गल्प विशेषांक / Fiction Special

नवम्बर २०११ / November 2011

दस हंगारी कवि

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शांदोर वोरोश

बलैरो*

हम सब चले जाते हैं, झूमते दरख्तों के नीचे से हम सब चले जाते हैं,
भीगे आकाश तले हम सब निकलते हैं बंजर के पार किसी
निर्मल गन्तव्य तक, हम सब जो यहां इक्ट्ठे हुए हैं,
हममें से कुछ अब भी देखते मुड़-मुड़ कर,
चांदनी चिलकती है हमारे पद चिन्हों पर,

अन्ततः हम सब चले जाते हैं, धूप भी पीछे रह जाती है,
और चले चलते हम तारों के पीछे गगन की कुण्डलियों में,
मीनारों के ऊपर, कुछ अब भी मुड़ते हैं और चाहते हैं
बाग में गिरे एक सेब को देखना, या शायद किसी हिण्डोले को
द्वार के करीब, एक लाल शामियाने में, पर अब हो रही देर, चलो चलें,
बजता है गजर और हम चले चलते हैं
हमेशा एक अलहदा तरीके से, तारों के पीछे,
समतल मैदान की गोल दीवार पर,
हम सब जो अन्ततः इक्ट्ठे हुए हैं, हम सब चले जाते हैं।

* (तीन ताल में निबद्ध एक स्पेनी गीत/नृत्य)

अनुवादः गिरधर राठी / सहयोगः मारगित कोवैश

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2 comments
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  1. बहुत सुंदर और मार्मिक कविता। बहुत गहरे छू गई…

  2. Fine translation into Hindi of a beautiful Hungarian poem,

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