आज़ादी विशेषांक / Freedom Special

अंक 13 / Issue 13

इम्फाल, शिलाँग और अगरतला से छह कवि

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अगरतला

6. चंद्रकांत मुड़ासिंह

मैं

(मंत्री और अग्रज कवि अनिल सरकार के लिए)

तुम गीत सुनना चाहते हो
मैं गा सकता हूँ
ठुमक-ठुमक नाच सकता हूँ
लेकिन नाच दल बनाने के लिए
कृपया मांगना मत पैसे
उस पैसे से मैं मोल लूंगा घोड़ा
घोड़ा और मैं, हम एक जोड़ा
कूदेंगे, नाचेंगे और कभी-कभी युद्ध में चले जाएँगे
जहाँ तुम्हारी गाड़ी नहीं जा सकती
तुम हो पारखी कविता के
जो कि मैं लिख सकता हूँ, थोड़ा वक्त चाहिए
नायलॉन की रस्सी से बांध दूँगा शब्द
कोई यह नहीं कह सकता कि कविता का कोई माई-बाप नहीं
किंतु कविता छपाने के बहाने
कृपया मांगना मत पैसे
इस पैसे से मोल लूंगा इश्क
और तब इश्क और मैं
बहेंगे बयार में
फूल फुलाएँगे, कभी-कभी खून टपकाएँगे
इस खून से रंगना नहीं अपना झंडा।
तुम ‘हीरा सिंह’ को जगा सकते हो
मुझ पर दुख करोगे तो कर लो
किन्तु ‘पूर्णश्री त्रिपुरा’ के लिए मांगना मत पैसे
इस पैसे से मैं मोल लूंगा मृत्यु
मृत्यु में ही मेरा महत्व है
मैं हिडिंबा का दूसरा पुत्र हूँ।

(काँकबराँक से)

टेटे-टेटे-टें

अब मैं हूँ पूरा का पूरा बाबू
चंद्र बाबू, कान्त बाबू, मुड़ासिंह बाबू, कवि बाबू
ऐसे बाबू बाबू सुनकर
मूक हदय में भी उदय हो जाए कविता
और मैं तो जीता जागता कवि हूँ
लेकिन बन्धु कविता लिखना आसान काम नहीं

एक घाट से दूसरे घाट के बीच है गहरा पानी
कविता का अर्थ दो-चार शब्द नहीं।
यह सब सोचते-सोचते दोपहर में आज
कुछ चमकते शब्द मिल ही गए

आनन्दित और उत्साहित मैं सुनाने लगा वे शब्द
अपने लगभग तलबे तले की छाया को
छाया छोटी भी होती गयी तब भी उसने की आवाज़
टेटे-टेटे-टें, टेटे-टेटे-टें

क्या कहा रे?
पक्षियाँ उड़ रही हैं इधर-उधर
चहचहाती सभी दुर्बोध भाषाओं में
अगर मैं उन शब्दों में लिखूँ कविता
मुझे बुलाया नहीं जाएगा कविता उत्सव में।
पास ही कहीं एक कटा ‘झूम’ सूख गया है
मैंनें उसमें लगा दी आग, शायद वों कुछ कहे
तभी क्या आवाज-ठक ठक ठुक, ठक ठक ठुक
क्या कहा उसने अपनी विकृत आवाज में
निश्चय ही वह कुछ कह रही है
क्या कहा रे?

अचानक सूझी मुझे एक बाबू सुलभ बुद्धि
मैं सीधे चला गया ए डी सी के पास
तब ये सरकार वो सरकार
उसके बाद कवि नन्दकुमार का घर
समुद्रगुप्त के केशों का अरण्य
शब्द आए तैरते-
टेटे-टेटे-टें, टेटे-टेटे-टें

अब इन शब्दों की नीरवता में
अगर मैं लौटूँ घर
अगर सुनूँ
अपने बच्चों को गाते गीत
टेटे-टेटे-टें, टेटे-टेटे-टें

(काँकबराँक से)

(अनुवादः तरूण भारतीय)

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2 comments
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  1. adbhut!!!

  2. “अब मैं हूँ पूरा का पूरा बाबू
    चंद्र बाबू, कान्त बाबू, मुड़ासिंह बाबू, कवि बाबू
    ऐसे बाबू बाबू सुनकर
    मूक हदय में भी उदय हो जाए कविता
    और मैं तो जीता जागता कवि हूँ
    लेकिन बन्धु कविता लिखना आसान काम नहीं”

    “तुम गीत सुनना चाहते हो
    मैं गा सकता हूँ
    ठुमक-ठुमक नाच सकता हूँ
    लेकिन नाच दल बनाने के लिए
    कृपया मांगना मत पैसे
    उस पैसे से मैं मोल लूंगा घोड़ा
    घोड़ा और मैं, हम एक जोड़ा
    कूदेंगे, नाचेंगे और कभी-कभी युद्ध में चले जाएँगे
    जहाँ तुम्हारी गाड़ी नहीं जा सकती
    तुम हो पारखी कविता के
    जो कि मैं लिख सकता हूँ, थोड़ा वक्त चाहिए”
    बेजोड़ कविताएँ …

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