आज़ादी विशेषांक / Freedom Special

अंक 13 / Issue 13

स्त्री-मुक्ति का यथार्थ और यूटोपिया: राजीव रंजन गिरि

‘वह बार-बार भागती रही
बार बार हर रात एक ही सपना देखती
ताकि भूल न जाये मुक्ति की इच्छा
मुक्ति न भी मिले तो बना रहे मुक्ति का स्वप्न
बदले न भी जीवन तो जीवित बचे बदलने का यत्न’

कवि अरुण कमल की एक कविता है – स्वप्न। इस कविता में एक औरत बार-बार ससुराल से भागती है। मार खाकर। कभी किसी मंदिर की सीढ़ी पर घंटों बिताती है। फिर अंधेरा होने पर उसी जगह लौट आती है। कभी किसी दूर के सम्बन्धी या परिचित के घर दो चार दिन काटती है। कभी अपने नैहर चली जाती है। पर हफ़्ता या महीना भर बाद थक कर उसी जगह लौटती है। बेहतर होगा यह कहना कि उसे हर बार लौटना पड़ता है। यह उसकी विवशता है। यह भी याद रखने की बात है कि वह हर बार मार खाकर ही भागती है और लौटने पर भी मार खाती है। तो क्या इस स्त्री को अपनी ट्रैजिक नियति का पता नहीं है? कविता बताती है कि उसे बखूबी पता है कि मार खाने के बाद जहाँ से भागती है, बार-बार उसे वहीं लौटना है। साथ ही लौट कर फिर मार खाना है। जानती थी वो कहीं कोई रास्ता नहीं है / कहीं कोई अंतिम आसरा नहीं है / जानती थी वो लौटना ही होगा इस बार भी। फिर भी भागती है। उसके यहाँ से गंगा भी ज्यादा दूर नहीं थी। रेल की पटरियाँ भी पास थीं। पर वह अपनी ट्रैजिक नियति को जानते हुए भी कि उसे फिर लौटना पड़ेगा, और मार खाना पड़ेगा; भागती है। कुछ दिन के लिए ही सही। वह मरण का वरण नहीं करती। आत्महत्या का रास्ता नहीं अख्तियार करती है। लिहाजा गंगा नदी का ज्यादा दूर न होना या रेल की पटरियाँ पास होना उसके लिए कोई विकल्प नहीं रचता। मार खाने से बचने के लिए जीवन को समाप्त करना उसे गवारा नहीं है। क्योंकि वह बार-बार जीवन से मृत्यु नहीं, मृत्यु से जीवन के लिए भाग रही थी। भागती भी है तो खूँटे से बंधी बछिया-सी जहाँ तक रस्सी जाती, भागती / गर्दन ऐंठने तक खूँटे को डिगाती। आखिरकार वह औरत किस खूँटे से बंधी है, जिसे उखाड़ने की बार-बार असफल कोशिश करती है। गौर करें गर्दन ऐंठने तक कोशिश करती है और उखाड़ भले न पाये पर डिगा देती है। गर्दन ऐंठने तक कोशिश करना मानीखेज है। धीरे-धीरे यह खूँटा जड़ से उखड़ भले न पाये, टूटेगा जरूर। क्योंकि वह औरत बार-बार हर रात एक ही सपना देखती है। ताकि भूल न जाये मुक्ति की इच्छा। सपना है- मुक्ति न भी मिले तो बना रहे मुक्ति का स्वप्न और बदले न भी जीवन तो जीवित बचे बदलने का यत्न।

इस कविता में, जहाँ से वह औरत मार खाकर भागती है, वहीं उसे बार-बार लौटना तथा मार खाना पड़ता है। जाहिर यह उसका ससुराल है। इसके लिए अरुण कमल ने ‘घर’ या ‘परिवार’ शब्द का प्रयोग नहीं किया है। क्या यह अनायास है? जबकि शादी के बाद, इस सामाजिक संरचना में, यही उसका ‘घर’ है या ‘परिवार’ भी। इस कविता में ‘घर’ शब्द एक बार आया है। जहाँ वह दो-चार दिन काटती है। कभी किसी दूर के संबंधी या किसी परिचित के घर जाहिर है यहाँ भी वह अपनी जिन्दगी का दो-चार दिन ही सही जीती नहीं, काटती है। कभी भागकर नैहर जाती है। पर यहाँ भी कितने दिन के लिए? हफ़्ता या महीना। वहाँ से भी थककर लौटती है। आशय यह कि पीहर में भी जिन्दगी का कुछ दिन ही काट पाती है। भले ही परिचित या किसी दूर के रिश्तेदार के घर के तुलना में कुछ ज्यादा दिन। थक कर लौटना दो बातों की तरफ इशारा करता है। एक, जिन्दगी जिया नहीं गया है, काटा गया है। दो, जो संरचना मौजूद है उसमें उसके लिए नैहर अब विकल्प नहीं रह गया है। चाहे जो हो उसे ससुराल में ही ‘निबाहना’ है। इस सामाजिक ढाँचे में माना यह जाता है कि डोली नैहर से उठी है तो अर्थी ससुराल से उठेगी। ऐसे में, वह ससुराल जहाँ बार-बार पीटी जाती है, शब्द के सच्चे मायने में ‘घर’ या ‘परिवार’ हो सकता है? हरगिज नहीं। वह उस स्त्री के लिए ‘जगह’ भर ही है। न तो ‘घर’ महज छत के नीचे का बसेरा है और न ही ‘परिवार’ कुछ लोगों के साथ भर रह लेने वाली व्यवस्था। जब तक आपसी संवेदनात्मक रिश्ता और उससे पैदा होनेवाली उष्मा मौजूद नहीं हो, उसे ‘घर’ या ‘परिवार’ की संज्ञा नहीं दी जा सकती। आखिरकार, जब वह जगह ‘घर’ और वहाँ के लोग ‘परिवार’ नहीं है तब वह वहाँ क्यों है? वह किस ‘खूँटा’ के मजबूत रस्सी से बंधी है जिसे गर्दन ऐंठने तक उखाड़ने या तोड़ने की हर बार कोशिश करती है। यह खूँटा पितृसत्तात्मक व्यवस्था है। याद रखें पितृसत्तात्मक व्यवस्था के मायने परिवार में पुरूष का सिर्फ मुखिया होना नहीं है। यह महज इतना ही होता तो इसका ‘खूँटा’ कब का उखड़ चुका होता या इसकी ‘रस्सी’ टूट गयी होती। क्या यह कहने की जरूरत है कि इस ढाँचे की रचना धूर्तता और चालाकी के साथ की गयी है और आज भी हो रही है। आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक, वैधानिक, सांस्कृतिक व्यवस्था और मूल्यों-मर्यादाओं, संस्कारों, आदर्शों तथा चिंतन के विभिन्न रूपों, विचारधाराओं, निर्मितियों, गतिविध्यिों के जरिये बड़े महीन ढंग से इसे रचा-बुना गया है। इन सबके जरिये पितृसत्ता पुरूष को औरत की तुलना में श्रेष्ठ स्थापित करने का पाखंड रचती और फैलाती है।

इस कविता में स्त्री के पास कहीं कोई रास्ता नहीं है और कहीं कोई अंतिम आसरा भी नहीं। जाहिर है उसे अपना रास्ता खुद बनाना है और अपना आसरा भी खुद ही बनना है। इस स्त्री को इसका बोध् है। इस बोध और गहरी जिजीविषा ने इसे रेल की पटरी पर या गंगा में जाने से रोका है। लिहाजा, ससुराल से मार खाकर बार-बार भागना महज पलायन नहीं है बल्कि विकल्प रचने के लिए रास्ता बनाने की प्रक्रिया की एक कड़ी है। इसके साथ ही पीटने की पीड़ा का अहसास होते रहने के लिए जरूरी कदम भी है। इस पीड़ा का अहसास होना बेहद जरूरी है। बगैर इस अहसास के न तो मुक्ति का स्वप्न याद रहेगा और न ही जीवन को बदलने के लिए यत्न करने की अभीप्सा बचेगी। इस अभीप्सा के बगैर वह गर्दन ऐंठने तक बार-बार खूँटे को डिगाने की असफल ही सही, कोशिश नहीं कर पायेगी।

पितृसत्ता ने एक तरफ स्त्री को घर के अंदर कैद किया है और उसके घरेलू श्रम का अवमूल्यन किया है। दूसरी तरफ विभिन्न मूल्यों-मान्यताओं और संस्कारों के जरिये शोषण को सहज एवं स्वाभाविक मान्यता के रूप में मन-मस्तिष्क में बैठाने की कोशिशा की है। इस कविता की स्त्री का आर्थिक तौर पर स्वावलंबी नहीं होना और विभिन्न संस्कारों का मकड़जाल अपना आशियाना अलग बनाने से रोकता है। इन वैचारिक जकड़बंदियों का दबाव ऐसा मजबूत है कि जहाँ तक रस्सी जाती है (यानी मंदिर की सीढ़ी, नैहर या किसी रिश्तेदार के घर) वहीं तक भाग पाती है। फिर ससुराल में लौटकर आना इसकी ट्रैजिक नियति है। लेकिन बार-बार, हर रात जो मुक्ति का स्वप्न देखती है उसके जरिये रास्ता जरूर बनेगा, मुक्ति जरूर मिलेगी, जीवन जरूर बदलेगा। इस कविता पर किंचित विस्तार के साथ विचार करने की वजह यह है कि इसमें एक आम स्त्री के जीवन का यथार्थ है और साधरण स्त्री की मुक्ति-कामना के साथ, खतरा मोलकर अपनी गर्दन ऐंठने तक कोशिश कर यूटोपिया रचने का साहस भी।

स्वप्न शीर्षक कविता के मार्फ़त स्त्री मुक्तिः यथार्थ और यूटोपिया पर विचार करने की एक वजह यह है कि यह कविता जिस स्त्री के जीवन पर हो रहे पारिवारिक अत्याचार को अपना विषय बनाती है, वह ‘स्त्रीवाद’ का सिद्धांत पढ़कर अपनी मुक्ति-कामना से लबरेज नहीं है, बल्कि जीवन-जगत के यथार्थ से उसमें यह मुक्ति-कामना पैदा हुई है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि अगर कोई स्त्री ‘स्त्रीवाद’ या स्त्री-मुक्ति से सम्बन्धित धरणाओं को पढ़-सुन या समझकर अपनी मुक्ति की कामना करती है या इसके लिए अग्रसर होती है तो यह अपराध नहीं बल्कि अच्छी बात है। इसी में मुक्तिकारी अवधरणाओं की सफलता भी है। यह उन लोगों के लिए कहा गया है जो ‘स्त्रीवाद’ और उससे जुड़ी धरणाओं को बदनाम करने के मकसद से अनर्गल प्रलाप करते हैं और मानते हैं कि आम औरतों का इससे कोई लेना-देना नहीं है। यह कविता पढ़कर समझा जा सकता है कि इस औरत पर पितृसत्तात्मक ढाँचे का भी असर है। इस संरचना के दायरे में जन्म लेने और उसके परवरिश होने की वजह से यह स्वाभाविक भी है। काबिलेगौर बात है – इस ढाँचे के भीतर रहते हुए उसका ‘स्वप्न’ देखना और उस स्वप्न के लिए ‘यत्न’ करना। यही स्वप्न और यत्न उसे मुक्ति भी दिलाएगी।

बहरहाल, दुनिया के सभी समुदाय, सभ्यता, धर्म और मुल्क में पितृसत्ता मौजूद है। नतीजतन स्त्रियों को पुरुषों की तुलना में कमतर मानने की रवायत है। अपवादस्वरूप भले ही कुछ इससे मुक्त हों। यह दीगर बात है कि इन सबमें पितृसत्ता का एक समान या सर्वमान्य रूप नहीं है। अपने अलग-अलग गुण, धर्म के साथ इसकी मौजूदगी बरकरार है। समय-समय पर इसने विभिन्न शक्तियों से नापाक गठजोड़ करके अपना रूप भी बदला है। इसीलिए अलग-अलग देश-काल में यह एक जैसा नहीं दिखता।

