मार्च + जून २०१० / March + June 2010

आ जाये मृत्यु जब भी वह आती है : नंदकिशोर आचार्य

१. हर सूने को

देखता हूँ जब भी
कोई भी सूनापन
अपनी आँख
उस में बसी पाता हूँ
मेरी आँख में पर
बसी हो बस तुम
इसलिए हर सूने को
तुम से बसा आता हूँ

२. फर्क

झील झील है अब भी
फर्क बस इतना है
आँखों में गहराती रहती थी जो
उमड़ आती है
किनारों पर कभी
और मैं
किनारे पर खड़ा
जो देखता था बस
भीग जाता हूँ।

३. फूल का सुर

खुशबू फूल का सुर है
या मूरत है फूल
खुशबू की
रात घुला लेती है खुद में मूरत को
खुद उस के सुर में गूँजती रहती।

४. हवा को कहाँ

हवा को कहाँ है फुर्सत
ठहर कर सुने
उस की बात
यह क्या कम है
वह उस की रहगुज़र में है
देर बाद तक
सिहरता ही रहता है जो पात।

५. सनातन

न जिसको कोई सुने
सनातन
गूँजती रहती पुकार वह
इसलिए वह भी
पुकारा जा रहा है जिसे।

६. हरे में झरता

झर रहे हैं पात
शिशिर की रात
गुनगुनाते हुए
बारिश
सुनते हुए मैं जिसके
हरे में झरता जाता हूँ।

७. पहला शब्द हो जैसे

तुम्हारी आवाज़
ढल जाती है
चेहरे में मेरे ऐसे
वह पहला शब्द हो जैसे
जिस का रुप है
यह कायनात सारी

८. ठिकाना

ठिकाना चाहिए मुझको
कह सकूँ खुद को
भटकना वरण है मेरा
नियति नहीं
चिट्ठी लिख सकता है कोई
मुझे मेरे ठिकाने पर
न मिले कभी चाहे मुझे
कहीं भी रहूँ भटकता मैं
ठिकाना है तो वह मेरा।

९. कितने अलग रंग हैं

प्यार सुनना
चाहती हो तुम
कहना नहीं
प्यार सहना
चाहती हो तुम
बहना नहीं
प्यार बोना
चाहती हो तुम
खिलना नहीं
कितने अलग रंग हैं
प्यार होने के
तुम्हारे।

१०. आ जाये

आग कर देती सब कुछ राख
राख का किन्तु नहीं
कुछ भी कर पाती वह
अब क्या कर लेगी मेरा
आ जाये मृत्यु
जब भी वह आती है।

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