आज़ादी विशेषांक / Freedom Special

अंक 13 / Issue 13

वह भी कोई देश है महाराज 2: अनिल यादव

हम दोनों को ही जोरदार पूर्वाभास था कि कहाँ जाना है और वहाँ हमारा स्वागत करने वाले लोग कौन होंगे.

…लेकिन स्टेशन से बाहर निकलते ही सबसे पहले तामुल खाना चाहता था. इस नशीली सुपारी से मेरा बचपन से भय, जुगुप्सा, अपराध बोध और आकर्षण का संबंध रहा है. सबसे पहले इस तामुल ने ही मेरे अबोध जीवन का अंत कर दिया था और बहुत दिनों तक सपनों में तरह-तरह के रूप धर कर आतंकित किए रखा था.

तब में आठ-नौ साल का रहा होऊंगा. ननिहाल मेरे हमारे जो पड़ोसी असम में रहते थे, उनका एक प्रद्युम्न नाम का रिश्तेदार आया हुआ था. पहली बार मैने उसे ही तामुल खाते देखा था. अंडाकार, भूरी, बदबू करती, अजीब सी चिकनी चीज़. एक दोपहर मैं उनके दालान में बैठा था, उस रिश्तेदार ने मुझे खेलने के लिए एक तामुल दिया. थोड़ी देर तक बतियाने, पुचकारने के बाद उसने मेरा नन्हीं, कोमल उंगलियों वाला हाथ, धोती के भीतर ले जाकर अपना गरम, भारी शिश्न मुझे पकड़ा दिया और उसके ऊपर लाल किनारी वाला जगप्रसिद्ध असमिया गमछा रख दिया. मैने बस उसकी एक झलक देखी, उसका अगला हिस्सा बिल्कुल तामुल जैसा था. मैं मुँह बाए उसकी लाल-लाल आँखों को देखते हुए वहीं जड़ हो गया. उस घर की एक बुढ़िया जो वहीं बैठी हुक्का पी रही थी, ने इसे भांप लिया. उसने आँखे तरेरते हुए वह गमछा मांगा और उठाने के लिए हाथ भी बढ़ा दिया. इससे हड़बड़ाकर उस आदमी ने मुझे छोड़ दिया. बाएं हाथ की मुट्ठी बांधे मैं दो दिन बुखार में पड़ा रहा. बहुत बाद में पता चला कि लोकभाषा में शिश्न को सुपाड़ा या सोपारा भी कहा जाता है.

लोगों की देखा देखी मैने भी एक रूपए का सिक्का तामुल के खोमचे पर रखा. उसने आधा कटा पान, आधा तामुल और कागज पर लद्द से रखा ढेर सारा चूना मेरी तरफ बढ़ा दिया. एक क्षण की देर किए बिना मैने उसे मुँह में डालकर चुभलाया फिर चबाने लगा. बस जरा सी देर कनपटियां गर्म हो गईं, गला सूखा और पसीना चुहचुहाने लगा. तय हो गया कि जब तक उत्तर-पूर्व में रहूँगा, तामुल ही खाऊंगा. जबर्दस्त किक थी, किसी भी पुरानी स्थिति से जड़ समेत उखाड़ कर नए भावलोक में उछाल देने वाली. दरअसल मेरी आत्मा में तामुल के आकार का एक घाव है जो उसे चबाने, उसके उत्ताप को झेलने और फिर थूक देने के बाद ही भरेगा, मैं जानता था. एक रिक्शे पर सामान फेंकते हुए हम दोनों ने एक लगभग एक साथ कहा, जो सबसे सस्ता होटल जानते हो, ले चलो.

