गल्प विशेषांक / Fiction Special

नवम्बर २०११ / November 2011

दस हंगारी कवि

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फ़ैरैन्त्स युहास

बछेड़े का जन्म

जब फूट पड़े झाड़ी में मई के गुलाब
और ऐल्डर और नीलक के फूल खिलखिलाने लगे
घोड़ी तैयार थी ब्याने को
उसने किया बार-बार विश्राम, चली लचक कर।

एक छोटा बच्चा उसे घुमा लाया हौले-हौले
फूल-भरे खेतों में, गाता हुआ,
लौटे जब थके-माँदे वे
आ बैठा था चाँद गगन की नीली कूबड़ पर।

झाग फूट आया, वह सिहरी
अपनी घुड़साल में नरम पुआल पर
फूले पेटों वाली अधलेटी गायें
उसे निहारने लगीं, छोड़ती उसाँसें।

इस तरह जब ऊँघने भूसे के ढेर भी,
सप्तर्षि चल पड़े दक्षिण की ओर,
उसने जना अपना बछेड़ा। फिर घण्टों
गीली बन्द आँखों और मुख पर उसे
चाटती रही वह दुलार से।

वह नवजात रहा लेटा
माँ की बगल में, तकियों के फाहे-सा;
ऐसी सुन्दर पुआल बिछी होगी कब कहाँ
कब सोई होगी ऐसे बर्फ, दूध!

लाल टोप-धारे चला आया भोर।
हैलो! कहा और चल दिया सपाटे पर।
खड़ा हुआ बछड़ा गँठीली-सी टाँगों पर
चला लड़खड़ाता-सा, पानी पर झाग-सा लहराता।

और जब सवेरे ने खिड़की पर
दस्तक दी अपनी नीली-सी नाक से,
उसे भाँप, बछड़े ने टहोका अपनी माँ का पेट
और गीले थूथन से पीया दूध।

पत्ते फुसफुसाने लगे आपस में,
मुदित मुर्गियों ने चोंचों से खोजे दाने,
और उधर ऊपर ईर्ष्या से मुरझाए
स्वर्ण पँखुड़ियों वाले वाले तारे।

अनुवादः गिरधर राठी / सहयोगः मारगित कोवैश

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2 comments
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  1. बहुत सुंदर और मार्मिक कविता। बहुत गहरे छू गई…

  2. Fine translation into Hindi of a beautiful Hungarian poem,

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