आज़ादी विशेषांक / Freedom Special

अंक 13 / Issue 13

दस हंगारी कवि

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शांदोर कान्यादी

पुस्तकचिह्न (बुकमार्क)

नवफाशीवाद के विरूद्ध

ऐसे मौक़े आते हैं जब एक बार फिर से आग की लपटों में
खाँसने लगते हैं हम जब धुआँ ऊपर की ओर
उमड़ने लगता है और हमें लगता है जब
एक के बाद एक पुस्तक
जला दी जाती है मानो हमारा मस्तिष्क ही
स्वाहा हो रहा हो
आता है वक़्त जब एक जो बच निकला था
उसी को दुर्लभ शिकार की तरह अब
घेरा जा रहा है फिर
आधी रात बीत चुकी हो तब दरवाजे पर
बज उठती है घण्टी
और फिर फ़र्श पर चूहों-सी खटर-पटर
मेज़ों दराज़ों में उलट-पुलट खोजबीन
चीजें गिरी बिखरी पड़ती अहाते में
सन्दिग्ध पुस्तक के साथ पकड़ में आए हम
अब नहीं छोड़ेगा ये कानून
ऐसे मौके आते हैं जब युक्तियाँ
तो दे दी जाती हैं लेकिन
जायज़ वजह कोई बतलाता नहीं है
कि क्यों आखिर किसलिए
एक घूँट में जो फ़ना हो गई
उनकी आँतों में उस पुस्तक की
क्यों तो बनायी लुगदी उन्होंने
जिसने कि अभी नहीं खोली थी आँखें
दिन के उजास में
उस को कर दिया बन्द अंधे अनन्त में
आते है ऐसे मौके जब काँइयाँ
डाक घर भुला देता चिटठी रसाना
और अगर जुरअत को हमने कुछ कहने की
तो वे झाड़ लेंगे हाथ पोंटियस पिलेट की तरह
ऐसे आते हैं मौक़े जब पलक झपकाये बिना
वे पूछते जाँच करते कोंचते और भेद लेते –
कहते ले आओ यहाँ और क्या छिपाया है उसमें
जब तक कि हमारे शर्ट-पेंट
चूने लग जाते हैं
मानो कि खुदरा चुराते किसी मामूली
चोर उचक्के की तरह शर्मसार हों हम
मानें उन्होंने जो छीना है हमसे
वह हमारी रीढ़ थी
हम डगमग कदमों से आते हैं हमसे
गलियारे में कँपते हाथों से
सिगरेट के मुड़े छोर को और कटुता को
जलाने की कोशिश हम करते हैं
कटुता – बस यही तो जानी है जीवन भर
खुश्क हमारे मुँह की किनार वह कुरेदती

अनुवादः गिरधर राठी / सहयोगः मारगित कोवैश

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4 comments
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  1. बहुत सुंदर और मार्मिक कविता। बहुत गहरे छू गई…

  2. Fine translation into Hindi of a beautiful Hungarian poem,

  3. बेहतरीन अनुवाद

  4. THIS IS ALSO A FINE TRANSLATION

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