खुदी सड़क की गिट्टियों पर उछलता रिक्शा पाँच रूपए की दूरी पर यानि अगले चौराहे पर ही रूक गया. यह रामचंद्र ग्वाला का “जनता होटल” था. एक सौ तीस साल पुराना, किराया भी एक सौ तीस रूपया. लोहित (ब्रह्मपुत्र) के पानी से लाल बाथरूम का फर्श, अंधेरे गलियारों में जीरो वॉट के बल्ब की लाल रोशनी, उड़े लाल रंग के दरवाजे और आधी रात तक रोशनदान से गिरता लाल धूल का झरना. फटी हुई मसहरी, चीकट गद्दे जिन पर तिलचट्टे रेंग रहे थे, खिड़की में शीशे की जगह गत्ते ले चुके थे और हर कहीं काला पड़ चुका पीतल का भारी हैंडिल लॉक. वाकई बूढा होटल था जिसे हम जैसे नाती-पोते मेहमान ही मिलने थे. कमरे के नीचे सिटी बस स्टैंड का शुरूआती स्टॉप था. शोर के बीच दो आवाज़ें लगातार आती रहतीं थीं-

ऊलूबाड़ी, आदाबाड़ी, पांजाबाड़ी, दिसपूर…….

ऊलूबाड़ी, आदाबाड़ी, पांजाबाड़ी, दिसपूर………

दूसरी आवाज़ किसी किशोर लड़के की होती थी जो अनवरत रिरियाता था- आइए खाना खाइए, आइए खाना खाइए, आइए खाना खाइए…..

चार घंटे लगातार भूखे चिल्लाने के बाद उसे खाना और बीस रूपए मिलते थे. रात में जब सारी आवाज़ें थम जातीं तो खिड़की से नामघर में चल रहा कीर्तन आने लगता था जिसमें बच्चों की चिचिंयाती आवाज़ें भी शामिल रहती थीं. आंतक में अवलंब खोजते निर्धन लोगों की सामूहिक प्रार्थनाएं.

रात में हम लोग ब्रह्मपुत्र का हालचाल लेने गए. नदी किनारे सुनसान फुटपाथों पर दूर-दराज के जिलों से आए बिहारियों के परिवार के डेरा डाले थे जो ईंट के चूल्हों पर खाना पका रहे थे. ये लोग उनके वतन को जाती ट्रेनों में भीड़ के कारण घुस नहीं पाए थे. शहर के अंधेरे कोनों में एल्युमिनियम के बर्तनों के नीचे की लाली में नरसंहारों का आतंक, पलायन की लाचारी और लाचार क्षोभ खदबदा रहे थे. अचानक खानाबदोश हो गए लोगों के बरअक्स ब्रह्मपुत्र में खड़े जर्जर स्टीमरों में बिजली की झालरों से सजे रेस्टोरेंट देर रात तक खुले हुए थे. इस रेस्टोरेन्टों के नाम वही पुराने जहाजों वाले ही थे- फेरी क्वीन, जलपरी, डाल्फिन.

उस रात धुंध और कुहरा था और पूरा शहर खुदा पड़ा था. कई फ्लाइओवर और सड़कें बन रहे थे. कुहरे में भीड़ सड़क पर उबलती लगती थी और सोडियम लाइटों के नीचे, गिट्टियों पर रिक्शे वाले हैंडिल के आगे ढिबरी जलाए फुदक रहे थे. वे अंग्रेजों के जमाने के म्युनिस्पैलिटी कानून का जस का तस पालन किए जा रहे थे. फुटपाथों को देखकर लगता था, कहीं चुनाव ठिठका खड़ा है. असम में हर चुनाव से पहले अचानक विकास और नरसंहार दोनों एक साथ होने लगते हैं. शहरी मिडिल क्लास के लिए विकास और गंवई असमिया के ध्रुवीकरण के लिए नरसंहार आजमूदा नुस्खा है जो उन्हें पोलिंग बूथ तक ले ही आता है.

शहर के व्यापारिक केंद्र फैन्सी बाजार और पान बाजार में एक छोटा-सा समृद्ध राजस्थान बसता है जिसके आईकॉन संगरमरमर के छोटे-छोटे मंदिरों में चुनरी ढके विट्ठल जी और राणी सती हैं. बिना प्याज और लहुसन का मारवाड़ीबासा, कचौड़ी-जलेबी-फुचके (गोलगप्पे) और गलियों में ठुंसी नई मॉडल की कारें, बाकी का ठाठ सजा देते हैं. सीपीआई के बूढ़े विधायक हेमंत दास ने बाद में अपने ही ढंग से एक दिन समझाया था कि असम में सौ प्रतिशत से भी ज्यादा थोक व्यापार मारवाड़ियों के हाथ में है और असमिया सिर्फ उपभोक्ता है. बाजार के पिछवाड़े गोदामों में सैकडो ट्रकों से माल लादा- उतारा जा रहा था. लगभग सारे पल्लेदार पुरबिया, बिहारी और छिटपुट मैमनसिंघिया मुसलमान थे. डर के कारण मैं उधर नहीं गया क्योंकि हर बड़े शहर में, हमेशा ऐसी गलियों में पल्लेदारी करते मुझे अपने गाँव, जिले या आसपास के जिलों के परिचित लोग मिल जाया करते हैं जो कभी खाते-पीते किसान हुआ करते थे. मैं उनका और वे मेरा सामना नहीं कर पाते. हर जगह पलायन और पीड़ा की उदास कर देने वाली एक जैसी कहानियां सुनने को मिलती हैं.

