Room Enough On Earth: Shrikant Verma
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प्रक्रिया
मैं क्या कर रहा था
जब
सब जयकार कर रहे थे?
मैं भी जयकार कर रहा था –
डर रहा था
जिस तरह
सब डर रहे थे.
मैं क्या कर रहा था
जब सब कह रहे थे,
‘अज़ीज मेरा दुश्मन है?’
मैं भी कह रहा था
‘अज़ीज मेरा दुश्मन है.’
मैं क्या कर रहा था
जब
सब कह रहे थे,
‘मुँह मत खोलो?’
मैं भी कह रहा था,
‘मुहँ मत खोलो
बोलो
सब जानते हैं.’
ख़त्म हो चुकी जयकार
अज़ीज मारा जा चुका है,
मुहँ बंद हो चुके हैं.
हैरत में सब पूछ रहे हैं,
यह कैसे हुआ?
जिस तरह सब पूछ रहे हैं
उसी तरह मैं भी,
यह कैसे हुआ?
ख़ैबर
पृथ्वी में सबके लिए जगह है, यह कहकर
शामिल हो गया शोर
स्वाद में.
बरसों तक लिखते हुए मैंने प्रमाद में
अनुभव किया,
दूसरी कोई भाषा न थी.
शोहरत और कुछ कर गुजरने का आकर्षण खींच कर
लाया जिस जगह वहाँ
कुछ नहीं
(दूसरों के स्वप्न को रौंदकर गुज़री हैं
झेलम की सेनाएं
या यह केवल मेरा भ्रम है! )
पाप और पुण्य, कार्य और अकार्य से फारिग कर दिये गए
शोहदों के रचे हुए तंत्र में
समारोह!
किसी भी दिन बदल सकता है,
फ़र्क मामूली है –
छपता है जिस ज़बान में इश्तिहार उसी में कविताएँ हैं!
दो कौड़ी वक़्त
मुझसे कहता है समग्र जियो.
कभी भी समाप्त नहीं,
(दीखती है दूर तक सिकंदर के पैरों की छाप)
अगर रोक सकते हो, रोको संसार को, रोको
जो चाहती थी पैरिस की सड़क से गुजरना
अभिशप्त रफ्तार को
इस हाहाकार को
जिसे होना ही था सियालदा में, हावड़ा में,
मृत्यु के असंख्य कार्यालयों में
घुसती और निकलते हुए.
फिर से आएँगे यूनानी ज्यामिति के प्रश्नों के हल की तलाश में
अन्तरिक्ष युग के लिबास में
औरतें राह देख रही हैं
(हममें से जो भी सैनिक हो
जा सकता है)
किसी के विरोध में न होकर भी सबके विरोध में.
भाड़ में जाय समरनीति.
जो आयें हैं मंसूबा लेकर जीतने का
ढह सकने वाला मकान.
बर्दवान. बर्दवान. फी यात्री तीन टका बर्दवान.
जो भी हो सकती थीं, विधियां हो चुकीं, इच्छा ही
शेष है –
हर पद्धति में क्लेश है.
किसका कर रहे हो शिलान्यास?
बाबर लौटता हुआ समरकंद को, एक बार, करता है
याद खुदावंद को और फिर
कुछ नहीं
ख़ैबर से आओ या ख़ैबर से जाओ
फ़र्क़ मामूली है.
बाबर और समरकंद
बाबर समरकंद के रास्ते पर है
समरकंद बाबर के रास्ते पर
बाबर हर थोड़ी दूर पर
पूछता है
समरकंद अब कितनी दूर है?
बाबर को कोई जवाब नहीं मिलता.
ऊपर चिलचिलाती हुई धूप है
नीचे धूल है
बाबर का घोड़ा चलने में मशगूल है.
समरकंद अब कितनी दूर है?
बाबर चिल्लाता है
कोई जवाब नहीं –
केवल बाबर का घोड़ा हिनहिनाता है.
बाबर के पहले
बाबर की ख़बर पहुँच चुकी है,
रास्तों पर भीड़ है,
बाबर भीड़ के बीच से गुजरता है –
‘खुदा के लिए.’ बाबर गिडगिडाता है.
‘समरकंद अब कितनी दूर है?’
बाबर का सवाल
बाबर के पास लौट आता है.
बाबर सिज़दे में झुकता है
शहर देख रुकता है,
‘समरकंद! समरकंद!’ बुर्ज़ देख
बाबर किलकारी भरता है
‘समरकंद पीछे रह गया है!’
कहता हुआ शहरयार
बाबर के पास से गुजरता है.
बाबर समरकंद के रास्ते पर है
समरकंद बाबर के रास्ते पर
अवन्ती में अनाम
क्या इससे कुछ फ़र्क पड़ेगा
अगर मैं कहूँ
मैं मगध का नहीं
अवन्ती का हूँ?
अवश्य पड़ेगा
तुम अवन्ती के मान लिए जाओगे
मगध को भुलाना पड़ेगा
और तुम
मगध को भुला नहीं पाओगे
जीवन अवन्ती में बिताओगे
तब भी तुम
अवन्ती को जान नहीं पाओगे
तब तुम दुहराओगे
मैं अवन्ती का नहीं
मगध का हूँ
और कोई नहीं मानेगा
बिलबिलाओगे –
‘मैं सच कहता हूँ
मगध का हूँ
मैं अवन्ती का नहीं’
और कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा
मगध के
माने नहीं जाओगे
अवन्ती में
पहचाने नहीं जाओगे
आवागमन
जब भी वह गुज़रा
कोसल से मगध
मगध से कोसल
आते हुए
हरेक ने उससे यही पुछा –
मगध से कोसल
जा रहे हो
या कोसल से
मगध आ रहे हो?
क्या फ़र्क पड़ेगा,
यह कहकर
उसने
टालना चाहा सवाल को.
मगर कुछ
सवालों को
टाला नहीं जा सकता –
विशेषकर तब जब
अक्सर गुज़रते हों हम
कोसल से होते हुए मगध
मगध से होते हुए कोसल
सबमें अहम है यह सवाल
कहाँ जा रहे हो?
कोसल और मगध में
किसे
ढ़ूंढ़ रहे हो?
और यह कि
कोसल
पहले आएगा
या मगध?
सच तो यह है कि
कोई नहीं जानता
वह बार-बार मगध से कोसल
कोसल से मगध क्यों जाता है?
क्यों दृश्यों को दोहराता है?
क्यों
मगध से गुज़रते हुए
कोसल के पक्ष में,
कोसल से गुज़रते हुए
मगध के विपक्ष में
नारे लगाता है?
क्यों,
कोसल के टूटे हुए दुर्गों पर
मगध के
फटे हुए झंडे
फेहराता है?
जब कहीं से कोई
जवाब नहीं मिलता
तब वह भी
उन्हीं में
शामिल हो जाता है
जो आते-जाते को पकड़ते
और पूछते हैं –
कोसल से होते हुए
मगध जा रहे हो
या
मगध से होते हुए
कोसल?
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