कुछ लोगों को लगता है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था सामंतवादी संरचना की उपज है और सिर्फ इसी सामाजिक ढाँचे में मौजूद रहती है। जाहिर है ऐसा मानने वालों की समझ है कि पूँजीवाद के साथ यह खुद-ब-खुद समाप्त हो जाएगी। ऐसा सोचने वाले लोगों में वे भी शामिल है जो पितृसत्ता को दरकते देख दुखी होते हैं और वे भी हैं जो पितृसत्ता की शोषणकारी, अमानवीय रूप से दुखी होकर इसे बदलना चाहते हैं। इसके पक्ष में दुखी होने वाले लोग पितृसत्ता को मजबूत बनाने की कामना करते हुए पुराने दिनों को याद करते हैं तथा पूँजीवाद और इसके साथ आए बदलाव को कोसते हैं। जबकि पितृसत्ता के चालाक समर्थक नित्य हो रहे बदलाव से किसी भी तरह गठजोड़ करके इसे बरकरार रखने का प्रयास करते हैं। पितृसत्ता की मौजूदगी से आहत उपरोक्त श्रेणी के लोग पूँजीवाद की भूमिका से कुछ ज्यादा ही अपेक्षा पालते प्रतीत होते हैं। इतना तय है कि पितृसत्ता सिर्फ सामंतवादी व्यवस्था में ही मौजूद नहीं होती। अगर ऐसा होता तो विकसित पूँजीवादी मुल्क में इसे पूरी तौर पर समाप्त हो जाना चाहिए था। तथ्य तो यह बताता है कि ऐसी संरचना में भी पितृसत्ता की मौजूदगी बनी हुई है, भले ही बदले रंग-ढंग में। इसका आशय यह नहीं है कि सामंतवाद और पूँजीवाद औरतों के मामले में, पितृसत्ता की मौजूदगी को लेकर, एक समान हैं। निश्चित तौर पर पूँजीवाद की भूमिका इस लिहाज से कई कदम आगे की है। इसने पितृसत्ता को एक हद तक चोट पहुँचाया है, बदला है, औरतों को आजादी मुहैया कराई है। पर पितृसत्ता में अपना हित दिखते ही पूँजीवाद ने इसके साथ गठजोड़ कर लिया। पितृसत्ता के सहयोग से औरतों के श्रम को कम करके आँका गया। इससे पूँजीवाद का हित सधता है। इसी तरह स्त्री-देह का मसला है। पूँजीवाद और इसके कई उत्पादों ने स्त्री-देह को एक स्तर पर आजाद करने में भूमिका अदा की। लेकिन दूसरे स्तर पर अपने हित के लिए पितृसत्ता से गलबहियाँ कर स्त्री-देह को महज पण्य में भी बदलने की कोशिश की। स्त्री-देह की मुक्ति जरूरी है। स्त्रियों को अपने देह पर पूरा-पूरा अधिकार होना चाहिए। लेकिन इस देह-मुक्ति का नारा देकर स्त्री-देह को अपने लिए, सबके लिए, उपलब्ध करने की चालाकी भी हुई है। दूसरे शब्दों में कहें तो देह की आजादी पितृसत्तात्मक बंधनों, मूल्यों, मान्यताओं से होनी चाहिए। पूँजीवाद के जरिए कई कदम आगे तक स्त्रियों को देह पर आजादी मिली है। स्त्रियों में यह चेतना भी विकसित हुई है कि उनके देह पर उनका हक है। पर आजाद देह को पुरुष-भोग के लिए ‘उपलब्ध देह’ बनाने की कोशिश अंततः पितृसत्ता को चोर दरवाजे से लागू करने का ही प्रयास है। यहीं एक बात और। पूँजीवाद के विभिन्न उपकरण, मीडिया आदि ने स्त्री-देह को खूब दिखाया और घुमाया है। घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर सार्वजनिक जगहों पर जाना, अपने आप में स्त्री-मुक्ति की दिशा में बढ़ा हुआ कदम है। पर यह भी गौर करना होगा कि इस बाहर आने में क्या सिर्फ स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया को यथार्थ बनाया जा रहा है ? अथवा पितृसत्तात्मक संरचना अपने को नए रूप में ढालकर स्त्री-देह का वस्तुकरण कर रही है। संभव है इसके पक्ष में ऊपरी तौर पर स्त्री की मर्जी भी दिखे। पर सोचने की बात है कि इस ‘मर्जी’ को कौन-सी सत्ता परिचालित कर रही है, नियंत्रित कर रही है? लिहाजा पितृसत्ता की कुछ की दहलीज लाँघने के बावजूद स्त्री-देह किसके नियंत्रण में है, कौन-सी ताकत इस दिशा में ठेल रही है। इस पहलू को नजरअंदाज करके स्त्री-मुक्ति का न तो यथार्थ समझा जा सकता है और न ही यूटोपिया की रचना हो सकती है। दरअसल, ये सारी परिस्थितियाँ इतनी जटिलताओं से युक्त हैं कि इसका एक पक्ष देखकर न तो इसे सीधे खारिज किया जा सकता है और न ही इसका पुरजोर समर्थन। लिहाजा, पूँजीवाद या इसके विभिन्न उपकरणों को उनकी प्रगतिशीलता का वाजिब श्रेय भी देना होगा। साथ ही इसके ‘मुनाफे’ के लिए बने शोषणमूलक तंत्रा की जटिलता और पितृसत्ता के साथ रिश्ते को समझते हुए मुखालफत भी करना होगा।

इन दो व्यवस्थाओं के अलावा समाजवादी/साम्यवादी मुल्कों में पितृसत्ता की क्या स्थिति रही? क्या यह बिल्कुल समाप्त हो गई? ;पिफलहाल यहाँ इस पर बहस किए बगैर कि वे मुल्क कितने समाजवादी या साम्यवादी थे?द्ध यह सवाल इसलिए पूछा जाना जरूरी है, क्योंकि कुछ लोगों का मानना है, समाजवाद आते स्त्री-मुक्ति का मकसद आप पूरा हो जाएगा। असल में, ‘आधार’ और अधिरचना की यांत्रिाक समझ के कारण ही कुछ लोग ऐसा समझते हैं। स्त्री-मुक्ति का सवाल ही नहीं बल्कि जाति के सवाल को भी कापफी समय तक ऐसे ही देखा जाता रहा है। कुछ लोग स्त्री-मुक्ति ;जेंडर के संदर्भ मेंद्ध के सवाल को सिपर्फ ‘अधिरचना’ से सम्ब( मानते हैं। ऐसे लोगों को लगता है कि क्रांति के बाद जब ‘आधार’ ही बदल जाएगा तो अधिरचना का बदलना अवश्यम्भावी है। लिहाजा स्त्री-मुक्ति का प्रश्न ही नहीं बचेगा। पितृसत्ता बिल्कुल समाप्त हो जाएगी। ऐसे लोग ‘आधार’ के साथ पितृसत्ता के जटिल रिश्तों को नजरअंदाज करते हैं। जबकि कुछ लोगों को पितृसत्ता का भौतिक आधार ही ज्यादा दिखता है। लिहाजा, ऐसे लोग इसे सिपर्फ ‘आधार’ से जुड़ा मानते हैं। इस समझ का प्रतिफलन इस रूप में विकसित होता है कि जब उत्पादन का सम्बन्ध बदल जाएगा, उत्पादन प्रक्रिया बदल जाएगी तो फिर स्त्री-मुक्ति तो अपने आप हो जाएगी। ऐसे में यह कहना जरूरी है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था का भौतिक आधार और सांस्कृतिक अधिरचना दोनों के साथ चोली-दामन का रिश्ता है। एक को दूसरे पर तवज्जो देना इसके जटिल अंतर्संबन्धें को नजरअंदाज करना होगा। यह भी याद करने की जरूरत है कि ‘आधार’ के बदलने मात्रा से ‘अधिचना’ भी पूरी तरह नहीं बदलती। आधार और अधिरचना के बीच इस तरह का सरल सम्बन्ध होता तो कई समस्याएँ खुद-ब-खुद मिट गयी होती। आधार और अधिरचना के द्वन्द्वात्मक सम्बन्ध को नजरअंदाज करके इसकी परस्परता को नहीं समझा जा सकता। बहरहाल, समाजवादी मुल्कों में गोकि पूर्णतः स्त्री-मुक्ति न हुई, पर स्त्रियों के हालात बेहतर हो गए थे। पूँजीवाद की तुलना में स्त्री-मुक्ति के लिए समाजवादी व्यवस्था ज्यादा माकूल है।

स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया की रचना इसलिए भी ज्यादा जटिल है कि स्त्री की पहचान सिर्फ और सिर्फ स्त्री के तौर पर नहीं है। हो भी नहीं सकती। लिहाजा स्त्री की समस्याएँ भी कई स्तर भेदों से जुड़ी हुई हैं। स्त्री अपने आप में कोई ‘वर्ग’ नहीं है। स्त्री होने मात्र से सारी स्त्रियों की न तो सभी समस्याएँ हो सकती हैं और न सबका हित एक हो सकता है। हाँ, किसी-न-किसी रूप में सभी स्त्रियाँ  शोषण की शिकार होती हैं। मसलन, अमीर स्त्री और गरीब स्त्री दोनों का शोषण होता है। पर एक वर्ग का न होने के कारण इनका साझा वर्गीय हित-अहित नहीं हो सकता। संभव है, अमीर स्त्री अपने परिवार, समुदाय में पितृसत्ता की शिकार हो और अपने वर्गीय हित में गरीब स्त्री का शोषण कर रही हो। दूसरे शब्दों में कहें तो जाति-धर्म, वर्ग के साथ स्त्री अपनी अलग ‘कैटेगरी’ भी बनाती है। तो क्या यह कहा जा सकता है कि सेक्स और जेण्डर के हिसाब से ऊपरी तौर पर समान होने के बावजूद ये स्तर-भेद ‘सार्वभौम बहनापा’ के मार्ग में अवरोध हैं? क्या इन स्तर भेदों को बिल्कुल नकारा जा सकता है?  प्रसंगवश, स्त्री-मुक्ति विमर्शकारों के यहाँ ‘सेक्स’ और ‘जेण्डर’ एक नहीं है। अब हिन्दी में इसके अनुवाद की समस्या हो सकती है। इन दोनों का अनुवाद ‘लिंग’ करने से उनके साथ का अर्थवृत्त नहीं आ सकता और अवधरणा भी स्पष्ट नहीं हो सकती। लिहाजा जब तक उस अवधरणा को स्पष्ट करने वाला शब्द नहीं मिलता, तब तक सेक्स के लिए लिंग और जेण्डर के लिए जेण्डर का उपयोग करने में क्या दिक्कत है? कुछ अन्ध हिन्दी-प्रेमी दूसरी भाषा के शब्दों को बिल्कुल लेना नहीं चाहते। नतीजतन ऐसा शब्द बना देते हैं जो उस अवधरणा को स्पष्ट करने में कहीं से कारगर नहीं होता। गौरतलब है कि लिंग (सेक्स के अर्थ में) एक बायोलॉजिकल कंस्ट्रक्ट है और जेण्डर एक सोशियोलॉजिकल कस्ट्रक्ट। यानी सेक्स जैविक या प्राकृतिक होता है। जबकि जेण्डर जैविक या प्राकृतिक नहीं होता। जेण्डर की रचना विभिन्न सत्ताओं ने ऐतिहासिक रूप से सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यों, मान्यताओं के तौर पर किया है। मतलब कि स्त्री- ‘सेक्स’ के लिहाज से पुरुष से भिन्न है। इन्हें ‘जेण्डर’ की भिन्नता पितृसत्ता ने अपने स्वार्थ के लिए स्त्रियों को विभिन्न ‘भूमिका’ देने के मकसद से और कमतर ठहराने के लिए किया है। इस लिहाज से देखें तो ‘सेक्स’ और ‘जेण्डर’ में बड़ा फर्क नजर आएगा। पितृसत्ता ने ‘जेण्डर’ को भी प्राकृतिक, स्वाभाविक गुण के रूप में प्रचारित-प्रसारित किया है। स्त्री-मुक्ति इसी ‘जेण्डर’ से मुक्ति में है। बहरहाल, स्त्री-मुक्ति का यूटोपिया रचने वालों को स्त्री के स्तरभेदों को ध्यान में रखना होगा। स्त्रियों के भीतर मौजूद परस्पर विरोधी पहचान के कई रूप हो सकते हैं। इन पहचानों को रेखांकित करने से स्त्री-मुक्ति का यूटोपिया कमजोर नहीं बल्कि ज्यादा सार्थक, विश्वसनीय और कारगर होगा। अलबत्ता यह स्तर भेद चुनौती जरूर पेश करेगा पर मुक्ति का मजबूत और चौड़ा रास्ता इसी से निकलेगा। जाति और वर्ग दोनों से निरपेक्ष जेण्डर की समझ मुक्तिकारी यूटोपिया की पुख्ता जमीन तैयार नहीं कर सकती। साथ ही इस यूटोपिया की संरचना तब तक पूर्णतया सफल नहीं हो सकती जब तक तमाम स्त्रियों के लिए इसमें जगह न हो। कहने का आशय यह है कि स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया की बाबत यह नहीं कहना होगा कि फिलहाल इस श्रेणी की स्त्री मुक्त होगी और उस श्रेणी की स्त्री बाद मुक्त होगी। आपसी परस्पर विरोधी भेदों के बावजूद सारी स्त्रिायाँ पितृसत्ता की शिकार हैं। और सबके लिए मुक्तिकामी यूटोपिया की दरकार है।

जब भी स्त्री-मुक्ति की चर्चा होती है, पितृसत्तात्मक व्यवस्था के अलमबरदार इसे खतरे के तौर पर प्रचारित करते हैं। ऐसे लोग यह फैलाते हैं कि मुक्ति की आवाज उठाने वाली ये औरतें पुरुषों से नफरत करने वाली, परिवार तोड़ने वाली, ब्रा जलाने वाली, परकटी समुदाय की हैं। इनकी कोई देशी जमीन नहीं है। अव्वल तो यह है कि स्त्री-मुक्ति का सपना देखने वाली या इस दिशा में चिंतन-मन्थन करने वाली औरतों की कोई एक धारा नहीं है न ही स्त्री-मुक्ति सम्बन्धी कोई एक अवधारणा। हर बड़े मकसद की तरह इसमें भी तरह-तरह की वैचारिक सरणियों में यकीन रखने वाले लोग सक्रिय हैं। किसी भी अस्मितावादी, मुक्तिकामी समूह का अपने ऊपर अत्याचार करने वाले लोगों के प्रति नफरत पैदा कर अपनी अस्मिता की तरफ ध्यान खींचने और इस ‘अन्य’ के बरअक्स ‘अपने’ लोगों को एकजुट करना आसान होता है। नोट करने की बात है कि अगर यह नफरत की प्रवृत्ति बढ़ती गई तो कोई भी मुक्तिकामी परियोजना सफल होने के बजाय एक-दूसरी वर्चस्वकारी शक्ति में तब्दील हो जाएगी। फिर यह एक लोकतांत्रिाक व्यवस्था बनाने की बजाय, इन मूल्यों के लिए खुद भी चुनौती बन जाएगी। इसलिए किसी भी मुक्तिकारी समूह के यूटोपिया में उसके ‘अन्य’ के लिए क्या भाव-स्थान है, इसके जरिए उस यूटोपिया की जाँच बिल्कुल जरूरी होती है। यह अच्छी बात है कि स्त्री-समूहों में अपने ‘अन्य’ (पुरुष) के लिए नफरत का भाव नहीं है। इनकी स्पष्ट समझ है कि हमारा संघर्ष पितृसत्ता के विविध आयामों से है, न कि पुरुष-व्यक्ति-सत्ता से। स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया में पुरुषों के लिए भी बराबर अधिकार और जगह होगी। अलबत्ता ये औरतें नफरत पफैलाने वाली नहीं  हैं बल्कि समाज में बराबरी, प्रेम और सौहार्द को स्थापित करना चाहती हैं। हाँ, अगर परिवार का ढाँचा अपने को बदलकर लोकतांत्रिक नहीं बनाता, पितृसत्ता से चिपका रहना चाहता है, तो इसका बना रहना क्यों जरूरी है ? पितृसत्ता पर आधरित मौजूदा ‘परिवार’ में लोकतांत्रिक बनने की प्रक्रिया के दौरान दरार आएगी और एक बेहतर परिवार की रचना होगी। इस नए बने ‘परिवार’ (या इसका कुछ नया नाम  पड़ जाए) में स्त्री-पुरुष समानता होगी। दोनों को बराबर हक होगा। क्या यह कहने की जरूरत है कि ऐसा होना सिर्फ स्त्री के लिए नहीं बल्कि पुरुषों के हित के लिए भी आवश्यक है। जिस ‘ब्रा- बर्निंग’ की चर्चा बार-बार होती हैं, उसे भी समझने की जरूरत है। असल में, मुक्तिकामी स्त्रियों ने ब्रा को ‘जेण्डर’ के साथ जोड़कर देखा था। अमेरिका में सम्पन्न एक विश्व सुंदरी प्रतियोगिता के दौरान स्त्रीवादियों ने एक कूड़ेदान में अपना-अपना ब्रा उतारकर फेंक दिया। इन लोगों ने स्त्रियों से यह अपील भी की ब्रा गुलामी का प्रतीक है अतः इसे फेंक दें। इन स्त्रियों का मानना था कि स्तन बच्चे के दूध पीने के लिए है, न कि पुरुष के उपभोग की खातिर। पुरुष-सत्ता ने इसे भोग की वस्तु बनाकर खास ‘आकार’ में रखने के मकसद से ब्रा का ईजाद किया है। आशय यह कि स्त्री ‘सेक्स’ के इस अंग को ‘ब्रा’ ने ‘जेण्डर’ में तब्दील कर दिया है। लिहाजा, गुलामी के इस निशानी को पफेंककर जला देना आवश्यक है। गौर करने लायक बात यह है कि आज का स्त्रीवाद इस समझ से काफी आगे बढ़ चुका है। दूसरा, ‘ब्रा-बर्निंग’ के मुद्दे पर इतनी हाय-तौबा की दरकार भी नहीं है। यह भी ऐसी ही घटना है जैसा कि गर्भपात के अधिकार के लिए हो रहे आंदोलन के दौरान सीमोन सहित फ्रांस की अनेक स्त्रीवादी महिलाओं ने अपना दस्तख्त कर सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि उन्होंने अपने जीवन में गर्भपात कराया है। गर्भपात कराना उनका हक है और यह अधिकार कानूनी तौर पर उन्हें मिलना चाहिए। कानूनी हक मिलने के साथ समाज में गर्भपात को लेकर मौजूद ‘टैबू’ भी इससे दूर हुआ। अतः इतिहास की इन घटनाओं को उसके संदर्भ में ही देखने से, इन्हें ठीक से समझा जा सकता है। बहरहाल ऐसी अपेक्षा तो स्त्री-पुरुष समता में भरोसा रखने वालों से की जा सकती है, पितृसत्ता के अलमबरदारों से नहीं।