गौहाटी एक युग से उत्तर-पूर्व में व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र रहा है. अब भी कई बेहद पुरानी दुकानों में सिर्फ नमक, टार्च और लालटेन बिकते हैं जिन्हें खरीदने के लिए सुदूर जंगलों से आदिवासियों के काफ़िले आते हैं. इन दुकानों का यूएसपी यह है कि पुराने ग्राहकों की ठहरने की जगह भी दुकान के पिछवाड़े होती है. यहाँ का सुअर बाजार तो अद्भुत है जहाँ व्यापार की भाषा भोजपुरी और पंजाबी हो जाती है क्योंकि इन्हें बोलने वाले प्रांतों से ही सबसे अधिक माल आता है.

सुबह अखबार देखे तब समझ में आया कि, जैसा ट्रेन में लगा था, हालात उससे कहीं अधिक बदतर हैं. उत्तर-पूर्व दिल्ली की मीडिया की चिंता के दायरे से बाहर है, दरअसल उसे ब्लैकआउट कर दिया गया है वरना यहाँ कश्मीर से जटिल और भयावह स्थिति है. 22 अक्तूबर को दुलियाजान और काकोजान में सोलह, 27 को नलबाड़ी में दस, 8 नवंबर को बरपेटा मे दस, 16 नवंबर को बेटावर में आठ, 25 नवंबर को नलबाड़ी में चार और 30 नवंबर को बोंगाईगाँव में दस हिन्दीभाषी मारे गए थे. इनके अलावा दूरदराज़ की जगहों में कम से कम सात हत्याएं हुई थीं जिन्हें रिपोर्ट नहीं किया गया था. सेना, गृहमंत्रालय और असम पुलिस को मिलाकर बनाई गई संयुक्त कमान के कोर ग्रुप की बैठक हो रही थी जिसमें गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के दूत के रूप में पूर्वोत्तर मामलों के संयुक्त सचिव एनके पिल्लै दिल्ली से आ रहे थे.

हर ओर चीमड़ लोकल माछ और फीके भात के अतिरेक से त्रस्त होकर रोटी के इकलौते विकल्प के रूप में हमने नेपाली मंदिर के पास एक रेस्टोरेन्ट खोजा जहाँ मैदे का पराठा और मटर का छोला मिलता था. तदुपरांत स्वीट डिश के तौर पर मलाई समसम. बाद मे यही “मलाईसमसम” हम लोगों का गुडलक साइन बन गया. असमिया जबान में “च” गायब है. चाय “सा” होती है और एक जाति सूतिया जिसे अंग्रेजी में वाकई चूतिया लिखा जाता है. हम लोग खाना खा रहे थे और सामने टेलीविजन पर खबरें आ रही थीं. एक बिहारी की हत्या के बाद उसका सिर पत्थर से कुचल दिया गया था, जिसका भेजा हमारी थालियों से ढाई फीट की दूर, रंगीन स्क्रीन पर छितरा पड़ा था. मुझे पेट में उफनता झाग महसूस हुआ. शाश्वत अपनी टिपिकल मादरी अवधी में मुझे गरिया रहा था, “ल्यौ ससुर अब भेजा देखो. पत्रकारिता करै आय हैं हियां. जहाँ देखो हुंआ लहास पड़ी है और एक मनई साला ढंग से बात करै वाला नहीं है. यू नहीं भवा कि चुपाई मार के अपने घरे रहो. बाप की दूई बात सुनि लेत्यो, भोजन तो चैन से बैठ के करत्यो.”

