्रुटि न हो इसका ध्यान रखने लगे। जे०ई०ई० भी निपट गया। युद्ध के परिणाम का इंतज़ार करने लगे। लेकिन मन में एक तरह का संतोष था। लड़ाई खत्म होने से पहले अगर सिपाही को छुट्टी मिल जाये और वह जानता हो कि छुट्टी से लौटने के बाद लड़ाई खत्म हो गई होगी तो उस छुट्टी का आनंद दुगना हो जाता है। मेरे रिजल्ट निकलने से पहले के कुछ दिन मुझे कुछ इसी तरह का आनंद दे रहे थे। थोड़े दिनों के लिए मैं जे०ई०ई० भूल गया। मगर पिताजी नहीं भूले।

मेरा बारहवीं का रिजल्ट अच्छा हुआ। जे०ई०ई० में मेरा रैंक १६५ आया। माँ ने मौहल्ले में रसगुल्ले बाँटे। ठाकुमा ने सत्यनारायण की कथा करवाई। पिताजी ज्यादा कुछ नहीं बोले। मेरी लड़ाई वह लड़ रहे थे। लड़ाई खत्म होने के बाद जीत को उपभोग करने की क्षमता उनकी जैसे क्षीण हो गई थी। चुपचाप दादू की तस्वीर के सामने थोड़ी देर खड़े रहे। शायद कह रहे थे तुम निराश न होना। तुम्हारा बेटा आई०आई०टी० में नहीं पढ़ सका तो क्या हुआ, तुम्हारा नाती तो पढ़ेगा। उसे जी भर के हम सब की ओर से आशीर्वाद दे दो। पिताजी की आँखों में आँसू थे। मुझे लगा पिताजी चाह रहे हैं कि उनके आँसू कोई और न देख ले। मैंने देखते हुये भी नहीं देखा। दादू को प्रणाम किया और चल दिया दोस्तों से मिलने।

हमारे कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ० माथुर खुद चलकर हमारे घर आये पिताजी को बधाई देने। कहने लगे पार्थप्रतिम हमारे स्कूल का गर्व है मिस्टर रायचौधरी। बच्चों की सफलता में ही हम लोगों की सफलता है। आपके अथक प्रयासों का ही फल है कि पार्थप्रतिम हम सब लोगों के गर्व का कारण बन सका। होनहार बिरवान के होत चीकने पात।

अब मुझे पहली बार घर छोड़ना था। मुझे लगा अब पिताजी थोड़ा बहुत समय माँ को और ठाकुमा को दे पायेंगे। कुछ पाने के लिये इन दोनों ने भी बहुत कुछ खोया है। माँ मेरे हॉस्टल जाने की तैयारी में लग गयी।

आई०आई०टी० का पहला दिन मुझे हमेशा याद रहेगा। पिताजी उस दिन माँ के साथ मुझे हॉस्टल छोड़ने आये। दोपहर का खाना हम लोगों ने साथ खाया। दिन भर साथ रहे। शाम होते ही दोनों घर लौट गये। दादी को घर जाकर सब कुछ बताना भी तो था। हॉस्टल से घर की दस मील की दूरी अचानक मुझे बहुत दूर लगने लगी। लगा ढेर सारी बातें करनी बाकी रह गई माँ से।

मेरे रूम मेट का मकान भी कानपुर में था। उसका घर आई०आई०टी० के काफी नजदीक था। शाम को वह अपने घर चला गया यह कहकर कि कल से हॉस्टल में रहना शुरू करेगा। मैं रह गया कमरे में बिल्कुल अकेला। सीनियर्स की हरकतें रात के एक बजे तक चलती रही। इसके बाद मैं कमरे में पहुँचा। सीनियर्स के सामने खूब जोरों से नींद आ रही थी। लेकिन कमरे में आने के बाद मेरी सारी नींद गायब। ठाकुमा, माँ, पिताजी कुछ ज्यादा ही याद आने लगे।

कमरे में और कोई नहीं था। मुझे रोने के लिये संकोच करने की जरूरत नहीं पड़ी। खुषी भी हुई। नये जीवन के शुरूआत की खुषी। एक बंधन मुक्ति की खुषी। मुझे लगा अब कहीं जाने के लिये, कुछ करने के लिये, किसी से मिलने के लिये मुझे सिर्फ मुझसे पूछना पड़ेगा। हॉस्टल में मैं अपनी साईकिल लाया था। रात के ढाई बजे थे। मैं कमरे से बाहर निकला। साईकिल उठाई और निकल पड़ा कैम्पस की सैर को।

पिंजरे से जब किसी पंछी को छोड़ा जाता है तो वह थोड़ी देर तक उड़ नहीं पाता है। मेरा हाल भी कुछ ऐसा ही था। मैं साईकिल साथ लेकर पैदल चलता रहा। एक हॉस्टल से दूसरे, दूसरे से तीसरे। उसके बाद प्रोफेसर क्वार्टर की ओर चलता चला गया। मन में उल्लास था। थोड़ी देर बाद मैं साईकिल पर सवार होकर जैसे उड़ने लगा। मेरी इस आजादी ने मुझे भविष्य के सपने देखना सिखाया। मेरा अन्तरमन जोर जोर से बहुत कुछ कहने की कोशिश करने लगा। मेरे मन की आवाज़ किसी और को भला कैसे सुनाई देगी।

सुबह होने वाली थी। मैं हॉस्टल की ओर चल पड़ा। हॉस्टल पहुँचकर पिताजी को इतने सबेरे हॉस्टल के सामने देखकर मैं घबड़ा गया। सब ठीक तो है घर में।

मेरे कमरे में ताला देखकर पिताजी भी परेशान थे। इतने सबेरे मैं कहाँ गया था पूछने पर मैंने कह दिया मोरनिंग साइकिलिंग पर निकला था। हम दोनों की हँसी ने कुछ और कहने या सुनने की गुंजाइश नहीं रखी।

मैंने गलत कहा था कि किसी को मेरे मन की आवाज नहीं सुनाई पड़ी थी। पिताजी ने मेरे मन की आवाज सुनी थी। उनको भी नींद नहीं आ रर्ही थी। सूरज के उगने का इंतजार नहीं कर पाये। देर रात को ही निकल पड़े मुझसे मिलने। कहने लगे मैं तो यूँ ही चला आया पता लगाने कि तेरा हॉस्टल का पहला दिन कैसा कटा। उस दिन सूरज को उगते हम दोनों ने साथ ही देखा था। पिताजी ने उस सुबह क्या केवल ही उगता हुआ सूरज उगता देखा?

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