स्त्रीवाद और स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया के समर्थकों पर आरोप लगाया जाता है कि इनकी देशी जड़ें नहीं हैं। ऐसा कहकर इस विचार को फैलाने की पुरजोर कोशिश होती है कि ये विदेशी धरणाएँ हैं और इसका यहाँ के अतीत, सभ्यता और संस्कृति से लेना-देना नहीं है। यहाँ की आम औरतों  का भी इस ‘मुक्ति’ से कोई सरोकार नहीं है। अव्वल तो यह कि कोई भी विचारधारा, वैचारिक सरणी अपने मुल्क में नहीं जन्मी तो क्या इसे नहीं अपनाना चाहिए ? क्या लोकतंत्रा, आधुनिकता सरीखी धरणाओं का जन्म जिन मुल्कों में नहीं हुआ, उन्हें इन धरणाओं को त्याग देना चाहिए ? ऐसी कूपमंडूकता के खरतनाक मंसूबों को हमेशा याद रखना होगा। दूसरी बात यह कि स्त्री-मुक्ति की देशी जड़ें यहाँ मौजूद रही हैं। स्त्रीवादी बुद्धिधर्मियों ने इसकी गहरी पड़ताल कर हमारी इस महत्त्वपूर्ण विरासत का विवेचन-विश्लेषण किया है। जबसे पितृसत्ता का अंकुश कायम हुआ है, इसके प्रतिरोध में स्त्री-आवाजें भी आई हैं। क्या इन आवाजों में मुक्ति-कामना नहीं झलकती ? अपनी पीड़ा का अहसास कराती इन आवाजों में मुक्ति की गहरी लालसा का म(मिराग भी लबरेज़ है। गार्गी, थेरी गाथा की स्त्रियाँ, आंडाल, अक्का महादेवी, मीराबाई, सहजोबाई से लेकर रमाबाई, ताराबाई शिंदे, महादेवी वर्मा सरीखी अनेक स्त्रियों की आवाज़ में अपनी पीड़ा और पितृसत्ता की मुखालफत शामिल है। पितृसत्ता ने कई स्तरों पर काम किया है। इनकी आवाज को दबाने से लेकर इनके विचारों को नष्ट करने तक पितृसत्ता की प्रत्यक्ष हिंसा तो दिखती है, पर चुप कराने वाली परोक्ष हिंसा जल्द दिख नहीं पाती। आलम यह रहा है कि निकट अतीत में सीमंतनी उपदेश की महान रचनाकार ‘एक अज्ञात हिंदू औरत’ ही बनी रही। आज तक उस साहसी स्त्री का नाम पता नहीं चल पाया है। क्या यह उस परोक्ष हिंसा का एक बुरा नतीजा नहीं है ? ऐसा नहीं है कि पितृसत्ता की मुखालफत करने वाली ये स्त्रियाँ सिर्फ भारत या यूरोप में हुई हैं। जिस तरह हर मुल्क में पितृसत्ता थी, उसी तरह इसकी विरोधी भी थीं। मसलन, काफी पहले न जाकर निकट अतीत, उन्नीसवीं सदी में गौर करें तो चीन में जिउ जिन, श्रीलंका में सुगला तथा गजमन नोना, इण्डोनेशिया में कार्तिनी, ईरान में कुर्रत उल ऐन सहित अनेक महिलाएँ हर मुल्क में मिल जाएंगी। यह अलग बात है कि पितृसत्ता का विरोध करने के साथ-साथ, मौजूदा दौर के हिसाब से देखने पर, इनकी सीमाएं भी सामने आती हैं। अपनी इस विरासत को न तो नकार कर और न ही बढ़-चढ़कर तारीफ करके इसे समझा जा सकता है। विरासत के सर्जनात्मक विकास के लिए खूबियों-सीमाओं को ध्यान में रखते हुए इसके साथ जिरह जरूरी होता है और कारगर भी।

अपने देश में स्वाधीनता आंदोलन ने स्त्रियों को घर की दहलीज से बाहर निकाला। इसी दौरान बड़ी तादाद में स्त्रियों ने सामाजिक-राजनीतिक कार्य में हिस्सा लिया। राजनीतिक प्रश्न के तौर पर स्त्रियों का सवाल इसी दौर में उभरा। स्त्रियों का घर की चारदीवारी से बाहर आकर सामाजिक-राजनीतिक कामों में हिस्सा लेना, सभा-संगोष्ठी में जाना अपने आप में स्त्री-मुक्ति की दिशा में बढ़ी हुई घटना थी। इसके लिए स्वाधीनता-आंदोलन की अगुवाई करने वाले नेताओं को इसका श्रेय देना चाहिए। पर यह भी याद रखना चाहिए कि दलित मजदूरों और किसानों के सवाल की तरह स्त्रियों का प्रश्न भी उनके लिए स्वाधीनता-आंदोलन का ही मसला था, अलग से स्त्री-मुक्ति का सवाल नहीं। आशय यह कि उस दौर के राष्ट्रवादी नेताओं ने स्त्रियों के मसले को अपने नजरिये से स्वाधीनता आंदोलन की जरूरत के नजरिये से उठाया। स्त्रियों को घर से बाहर लाकर आंदोलन से जोड़ना उनकी ऐतिहासिक जरूरत थी। यही वजह है कि १९१७ में सरोजनी नायडू की अगुवाई में स्त्रियों के एक प्रतिनिधिमंडल को मांटेस्क्यू से मिलकर कांग्रेस, मुस्लिम लीग और काउंसिल के उन्नीस गैर-सरकारी सदस्यों द्वारा उठाए गए स्वराज्य की मांग को अपना समर्थन देते हुए स्त्रियों के सवाल को अलग से उठाना पड़ा। स्वाधीनता आंदोलन के अगुआ खुद ‘जेण्डर’ की धरणा से ग्रसित थे। उन्हें लगता था कि स्वाधीनता आंदोलन में जो काम पुरुष कर सकते हैं, स्त्रियां नहीं कर सकतीं। इसे समझने के लिए महात्मा गांधी द्वारा आहूत नमक सत्याग्रह को याद किया जा सकता है। गांधी जी स्वाधीननता आंदोलन में स्त्रियों को भाग लेने के लिए प्रेरित करते थे परंतु नमक सत्याग्रह के लिए हुए दांडी मार्च में हिस्सा लेने से रोक रहे थे। इन्हें लगता था कि इतना दूर चलने से स्त्रियां थक जाएंगी। गांधी जी की इस मनाही का सरोजनी नायडू सहित कुछ स्त्रियों ने विरोध किया और दांडी-मार्च में शामिल होने हेतु जिद की। इनकी जिद के सामने झुककर गांधी जी ने बाद में अपनी हामी भरी। दांडी-मार्च और इसकी परिणति नमक सत्याग्रह में शामिल स्त्रियों ने गांधी जी की पूर्व मान्यता को गलत साबित करते हुए पुरुषों की तुलना में ज्यादा काम किया। इस तरह की कई घटनाएँ बताती हैं कि स्वाधीनता-आंदोलन के नेताओं की मानसिक बनावट में ‘जेण्डर’ की पितृसत्तात्मक मान्यताओं का कितना असर था। इसी के साथ कुछ ऐसी बातें भी हैं जिनमें भारत की स्त्रियों को, अपने हक के लिए यूरोप की महिलाओं की तुलना में काफी कम संघर्ष करना पड़ा। यूरोपीय महिलाओं को अपने राजनीतिक हक, ‘वोट देने का अधिकार’ पाने के लिए लंबी जद्दोजहद करनी पड़ी थी।

१९२८ ई में हुए मुंबई (तब बम्बई) कांग्रेस में सरोजिनी नायडू ने काउंसिलों के चुनाव में स्त्रियों के मताध्किार का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव का मदन मोहन मालवीय ने मुखर विरोध किया था। हालांकि मालवीय के विरोध के बावजूद यह प्रस्ताव पास हो गया। आशय यह है कि स्त्रियों के पक्ष में, भले ही कुछ कदम आगे बढ़कर साथ देने के लिए, स्वाधीनता-आंदोलन में शामिल शिक्षित मध्य वर्ग सामने आता था।

भारत में स्त्रीवाद और स्त्री-मुक्ति के हिमायतियों ने सिर्फ स्त्रियों का सवाल उठाकर, उसके लिए जोखिम भरा संघर्ष नहीं किया है। बोधगया मुक्ति आंदोलन, चिपको आंदोलन और आंध्र प्रदेश में शराब के खिलाफ हुए आंदोलन जिसकी वजह से सरकार गिर गई थी, स्त्रियों द्वारा किए गए आंदोलन हैं जिसमें अपनी-अपनी तरह की स्त्रीवादी महिलाएं शामिल रही हैं। इन सारे संघर्षों में स्त्रियों को काफी सफलता भी मिली है। इस लिहाज से गौर फरमाएं तो भारत के स्त्री-मुक्ति आंदोलन की यह निजी खासियत है और इसके विस्तार तथा व्याप्ति का सूचक भी।

स्त्री-मुक्ति का एक यूटोपिया एक सदी पहले रुकैया सखावत हुसैन ने अपनी कहानी सुल्ताना का सपना में रचा था। इसके हिसाब से पुरुष घरों में सारा काम कर रहे हैं और औरतें बाहर के सारे काम को कर रही हैं। इस यूटोपिया को लागू करने की प्रक्रिया नफरत पर आधरित तो नहीं थी, परंतु इसमें सारा क्रम सिर्फ उल्ट दिया गया था। मौजूदा स्त्री-मुक्ति-विमर्श इस समझ से काफी आगे बढ़ चुका है। अब क्रम को सिर्फ उल्टा नहीं जाता बल्कि सहभागिता, स्वतंत्रता और समता को सुनिश्चित किया जाता है।

नोट करने लायक बात यह है कि यथार्थ और यूटोपिया एक-दूसरे से बिल्कुल अलहदा नहीं होते। दोनों के बीच द्वन्द्वात्मक रिश्ता होता है। यथार्थ के घात-संघात और समझ से यूटोपिया आकार ग्रहण करता है तो यूटोपिया हमें यथार्थ को जाँचने-समझने की समझ भी देता है, जिससे उस यथार्थ की जटिल संरचना में निहित वर्चस्वकारी रूप को जानकर उसे दूर करने की दिशा में बढ़ते हैं। स्त्री-मुक्ति का यूटोपिया यथार्थ के विभिन्न आयामों को समझे बगैर नहीं रचा जा सकता। व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं के साथ पितृसत्ता ने अन्योन्याश्रित सम्बन्ध बना रखा है। इसलिए इन सारे पहलुओं को ध्यान में रखकर ही स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया का खाका निर्मित हो सकता है। पितृसत्ता के इस मकड़जाल को देखते हुए ऐसा लगता है कि बगैर पूरी व्यवस्था बदले पूर्णतः स्त्री-मुक्ति संभव नहीं।  एक न एक दिन स्त्री-मुक्ति का यूटोपिया यथार्थ जरूर बनेगा। मुक्ति का स्वप्न इसे हकीकत तक जरूर पहुँचायेगा। कवि वेणु गोपाल की कविता का सहारा लेकर कहें तो …

ना हो कुछ भी
सिर्फ सपना हो
तो भी हो सकती है शुरुआत
और यह एक शुरुआत ही तो है
कि वहाँ एक सपना है।

77 comments
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  1. इस विवेचना में स्त्री -मुक्ति सम्बन्धी सभी पहलुओं पर बारीकी से गौर किया गया है .इसके इतिहास की भी जाँच-परख की गयी है . यह अधिकांश भारतीय स्त्री की कहानी है . इसका दोष जड़ में हीं है इसलिए इसका ऐसा रूप देखने को मिलता है . बचपन से हीं लड़के-लड़कियों में भेद किया जाता है .लड़के को विद्यालय से लेकर अन्य हर तरह की सुविधाएं प्रदान की जाती है वहीँ लड़कियों को घरेलु कार्यों में लगाया जाता है . यहाँ तक कि खाने-पीने में भी भेद किया जाता है . देखते-देखते उसकी शादी भी हो जाती है और उसे अपने बारे में सोचने या निर्णय लेने के लिए कोई मौका भी नहीं मिलता है . इस तरह वह सम्पूर्ण रूप से दुसरे पर आश्रित हो जाती है और स्वतंत्र रूप से जीने के लिए कोई आश्रय नहीं होता.
    मैं इस सन्दर्भ में वश यही कहना चाहूँगा कि अगर स्त्री मुक्ति कि बात करते हैं तो स्त्रियों को शिक्षा का अधिकार दें , आत्म निर्भर बनने का अवसर प्रदान करें .