“तुम तो लौन्डे की जिद मान के पछताय रहे किसी गरीब बाप की तरह पिनपिना रहे हो.” मैने और उकसाया ताकि ध्यान बंटे और उल्टी करने से बच सकूं.

उसका गुस्सा जायज़ था. लखनऊ के समाजवादी गिरीश पान्डेय ने जिन मददगार समाजवादी नेता का पता दिया था, उनकी मौत चार साल पहले हो चुकी थी. पत्रकार रामबहादुर राय ने जिन पत्रकारों के पते दिए थे, उनमें से दो मर चुके थे और एक रिटायर होकर भजन कर रहे थे. लखनऊ पॉयनियर के संपादक उदय सिन्हा ने जिस अखबार मालिक का पता दिया था, वे मिलते ही हत्थे से उखड़ गए कि सिन्हा को पान चबाने के अलावा आता क्या है. वही तो हमारे अखबार को यहाँ बरबाद करके गया है. प्रभाष जोशी ने आंचलिक ग्रामदान संघ के बिनोबापंथी रवीन्द्र भाई का पता दिया था, जिनका कहीं अता-पता नहीं था. संजीव क्षितिज ने फिल्म निर्देशक जानु बरूआ का नम्बर दिया था, वे कलकत्ता में थे.

एक और बात थी. मैने शाश्वत का कैमरा गले मे लटकाने से पहले ही दिन साफ इनकार कर दिया था. यह बच्चों को जन्मदिन पर उपहार में दिया जाने वाला फुसलाऊ कैमरा था और मुझे झालरदार टूरिस्ट दिखने से पुरानी चिढ़ थी. यह कैमरा उसने सुल्तानपुर में अपने बिकाऊ पुश्तैनी घर की आखिरी तस्वीर उतारने के लिए खरीदा था.

तो अब हमें अपनी पत्रकारिता की शुरुआत करनी थी. सवा साल तक अवसाद और बेरोजगारी में सोने के बाद मैं अचानक पूर्वोत्तर का उग्रवाद कवर करने जा रहा था. मेरे पास लखनऊ से अनियमित निकलने वाले एक चौपतिया धंधेबाज साप्ताहिक अखबार का उड़ाया गया फर्जी पहचान पत्र था, जिसमें मुझे दिल्ली ब्यूरो प्रमुख बताया गया था. यह आई-कार्ड मुझे वहाँ खानसामा का काम करने वाले एक लड़के ने अखबार मालिक की जानकारी के बिना मुहर समेत बनाकर दिया था. आई-कार्ड में मेरी उम्र के आगे ठीक शताब्दी पहले की बिल्कुल सही तारीख लिखी हुई थी. पहचान के कॉलम में गलत स्पेलिंग में लिखा था कि मेरी बांई आँख के भीतर कहीं एक कटे का निशान है. मैने पहले इन सब चीजों पर कभी गौर ही नहीं किया था. खैर शाश्वत के पास तो यह कार्ड भी नहीं था. हम लोगों ने सबसे पहले लोकल अखबारों की प्रिन्ट लाइन में छपे नम्बरों पर फोन कर गुवाहाटी के पत्रकारों से मिलना तय किया ताकि जान सकें कि खून की नदी में हम अपनी पत्रकारिता की डोंगी लेकर किस दिशा में जाएं.

