The Language Of The Bullets: Dhoomil
Pages: 1 2

बीस साल बाद
बीस साल बाद
मेरे चेहरे में
वे आँखें वापस लौट आयी हैं
जिनसे मैंने पहली बार जंगल देखा है:
हरे रंग का एक ठोस सैलाब जिसमें सभी पेड़ डूब गए हैं.
और जहाँ हर चेतावनी
खतरे को टालने के बाद
एक हरी आँख बन कर रह गयी है.
बीस साल बाद
मैं अपने आप से एक सवाल करता हूँ
जानवर बनने के लिए कितने सब्र की ज़रूरत होती है?
और बिना किसी उत्तर के चुपचाप
आगे बढ़ जाता हूँ
क्योंकि आजकल मौसम का मिज़ाज कुछ यूँ है
कि खून में उड़ने वाली पत्तियों का पीछा करना
लगभग बेमानी है.
दोपहर हो चुकी है
हर तरफ़ ताले लटक रहे हैं
दीवार से चिपके गोली के छर्रों
और सडकों पर बिखरे जूतों की भाषा में
एक दुर्घटना लिखी गई है
हवा से फड़फड़ाते हुए हिंदुस्तान के नक्शे पर
गाय ने गोबर कर दिया है
मगर यह वक्त घबराए लोगों की
शर्म आंकने का नहीं
और न यह पूछने का –
की संत और सिपाही में
देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य कौन है!
आह! वापस लौटकर
छूटे हुए जूतों में पैर डालने का वक्त यह नहीं है
बीस साल बाद और इस दोपहर में
सुनसान गिलयों से चोरों की तरह गुजरते हुए
अपने आप से सवाल करता हूँ –
क्या आज़ादी सिर्फ़ तीन थके हुए रंगों का नाम है
जिन्हें एक पहिया ढोता है
या इसका कोई खास मतलब होता है?
और बिना किसी उत्तर के आगे बढ़ जाता हूँ
चुपचाप.
उस औरत की बगल में लेटकर
मैंने पहली बार महसूस किया है
कि नंगापन
अँधा होने के खिलाफ
एक सख्त कार्यवाही है
उस औरत की बगल में लेटकर
मुझे लगा कि
नफ़रत और मोमबत्तियां जहाँ बेकार
साबित हो चुकी हैं और पिघले हुए
शब्दों की परछाई
किसी खौफनाक जानवर के चेहरे में
बदल गई हैं, मेरी कविताएँ
अँधेरा और कीचड और गोश्त की
खुराक पर जिंदा हैं
वक्त को रगड़कर
मिटा देने के लिए
सिर्फ़ उछालते शरीर ही काफ़ी नहीं हैं
जबकि हमारा चेहरा
रसोईघर की फूटी पतीलियों के ठीक
सामने है और रात
उस वक्त रास्ता नहीं होती
जब हमारे भीतर तरबूज कट रहे हैं
मगर हमारे सर तकियों पर
पत्थर हो गए हैं
उस औरत की बगल में लेटकर
मैंने महसूस किया कि घर
छोटी-छोटी ख़ुशियों की लानत से
बना है
जिसके अन्दर जूता पहनकर टहलना मन है
यह घास है याने कि हरा डर
जिसने मुझे इस तरह
सोचने पर मजबूर कर दिया है
इस वक्त यह सोचना कितना सुखद है
कि मेरे पड़ोसियों के सारे दाँत
टूट गए हैं
उनकी जाँघों की हरक़त
पाला लगी मटर की तरह
मुर्झा गयी है उनकी आंखों की सेहत
दीवार खा गयी है
उस औरत की बगल में लेटकर
(जब अचानक
बुझे हुए मकानों के सामने
दमकलों के घंटे चुप हो गए हैं)
मुझे लगा कि हांफते हुए
दलदल की बगल में जंगल होना
आदमी की आदत नहीं लाचारी है
और मेरे भीतर कायर दिमाग है
जो मेरी रक्षा करता है और वही
मेरी बटनों का उत्तराधिकारी है
शांति-पाठ
अखबारों की सुर्खियाँ मिटाकर दुनिया के नक्शे पर
अन्धकार की एक नयी रेखा खींच रहा हूँ ,
मैं अपने भविष्य के पठार पर आत्महीनता का दलदल
उलीच रहा हूँ।
मेरा डर मुझे चर रहा है।
मेरा अस्तित्व पड़ोस की नफरत की बगल से उभर रहा है।
अपने दिमाग के आत्मघाती एकान्त में
खुद को निहत्था साबित करने के लिए
मैंने गांधी के तीनों बन्दरों की हत्या की हैं।
देश-प्रेम की भट्ठी जलाकर
मैं अपनी ठण्डी मांसपेशियों को विदेशी मुद्रा में
ढाल राह हूँ।
फूट पड़ने के पहले, अणुबम के मसौदे को बहसों की प्याली में उबाल रहा हूँ।
ज़रायमपेशा औरतों की सावधानी और संकटकालीन क्रूरता
मेरी रक्षा कर रही है।