  2. Bahut khub…..istri mukti jaruri hai….per dhayan se kahi dalit aandolan ki tarah …ye bhi pratiaaspradha me bhatakne na lage……aapke vichare bade aachhe hai…..mai iski izaat karta hu……

    Shyam

  3. Giri Jee
    Striwaad ki Samajh rakhne Ka Dawa sirf is Anushashan ke ‘Formal’ adhyeat a hi nahi kar sakte, yah to apke alekh se tay ho jata hai, Badhai tatha Swagat!
    Bhai lekin Mujhr kuch samajh mein nahin ata ki Pariwar ka koi vikalp bhi hai kya, aur yadi hai to stri ke shoshan se rahit uska swaroop kya hoga. Kucch milkar iski partal ki ja sakti hai. Shoshan par adharit pariwar abtak ki sabse kamal ki sanstha hai jahan care hai, pyar hai, sahyog hai, upeksha bhi hai, nafarat bhi aur asahyog bhi– parantu kuch to hai, vyakti ke roop mein identification to hai. Bajar mein khade kabira ka kya, Chaliye ispar milkar baat karein
    Punah Deh se mukti ka bada ghalampel hai. Bhai Dehmukti ka sandarbh availiblity se nahin ho sakta jo ki ‘lampat srivdai’ Purush (!) samajhata hai ,kuchh had tak bajar bhi abhash deta hai. Aisi Samajh Hindi patti mein pale badhe adhikansh Swanam dhanyon ki hai, jo ki sankirn bandahno ki kuntha hai, unke liye ek ilaz hai, west mein apne bete ko lo mood se nikalane ke liye ek maan ne sex provide karane ke liye kisi stri ka awahan kiya hai.
    Khair ‘deh se mukti jaroori hai’ sabse jaroori ,strimukti ke liye !iske apne sandarbh hain kucch baat to isparbhi honi chahiye
    Bhai punah badhai
    Sanjeev chandan

  4. न हो कुछ भी
    सिर्फ सपना हो
    तो भी हो सकती है शुरुआत ……,
    राजीव जी यह कविता मैंने फ्रेम करा कर अपने घर में लगा रखी है ,स्त्री मुक्ति के साथ आपने यूटोपिया और यथार्थ पर बेहद जरूरी और गंभीर लिखा है , औरत की मुक्ति का सपना शायद आप जैसे प्रखर आलोचकों की कलम से होकर पूरा हो …….
    अभी वो दिन बहुत दूर पर ख्वाब तो देख ही सकते हैं ………अरुण कमल जी बड़े कवि हैं उन्होंने ”स्वप्न ” तो रचा ……….क्या यह एक शुरुआत नहीं है स्त्री मुक्ति की ? बहुत बहुत बधाई .—-सुशीला पुरी

  5. राजीव जी
    औरत के दुखों की और उसके संघर्ष की ताकत का सांगोपांग जो चित्र खींचा है आपने उसकी तारीफ कैसे करें .. अरुण कमल की कविता की एकदम सही व्याख्या की है आपने !
    वास्तव में औरत के दुःख ऐसे ही होते हैं की उसको घर का एहसास नहीं होता है . वह तो एक ठौर होती है ..बस . यथार्थ और यूटोपिया का तो एकदम साफ़ रिश्ता है.. आप ने एकदम सही लिखा है की पुरुष सत्ता मुखर रूप में हर स्त्री को प्रभावित करती है चाहे वह गरीब हो या अमीर
    .स्वप्न साथ रहेंगे तभी वे साकार होंगे .प्राप्ति तो है ही. आज सीमंतिनी उपदेश जैसी लेखिका को अपना नाम छुपाने की आवश्यकता नहीं है…सारे स्वप्न पूरे ही होंगे .. अँधेरा तो सिर्फ देहरी पर उस पार है उजास की एक पूरी दुनिया .
    प्रज्ञा

  6. राजीव जी
    स्त्री मुक्ति —स्वप्न ‘ यथार्थ’ यूटोपिया ‘पर आपका सारगर्भित लेख पढा . आप बधाई के पात्र हैं .मेरा मानना है की स्त्री मुक्ति स्वप्न से ही हो ;तो काफी कुछ बच जायेगा .लेकिन पहले जिन स्त्रियों ने मुक्ति चाही ;उन्होंने इन तीनो को तोडा है .लेकिन आज
    भी समाज अपने आप को इस बदलाव के लिए तैयार नही कर पाया है .समाज के लिए बहुआयामी स्त्री शिक्षा एक विकल्प हो सकता है

  7. ye lekh stri vimarsh ko samajhne ke naye aayaam kholta hai.

  8. good attempt….
    best wishes.

  9. अच्‍छी शुरूआत है भाई …

  10. Apke lekh padhne se stri vimarsh sambandhi ek gahri samajh banti hai. striyo ki swatatra/ samasyaon ko samajaitihasik paridrishya me apne parakhne ki koshish ki hai jo kafi sarahniye hai. hindi patrikao me jis tarah proof sambandhi kamiya hoti hai wo yaha v dikh rahi hai, patrika ke sampadako sanchalko ko is per dhyan dena chahiye. Prabhat kumar jha

  11. राजीव जी मैंने आपका लेख पढ़ा. काफ़ी अच्छा लगा. पर सवाल मन में बार-बार यही उठता है कि लोग पढ़कर अच्छा-अच्छा तो कहते हैं पर जब अपने जीवन में इन चीजों को उतारना पड़ता है तब वो भी इस यूटोपियाई यथार्थ से बाहर नहीं निकल पाते हैं. इसका भी यदि कोई उपाय आपको नजर आए तो उस तरफ भी अपने पाठकों का ध्यान आकृष्ट कराएं. तब शायद सही अर्थों में स्त्री मुक्ति का सपना साकार हो सकेगा.

  12. rajiv bhai arun kamal ki kavita se suru hokar venugopal ki kavita par jis tarah se aapki stri sambandhi chinta khatam hoti hai vakai lajawab hai. stri vimarsh par itna vicharottezak lekh mera khayal hai sayad hi kisi naye aalochak ne likhi ho. bahut samyak visleshan karte hain aap. pitrisatta par aapne bahut hi baariki se prahaar kiye hain. itna lamba lekh hote hue bhi kahin se bhi iska flow nahin tutta hai. rajiv bhai mujhe aasha hai ki isi tarah se aap vartmaan mai chal rahe dalit vimarsh par bhi prakash dalenge. ek baat aur stri sambandhi chinta karne wale kam se kam hindi ke lekhon ko to jarur is lekh ko padhana chahiye. badhai ho.

  13. yah nari vimarsh chlta hi rahega, jabtak stri ko stri roop me dekha jata rahega. stri sabase pahale vyakti hai, mahushy hai. ise samajhana koi nahi chahata. to, vimarsh hote rahemge, akhir kuchh na kuchh to chahiye kahane ke liye. … lekh aapaka bahut achchha hai, isame do raay nahin.

  14. pitrasattatmak parivar me stri ki dasha ke vishaya me apki samajh gahari hai

  15. stri mukatti ki vykulta ko vyapak falak pradan kiya gaya ha. lekhak ne atynat sahas ke sath samajik sanrachna ke tane bane ko mulyankit karane ka prayas kiya ha. aam stri ki pratorodhi chetana ko aage badhane ka sahaspurn kam yah lekh karata ha isake liye lekhak ko badhai badhi.

  16. adbhut lekh hai stree samasya ko naye aalok mein parakhata. rajeev ke paas vaichaarik gahrayee hai. priyam

  17. maanniya rajiv ji,
    arun kamal ji ki kavita ki panktiyon ko saamne rakhkar apne gambhir vichaar kiya hai.Lekin is sandarbh me do aur baato par bhi vichaar hona chaahiye.ek to yah, ki practically hum “stri” ke saath nahi jee rahe hote hai,Kyonki yadi woh hoti hai to kisi na kisi sambandh ya rishte ke daayre me humaare saath hoti hai.Shaayad isi liye mukti “stri” ki sambhav nahi ho sakti,kyonki woh patni,bhan bhabhi,maa ityaadi hokar hi stri hoti hai.Isliye stri mukti ko sambandho ke attachment se shaayad adhik samjha ja sakta hai.Dusri baat yah ki varga bhed aur uske itar,dono hi sthitiyo me,stri mukti ke chinho ki pahchaan kaise ki jaaye is par bhi abhi vichaar ki bahut sambhaavna hai.

  18. chintanparak lekh laga. dhanyawaad guruji. aise hi gyan bdate rahein.

  19. …बकौल रघुवीर सहाय

    नारी विचारी है
    पुरुष की मारी है
    तन क्षुधित है
    मन से मुदित है
    लपककर झपककर
    अंत में चित है…

  20. Hi Giri ji, It;s a wonderful article i have ever read.the arcle is mind blowing. you have good command over the language. You r going in right direction. desh ki mahilayo par vakai vichar or lagu karne ki jarurat hai.
    with regards,
    yours,
    Mohan

  21. Pyare Rajiv,
    Maine tumhara lekh padha. Stri shakti adbhut hai. Parantu jaroorat hai us shakti bodh ko jagrit karne ki. Maine bachpan me ek lekh padha tha. Yaad nahi shayad aap bata sako. Usme do tarah ke bodh ki baat ki gayi thi. Ek tha shakti bodh aur dusra tha saundarya bodh. Purush shakti bodh tak hi simit hota hai parantu stri dono bodh ko samaahit kar sakti hai. Bas is bodh ko ujagar/jagrit ki jaane ki jaroorat hai. Mudda samkalin hai aur gamgin bhi. Gharelu atyachaar ke upar abhi bhi koi pabandi nahi lag saki hai. Mudda paarivaarik batakar ise kahi thik dhang se na sunaya jaata hai aur na hi suna jaata hai. Aapne is mudde ko bahut hi achhe dhang se uthaya hai. Aapko meri bahut bahut shubhkaamnaaye.
    shubhechhu
    Abhay
    P.S. Tumne apni tasvir bahut hi dhaansu lagayi hai!

  22. lekh ke liye badhai aur shukriya,

    is lekh mein strivimarsh ko samjhne ke liye interdisciplinary approach ki jhalak mili…taqriban hum sabhi smasyaon se wakif hain…par smasyaon ka ko tayshuda dhanchan nhi hota…duniya ke majduron ke tarah striyon ki smasyain bhi aik nahi hai..isliye sthaniya star par vyaktigat sandharbhon mein hal khojne ki jarurat hai.

  23. राजीव जी,
    स्त्री पराधीनता को कविता के जरीये व्याख्यायित करने का प्रयास काबिले तारीफ है।बहुत बहुत बधाई। हिन्दी पट्टी में इस प्रकार के लेखों की सख्त आवश्यकता है। स्त्री विमर्श के प्रति आम लोगों के मन की गलतफहमी इसी प्रकार के लेखों से दूर हो सकती है।

  24. राजीव जी, आपके लेख में बहुत कुछ जानने और समझने को मिला। स्त्री स्वतंत्रता पर आपने लेख में शब्दों के ज़रिए गूढ़ रहस्यों पर प्रकाश डाला है। काफी कुछ उजागर किया है। उदाहरणों से आपने लेख में साक्ष्यों का काम किया है। कुल मिलाकर आप पाठक को अपने विचारों से सहमत करने में कामयाब हुए हैं। पितृसत्ता के पक्ष में रहने वाले लोग भी इस लेख को पढ़कर शायद उदारमना हो जाएं।

  25. राजीव जी,
    पहली बार आपको पढ़ा है….स्त्री की इस दशा पर मैंने ये पहली कविता पढ़ी…आपसे कैसे बताऊं कैसा महसूस हुआ,,,,,ऐसा लगा जैसे अपने आस-पास की किसी घटना को सचित्र देख रहा हूं….इस लेख का धन्यवाद….हमारे ब्लॉग पर भी लिखें….हिंदयुग्म(www.hindyugm.com)की बैठक (baithak.hindyugm.com) में आपका स्वागत है…..कभी मौका मिले तो संपर्क करें….दिल्ली में ही हूं…..

  26. rajiv,
    mudda ‘stri’ itna adhik lokpriy ho chala hai, k kuch bhi kah dena mahattvapurn lagta hai. aise me tumne ek kavita ko aadhar banakar bat karne ki koshish ki, yah sarahniy hai.
    main yahan kuchh alag bat karna chahta hun.
    sapna sirf tabhi sach ka akar le pata hai jab uska koi thos uddeshya hota hai. is lekh me bhi aise katipay aandolano ka jikr hai.
    aur jahan tak arun kamal ki ukt kavita ka ansh hai- bahut hi akarik aur sandarbh se bahishkrit hai. jahir hai, mukti ka matlab bhagna nahi- nayi sanrachna ka gathan hai, jo unki dusri kavitaon me bhi nahi dikhta, sirf rang-hin sapne.
    baharhal , do kavitaon ke bich ki tumhari upasthiti mujhe paryapt gambhir aur vastvik lagi. tum aisi hi apeksha hai.