पहली मुलाकात, उल्फा की मदद करने के आरोप में कुछ दिन पहले तक टाडा में बंद रहे और अब अपना बिल्कुल नया अखबार जमाने में लगे “आजि” के संपादक अजित भुंईया से हुई. खूबसूरत और सुकुमार भुंईया का परिचय एक टीवी पत्रकार ने यह ईर्ष्या भरी जानकारी के साथ दिया था कि राज्यसभा सदस्य मतंग सिंह का बेनामी पैसा उनके अखबार में लगा हुआ है. लेकिन धूल से अटे और सड़ते पानी की दुर्गंध से गमकते राजगढ़ लिन्क रोड स्थित उनके दफ्तर में दूसरा ही नजारा था. भुईयां अपना ही रोना लेकर बैठ गए कि प्रफुल्ल कुमार मंहतो की सरकार लोन देने में अड़ंगा डाल रही है, बिजली का कनेक्शन नहीं मिला इसलिए जनरेटर से अखबार निकाला जा रहा है. कोई डेढ़ महीने बाद जब सुल्फा (सरेन्डर्ड यूनाइटेड लिबरेशन फोर्स आफ असोम) ने पुलिस के साथ साझा आपरेशन में उल्फा के उग्रवादियों के घरों पर हमले शुरू किए तब एक रात, लाउडस्पीकर से उड़कर आती एक कविता में अजित भुंईया का जिक्र सुना. उस आधी रात दीघाली पुखुरी के किनारे चल रही नरसंहार, खंत्रास विरोधी खिल्पी (कलाकार) सभा में एक चौदह साल का किशोर काव्यपाठ कर रहा था- “आमि होबो अजित भुंईया, परागदास……..” लेखक परागदास जिनकी हत्या सुल्फा ने कर दी थी, को असम में शहीद का दर्जा हासिल है. अजित भुंईया उन्हीं के दोस्त हुआ करते थे और अब उग्रवाद के प्रति सरकारी रवैये पर कुछ बोलकर नए झंझट में नहीं फंसना चाहते थे. पुराने झंझट ही बहुत थे.

अगले ही दिन लालमाटी में सेना मुख्यालय में उग्रवाद के खिलाफ बने नए संयुक्त कमान की प्रेस कांफ्रेस थी. हम लोग सुबह ही होटल ब्रह्मपुत्र पहुंच गए जिसके लाउंज के सोफों और बाहर की सड़क पर लोकल पत्रकारों का अड्डा हुआ करता था क्योंकि दिल्ली से आना वाला हर महत्वपूर्ण आदमी इसी होटल में ठहरता था. वहाँ से सूचना विभाग की एक खटारा जीप में लटक कर, सेना के मुख्यालय के भव्य लॉन में सजी कलफदार, झक्क सफेद कुर्सियों पर पहुंच गए. वहाँ सेना की हरी और पुलिस की खाकी वर्दियां लयबद्ध ढंग से आईएसआई-आईएसआई का कीर्तन कर रहीं थीं. जीओसी कार्प्स के कर्नल महेश विज बता रहे थे कि जनता के प्रति सेना के मैत्रीपूर्ण रूख के कारण हमारी मारक क्षमता सौ प्रतिशत बढ़ गई है. पिछले तीन साल में हमने पहले की तुलना में दोगुने उग्रवादी मारे हैं और लगभग दो हजार आत्मसमर्पण कराए हैं.

“…दुरकेला” बस दो घंटे पहले परिचित हुए एक असमिया रिपोर्टर ने मुझसे कहा, “सरकारी लोन लेने के लिए एक आदमी चार-चार बार सरेन्डर करता है. तुम विश्वास नहीं मानता हमारा तो तुमको ले चल कर टेलर मास्टर से मिलवा देगा जिससे आर्मी का अफसर सरेन्डर करने वाले को पहनाने के लिए उल्फा का वर्दी सिलवाता है.”

दिल्ली से आए संयुक्त गृह सचिव पिल्लै बता रहे थे कि संयुक्त कमान की सफलता से भयभीत उल्फा ने अब निरीह लोगों (साफ्ट टार्गेट्स) को मारना शुरू किया है ताकि वे असम में अपनी उपस्थिति जता सकें. दरअसल अब विचारधारा से उनका कोई नाता नहीं रह गया है और वे विशुद्ध आतंकवादी संगठन में बदल गए हैं. कई दिन से मेरे भीतर जो सवाल कुलबुला रहा था, वह पिल्लै साहब की बात खत्म होने से पहले ही टपक पड़ा, “अगर उन्हें साफ्ट टार्गेट ही चुनना है तो वे बांग्लादेशी घुसपैठियों को क्यों नहीं मारते जिन्हें यहाँ से वापस भेजना ही असम आंदोलन की सबसे प्रमुख मांग थी. घुसपैठियों को वापस भेज पाने में सरकार की विफलता के कारण ही तो असम गण परिषद (एजीपी) से नाराज लड़कों ने उल्फा बनाया था. उनके बजाय यहाँ अपने ही देश के बिहारियों को ही क्यों मारा जा रहा है.”

