गल्प विशेषांक / Fiction Special

नवम्बर २०११ / November 2011

Caught Between Arguments And Raucous Laughter: Kunwar Narain

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जंजीरा का क़िला

समुद्र से घिरा जंजीरा का क़िलाः
सदियों से लहरों के थपेड़े खाती
बुर्जों की गुर्क़ाब बुनियादें
आज भी पुख्ता हैं.

अबीसीनिया के गुलाम-सौदागर
सुरुल ख़ाँ के महल –
दरकती दीवारों पर चढ़ती
जंगली पेड़ों की जिद्दी जड़ें
गरगजों पर पड़ी जंग खाती तोपें,

याद आते
क़िले के आसपास लंगर डाले, या
अरब सागर पार करते
गुलामों से लदे उसके जहाज़…

ग़रीब देशों से अमीर देशों को
निर्यात हो रहे सस्ते मज़दूर!

कभी-कभी इतने क़रीब से
अपने को दुहराता है इतिहास
कि साफ़ सुनायी देती
सुनसान रातों में सागर-तट पर
दूर से आती
कभी सिक्कों तो कभी सिसकियों की आवाज़.

असल बात

बेचैन सोये
शिष्टता से ढंके
मीआदी ज़रूरतों की हवस को

या जागे हैं तो किसलिए ?

इतनी बड़ी दुनिया थी
छोटी पड़ गई
जब भी ज़रा भी फैलना चाहा
बनी बनायी सीमाओं से ज़्यादा.

तमाम लट्ठमार तजुर्बों से घबड़ा कर
सिकोड़ लिया अपने को
अपने ही इतिमिनान की सख्त पीठ के नीचे
कछुए की गर्दन की तरह,
या फिर हड़बड़ा कर भागा
किसी गहराई की तरफ़
जो समझ की पकड़ में आ सकी.

बहसों और क़हक़हों के बीच
अलग बैठे एक खास अंदाज़ से
देखा तो फ़ुज़ूल था क़ाबू इस दुनिया पर;
इससे अच्छा थोड़ी सी हैरत के साथ,
उठ चलो, “वह कौन जगह थी? किस
तारीख़ से किस तारीख़ तक…?”
असल बात तो वह थी
जो हुई नहीं.

लचर बातों की गवाही में, सिफ़ारिश में,
हिफ़ाजत में फंसे रहे आजीवन.
कैसी छूट उन दिमाग़ों से जो कैद हैं
अपने धर्मों में, शहरों में, धन्धों में…
जिनके बाहर भीतर
कोई कहीं नहीं आ जा सकता.

आख़िरी बार फिर पूछता हूँ – असल बात
क्या थी जिसके लिए
इतनी बड़ी सज़ा काटी?

वही चुप्पी? … अच्छा, जाने भी दो…
क्या रक्खा है असलियत में…
एक मुदर्रिस के कुल जमा-ख़र्च-सी
हक़ीक़त का फ़ैसला
अन्तिम फ़ैसला है – बस इतने ही से
काम चलाओ,
जितनी चादर उतना ही पाँव फैलाओ.

माथे पर माथा रखे नहीं
हाथों पर माथा रखे गुज़ारदी जो मुश्किल
यक़ीन नहीं होता इतनी ही बड़ी चीज़ थी
ज़िन्दगी जो तमाम फिसड्डी हरकतों का
दस्तावेज़ होकर रह गई, जिसमें सिवाय
अपनी रोज़मर्रा हत्या के
दूसरा कोई गुनाह तक शामिल नहीं!

नीम के फूल

एक कड़वी-मीठी औषधीय गंध से
भर उठता था घर
जब आँगन में नीम के फूल आते.

साबुन के बुलबुलों-से
हवा में उड़ते सफ़ेद छोटे छोटे फूल
दो एक माँ के बालों में उलझे रह जाते
जब वो तुलसी पर जल चढ़ा कर
आँगन में लौटतीं.

अजीब बात है मैंने उन फूलों को जब भी सोचा
बहुवचन में सोचा.
उन्हें कुम्हलाते कभी नहीं देखा – उस तरह
रंगारंग खिलते भी नहीं देखा
जैसे गुलमुहर या कचनार – पर कुछ था
उनके झरने में, खिलने से भी अधिक
शालीन और गरिमामय, जो न हर्ष था
न विषाद.
जब भी याद आता वह विशाल दीर्घायु वृक्ष
याद आते उपनिषद् : याद आती
एक स्वच्छ सरल जीवन-शैली : उसकी
सदा शान्त छाया में वह एक विचित्र-सी
डदार गुणवत्ता जो गरमी में शीतलता देती
और जाड़ों में गर्माहट. याद आती एक तीखी
पर मित्र-सी सोंधी खुशबू, जैसे बाबा का स्वभाव.
याद आती पेड़ के नीचे सबके लिए
हमेशा पड़ी रहने वाली
बाध की दो-चार खाटें :
निबौलियों से खेलता एक बचपन…

याद आता नीम के नीचे रखे
पिता के पार्थिव शरीर पर
सकुचाते फूलों का वह वीतराग झरना
– जैसे माँ के बाल झर रहे हों –
नन्हें-नन्हें फूल जो आँसू नहीं
सान्त्वना लगते थे.

महा भारत

धृतराष्ट्र अन्धे.
विदुर-नीति हुई फ़ेल.

धर्मराज धूर्तराज दोनों जुआड़ीः
पाँसे खनखनाते हुए
राजनीति में शकुनी का प्रवेश.

न धर्मक्षेत्रे न कुरुक्षेत्रे.
सीधे-सीधे चुनाव क्षेत्रे –
जीत की प्रबल इच्छा से
इकट्ठा हुए महारथियों के
ढपोर शंखी नाद से
युद्ध का श्रीगणेश.

दलों के दलदल में जूझ रहे
आठ धर्म अट्ठारह भाषाएँ अट्ठाईस प्रदेश…

एक ओर रथ पर
शन्त भाव से गीता पकड़े
श्रीकृष्ण,
दूसरी ओर एक हाथ से गाण्डीव
और दूसरे से अपना सिर पकड़े गुडाकेश,
देख रहे
भारत से महा भारत होता हुआ एक देश.

क्या वह नहीं होगा

क्या फिर वही होगा
जिसका हमें डर है?

क्या वह नहीं होगा
जिसकी हमें आशा थी?

क्या हम उसी तरह बिकते रहेंगे बाजारों में
बज़ारों में
अपनी मूर्खताओं के गुलाम?

क्या वे खरीद ले जायेंगे
हमारे बच्चों को दूर देशों में
अपना भविष्य बनवाने के लिए?

क्या वे फिर हमसे उसी तरह
लूट ले जायेंगे हमारा सोना
हमें दिखा कर काँच के चमकते टुकड़े?

और हम क्या इसी तरह
पीढ़ी-दर-पीढ़ी
उन्हें गर्व से दिखाते रहेंगे
अपनी प्राचीनताओं के खण्डहर
अपने मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारे ?

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