आज़ादी विशेषांक / Freedom Special

अंक 13 / Issue 13

इन किताबों के बीच एक शाम मरी हुई है: नीलिम कुमार

nilim-full.jpg

शिलांग, १६ अप्रैल ८९

दुनिया की सबसे सख्त चट्टान एक सफ़ेद देवदार
के नीचे सो रही थी. व्हिस्की का पीला नशा मुझे
इस चट्टान तक ले आया. मुझे नहीं मालूम किसकी
खोज में चट्टान की दरारें और तरेड़ें चाँदनी से भर गई थीं,
चट्टान की क्रिस्टल देह किसी नग्न लड़की की तरह दमक रही थी
कान की मांद में एक पीली हवा सरसरा रही थी

मेरे जूते चाँदनी में ज़र्द पड़ रहे थे. सब कोई
जैसे चाँदनी में नग्न होना चाहता था, मेरे वस्त्र
बेचैन थे. चट्टान तहाई जा रही थी, मुड़तुड़ रही थी
मेरे ओठों की ओर झुकती हुई

दुनिया की सबसे सख्त चट्टान
दो सेकंड के लिए नर्म पड़ रही थी
पीली हवा, चाँदनी और एक सफ़ेद देवदार के नीचे

अचानक एक जंगली काँटा चुभ गया मुझे
मेरे पैरों से खून बह निकला और में हैरान रह गया देखकर
की लाल नहीं, पीला था मेरा खून

शाम

पुस्तकालय में एक शाम मरी हुई है

जिस शाम ने कल
मृतक तारों की पहाड़ी पर खड़े होकर
दो बूँद खून मुझसे माँगा था

कल नहीं जानता था मैं
उस शाम, उस पहाड़ और शाम के रहस्य को

आज इन किताबों के बीच
एक शाम मरी हुई है

जिस शाम के नीचे
क्षण भर के लिए
जी उठती है वह पहाड़ी
और मेरी चेतना में मृत्यु

लहर

लहरें पानी में उठ रही हैं
रजत-सुनहरी लहरें

लहरें मछलियों में बदल गई हैं

लहरें प्रतिकूल दिशा में बह रही हैं
जाल और फंदों से आदमी लहरों को पकड़ रहे हैं

टोकरियाँ लहरों से भरी गई हैं
लहर-रक्त से सने हैं मांस छीलने के चाकू

लहरें दमक रही हैं
नमक और हल्दी की रंगत से

औरतें लहरों से दोपहर पका रही हैं
कटोरे लहरों में छलछला आए हैं

लहरें जा रही हैं
मनुष्यों के पेट में

एक असंभव कविता की तरह
रजत-सुनहरी लहरें.

बचपन

चींटियों से बांबी और उसके करीब
बांसों के कुटुंब
बड़ी उम्र के नर, मोहक मादा
और, उनकी झालरें थामते हुए शिशु
हम उनके करीब खेला करते, उनकी टहनियों और पत्तों के करीब,

उनकी छायाओं के पास
उनके संग हमें खेलते देख बड़ी उम्र के नर गुर्राने लगते.
मेरी छोटी बहन बांबी पर  बैठी थी,
अपनी छाती पर नन्हें स्तनों के चिह्न लिए.

One comment
Leave a comment »

  1. अनकहे को पकड़ने में हमेशा कुछ अनकहा छूट जाता है
    उसी में सूखते पेड़ की छाल को
    थोड़ी देर के लिए ठिठकी नदी अपनी देह पर धारण करती है।
    इस धारण की आवाज जानवरों के पैरों से दबी दूब में
    हवा का सहारा लेकर धीरे से करवट लेती है
    और थोड़ी दूर और चलने की कोशिश करती है
    एक पक्षी की फड़फड़ाहट उसको थाम कर कहीं ले जाती है…
    रवींद्र व्यास, इंदौर

Leave Comment