गर्भ-गद् गद् औरतों में अजवाइन की सत्त और मिस्सी
बाँट रहा हूँ।
युवकों को आत्महत्या के लिए रोज़गार दफ्तर भेजकर
पंचवर्षीय योजनाओं की सख्त चट्टान को
कागज़ से काट रहा हूँ।
बूढ़ों को बीते हुए का दर्प और बच्चों को विरोधी
चमड़े का मुहावरा सिखा रहा हू।
गिद्धों की आँखों के खूनी कोलाहल और ठण्डे लोगों की
आत्मीयता से बचकर
मैकमोहन रेखा एक मुर्दे की बगल में सो रही है
और मैं दुनिया के शान्ति-दूतों और जूतों को
परम्परा की पालिश से चमका रहा हूँ।
अपनी आँखों में सभ्यता के गर्भाशय की दीवारों का
सुरमा लगा रहा हूँ।
मैं देख रहा हूँ एशिया में दायें हाथों की मक्कारी ने
विस्फोटक सुरंगें बिछा दी हैं।
उत्तर-दक्षिण-पूरब-पिश्चम-कोरिया, वियतनाम
पाकिस्तान, इसराइल और कई नाम
उसके चारों कोनों पर खूनी धब्बे चमक रहे हैं।
मगर मैं अपनी भूखी अंतड़ियाँ हवा में फैलाकर
पूरी नैतिकता के साथ अपनी सड़े हुए अंगों को सह रहा हूँ।
भेड़िये को भाई कह रहा हूँ।
कबूतर का पर लगाकर
विदेशी युद्धप्रेक्षकों ने
आज़ादी की बिगड़ी हुई मशीन को
ठीक कर दिया है।
वह फिर हवा देने लगी है।
न मै कमन्द हूँ
न कवच हूँ
न छन्द हूँ
मैं बीचोबीच से दब गया हूँ।
मै चारों तरफ से बन्द हूँ।
मैं जानता हूँ कि इससे न तो कुर्सी बन सकती है
और न बैसाखी
मेरा गुस्सा-
जनमत की चढ़ी हुई नदी में
एक सड़ा हुआ काठ है।
लन्दन और न्यूयार्क के घुण्डीदार तसमों से
डमरू की तरह बजता हुआ मेरा चरित्र
अंग्रेजी का 8 है।
कविता
उसे मालूम है शब्दों के पीछे
कितने चेहरे नंगे हो चुके हैं
और हत्या अब लोगों की रुचि नहीं –
आदत बन चुकी है
वह किसी गँवार आदमी की ऊब से
पैदा हुई थी और
एक पढ़े-लिखे आदमी के साथ
शहर में चली गयी
एक संपूर्ण स्त्री होने के पहले ही
गर्भाधान की क्रिया से गुजरते हुए
उसने जाना कि प्यार
घनी आबादी वाली बस्तियों में
मकान की तलाश है
लगातार बारिश में भीगते हुए
उसने जाना कि हर लडकी
तीसरे गर्भपात के बाद
धर्मशाला हो जाती है और कविता
हर तीसरे पाठ के बाद
नहीं – अब वहां कोई अर्थ खोजना व्यर्थ है
पेशेवर भाषा के तस्कर-संकेतों
और बैलमुत्ती इबारतों में
अर्थ खोजना व्यर्थ है
हाँ, हो सके तो बगल से गुजरते हुए आदमी से कहो –
लो, यह रहा तुम्हारा चेहरा,
यह जुलूस के पीछे गिर पड़ा था
इस वक्त इतना ही काफ़ी है
वह बहुत पहले की बात है
जब कहीं, किसी निर्जन में
आदिम पशुता चीखती थी और
सारा नगर चौंक पड़ता था
मगर अब –
अब उसे मालूम है कि कविता
घेराव में
किसी बौखलाए हुए आदमी का
संक्षिप्त एकालाप है
सच्ची बात
बाडियाँ फटे हुए बाँसों पर फहरा रही हैं
और इतिहास के पन्नों पर
धर्म के लिए मरे हुए लोगों के नाम
बात सिर्फ़ इतनी है
स्नानघाट पर जाता हुआ हर रस्ता
देह की मन्डी से हो कर गुजरता है
और जहाँ घटित होने के लिए कुछ भी नहीं है
वहीँ हम गवाह की तरह खड़े किए जाते हैं
कुछ देर अपनी ऊब में तटस्थ
और फ़िर चमत्कार की वापसी के बाद
भीड़ से वापस ले लिए जाते हैं
वक्त और लोगों के बीच
सवाल शोर के नापने का नहीं है
बल्कि उस फासले का है जो इस रफ्तार में भी
सुरक्षित है
वैसे हम समझते हैं कि सच्चाई
हमें अक्सर अपराध की सीमा पर
छोड़ आती है
आदतों और विज्ञापनों से दबे हुए आदमी का
सबसे अमूल्य क्षण संदेहों में
तुलता है
हर ईमान का एक चोर दरवाज़ा होता है
जो संडास की बगल में खुलता है
दृष्टियों की धार में बहती नैतिकता का
कितना भद्दा मजाक है
कि हमारे चेहरों पर
आँख के ठीक नीचे ही नाक है
Pages: 1 2