  27. badhai RAJEEV JI, badhai issliye ki yeh bahas uss aam isstri ke liye hai jisse khood apno ne hi hashiye par dhake rakha hai…. wo janti hai, bav jood isske wo har bar ussi narak m laut aati hai ,jisme pehli bar wo jo dher se khwab boonkar wo layi thi uska maatam manane ke liye..wo vapas aati h…”evan se mritu ki aur nahi mritu se jeevan ki aur…” ”aarthik swavlamban aur pittrasatta ki lakdan, ye do aise virodhi swar hai h isstri mukti ke swapn k jinse hokar gujarna uske liye vastavik mukti ka shi sandarbh hoga…yhi wh nabj h jise giriji ne pakda h…baat nayi hi ho aissa ni hai lekin jisse khna hai uss tk pahuchane ke liye isse behtar prayas mushkil hai kuki yeh kahi bhi amurt vichro m jakar samadhaan ki talash nhi karte aur na hi we uski swapan ki aakansh ko palayanvadi mante ,assa ki aamtor par hota, ye usse uss badlaav ki bhoomika mankr chalte hai…aur uski disha ki padtaal karte hai…wo un hatash kisano ki tarah apne bhare pure pariwar ko chorkar b nahi jati..halanki pariwar ka yeh moh bhi apne aap m ek aissa majboot khoonta hai jisse tod pana uske bas ki baat nhi thi…lekin ab wo khoonta bhi hil rha hai aur hil rahi hai pratyek wo deewar jo usse bandhe rakhna cahti hai…saath hi wo poonjivai daur ki mokti aur phir usse punah apnr pittrasattatmak paashe main kheench lane ki amanviya saajish ki hi pol kholte hai..aur jisse aisa nahi lagta hai un karno ko bhi yeh lekh batata hai..arunji ki kavita ke bahane..aur ab bahana mera bhi ki main bhi fir lautunga,,,,

  28. RAJEEV bhaiya pahle to main let-latifi ke liye mafi chaahoonga ,arun kaml ki ‘svapn’ kavita ko vyakhyaayit karte huye stri-mukti ki pratyek pagdandiyon ki padtal karta yah aalekh apne lakshya men kaamyab rha hai ,bdhai. yah pitrisattatmak smaj aur iski purushvadi mansikta se nirmit samajik -parivarik niyam-kanoon,vyavstha ne stri svatantrata ke liye koi vikalp nahi chhoda hai .dekha jay to roodhi,dharm,maan-maryada aadi ke bhane striyon ko aangan ki dahlij se lekar vaicharik dahlij tak n langhne dene ki puri chaak-chaubandi ki gayi hai ,vah bhi itne suniyojit dhang se ki vah{stri} ek chakra se nikle to usse dusre dushchakra men fansna hi fansna hai. vidambna yah ki padhi-likhi sushikshit mahilayen bhi ise apni aur sampurn stri jati ki niyati maan baithi hain . yah hamari shiksha neeti hi aisi hai jo pathya-poostakon ke madhyam se ladkiyon ko sita aur savitri ban kar pairon ki thokar khakar bhi pativrata ka updesh deti hai.stri-svasthya vrat aur upvaas ki bali chadh jata hai tatha maje ki baat yah ki vrat ka punya bhi pati aur putra{purush}hi ko milta hai .haan,yah bilkul sahihai ki stri ka apna aisa koi parivar nahi hota jise vah nitant apna kah sake .na hi mayka aur na hi sasural . is isthiti men bda hi aham aur jatil saval khda hota hai kistri ka apna parivar kya ho?aapne jis vikalp ki baat ki hai ,kya uski talash poori ho payegi ?kya vartaman parivaar ke alave striyon ke liye koi dusra parivaar ho sakta hai?agar hoga to uska svarup kya hogo ?usmen vivah namak sanstha ki kya aur kaisi bhoomika hogi?kyon ki vivah namak sanstha hi maujooda parivaar ka aadhar hai .mujhe ummid hai ki aage kisi aalekh men aap in pahloon par bhi prakash dalenge. shubhakamna. …………………………………manish,wardha.

  29. rajiv ji baht bahut badhai ho achhe lekh ke liye. apne ek stree ki niyati gahrai se pakda hai.mujhe lagta hai ki stree mudde par jitna likha ja raha hai uski tulna me stree ki dasha nahi sudhar rahi hai.kya aisa nahi ho sakta hai ki in muddon par likhne wale is andolan se bhi jude?

  30. lekh achha hai kintu shuruat me kavita ka drishtant dekar bahut door tak ek hi paksh ko lekar chala gaya hai halaki suruat ke baad jab vaicharik parinati aati hai to lekh me gambhirata aur gahrai dekhne ko milti hai. Paschmi mahilao ka drishant dekhne se nai bahas ke aayam khulte hain. Sampurnta me kai tathayo ko samete naari ke sangharsh ki suruat ki achhi vakalat karta hai. Kai mamlo me mera bhi nazariya badla. Thanks!

  31. लेख पढ़कर काफी अच्छा लगा| प्राचीन समय से ही स्त्री को हासिये पर धकेला जा रहा है और दुर्भाग्य की बात ये है की भारत जैसे देश में जहाँ स्त्रियों को देवी का दर्जा दिया गया है आज भी बहुत सी स्त्रियाँ पितृसतात्मक बन्धनों से जकड़ी हुई हैं|

    इस लेख में ब्रा बर्निंग के बारे में बताया गया है की मुक्तिकामी स्त्रियों ने इसे जेंडर के साथ जोड़कर देखा था तो आज के men’s bra के बारे में आप क्या कहेंगे |

  32. sahitya samay ki nabj
    tatolta hai,phir uske upchar hetu lekhak ka sahyog leta hai. aapka prayas kabile tariff hai. lekin ek prashan uthata hai- istri ke liye mukti kya sirf sawapn
    ke madhyam se hi prapt ho sakti hai

  33. मुक्ति न मिले तो बना रहे मुक्ति का स्वप्न…कितना सुंदर….राजीव जी ,,आगे भी आपकी लेखनी ऐसे ही यथार्थ को दर्शाती रहे,,मेरी ढेरों शुभकामनाएं….

  34. rajiv ji!
    sabse pahle ki na to apka lekh karele ki tarah karwa hai na main diabetic hoon.ek imandar aur gahari partal karne ki koshish hai apka ye lekh jo hamesha se rahi hai.badhai.!!sach kahun to bahut kuch mila hai likhne ko kahne ko.jara aur parh lun.. क्योंकि वह बार-बार जीवन से मृत्यु नहीं, मृत्यु से जीवन के लिए भाग रही थी। भागती भी है तो खूँटे से बंधी बछिया-सी जहाँ तक रस्सी जाती, भागती / गर्दन ऐंठने तक खूँटे को डिगाती। आखिरकार वह औरत किस खूँटे से बंधी है, जिसे उखाड़ने की बार-बार असफल कोशिश करती है। गौर करें गर्दन ऐंठने तक कोशिश करती है और उखाड़ भले न पाये पर डिगा देती है। गर्दन ऐंठने तक कोशिश करना मानीखेज है। धीरे-धीरे यह खूँटा जड़ से उखड़ भले न पाये, टूटेगा जरूर। क्योंकि वह औरत बार-बार हर रात एक ही सपना देखती है। ताकि भूल न जाये मुक्ति की इच्छा। सपना है- मुक्ति न भी मिले तो बना रहे मुक्ति का स्वप्न और बदले न भी जीवन तो जीवित बचे बदलने का———yahan yutopiya aur yatharth ka dwandwa dekh rahi hun.khair1vistar se likhoongi.
    apke aalekh ke liye bahut bahut badhai .
    manjulika

  35. sabse phele apko bdhai, aur is baat ki khushi hai k stri k bhitar k sachai ko itne saral aur sehaj sabdo me samne lana yeh aj bhut badi baat hai aur isse sudur daxin me rehte hue isse apne shod karya ko samjna aur isse labh uthna ek vidhyarti k lye isse badi aur kya bat ho sakti hai, islye isi asha k sat ap aage likte rahenge aur hame labhanvit karte rahenge.

  36. राजीव जी
    आप का आलेख भारतीय नारी के जीवन यथार्थ को समझाने के साथ हीं वैश्विक परिवेश में नारीवाद को समझनें की एक दृष्टी देता है . सवाल यहाँ है की क्या पित्रिसतात्मक समाज किस हद तक नारी को मुक्त देखना चाहता है . आलम ये है की स्त्री शिक्षा के अभाव में आज नहीं सदियों से स्त्रिओ के शोषण में पुरुष के साथ स्त्रियाँ भी शामिल रहीं हैं . आज स्त्री विमश की नहीं स्त्री आन्दोलन की जरूरत हैं जो केवल बुद्धिजीविओं का केवल मानसिक कुस्ती नहीं वरन जमीनी सच्चाई से वास्ता रखता हो… इन सरे विमर्शों की सार्थकता इसी में है . मेरे अलावे किसी और को हबी यह लेख कुछ प्रेरित कर सके इसके लिए आपको बधाइयाँ……

    आपका स्नेहकंक्षी
    krishnasoni

  37. Dear rajeev ji,
    bahut-bahut badhai ho aapke is khobsurat lekh ke liye. apne ek stri ki niyati gahrai se samjha hai.mujhe lagta hai ki stri mudye par jitna likha ja raha hai uski tulna me stree ki dasha nahi sudhar rahi hai.kya aisa nahi ho sakta hai ki in muddon par likhne wale is andolan se bhi jude?

  38. राजीव जी ,आपका यह लेख स्त्री मुक्ति के संदर्भ के नए आयाम तो खोलता ही है ,अब तक के किये गए कार्यों की बेबाकी से समीक्षा भी करता है … इसके लिए आपको बहुत -बहुत बधाई ….
    अजीत पुरी,शोध छात्र ,दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली …

  39. राजीव जी,
    आपका लेख पढ़ा. स्त्री मुक्ति के विमर्श के नए आयाम बताने के लिए धन्यवाद… किन्तु स्त्री मुक्ति: यथार्थ और यूटोपिया अपने आप में स्वयं एक यूटोपिया ही है.
    दिनेश मिश्र, गोरखपुर

  40. राजीव जी,

    पहले तो एक अच्छे लेख के लिये बधाई.शरतचन्द्र का एक लेख
    है-नारी का मूल्य.इसमें तत्कालीन समाज मेंसती प्रथा पर बात करए हुये लेखक
    ने जिस भाषा का प्रयोग किया है,वो देख्नने और उद्ध्र्त करने लायक है.शरत की
    रची सारी स्त्रियां यूटोपिया में जीती हैं उसे यथार्थ बनाने में पूरा जीवन
    गर्क कर देती हैं.वैसे यहाँ हर युग की स्त्री का सत्य है,वो चाहे श्हरी हो या ग्रामीण सबके संघर्शो के पीछे एक ऐसी दुनिया की चाह है जहां वो विमर्श की हिस्सेदार ना भी हो तो भी अपनी बेटी को सुरक्षित बाहर भेज सके.अब इसे क्या कहेंगेंकि विदेश से लेकर देश तक की स्त्री के साथ रोज घटनाएं घट्ती है और केवल एक खबर भर बनाया जाती है.स्त्री देह को रौंदने की वहशी ख्वाहिश का अंत होगा ऐसा यूटोपिया तो मेरे मस्तिष्क मे भी है.

  41. राजीव जी बधाई……लेख शोधपरक है.

  42. अच्छे नज़रिये के लिये बधाई।

    लं आलेख में तथ्य ,इतिहास, और कलमकारी से विमर्श की वकालत तो हुई है लेकिन इस कलम का नज़रिया थ्री डायमेंसनल होता तो मज़ा आता। मेरे हिसाब से यह मुद्दा बहुत बिक चुका है और बकौल अज्ञेय अधिक घिसने से मुलम्मा छुट जता है।पित्रिसत्ता का इतिहास राम को
    सीता के हाथों दडित कराता है।फ़िर भी आपने गेंडर की बात की है तब शायद दर्शन को मायके और ससुराल से अलग सेक्सुअली मेल फ़िमेल के बज़ाये सोशली मेल फ़िमेल दिखना चाहिए। दर असल इतिहास में भावनायें असुरक्षित रही हैं पर आप जीवन की व्यावसायिकता के विरोध में
    इसी कमजोर भावुकता के अलावा किस चीZअ का स्वपन देख सकते हैं।

    मेरी व्यक्तिगत राय में स्त्री को मुक्त होने का नहीं मुक्त करने का स्वपन देखना है।
    जो मुक्त कर सकता है उसे बंधन में तो रखा ही नहीं जा सकता!

  43. दरअसल मेरी व्यक्तिगत राय में स्त्री बंधनों में तो है, पर यह सारे बंधन स्वयं के द्वारा स्थापित हैं क्योंकि बंधनमुक्ति की कामना और बंधन मुक्ति में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है। व्यक्तिगत जीवन में तो एक क्षण से भी कम।

    अगर हम इतिहास को देखें तो सीता भी उसी खूँटे से बंधी थी, जिसकी चर्वा आपने इस आलेख में की है। पर सीता ने इस बंधन को अस्वीकार किया और समय ने उसे स्वीकार भी किया। स्वयं को बंधनमुक्त रखना स्त्री और पुरूष होने पर निर्भर नहीं करता, बल्कि यह जोखिम के प्रति स्वीकार्यता पर निर्भर है। बंधन में सुरक्षा है, स्त्री ने इस तथ्य को आदिम काल से समझा है। जिसने भी आजादी की कीमत दी है, आजादी उसे ही मिली है। सीता ने भी कीमत चुकाई।

    आप एक तरफ़ स्वतंत्रता भी चाहें और सुरक्षा भी, तो यह हास्यास्पद हो जाता है। स्त्री मुक्ति का अर्थ जो आज लगाया जा रहा है या फ़िर जिन प्रतीकों को पितृसता के विरोध में जलाया जा रहा है, वह वास्तविकता से बहुत दूर है। प्रतीक संचार में तो बड़ी भूमिका निभाते हैं पर वह कोई वास्तविक समाधान उपस्थित नहीं करते। स्त्री मुक्ति का अर्थ भावनारहित हो जाना मेरी समझ में नहीं आता, क्योंकि भावनाएं ही हमें पशुओं से अलग मस्तिष्क की मेधा से सहारा पाकर एक मानवता की भूमि सी दे पाई हैं। अगर वह नहीं होंगी तो मानव मूल्यों का नाश ही लगता है। स्त्री हो या पुरूष, इसकी रक्षा तो करनी ही होगी। और फ़िर भावनाएँ, जैसा सब जानते हैं कि असुरक्षित होती और करती हैं। यह कीमत तो मानव होने की है, जिसे हर हाल में देना ही है।

