दस हंगारी कवि

गिज़ैल्लॉ हैरवाई
लिखती हूँ जैसे कोई मृत्युदण्डित
लिखता है अपने परिवार को
हरेक को एक मेरी कविता
मैंने नहीं उगला कोई नाम
मुझे आशा है
रहूँगी मैं नामहीन जैसे तुम
और मरूँगी मैं नामहीन
आशा है तुम सारे नामहीन
हस्ताक्षर करोगे मेरी आँखों पर
अनुवादः गिरधर राठी / सहयोगः मारगित कोवैश
बहुत सुंदर और मार्मिक कविता। बहुत गहरे छू गई…
Fine translation into Hindi of a beautiful Hungarian poem,