वहाँ मौजूद चेहरों पर व्यंग्य भरी मुस्कानें खिल गईं जैसे कोई बहुत बेतुकी बात मैने उठा दी हो, जिसे यहाँ का बच्चा-बच्चा जानता है.

आपका परिचय…पिल्लै ने जवाब देने के बजाय सवाल किया तो मेरी टाँगे कांप गईं. अगर कहीं इसने मेरा परिचय पत्र देखने के लिए माँग लिया तो अभी पोल खुल जाएगी. मैने हिम्मत बटोर कर कुछ ज्यादा ही जोर से कहा, मैं दिल्ली से हूँ. जवाब असम के पुलिस महानिदेशक एच के डेका देने लगे- “क्योंकि उल्फा पूरी तरह से आईएसआई के हाथ में चला गया है. आप ही लोग रोज लिखते हैं कि ढाका में उसका हेडक्वार्टर है और काक्स बाजार बंदरगाह से उसके हथियारों की खेप आती है. उल्फा कमांडर परेश बरूआ समेत कई नेताओं के ढाका में मल्टीस्टोरी बिजनेस काम्प्लेक्सेज हैं और उनके पास पाकिस्तान के सैटेलाइट फोन हैं. आप अपने ही अखबार के शीर्षकों को याद कीजिए, सब समझ में आ जाएगा.”

मेरा सारा ध्यान पुलिस महानिदेशक के जवाब पर नहीं उसके अंग्रेजी उच्चारण पर अटक गया. वह हॉलीवुड की किसी क्राइम थ्रिलर फिल्म के सुपरकॉप की तरह बोल रहा था. पता नहीं क्यों मुझे ट्रेन में मिली मोरेगाँव की सहुआईन की लड़कियों की याद आई और लगा कि उन्होंने अपनी जान और पुलिस महानिदेशक ने अपनी नौकरी बचाने के लिए भाषा का अविष्कार एक ही तरह से किया है. चारो तरफ लोग मारे जा रहे हैं, उग्रवादी दिन और समय बताकर हमले कर रहे हैं. सेना और पुलिस ने नेताओं के लंबे भाषणों से गूंजते फर्जी समर्पण समारोहों और मुठभेड़ों के मीडिया मैनेजमेंट में महारत हासिल कर ली है. ऐसे में भाषा, बंदूक से ज्यादा ज़रूरी असलहा हो जाती है जो भ्रम बनाए रखती है कि उग्रवाद को काबू में रखने के लिए काफी कुछ किया जा रहा है.

मीडिया मैनेजमेन्ट के नियमों की चहारदीवारी के भीतर सनसनीखेज स्टोरी की तलाश करते एक बूढ़े चश्माधारी पत्रकार ने सवाल किया- “उग्रवाद सिर्फ कानून-व्यवस्था की समस्या है या दिल्ली के खिलाफ युद्ध जैसी स्थिति है?”

आप बताइए. हम लोग आपसे भी यही जानना चाहते हैं. लेफ्टिनेन्ट जनरल ने उसे टरकाया. पीछे एक टीवी चैनल का कोई घिसा हुआ कैमरामैन बुदबुदा रहा था, “एक ठो बासी पेस्ट्री और लाल सा देकर फांकी मार दिया बेट्टा.”

वाकई मुझे भी अफसोस हो रहा था. सोचा था कि कम से कम सेना मुख्यालय में तो आज ढंग का खाना मिलेगा लेकिन दाँव खाली चला गया था.

3 comments
Leave a comment »

  1. मजा आते-आते रह गया और बात शुरू होते ही ख
    त्‍म हो गयी । इतनी छोटी पोस्‍ट लिखने के लिए अनिल को फटकार और किराडू को लानत-मलामत की बड़ी क्‍यों नहीं लिखवाई । अब फिर करना पडेगा दो माह का विकट इंतजार।

  2. आशा के विपरीत छोटी पोस्‍ट। फिर भी मजा तो आया ही पढकर।

  3. अनिलजी,
    धन्यवाद.

    आज के असम का पूरा खाका खींच दिया।
    हिन्दी भाषा मारे जा रहे हैं सही. लेकिन जो जिंदा है वब आतंकित है।

Leave Comment