    दूसरी बात यह है कि अगर स्त्री को चूल्हे, और घर से जोड़ कर देखा जाए तो पुरूष को भी दफ़्तर और घर की जरूरतें पूरा करते देखा जाएगा। जो सामने होगा वह एकरस जीवन से पैदा हुई ऊब होगी जो नए जोखिम से बचकर चलने से आती है। लेकिन मैं तब भी इस बात का समर्थन करती हूँ कि स्त्रियों को घर से बाहर की दुनिया अवश्य देखनी चाहिए। यह दुनिया ज्यादा मायनों में स्त्रियों की रची हुई है, वे स्रष्टा हैं इस समाज की, नैतिकता की और नियम कानूनों की भी। जैसा कि हम जानते हैं कि नई पीढ़ी के मन पर पहला प्रभाव माँ का होता है और स्त्री को यह देखना चाहिए कि घर, पद, प्रतिष्ठा इन सब कामनाओं को स्वार्थों में तब्दील कर देने से समाज में शोषण का जो आह्वान हुआ है उसके परिणामस्वरूप बनी दुनिया स्वार्थपूर्ण युद्ध और शोषण के आतंक में जमी हुई है। इसके दर्शन से ही शायद वह अपने प्रियजनों को स्वार्थमुक्त करने की प्रेरणा पा सके।
    संसार का हर अत्याचार और शोषण किसी न किसी रूप में किसी स्त्री के द्वारा ही स्वीकृत है। शारीरिक शोषण के सदर्भ में बात थोड़ी अलग है। यह प्राकृतिक न्याय की श्रेणी में आता है कि सबल निर्बल का शोषण स्वार्थ पूर्ति के लिए करते ही हैं। यह स्त्री पुरूष दोनों की विफ़लता है कि हम मनुष्यता को पशुता से वांछित दूरी पर परिभाषित नहीं कर सके हैं। कमजोर होते ही चाहे वह स्त्री हो या पुरूष, हमारे समाज में पैठी पाशविकता के कारण शोषण का शिकार हो जाता है। जब विवेकानंद ने कहा था कि भय सबसे बड़ा पाप है तो मेरी नजर में उनका तात्पर्य यही रहा होगा।
    लाचारी किसी जेंडर विशेष की पहचान नहीं है। इस कविता के स्त्री की लाचारी उसके स्त्री होने के कारण कम, नकारात्मक रूप में निश्चिंतता और लोभ या सकारात्मक रूप में भावना और समर्पण के कारण अधिक है। यह स्त्री होने या न होने से नहीं, कमजोर होने या न होने की बात है।
    क्या स्त्री मुक्ति कौस्मोपालिटन या प्लेब्वाय के कवर पेज़ पूरी करेंगे? हालाँकि इससे अंतर नहीं पड़ता है। यह एक जेस्चर के रूप में महत्त्वपूर्ण हो सकता है पर समाधान के रूप में इसका कोई औचित्य नहीं है। आज शोषण की पहचान तो ठीक ही हो रही है, पर कारण अभी छुपे हुए है।

  44. nari mukti ka dvand aur raste per jo aapne vistar se vichar kiya hai wo kabile tarif hai …iske sath hi hame pure samaj ko nye najariye se dekhne ki jarurat haai…lekh ke liye bahut ..bahut dhanyabad…………

    sampurnanand

  45. hello bhaiya its wonderful and i will talk you later on this note and some times i feel there is some thing given and another time something missing but at last its gud

  46. bdhai h….aapka yh article stri mukti ko khangalne ke liye praypt hai….bhut bhut bdhai…keeep it up…

  47. RAJEEV RANJAN JEE,
    NMSTE
    AAPKA LEKH PADHA…. I M AN M.B.A. STUDENT.
    ITS NICE ARTICLE. PR HM STRIYO KA UTOPIA PURA KB HOGA? AGR AAP ISPR LIKH SKE TO MEHRBANI
    HOGI….
    MERE HOSTEL KE ANY KYI LRKIYON NE BHI ISE PADHAA… PR LRKO NE ISE PADH UL JLUL KAHAA….
    YH HAI MRDO KI MANSIKTA…
    HM STRIYO KE SATH DIKKT YH HAI KI HME PARAAYO SE JDDOJAHAD SE PHLE APNE GHAR KE MRDO(dad, tau,bhai)SE BHI DIMAGI JDDOJAHAD KRNA PDTA HAI…. DUSRO SE LRNA AASAN HAI PRNTU APNO SE LRNA MUSKIL……. SHAYAD DER SBER SB SUNDR HO JAYE…..
    ISI TRH AAGE BHI LIKHEN…… SHUBHKAMNAYEN AUR BADHAI…..
    GITANJALI CHAUHAN
    RAIPUR, CHHATISGADH.

  48. bahut ache sir , aapke vichar padkar bahut acha laga………
    waise aapke vichar padkar mujhe to lagta hai ki aap kaafi bade istriwaadi hai ,,,,,,,,,, istriyo ke liye to aapne gandhi ji tak ko nhi baksha , gandhi ji ko bahut logo ne apna aadarsh maana ………….. lekin shayad aapke vichaar padne ke baad unke vichaar badal jaayenge
    lekin agar main apne vicharo ki baat karun to mujhe lagta hai ki istrio ki is dasha ke liye kaafi had tak wo khud bhi jimmedar hai , haan or unhi ke prayaaso se hi istrio ke stithi main sudhaar bhi aaya hai………………any how
    at the end well said sir , and a saluet to u

  49. dear sir
    i have read this article..
    hmare smaj me striyo ki halt itni darun hai……..rongte khade ho jate hai…
    aapne itni sanjidgi se is smsya pr prakash dala hai…. kya kahu?
    ab to 33% reservation bhi mila hai, shayd kuchh bat bne….
    ummid hai aage bhi aise margdarshan krte rhenge likhkr…..
    umda lekh hetu badhaaaaaiiiiiiiii….

    akhilesh sigh rawat
    kankhal, uttarakhand

  50. rajiv sir,,apke dwara likha gaya yeh article bahut acha diya gaya hai…….ek vidyarti hokar is article ko padne se mere vicharon ko aur acha banaya hai……is kavita ke madhyam se…apne bahut acha samjhaya hai….nari mukti par yeh article bahut acha…….hamare desh mein hum sab jante hain….ki auton ki kya stithi rahi hai…shuru se he…mardon ko upari darja diya gaya gaya hai……..aur dono ke beech humesha…barabari ka mool nahi raha hai…..dahej ko lekar bhi pehle aur ab bhi bahut cases sun ne ko milte hain…..jiska paridaam yeh ki un par shaadi ke baad zulm shuru hojate hai….maar peet,,,,,gaali galauj……yeh sab kuch abhi bhi dekhne ko milta hai…….yeh article ne meri soch ko aur badaya hai….aur utsahit bhi karta hai…..ki hum aise vicharo par aur dhyaan de………..

  51. hi Rajeev Ji,
    finally i found ur article…………its very inspiring for the women who dont know wat their rights are………….constantly they are becoming victims of domestic voilence ………..& sacrificing their lives ………. this article gives them a ray of hope to live for themselves & the world around them.

  52. ur article s clearly insinuating d tragic life of a women in our society……in my opinion still she is in a penumbra….in d sense dat couldnt get riddance frm so called male dominated society……ur focus is based on dat…..which is really ineffably beautiful…..highly accolading write-up…..thnx

  53. Lekh padha ,
    Rajeev ji ne kaphi chijo ko hamare samne rakha hai. ek treebim (SAMAAJ, SASURAL AUR MAIKA) ki rachana hamare samne aati hai…………
    jeesme fasi hue estree kabhi bhi bahar nahi nikal pati hai. parivar samaj me aaj bhi mahilae barabr samman nahi pati hai ……hamare samaj ka tana-bana es tarah se buna gaya hai ki esse nikalna tatkal sambhaw nahi…….. jaminee aadhar par kam kare ki jarurat aaj jyada jarurat hai……….

    PANKAJ CHAUBEY

  54. hello rajiv ranjan jee..

    congrats a lot for very nice article…….
    day by day we are watching these situations in our society………
    you hv explained it very critically…..
    all women must remember………. PERSONAL IS POLITICAL……………..
    then our society will be change….

    sudha pathak
    himachal pradesh

  55. aadarniya rajeev ji..
    nmste
    aapka lekh padha………………………………….kafi jaruri lga…………
    is vishay pr padhna aur sochna chahta hoo……….
    is topic pr aapne aur kha likha hai?
    hmare smaj ka kodh isi trh ke lekh se thik hoga…
    RAHUL RAJ

  56. mukti na bhi mile to bhi bacha rahe mukti svapn’..nari mukti ke aayamoo ko samgrta mein prastut kerta yah leka bhaut hi sar garbhit hai . prerit karne wala hai . bhaut bhadhai rajeevji.

    renu shah
    jodhpur
    26 may 2011

  57. राजीव जी आपने बात तो काफी सही कही है कविता को ढाल बना कर, लेकिन यह समझाने में असमर्थ है कि आपके लेख की यह स्त्री किसी मेट्रो शहर की है या किसी गांव की| क्योंकि स्त्री तो भाई स्त्री है| अगर गांव की है तब तो मार खा सकती है खूंटे पर बंधी गाय की तरह लेकिन अब के समय में तो वह भी संभव न दिखता है| और कहीं यदि मेट्रो की है, तब तो ना खायेगी मार और यदि कभी खा भी गई तो लौट कर ना जायेगी, और यह केवल मार नहीं होगी बल्कि मार-पीट होगी, वह भी दुतरफा जबरदस्त, अगर इन सब के बावजूद भी प्यार नामक कीड़ा कुलबुलाता रहा तो बात अलग है| क्योंकि प्रेम की दुनिया ही अलग है जहाँ इन विमर्शों की पहुँच नहीं है| कवि अरुण कमल की कविता ‘स्वप्न’ किसी गुस्साए या फिर एक दर्दनाक किस्से को बड़े ही सलीके से बयान करने जैसा लगती है| जिसमे भावना की जलेबी में दयनीयता की चासनी और क्रोध उन्मादन का अर्क पड़ा हुआ है| आप ने लिखा यह खूंटा उखड़े ना उखड़े पर टूटेगा जरूर| तो बन्धु आखिर स्त्री पुरुष को छोड़ कर किस नये जीव के पास जायेगी| कुत्ता, या किंग कांग वाले भालू के पास या फिर हालिया रिलीज फिल्म रोबोट की तरह किसी रोबोट के पास| आप लिखते हैं कि वह रेल पर जाने से वह रुकी उसमे उसकी जिजीविषा दिखती है बल्कि सच तो यह होता है कि मरने का फैसला करने पर ही आसुओं की उतनी बड़ी धार फूटती है जितनी बड़ी उस चोट से नहीं निकलती है| इंसान जब बहुत मजबूर हो जाता है, जब सारी दुनिया के विकल्प चुक जाते हैं तब मृत्यु अपनाता है, इतना आसान नहीं है मृत्यु का वरण, महज कल्पना करना तो ठीक है लेकिन उस कल्पना की भावना से मृत्यु के भय को बनाना ठीक नहीं है| आपने भी अपने आर्टिकल के ऊपर एक ह्रदय विचलित कर देने वाला फोटो लगा कर उस भय को बढ़ा ही रहे हैं|

    आप लिखते हैं कि स्त्री को घर कैद करके उसके घरेलू श्रम का अवमूल्यन किया है| लेकिन आप बताइए ‘क्या आप विवाह करके दो वक्त घर का खाना नहीं चाहेंगे|’ आज अधिकतर घरों में जाकर देख लीजिए सबसे बड़ी दिक्कत इस खाना बनाने की ही है, जिस चूल्हे चौके स्त्री पहले प्रेम से करती थी आज उसी बात के लिए रोना धोना मचाता है| क्यों भाई ? हाँ आपने एक बात अवश्य सही लिखी है कि इस बाजारवाद (पूँजीवाद और उपनिवेशवाद का परिष्कृत रूप) ने अवश्य स्त्रियों को आजादी दिलाई है| लेकिन यह आजादी अब मात्र आजादी नहीं रही बल्कि स्त्रियों की उछ्रंखलता हो गई है| यह पूंजीवाद की पूंजी ही आज स्त्री-पुरुष के अलगाव का कारण बन रही है जो दिन दुने रात चौगुने बढ़ रहे हैं, और इन्हें कोई विमर्श रोक नहीं पायेगा यह बढ़ता रहेगा| जब तक कि स्त्री अपना और पुरुष अपना मध्य मार्ग अपना कर प्रेमभाव से नहीं रहना सीखेगा तब तक|
    आज रिश्तों और अलगाव में असंतोष भी एक मुख्य क्लारण बनता जा रहा है| हर कोई इतना असहिष्णु हो गया है कि वह जरा सी बात भी बर्दाश्त नहीं करता है, और झगड़ने पर उतारू हो जाता जिसमे दोनों का बराबर कमाने का दंभ एक अच्छी खासी उर्जा का कार्य करता है| हम कितने भी कह ले कि हम अधिक शिक्षित और सभ्य हो गये हैं लेकिन साथ हीई हमारे अन्दर की सहनशीलता गायब होती जा रही है| आर्थिक अवसर बढ़ने और आय में तेज बढ़ोत्तरी के दौर में देखा जाए कि ऐसे अनेक उपयोगी कार्य जो पैसा कमाने या उसकी चाह के बिना किये जाते थे (जैसे रुमाल बनियान तह कर रख देना और भोजन के वक्त पाती के लिए गरम गरम रोटियां बना कर देना) उनका तेजी से अवमूल्यन हुआ है| वे कम प्रतिष्ठा के और उबाऊ लगने लगे हैं, यह दें पूंजीवाद की ही है|
    आप पूंजीवाद को स्त्री मुक्ति के रूप में तो चाहते हैं परन्तु उसके अन्य पहलुओं को से आपको नाराजगी है| यह तो वैसा ही है जैसा गाँधी जी ने अंग्रेजों के जाने कि बात पर यह कहा था कि “आप बाघ का स्वाभाव तो चाहते हैं लेकिन बाघ नहीं”, जो कि असंभव स लगता है| एक दूसरे एंगल से देखने पर यह भी पाता चलता है कि पूँजीवाद नहीं इसके लिए हमर छुपा हुआ लोभ दोषी है| आज ना जाने कितनी लड़कियां जिनकी उम्र 5 साल से लेकर 60 वर्ष तक या इससे ज्यादा या कम भी हो सकती है| इन विज्ञापनों में जगह पाने के लिए पाता नही कितने आडिशन दे रही हैं तब जाकर एक चांस मिलता है पूँजीवाद ने हमारी मूल भाव लोभ को समझ कर, परख कर अपना भ्रम रचा है| आज वह हमें नहीं बुलाता है हम उसे बुलाते हैं उसमे फंसते हैं अपनी मर्जी से| आज हजारों लड़कियां टीवी पर चल रहे लाखों कम्पटीशनों में भाग ले रही है जहाँ होड़ मची हुई है पहुँचाने की| आज पाता नहीं कितनी लड़कियां फिल्मों में काम को लेकर अपना सब कुछ बर्बाद कर के उसके पीछे अच्छे और गंदे सभी तरह के समझौते करने को तैयार हैं| बच्चियां अपने अविकसित उभारों को जबरदस्ती दिखा रही है| इसे आप पितृसत्ता का चोर दरवाजे से दाखिला नहीं कह सकते हैं, बल्कि यह बाजार की आपके घर और आपके बेड रूम और आपके आने वाले बच्चों की नस्ल में नैतिकता की सेंधमारी है| आप पितृ सत्ता की बात करते हैं लेकिन अब बाहुबल को शक्ति और सत्ता का पर्याय नहीं माना जाता है| और सत्ता वहीँ होती है जहाँ शक्ति होती है, आज शक्ति रूपया में है, बाजार में है सबसे अव्वल बात पूँजीवाद में है|
    आप लिखते हैं स्त्री की देह मुक्ति जरुरी है| अच्छा आप ही बता दीजिए ये स्त्री देह मुक्ति है क्या बला ? सवाल फिर वही हैं कि क्या स्त्री शरीर को अदर्शनीय कर दिया जाए और उन सभी सुखद अनुभूतियों को किसी रासायनिक या वैज्ञानिक विधि से मिटा दिया जाए जो स्त्रियों से होती है| या फिर आप लेस्बियन कल्चर चाहते हैं क्योंकि आपको तो पुरुष प्रजाति से दिक्कत है ?
    आप समाजवादी और साम्यवादी विचारधारा में स्त्रियों की स्थिति बेहतर बतायी है| तो उनमे उन विचार धाराओं का कोई गुण दोष नहीं है बल्कि दोनों ही विचार धाराएँ मानव को केन्द्र में रख कर बात करती है सिर्फ इस लिए, अंततः बात सभी जगह वही है| आप शोषणमूलक तंत्र जटिलता की मुखालफत करना चाहते हैं, लेकिन मनुष्य के स्वाभाव को कैसे बदलेंगे वह खुद ही अधिक लाभ के लिए शोषणमूलक तंत्र को मजबूत करना चाहता है| यह मूलतः मनुष्य के स्वाभाव की कहानी है|
    आप लिखते हैं कि “अमेरिका में सम्पन्न एक विश्व सुंदरी प्रतियोगिता के दौरान स्त्रीवादियों ने एक कूड़ेदान में अपना-अपना ब्रा उतारकर फेंक दिया। इन लोगों ने स्त्रियों से यह अपील भी की ब्रा गुलामी का प्रतीक है अतः इसे फेंक दें। इन स्त्रियों का मानना था कि स्तन बच्चे के दूध पीने के लिए है, न कि पुरुष के उपभोग की खातिर। पुरुष-सत्ता ने इसे भोग की वस्तु बनाकर खास ‘आकार’ में रखने के मकसद से ब्रा का ईजाद किया है। आशय यह कि स्त्री ‘सेक्स’ के इस अंग को ‘ब्रा’ ने ‘जेण्डर’ में तब्दील कर दिया है। लिहाजा, गुलामी के इस निशानी को पफेंककर जला देना आवश्यक है। गौर करने लायक बात यह है कि आज का स्त्रीवाद इस समझ से काफी आगे बढ़ चुका है। दूसरा, ‘ब्रा-बर्निंग’ के मुद्दे पर इतनी हाय-तौबा की दरकार भी नहीं है।“
    आप ने बड़ी ही सफाई से ब्रा को पुरुष की गुलामी का प्रतीक माना गया है उसे उतरवा दिया है उन स्त्रियों ने भी बड़ी सफाई से स्तन को मात्र दूध पीने से जोड़ लिया है, लेकिन यह बात यहाँ गायब हो गई है कि वह बच्चा भी क्या उस क्रिया से इतर आ गया है जिसे “महामिलन” का नाम दिया जाता है| और उस स्थिति में क्या यह मात्र दूध पीने का स्तन म्ज़त्र दूध पीने का स्तन ही होता है, शरीर विज्ञान कहता है कि यह सेक्स के लिए उत्तेजक का कार्य करते हैं| और वहीँ उस कम्पटीशन को जीतने वाली स्त्री भले ही एक क्षण को ब्रा उतर कर फेंक दिया हो लेकिन यह मामला केवल वहीँ तक सीमित रहा होगा| उन्होंने आजीवन तो वैसे ही रहने की कसम नहीं ही खाई होगी| यह मामला अपने शरीर की देखभाल से जुड़ा है|
    दरअसल दिक्कत यहाँ नहीं है हमारी मानसिकता में है| और क्या स्त्रियों को बच्चों को दूध पिलाने के इतर सदैव ही ऐसे स्तन दिखाऊ तरीके से रहने की आजादी दी जा सकती है यदि ऐसी अवस्था में हम आ जाएँ तब तो सारा मानसिक विकास का किया धारा ही बर्बाद हो जायेगी| और जो अव्वस्था फैलेगी उसका अंदाजा भी लगाना मुश्किल हो जायेगा| और दूसरे शब्दों में कहा जाए तो यह नग्नता भी है यह मात्र गुलामी को नहीं बल्कि अपनी पाशविक प्रवृतियों पर लगाम ना लगाये जाने का मामला है| मनुष्य पैदाईशन तो जानवर ही है और इस तरह के कार्य उसके अधिक पशुता की ओर बढ़ जाने की पुष्टि करते हैं| क्योंकि हमने अपनी पशुता को दबा कर अपने स्वाभाव के विरोध में खड़े होकर ही सभ्य रहना सीखा है|
    आपके इस आलेख के कुछेक जवाब अर्चना जी की टिपण्णी में अवश्य मिलते हैं जब वह लिखती हैं कि “दरअसल मेरी व्यक्तिगत राय में स्त्री बंधनों में तो है, पर यह सारे बंधन स्वयं के द्वारा स्थापित हैं क्योंकि बंधनमुक्ति की कामना और बंधन मुक्ति में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है। व्यक्तिगत जीवन में तो एक क्षण से भी कम।“
    आप एक तरफ़ स्वतंत्रता भी चाहें और सुरक्षा भी, तो यह हास्यास्पद हो जाता है। स्त्री मुक्ति का अर्थ जो आज लगाया जा रहा है या फ़िर जिन प्रतीकों को पितृसता के विरोध में जलाया जा रहा है, वह वास्तविकता से बहुत दूर है। प्रतीक संचार में तो बड़ी भूमिका निभाते हैं पर वह कोई वास्तविक समाधान उपस्थित नहीं करते। स्त्री मुक्ति का अर्थ भावनारहित हो जाना मेरी समझ में नहीं आता, क्योंकि भावनाएं ही हमें पशुओं से अलग मस्तिष्क की मेधा से सहारा पाकर एक मानवता की भूमि सी दे पाई हैं। अगर वह नहीं होंगी तो मानव मूल्यों का नाश ही लगता है। स्त्री हो या पुरूष, इसकी रक्षा तो करनी ही होगी। और फ़िर भावनाएँ, जैसा सब जानते हैं कि असुरक्षित होती और करती हैं। यह कीमत तो मानव होने की है, जिसे हर हाल में देना ही है।
    दूसरी बात यह है कि अगर स्त्री को चूल्हे, और घर से जोड़ कर देखा जाए तो पुरूष को भी दफ़्तर और घर की जरूरतें पूरा करते देखा जाएगा। जो सामने होगा वह एकरस जीवन से पैदा हुई ऊब होगी जो नए जोखिम से बचकर चलने से आती है। लेकिन मैं तब भी इस बात का समर्थन करती हूँ कि स्त्रियों को घर से बाहर की दुनिया अवश्य देखनी चाहिए। यह दुनिया ज्यादा मायनों में स्त्रियों की रची हुई है, वे स्रष्टा हैं इस समाज की, नैतिकता की और नियम कानूनों की भी। जैसा कि हम जानते हैं कि नई पीढ़ी के मन पर पहला प्रभाव माँ का होता है और स्त्री को यह देखना चाहिए कि घर, पद, प्रतिष्ठा इन सब कामनाओं को स्वार्थों में तब्दील कर देने से समाज में शोषण का जो आह्वान हुआ है उसके परिणामस्वरूप बनी दुनिया स्वार्थपूर्ण युद्ध और शोषण के आतंक में जमी हुई है। इसके दर्शन से ही शायद वह अपने प्रियजनों को स्वार्थमुक्त करने की प्रेरणा पा सके।
    संसार का हर अत्याचार और शोषण किसी न किसी रूप में किसी स्त्री के द्वारा ही स्वीकृत है। शारीरिक शोषण के सदर्भ में बात थोड़ी अलग है। यह प्राकृतिक न्याय की श्रेणी में आता है कि सबल निर्बल का शोषण स्वार्थ पूर्ति के लिए करते ही हैं। यह स्त्री पुरूष दोनों की विफ़लता है कि हम मनुष्यता को पशुता से वांछित दूरी पर परिभाषित नहीं कर सके हैं। कमजोर होते ही चाहे वह स्त्री हो या पुरूष, हमारे समाज में पैठी पाशविकता के कारण शोषण का शिकार हो जाता है। जब विवेकानंद ने कहा था कि भय सबसे बड़ा पाप है तो मेरी नजर में उनका तात्पर्य यही रहा होगा।
    लाचारी किसी जेंडर विशेष की पहचान नहीं है। इस कविता के स्त्री की लाचारी उसके स्त्री होने के कारण कम, नकारात्मक रूप में निश्चिंतता और लोभ या सकारात्मक रूप में भावना और समर्पण के कारण अधिक है। यह स्त्री होने या न होने से नहीं, कमजोर होने या न होने की बात है।
    क्या स्त्री मुक्ति कौस्मोपालिटन या प्लेब्वाय के कवर पेज़ पूरी करेंगे? हालाँकि इससे अंतर नहीं पड़ता है। यह एक जेस्चर के रूप में महत्त्वपूर्ण हो सकता है पर समाधान के रूप में इसका कोई औचित्य नहीं है। आज शोषण की पहचान तो ठीक ही हो रही है, पर कारण अभी छुपे हुए है।
    आप लिखते हैं कि “अपने देश में स्वाधीनता आंदोलन ने स्त्रियों को घर की दहलीज से बाहर निकाला। इसी दौरान बड़ी तादाद में स्त्रियों ने सामाजिक-राजनीतिक कार्य में हिस्सा लिया। राजनीतिक प्रश्न के तौर पर स्त्रियों का सवाल इसी दौर में उभरा। स्त्रियों का घर की चारदीवारी से बाहर आकर सामाजिक-राजनीतिक कामों में हिस्सा लेना, सभा-संगोष्ठी में जाना अपने आप में स्त्री-मुक्ति की दिशा में बढ़ी हुई घटना थी।“ इनपर अवश्य सहमति है कि पर्दा प्रथा, सटी प्रथा और तमाम तरह के पाखंड गलत थे लेकिन यह स्त्री देह मुक्ति और पुरुष को अपराधी बनाने का नया स्वांग सही नहीं है| क्योंकि अरुण कमल जी खुद लिखते हैं कि वह बार बार भाग कर जाती है और और पुनः वापस आती है, और उसे कोई ठौर नहीं है| स्त्री को उस पुरुष के अन्दर छुपे राक्षस को मारना होगा ना कि वहाँ से भागना होगा, भागने से तो वह राक्षस और भी ताकतवर होगा, उससे बिना दूर होकर उसे सामना करना होगा इस मुक्ति के लिए लेकिन आज बढ़ते तलाक के केस इसकी हवा निकाल रहे हैं| आज शुरूआती स्थिति में पुरुष से भागने की प्रक्रिया और अंततः फिर एक पुरुष के पल्लू में ही बंधने का नया खेल क्यों ? आज भावना का स्थान का नगण्य हो गया है और बाजार हमारे दिलों पर राज कर रहा है जिससे हम पुरानी तरह की समस्याओं से बचते बचते, नयी अधिक उलझी हुई समस्याओं में खोते जा रहे हैं|

  58. राजीव जी
    स्त्री मुक्ति —स्वप्न ‘ यथार्थ’ यूटोपिया ‘पर आपका सारगर्भित लेख पढा . आपको बधाई.
    आपने साँची खरी खरी बात कह दी है अपने लेख में …..
    आपने काफी सारी तहों को उलट कर जो जांच पड़ताल की है अच्छा लगा पढकर …………

  59. maine yh article paanch bar pdhi ……
    bahut hi vicharotejk article hai aise article hindi magazine me km hi pdhne ko milte hai…
    hindi me likhne ke liye rajiv ji ko thanks….
    keep it up..
    god bless u…

  60. good morning.
    aapka article pratilipi me pdha,bahut hi mehnat krke likhi hai aapne..
    hindi ke liye bahut hi nye vichar diye hai aapne..
    bdhai ho..aisa hi hona chahiye..isse cut -paste wali prampra khtm hogi..
    hindi me to maine dekha hai..jo log cut-paste krte hai unki charcha jyada log krte hai..mai hindi se jyada talluk nhi rkhta ,but mere kuchh dost hindi me achchhi jgh pr hai unka name bhi hindi wale jante hai.name nhi btaunga sayd we naraj ho jaye…ek wakya yad aa rha haimai unhi namo me se ek ke pas baitha tha tbtk kisi ek nye awardi kahanikar ka call aaya ,something party ki bat ho rhi thi maine usse puchchha kya bat hai bhai?us smay hi mai videsh se lauta tha..maine usse puchha ki kaisi party ki bat ho rhi thi..phle to wh nhi bta rha tha but jor dene pr hindi ki politics smjh aayi..usne mujhse btaya to mujhe ykin nhi hua yar..mai aapke sath share krna chahta hun..wh kahanikar apne kahani sangrh ki reviwe krane ke liye party de rha tha..ki achchhe se aap likhna …usne btaya ki award bhi aise hi dilaye jate hai…aise hi chrcha me aane ke liye women lekhika kuchh bhi krne ko taiyar rhti hai …chrcha me aana hai ,kahani ya kawitaye chhpwani hai to ya to paise khrch kro ya ……………kro…
    kuchh cases aise nhi hote hai lekin jyadatr nhi…filmon wali bat hai bhai…
    aapko bhi kuchh nhi mila hoga mujhe jhan tk lgta hai…
    maine net pr search kia toye web magazine mili…
    bahut achchha prayas hai editor ka …
    all the best…

  61. Rajive
    stri mukti kay sawal ko tumne sabi vicharo ko khangaltay huye bahut hi majjbuti se likha hai.
    Mahilawadi dristyi jo bhi rakhata hai uan tak is lakh ko parahana cahiay.
    Putul

  62. Rajeev ji,

    Aap ka lekh padha, toh aisa laga ki koi to hai jo iss tarah se bhi stri durdasha ka varnan kar sakta hai,
    lekin aap se ek sawal bhi puchna chahti hoon, kya in sabko kabhi badla nahi ja sakta…?
    aap ke lekh ke sath jo photo attach hai…it touched me…
    abhi tak mujhe khud ko aur apne jaise aur ladkiyon ko dekh kar lagta tha ki sammaj mein hamari stithi be acchi hai…lekin kuch aur mahilaein aisi bhi hai…jinke hone-na hone se kisi ko fark nahi padta

  63. Rajeev sir
    Apaka lekh phadha lekin yah lehk …na rahe hum log apne apne giwan me paryog kare…….
    tabhi estri-mukti par lekh sarthak ho…….

    Beili, Gopalganj ,(Bihar)

  64. Sahi maayane me agar stri ko pitrasttatmakta ke samtulya mukti na mile to is varn aur samaj ke logo ki vichaar- dharaye male monopoly se grasit ho jayengi jahan unke maansikta ki wajeh se har roj kisi stri ko gehre andhkoop me dhakela jayega, uski hazaar ankurit soch jisse aage chal kar samaaj ek vishal aur hare- bhare samooh ka roop leta ho nirdayata se daba diya jayega. main ye nahi kehta ki kshetra aur samaaj ke vikas me purusho ka yogdaan kam hai parantu ek vaayu-yaan ko ache se land karne k liye uska agla aur peechla pahiye dono ka samaan roop pe jameen ko chuna chahiye, tabhi ja kar ye sahi maayane me saarthak sidh hoga

  65. mai thali ki antim roti hoon, thali mai hi khuli rakhi hoon ab tak, bhediye ghat lagaye hai ab tat, lotti rahegi meri abroo kab tak. pappu add -samaspur kaushambi

  66. याद रखें पितृसत्तात्मक व्यवस्था के मायने परिवार में पुरूष का सिर्फ मुखिया होना नहीं है। यह महज इतना ही होता तो इसका ‘खूँटा’ कब का उखड़ चुका होता या इसकी ‘रस्सी’ टूट गयी होती। क्या यह कहने की जरूरत है कि इस ढाँचे की रचना धूर्तता और चालाकी के साथ की गयी है और आज भी हो रही है। आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक, वैधानिक, सांस्कृतिक व्यवस्था और मूल्यों-मर्यादाओं, संस्कारों, आदर्शों तथा चिंतन के विभिन्न रूपों, विचारधाराओं, निर्मितियों, गतिविध्यिों के जरिये बड़े महीन ढंग से इसे रचा-बुना गया है। इन सबके जरिये पितृसत्ता पुरूष को औरत की तुलना में श्रेष्ठ स्थापित करने का पाखंड रचती और फैलाती है।………………………ye hai samajj ka woh sach jisne aaj tak striyon ko sahi mayne me mukt nahi hone diya ..striyan is had tak is ptrisattatamak samj se prabhavit hain ki khud ki dushman ban baithi hain ….apne aas pass dekhen to striyan hi striyon ki dushman nazar aati hain …..aur fir ye prush warg striyon hi doshi kahta hai …..striyon ko to sanskar ,aadrash, mulay, mrayada jaise shabd ki ghunti pila kar paida hote hi purush ke adheen kar diya jata hai to fir usse ubare kaise ……aapka ye lekh yugo se aa rahe stri paradheenta ki jad me ja kar usse mukt hone ki prerna deta hai …………………badhayi n dhanywaad ..

  67. nice i love it very much…………….

  68. स्त्री मुक्ति —स्वप्न ‘ यथार्थ’ यूटोपिया ‘पर आपका सारगर्भित लेख पढा . आपको बधाई.
    आपने साँची खरी खरी बात कह दी है अपने लेख में …..

  69. Dear Rajeev,
    Tha article is very good one as it reveals certain facts about gender, liberation of women, the social out look, role of tradition etc. The poem expresses major issues that faced by women in society and within her family. It is obvious that woman is bound to her family more than her own life. If she is forced to live the way she doesn’t want to will force her to react . Stri jeevan bhar pitrsattatmak zanjeero ko thodne ki koshish karti rahti hai.Man hi man prateeksha karti hai ki ek na ek din kamyab zaroor hogi.stri ko apna rasta swayam thay karna hai, yeh sach hai. stri ko purush se kamtar manne ki vrithi pitrsattatmak vyavastha ki upaj hai.Sattatmak avdharanao ko thodne ki kshamata stri ke bhitar hai.
    Vah keval upabhog ki cheez nahi hai, peetiyo ko janm denevala yantr bhi nahi hai,usse badkar apni duniya hai, niji jeevan hai, vichar hai, soch-amajch hai. Is duniya mein sir utakar jeene ka adhikar hai.
    Aap ke lekh mein kavitha ki sahata se stri- mukthi evam stri sambandhi vicharo ka sundartam abhivyakthi hai. Jender ke bare mein, tatha stri mukthi andolan ke bare mein bhi vistrit roop se bataya hai, jo ekdam sahi hai. I congratulate you Rajeev . Aaj kal striyo par jo jo akraman ,atyachar ho rahe hai, is tarah ke lekho ki prasangikta badti hai.
    Nice work . wish you all the Best.
    Regards,
    Asha s Nair, Trivandrum, Kerala

  70. Dear Rajeev,
    Arun Kamal ki kavita par aadharit aapka lekh bahut achcha hai.Unki kavita vichar karne ke liye hame prerit karegi. Aur uspar aap ka vichar char chand laganewala hai. Stri aaj sab kahi charchit hoti ja rahi hai. jitna adhik uske bare mein charcha hogi, utna adhik uspar honewala atyachar badta hai.Badta hai ya samaj ke samne aata hai, iska pata nahi. Samaj Stri ko jitna samman dene ki bat karta hai, utna use milta nahi. Iska dosh kiske ooper dhop diya jay?
    Barat mein yeh dekha jata hai ki stri apni niji zindagi se zyada parivar ko mannewali hai.Wah pitrsatta ki zanjeerem thodne ki kosos karti rehti hai,lekin kamtab hona baz ke bahar ki bat hai. Phir bhi kosisem zari hai.aap ka kahna tik hai ki stri ko apna rasta khud thay karna hai.Yeh bhi sach hai ki jeevan ka yadharth kavitha mein hai, sadharan stri ki mukthi-kamna utopia rachne ka sahas hai, jise wah karti rehti hai.Stri ko purush se komtar manne ki vritti zaroor pitr-sattatmak vyavastha ki upaj hai. Sattatmak avdharanao ko thodne ki sakthi stri ke bhitar hai.Wah kevel upabhog ki vasthu nahi, agli piti ko janm denewala koyi yantr bhi nahi. Uski apni duniya hai, swabhiman ke sath sar utakar jeene ka adhikar hai. Aaj wah puresh ke piche nahi hai, uske sath kandhe se kandha milakar chalnewali hai. Samajvadi chetna sambal deti hai, magar panah nahi.
    Gender ke bare mein vistrit roop se bataya hai. Stri-mukthi ke liye symbolic roop se ladna koyi vijay nahi la sakta. Kyonki, Biological difference lekar ladna bekar hai. Apne bhitar jo sakthi hai, viswas hai use pehchankar, sahi sahi upayog karna hai.Stri-mukthi ki awaz utanewali ko jo bhi nazariye se dekh lem, wah to swabhiman ke sath jeene ka haq mangnewali hai, purush ke khilaf ladnewali nahi.
    Lekh bahut ache hai..soch-vicher karne ki prerana denewala hai. Aap prasamsa ka patr zaroor hai. Badhayiyam..
    Regards,
    Asha.

  71. Dear Rjeev,
    Fentastic Lekh. Whwever I type my comments, it shows ‘your comment need moderation. I dont know why. Carry on, you are a good critic.
    Asha

  72. Respected Sir
    CONGRATULATIONS FOR THIS ARTICLE.
    ANEK BAT JANNE KO MILI. IS LEKH KE THROUGH PRATILIPI KO JANA.
    BADHIYA KAM KR RHE HAI PRATILIPI WALE.
    AURATON KE SWALON KO ITNI SAFGOI SE AAPNE LIKHA HAI,
    MERI BADHAAIYAAN…..
    vivek rathaur

  73. महाशय, आपका लेख पढ़ा, मैं सबसे पहले आपको धन्यावाद देना चाहूँगा की आपने नारी और उसके द्द्न्द को समाज के सामने सरलता के साथ लेन का प्रयास किया | हमारा समाज तभी तक् सुरक्षित है, जब तक हम इसे नारी की नजरों से देखेंगे | आज नारी और उसके प्रेम करने के मानवीय तरीके से समाज को सिखने की जरुरत है | आशा है, आप आगे भी नारी की मुक्ति की बेचैनी को समाज के सामने अपने लेखनी से लाते रहेंगे | सधन्यावाद |

  74. Respected Sir,
    Mujhe apka article bahut acha laga jise padkar mujhe bahut kuch janne ko bhi mila. aaj k samay m stri ki sthiti hai weh badi dukhdayi hai….
    Abhi bhi hamara samaaj pitrsatatmak soch ka aadi hai weh yeh manane ko tyyar hi nhi ki stri ka bhi wohi darja hai jo ki purush ka is samaaj me hai…
    hamare samaaj ki in trutiyo ko badalna hoga avam apke jaise budhijivi logo ki aisi koshisho ke dwara hum is badlaw ki or jaroor agrasar honge.

    CONGRATULATIONS SIR FOR YOUR EFFORTS AND YOUR HARD WORK.
    REGARDS,
    NAMRATA MISHRA

  75. राजीव जी, साधुवाद! आपका आलेख शोधपरक, वस्तुनिष्ठ और विषय की गंभीरता के अनुरूप पाठकों को बहसतलब बनने के लिए प्रेरित करने वाला है। जिस देश में स्त्रियों को वंदिनी मानकर पूजने की परम्परा है; वहाँ वे पितृसत्तात्मक शासन की गुलामी खट रही हैं। चालू अर्थों में आज़ाद भारत में समानता का अधिकार स्त्री-पुरुष दोनों को है; लेकिन व्यावहारिक धरातल पर यह नीतिगत समानता एक विषम अवधारणा के रूप में परिचालित है। स्त्रियाँ थोड़ी समर्थ बनी नहीं कि तनाव के ताने-बाने तीखे हो जाते हैं। उन्हें ‘यूज टू’ बनने का चैतरफा दबाब बढ़ जाता है। उसे अच्छी बहू बनना है, पत्नी भी, बच्चे की माँ भी और कुशल पेशेवर महिला भी। ऐसी साहसी महिलाओं के लिए बोलते ज़बान बहुत हैं; लेकिन, जगह पर्याप्त नहीं है। स्त्रियाँ शिक्षित, जागरूक और आर्थिक रूप से जैसे-जैसे सक्षम हो रही हैं; मर्दाना चाहरदिवारी फाँदकर वे बाहर आ जा रही हैं। यह आवाजाही अभी शहरी रेस का हिस्सा है। ग्रामीण स्त्रियाँ तो अभी भी अरुण कमल की कविता की ही स्त्री है। उसमें से भी आजकल जान देने वाली, रेल की पटरियों पर कट मरने वाली; फांसी के फन्दे पर झूल जाने वाली, आग से जल जाने वाली स्त्रियों की तादाद तेजी से बढ़ी है; समाज-मनोविज्ञान के बुद्धिस्थों को इस पर शोधशील होने की आवश्यकता है; क्यांेकि सच को आजकल हम आँख से नहीं आँकड़ों की बिनाह पर सच मानते हैं। मेरी दृष्टि में आज समाज जिस मानसिक बुखार से पीड़ित है उसमें पितृसत्तात्मक मानसिकता सभी बीमारियों का जड़ है। वह लगातार स्त्रियों के ज़िन्दा रहने लायक माहौल का हरण कर रहा है। मेरा मानना है कि जीवन को वरीयता देने वालों में ग्रामीण स्त्रियाँ सबसे आगे हैं। वे मृत्यु को वरण करने का फैसला तभी करती हैं जब उन्हें जीने का सारा आसरा ख़त्म मालूम देता है। आज इस समस्या को वैज्ञानिक विचारधारा या विचारधारात्मक आन्दोलन के माध्यम से समाप्त नहीं किया जा सकता है। इसके लिए हमें अपने दिमागी पायजामे-कुरते का रंग-ढंग बदलना होगा; वाक्-व्यवहार में व्यक्तिगत-इयता के महत्त्व को समझना होगा; आज स्त्रियों के साथ ‘बहनापा’ की बजाए ‘समनापा’ और ‘अपनापा’ के बर्ताव को विकसित करना बेहद जरूरी है।

  76. it is a very big essay make it small

  77. स्त्री मुक्ति का यूटोपिया यथार्थ के विभिन्न आयामों को समझ कर रचा जा सकता है, लेकिन वह यूटोपिया ही रहेगा, किसी भी स्त्री का न तो सच बन सकता है न हीं उसका स्वप्न. मुक्ति की चाह है, छटपटाहट है, पलायन की ज़िद है, फिर भी स्त्री तो स्त्री है. सदियों से यही जानती मानती है जिसे वह भोग रही है. ऐसा नहीं कि यह सब सिर्फ इसलिए कि सत्ता पर पुरुष बैठा है, बल्कि इसलिए भी कि स्त्री की शारीरिक संरचना उसका अभिशाप है. कहीं न कहीं उसका बदन उसे कमजोर कर देता है. चाहे वह गर्भवती होना हो या फिर भोग की वस्तु होना. निश्चित ही इस अभिशाप के लिए पुरुष की मानसिकता दोषी है, जिसे बदल पाना नामुमकिन है. स्त्री मुक्ति के यूटोपिया का खाका चाहे पुरुष ही क्यों न बनाए उसे यथार्थ नहीं बना सकता. पितृसत्ता का मकड़जाल नष्ट भी कर दिया जाए फिर भी स्त्री मुक्ति संभव नहीं है. जब तक स्त्री को पुरुष से अलग एक अलग प्रजाति मानना बंद न होगा स्त्री मुक्ति की बात बेमानी है. स्त्री को इंसान का दर्ज़ा ही नहीं दिया जाता है. या तो वह पवित्र (परम्परवादी) होती है या कुलटा (हक़ की बात करने वाली), परन्तु एक आम स्त्री नहीं जिसे वह सब कुछ चाहिए जो पुरुष को चाहिए. स्त्री मुक्ति का स्वप्न यथार्थ बने ऐसी आशा तो रहेगी.

    आपने एक लेख में स्त्री की सत्ता से जुड़े कई सवालों को ला खड़ा किया है, जिसपर चर्चा के साथ ही चिंतन भी ज़रूरी है. सारगर्भित लेख और समीक्षा के लिए बधाई राजीव जी.

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